पूर्वाग्रह के कारण | संज्ञानात्मक उपागम विधि |Cognitive approach for Prejudice

 पूर्वाग्रह के कारण Reason of Prejudice in Hindi

पूर्वाग्रह के कारण | संज्ञानात्मक उपागम विधि |Cognitive approach for Prejudice


 पूर्वाग्रह के कारण जान ने की संज्ञानात्मक उपागम विधि  (Cognitive approach) 


  • इस उपागम में पूर्वाग्रह की व्याख्या पूर्वाग्रही व्यक्तियों द्वारा पूर्वाग्रह के लक्ष्य के बारे में किया गया प्रत्यक्ष (perception) तथा उसके बारे में प्राप्त सूचनाओं के संसाधन (Processing) के आधार पर किया जाता है।

 

  • हैमिल्टन (Hamilton 1979) के अनुसार इस उपागम का सम्बन्ध परिस्थिति के वस्तुनिष्ठ तथ्यों (objective reality) से कम तथा पूर्वाग्रह के लक्ष्य के सम्बन्ध में पूर्वग्राही व्यक्तियों द्वारा किया गया आत्मनिष्ठ विश्लेषण से अधिक होता है।

 

(i) अन्तः समूह सदस्यों एवं बाह्य समूह सदस्यों में विभिन्नता- 

  • कुछ समाज मनोवैज्ञानिकों ने पूर्वाग्रह का कारण अन्तः समूह सदस्यों एवं बाह्य समूह सदस्यों के गुणों में विभिन्नता बतलाया है। अन्तः समूह (in-group) से तात्पर्य उस समूह से होता है जिसका व्यक्ति सदस्य होता है तथा बाह्य समूह से यहाँ तात्पर्य उस समूह से होता है जिसका सदस्य वह स्वयं नहीं होता है। परन्तु जिसके सदस्य पूर्वाग्रह का निशाना होते हैं। कम उम्र के एक व्यक्ति के लिए कम उम्र के व्यक्तियों का समूह अन्तः समूह (in group) हुआ परन्तु बूढ़े लोगों का समूह बाह्य समूह (out-group) का उदाहरण हुआ। 


  • डाउनिंग तथा मोनाको (Downing & monaco 1982) के अनुसार अन्तः समूह के के सदस्यों एवं बाह्य समूह के सदस्यों के बीच जितना ही कम सम्पर्क होता हैबाह्य समूह के सदस्यों के प्रति पूर्वाग्रह उतना ही मजबूत होता है। यही कारण है कि एक जाति विशेष का व्यक्ति अपनी जाति के लोगों के प्रति कम पूर्वाग्रही (prejudiced) होता है। परन्तु अन्य जाति के लोगों के प्रति अधिक पूर्वाग्रही होता है।

 

(ii) आरोपण सिद्धान्त (Attribution theory)- 

  • आरोपण सिद्धान्त पर आधारित व्याख्या के अनुसार पूर्वाग्रही नकारात्मक व्यवहार का कारण उस व्यक्ति या समूह में विदित व्यक्तिगत गुणों को माना जाता हैपरन्तु जब उसके द्वारा कोई धनात्मक व्यवहार (positive behaviour) किया जाता है तो पूर्वाग्रही व्यक्ति उसकी प्रशंसा न करके उनका कारण भाग्यअधिक प्रयास अपवादात्मक व्यवहार (exceptional behaviour) आदि बतलाकर अपने आप को संतुष्ट कर लेता है। इसे पेटिग्रिक (pettigrew) ने निर्णायक आरोपण त्रुटि कहा जाता है।

 

उदाहरण- उच्च जाति के लोग अक्सर दलितों के प्रति पूर्वाग्रही होते हैंयदि कोई दलितचोरीडकैतीआदि काण्ड में पकड़ा जाता हैतो उच्च जाति के लोग यही कहते हैं कि यह उनका खानदानी धंधा है और इन्हीं कामों के लिए ही उनका जन्म हुआ है। परन्तु यदि कोई दलित एक बड़ा पदाधिकारी बन जाता है या समाज सुधारक .बन जाता है तो वे लोग उनकी प्रशंसा न करके प्रायः यही कहते हैं कि संयोगवश ऐसा हो गया है।

 

  • पेटिग्रीऊ ने अपने अध्ययन के आधार पर यह भी बतलाया है कि जब दो व्यक्तियों या समूहों के बीच बैर-भाव एवं संघर्ष का इतिहासलम्बा होता हैतो निर्णायक आरोपण त्रुटि की मात्रा भी अधिक होती है। 

  • पेटीग्रीऊ द्वारा की गई पूर्वाग्रह की व्याख्या को टेलर एवं जागी (Talor & Jaggi, 1974) द्वारा दक्षिण भारत में हिन्दू किरानियों पर किये गये अध्ययन से पूर्ण समर्थन मिलता है।


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