रवीन्द्रनाथ टैगोर का मानवतावाद | Ravindra Nath Tagore Manvta vaad

 रवीन्द्रनाथ टैगोर का  मानवतावाद 

रवीन्द्रनाथ टैगोर का मानव धर्म


रवीन्द्रनाथ टैगोर का मानव धर्म

  • प्राचीन मनीषियों जैसा सुगठित शरीर, दाढ़ी, घनी पतली भोहें, सिर पर भारतीयता के द्योतक ने जटाएँ, उन्नत ललाट, ममता और करुणा से प्लावित आंखें, लम्बी श्वेत अपनी ही ढंग का अद्भुत चोगा मानो कुछ कहना चाहते हो, ऐसा था स्वरूप गुरुदेव था।
  • रवीन्द्रनाथ टैगोर भारत के उन दैदीप्यमान रत्नों में से एक हैं, जिन्होंने भारत के चेहरे को पढ़ने का प्रयास किया, जिन्होंने भारत के खोए हुए आत्म-विश्वास को ढूँढने का प्रयास किया, जिन्होंने मानवता की कष्टों से राहत, छुटकारे और बोध के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया, जिन्होंने भारत के वेदों और उपनिषदों और मृतप्राय: संस्कृति को नवीन जीवन और चेतना देकर अंतर्राष्ट्रीय प्रांगण में खड़ा किया,
  • जिन्होंने देश के रग-रग में 'उत्थिव्यम् ' जाग्रतव्यम् और 'बोधितव्य' की भावना का संचार किया, जिन्होंने प्रकृति की मंद सिहरन और रहस्यमय रूप से तादात्म्य स्थापित किया, जिन्होंने कला को सौंदर्य का बोध दिया, जिन्होंने सौंदर्य को गति दी और जिन्होंने गति को शिव तक पहुँचाया। 
  • टैगोर मानवता के असीम पुजारी थे। उनकी दृष्टि में मनुष्य विधाता की अनुपम कृति है। विश्व में उसका स्थान संदिग्ध नहीं। जीवन और मृत्यु की सीमा के अंतर्गत मानव कर्त्तव्य, आत्म-चिंतन, प्रेम और कर्तव्य-निष्ठा में है। इसी में जीवन की शांति और वास्तविक सुख है।
  • टैगोर-साहित्य, उपनिषद् की प्रस्तावना है। उनका अध्यात्म उपनिषद् की नींव पर खड़ा है। टैगोर की दार्शनिक विचारधाराओं के अनुसार मानव ईश्वर से पृथक नहीं।
  • संसार ईश्वर की कृति नहीं, वरन् ईश्वर का स्वरूप है अतः ईश्वर  से पार्थक्य  नहीं हो सकता।
  • प्रकृति-बाह्य संसार ही ईश्वर है। इस बाहा संसार  के ज्ञान  से ही हम अपने आत्म को पहचान सकते हैं। आत्म की पहचान मस्तिष्क के विकास से ही सम्भव है। 
  • प्रकृति की पूर्णता में योगदान ही व्यक्तिगत आत्म- चिंतन का मार्ग है। संसार में वही महान् हुआ है, जिसने आत्म-त्याग और समाज-सेवा की है। मानवता से प्रेम करना ही मानव का प्रथम कर्तव्य है। 
  • टैगोर ने विश्व को मानवता का संदेश दिया। उन्होंने मानव जाति की एकता पर बल दिया। एकता वही है, जो नैसर्गिक विभिन्नता से अनुप्राणित और परिपूर्ण हो। टैगोर के दृष्टिकोण में मानव जाति के पूर्ण विकास के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विभिन्नताएँ आवश्यक हैं।

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