वायु अपरदन द्वारा निर्मित प्रमुख स्थलाकृति | पवन और उसके कार्य | Pavan Aur Uske Karya

वायु अपरदन द्वारा निर्मित प्रमुख स्थलाकृति

पवन और उसके कार्य | Pavan Aur Uske Karya

वायु अपरदन द्वारा निर्मित प्रमुख स्थलाकृति | पवन और उसके कार्य | Pavan Aur Uske Karya


पवन किसे कहते हैं 

  • वायुमण्डल की गतिशीलता को पवन कहा जाता है. प्रवाहित जल और हिमनद की भाँति वायु भी भूपृष्ठ पर अपरदन, परिवहन और निक्षेपण कार्य करती है. नदी की भाँति पवन के भी अपरदनात्मक परिवहनात्मक और निक्षेपणात्मक कार्य हैं और उनसे निर्मित भू-आकृतियाँ उल्लेखनीय भौगोलिक अध्ययन का एक महत्वपूर्ण अंग हैं.


यह भी पढ़ें... पवन के बारे में जानकारी 


पवन के अपरदनात्मक कार्य

  • पवन के अपरदनात्मक कार्य को प्रभावित करने वाले तत्वों में (1) जलवायु (2) पवन का वेग (3) शैल संरचना (4) पवन के अपरदनकारी यंत्र और वनस्पति की मात्रा मुख्य हैं :


वायु अपरदन द्वारा निर्मित प्रमुख स्थलाकृति

वायु अपरदन द्वारा निर्मित प्रमुख स्थलाकृतियों में

(1) वातगर्त 

(2) इन्सेलबर्ग 

(3) छत्रकशिला 

(4) ज्यूगेन 

(5) यारडांग 

(6) देमोइजेल 

(7) पवन गवाक्ष 

(8) ड्राई कान्टर या त्रिकोणक और प्रस्तर जालक आदि.


वातगर्त (Blowout)

  • अल्प वृष्टि के शुष्क एवं रेतीले मरुस्थलीय प्रदेशों में पवन की अपवाहन क्रिया द्वारा निर्मित गर्त को वातगर्त कहते हैं. जब पवन चक्राकार रूप में चलती है तब अगठित और अबद्ध शैलों के कणों और खण्डों को अपवाह क्रिया से उड़ा ले जाती है और इस प्रकार बने गर्तों को वातगर्त (Blowout) कहते हैं. दक्षिणी कैलीफोर्निया और न्यू मैक्सिको में मोण्टाना से टैक्सास के क्षेत्रों में ऐसे हजारों वातगर्त दृष्टिगोचर होते हैं.

 

इन्सेलबर्ग (Inselberg)-

  • मरुस्थलीय प्रदेशों की अवशिष्ट शैलपिण्ड या ऊँचे-ऊँचे टीले हैं जो परि अनाच्छादन क्रिया द्वारा विलग हो जाता है. इस प्रकार के इन्सेलबर्ग पवन के अपरदन द्वारा चिकना और गुम्बदाकार आकृति का अवशिष्ट भाग होता है. कालाहारी के मरुस्थलीय भागों में, अल्जीरिया, नाइजीरिया और रोडेशिया के मरुस्थलों में मिलते हैं.

छत्रक शिला (Mushroom Rock)

  • छतरीनुमा शैल आकृति को छत्रक शिला कहते हैं जो मरुस्थलीय क्षेत्रों में मुलायम शैलों के अधिक और कठोर शैलों के कम अपरदन के परिणामस्वरूप बनते हैं. इन्हें गारा (Gara) भी कहते हैं. जर्मनी में इन्हें पिट्जफेल्सन कहते हैं । 

 

ज्यूगेन (Zeugen) - 

  • मरुस्थलों में प्रतिरोधी एवं कठोर शैलों के सपाट टेबिलनुमा स्तरित शैलपिण्ड हैं जो कठोर और मुलायम शैलों की परतों के क्षैतिज दिशा में एक-दूसरे के ऊपर होती है उन क्षेत्रों में पवन के विभेदी अपरदन के निघर्षण प्रभाव द्वारा इस प्रकार की स्थलाकृति का निर्माण होता है। 

 

यारडंग (Yardang)- 

  • यारडंग की रचना ज्यूगेन के विपरीत होती है, जब कोमल तथा कठोर चट्टानों के स्तर लम्बवत् दिशा में मिलते हैं तो पवन कठोर शैल की अपेक्षा मुलायम शैल को शीघ्र अपरदित करके उड़ा ले जाती है. इस प्रकार कोमल शैलों के अपरदित होकर उड़ जाने के कारण कठोर चट्टानों के भाग खड़े रह जाते हैं इन्हें यारडंग कहते हैं यारडंग ईरान, इराक, अरब और मध्य एशिया के अन्य मरुस्थलों में बहुतायत में मिलता है

भूस्तम्भ (Demoiselles)

  • एक प्रकार का भूस्तम्भ है जो कठोर शैल या गोलाश्म के आवरण द्वारा आरक्षित होता है मरुस्थलीय प्रदेशों में जब मुलायम शैल के ऊपर कठोर शैल खण्ड स्थित होती है तो वह अपने नीचे की मुलायम शैल को अपरदन से बचाती है तथा निकटवर्ती मुलायम शैल के अपरदन के उपरान्त एक स्तम्भ के रूप में अवशिष्ट रह जाती है इसी को भूस्तम्भ कहते हैं मंगोलिया, तुर्किस्तान, इराक, अरब, पीरू के मरुस्थलों में अनेक भूस्तम्भ मिलते हैं। 


