नागरिक समाज विवेचना की समसामयिक सार्थकता | Contemporary Meaning of Civil Society Discussion

नागरिक समाज विवेचना की समसामयिक सार्थकता
Contemporary Meaning of Civil Society Discussion
नागरिक समाज विवेचना की समसामयिक सार्थकता | Contemporary Meaning of Civil Society Discussion


 नागरिक समाज की सामयिक सार्थकता का विश्लेषण कीजिए ?


हाल में नागरिक समाज नए उत्साह और अन्तर्दृष्टि के साथ राजनीतिक सिद्धान्त में फिर से उभरा है। सुदिप्त कविराज और सुनील खिलनानी ने नागरिक समाज के बारे में अपनी नई पुस्तक में समसामयिक विचार-विमर्श में तीन सूत्रों का उल्लेख किया है:


 सुदिप्त कविराज और सुनील खिलनानी ने नागरिक समाज के बारे में विचार 

एक: 


  • पूर्व सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप की अब तक की साम्यवादी प्रणालियों ने अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र को और राज्य संस्थाओं के प्रभावी नियंत्रणजैसे अफसरशाही के नियंत्रण को लगभग क्षेत्रों पर बढ़ा लिया है। उन साम्यवादी व्यवस्था वाले राज्यों के समाप्त हो जाने के बाद राज्य के वैधानिक अधिकार क्षेत्र के बाहर नागरिक समाज की संस्थाओं की प्रगति को प्रोत्साहित करने में आवश्यकता के बारे में तर्क दिया गया।"

 

दोः

  • वामपंथी राजनीतिक विचार की कम से कम प्रवृत्तियाँ नागरिक समाज के विचार को पुनर्जीवित करने के लिए उत्सुक रही हैं सोवियत प्रयोग तथा समाजवाद के विचार के प्रति निरूत्साह के कारण लोकतंत्र के विचार के प्रति निरुत्साह के कारण लोकतंत्र के विचार में कुछ मूलभूत परिवर्तन लाने और नागरिक समाज के विश्लेषण को फिर से शुरु करने की ओर भी ध्यान गया। थैचर रीगन शासनकाल के दौरान नव-कंजरवेटिव प्रतिक्रिया के वर्षों के दौरान कल्याणकारी राज्य की ओर वापस लौटने के विचार ने ब्रिटिश बहुलवादी परम्परा की भावना को ओर आगे बढ़ाया। "पूँजीवादी पर मानवीकरण की स्थिति का मुकाबला करने के लिए नागरिक समाज में गैर राज्य संगठनों की संघात्मक पहल” को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया गया।

 

तीनः 


  • पश्चिमी देशों में नए सामाजिक आन्दोलनों (नारीवादपर्यावरणवाद) आदि के बारे में वर्तमान चिंतन का नागरिक समाज की विवेचन से कविराज तथा खिलनानी के शब्दों में "संघीय तर्कों तथा विचारों तथा नऐ सामाजिक आन्दोलनों के बीच सुदृढ़ समानता है जो कि श्रेष्ठ श्रमिक वर्ग आन्दोलनों से हितों और रूपों की दृष्टि से बिल्कुल भिन्न हैंमूल लोकतान्त्रिक आकांक्षाओं के वाहक हैं। "

 

तीसरी दुनिया के देशों में नागरिक समाज विकास प्रशासन के क्षेत्र में ग़ैर राजकीय क्षेत्रों (गैर सरकारी संगठनों तथा सामुदायिक संगठनों) को लाने के लिए विश्व बैंक जैसी अन्तर्राष्ट्रीय दाता एजेन्सियों का उपभोग करने में लगे हुए हैं। भारत जैसे देशों में भी नागरिक समाज को सामाजिक परिवर्तनों के माध्यम से परम्परागत दलगत राजनीति की भूमिका तथा क्षमता के बारे में निराशा की भावना से निकलकर लोकतंत्र को व्यापक तथा गहरा बनाने का प्रयास किया जा रहा है।


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