बादशाह के रूप में जहांगीर का आकलन Assessment of Jahangir as emperor

बादशाह के रूप में जहांगीर का आकलन Assessment of Jahangir as emperor

 

बादशाह के रूप में जहांगीर का आकलन Assessment of Jahangir as emperor

  • सन् 1605 से 1627 तक के अपने शासनकाल में जहांगीर ने विशेष उपलब्धियां अर्जित नहीं कीं परन्तु अकबर की धार्मिकराजपूत तथा प्रशासनिक नीतियों का अनुगमन कर उसने अपनी व्यावहारिक बुद्धिमत्ता का परिचय अवश्य दिया। 
  • जहांगीर ने एक न्यायप्रिय शासक के रूप में स्वयं को प्रतिष्ठित किया किन्तु वास्तव में वह एक न्यायप्रिय शासक कहलाने का अधिकारी नहीं था। 
  • जहांगीर की राजपूत नीति सफल रही। मेवाड़ के शासक राणा अमर सिंह को पराजित कर जब सन् 1615 में शहज़ादे खुर्रम ने मुगलों की आधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार कर लिया तब जहांगीर ने उसको न केवल मुगल दरबार में उपस्थित होने की बाध्यता से मुक्त किया अपितु उसे शाही सम्मान व शाही उपहारों से अलंकृत कर मेवाड़ को मुगलों का स्थायी मित्र बना लिया। 
  • उसने साम्राज्य विस्तार की दृष्टि से कांगड़ा की विजय की किन्तु उसके काल में कान्धार मुगल साम्राज्य से निकल गया और अहमदनगर में मलिक अम्बर के नेतृत्व में मुगलों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया गया। 
  •  जहांगीर स्वयं एक लब्धप्रतिष्ठ लेखक था। उसकी तुज़ुक-ए-जहांगीरी उसके शासनकाल का प्रामाणिक दस्तावेज़ है। 
  • जहांगीर के शासनकाल में चित्रकला अपने शिखर पर पहुंच गई थी। 
  • जहांगीर के शासनकाल के अन्तिम पाँच वर्ष नूरजहां की अनियन्त्रित शक्ति के विरोध में शाहजहां और महाबत खाँ के विद्रोहों की छाया में बीते थे। अपनी विलासप्रियतामद्यपान के बुरे व्यसनआलस्य और शिथिलता तथा राजकाज की बागडोर पूरी तरह नूरजहां पर छोड़ने के कारण जहांगीर ने मुगलों की प्रतिष्ठा तथा बादशाह के गौरव को अपूर्णनीय क्षति पहुंचाई थी।
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