पवन गवाक्ष (Wind Window)

  • पवन के बहने की दिशा के सम्मुख वाले छिद्र पवन के बालू क्षेपण की अपरदन क्रिया से धीरे धीरे बड़े होते जाते हैं. कालान्तर में इन छिद्रों का विस्तार अधिक हो जाता है तो इन्हें 'पवन गवाक्ष' कहते हैं. दक्षिणी पूर्वी यूटाह (सं. रा. अ.) में ऐसे अनेक उदाहरण देखे जाते हैं


ड्राइकान्टर या त्रिकोणक (Dreikanter)

  • कठोर एवं मुलायम दोनों प्रकार के शैल पदार्थों से निर्मित प्रस्तर का प्रचण्ड वेग से प्रवाहित होने वाले पवन के मार्ग में स्थित होने से होती है पवन मुलायम शैल न पदार्थों का अपरदन कर देती है और कठोर 1 शैल पदार्थ कम प्रभावित रह कर ही स्थान पर स्थिर रहता है, इससे उस प्रस्तर में मुलायम शैल पदार्थों के स्थान पर छिद्र बन जाते हैं. यह छिद्रयुक्त जालीनुमा खण्ड प्रस्तर जालक कहलाता है.

पवन या वायु के निक्षेपण से बनी भू-आकृतियाँ

निक्षेपणात्मक मरुस्थलीय भू-आकृतियाँ 

वायु के निक्षेपणात्मक कार्य से निर्मित भू-आकृतियों में लोयस, बालुका स्तूप, बरखान प्रमुख हैं.


लोयस (Loess)-

  • अत्यन्त बारीक कणों की सम्बद्ध चूर्णशील सूक्ष्मरन्धी और पीले रंग की धूलि को पवन उड़ा कर ले जाती है और किसी स्थान पर निक्षेपित करती है. उस स्थान को लोयस (Loess) कहते हैं. लोयस चीन, संयुक्त राज्य अमरीका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड और र दक्षिणी अमरीका में अर्जेन्टाइना के मैदानों ई में पाए जाते हैं। 


बालुका स्तूप (Sand Dunes)

  • पवन द्वारा लाए हुए रेत की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ या टेकरियों को बालुका स्तूप कहते हैं  यह मरुस्थलीय और अर्द्धमरुस्थलीय घ क्षेत्रों में अधिक बनते हैं. इनका आकार गोल नव चन्द्राकार और अनुवृत्ताकार होता है इन्हें सहारा के मरुस्थल में अर्ग (Erg) और तुर्किस्तान में कू म (Koum) के नाम से पुकारते हैं. आकृतियों के आधार पर बालुका स्तूप कई प्रकार के होते हैं जैसे शीर्ष स्तूप, पुच्छ स्तूप, अग्रगत स्तूप, पार्श्विक स्तूप और पश्चवर्ती स्तूप इनके बनने की स्थिति के आधार पर इन्हें तटीय बालुका स्तूप, सरोवरीय बालुका स्तूप, मरुस्थलीय बालुका स्तूप कहते हैं संरचना की दृष्टि से इन्हें अनुदैर्ध्य, परवलयिक, अनुप्रस्थ आदि में विभाजित किया जा सकता है। 


बरखान (Barkhan) 

  • पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति में बरखान विशेष उल्लेखनीय है जिसका तात्पर्य नव चन्द्राकार एवं चापाकार बालुका स्तूप से है जो पवन प्रवाह की दिशा से अनुप्रस्थीय दिशा में स्थित होता है और इसके शृंग उस दिशा की ओर अनुगमन करते हैं जिसमें पवन बहती है, क्योंकि स्तूप के सिरों पर प्रवाहित किए जाने के लिए थोड़ी रेत की मात्रा होती है बरखान स्तूपों के लिए सहारा, सीरिया, अरब, मिस और तुर्किस्तान के प्रदेश विशेष उल्लेखनीय हैं। 


सामुद्रिक अपरदन द्वारा निर्मित स्थलाकृतियाँ

  • सामुद्रिक अपरदन- मुख्यतः लहरों द्वारा होता है इसके लिए जलगति क्रिया, संघर्षण क्रिया, सन्निघर्षण क्रिया, चट्टानों की धुलाव क्रिया, जलीय दाब क्रिया उत्तरदायी हैं. सामुद्रिक जल द्वारा अपरदित स्थला कृतियों में भृगु, कगार, तरंग घर्षित महावेदी, शैल भीति, महराव, अपतटीय सोपान प्रमुख हैं। 
  • निक्षेपित स्थलाकृतियों में तरंग जनित महावेदी पुलिन कूट, पुलिन उभयाग्र. पुलिन, रोधिका तथा रोध, अपतटीय रोधिकोरोधी द्वीप, ज्वारीय प्रवेश मार्ग, संलग्न भित्तियाँ. संयोजक रोधिका अंकुश, आदि मुख्य है
  • भूमिगत जल द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों में लैपीज, घोलरन्ध्र, पोनोर युवालाज, पोल्जी, डोलाइन, कार्स्ट खिड़की, प्राकृतिक पुल अन्धी घाटी, कन्दराएँ अपरदित स्थलाकृतियाँ हैं। 
  • प्रतिस्थापन, ग्रन्थिका, समानुस्तरण अशचुताश्म या स्टैलैक्टाइट और निशचुताश्म या स्टैलैग्माइट, कन्दरा स्तम्भ,  निक्षेपित स्थलाकृति   हैं। 

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