बैंकों का राष्ट्रीयकरण तथा राष्ट्रीयकरण के पश्चात प्रगति | Nationalization of Bank in Hindi

 

बैंकों का राष्ट्रीयकरण तथा राष्ट्रीयकरण के पश्चात प्रगति

Nationalization of Bank in Hindi


बैंकों का इतिहास अत्यन्त ही पुराना होने के साथ गत्यात्मक भी रहा है। बैंकों की स्थापना निजी क्षेत्र से प्रारम्भ हुई।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण का अर्थ

राष्ट्रीयकरण से तात्पर्य बैंकों की परिसम्पत्ति तथा कार्यप्रणाली पर सरकारी स्वामित्त्व एवं नियंत्रण से लगाया जाता है।

राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया भी भारत में समय-समय पर अलग-अलग स्तरों पर प्रारम्भ की गयी। देश के आजाद होने के बाद इस दिशा में और महत्वपूर्ण कदम उठाये गये जो वर्तमान में अत्यन्त ही महत्वपूर्ण सिद्ध हुए हैं।

वर्तमान में राष्ट्रीयकृत बैंकों के साथ निजी क्षेत्र की बैंकों का भी अस्तित्व महत्वपूर्ण हो गया है जो विश्व अर्थव्यवस्था की कार्यप्रणाली से प्रभावित है।

सामान्य स्तर राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया का भारतीय रिजर्व बैंक से अत्यन्त गहरा सम्बन्ध है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में होने वाले आधारभूत परिवर्तन भी इस दिशा में महत्वपूर्ण सार्थक सिद्ध हो रहे हैं।


बैंकों के राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता

उन्नीसवीं सदी के पूवर्द्धि में अनेक प्रकार की आर्थिक, राजनैतिक तथा वैश्विक समस्याओं का सामना करने के बाद भी देशी बैंकर तथा निजी  बैंकिंग प्रणाली ने भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण प्रभावी योगदान अदा किया है फिर भी ब्रिटिश शासन की मौद्रिक नीतियों के कारण बैंकों का राष्ट्रीयकरण आवश्यक समझा गया।

सन् 1931 में केन्द्रीय बैंकिंग जाँच समिति (Central Banking Enquiry Committee) ने भी भारतीय मौद्रिक बाजार में देशी बैंकर एवं आधुनिक बैंकिंग प्रणाली के मध्य सामन्जस्य पर बल दिया तथा देशी बैंकरों के बैंक-कार्य का रिजर्व बैंक से सम्पर्क स्थापित करने की सिफारिश की गयी। 


द्वितीय युद्ध के परिणाम स्वरूप सन् 1939-40 के बाद मुद्रा  प्रसार के कारण बैंकों के विक्षेप बढ़  गये तथा अर्थव्यवस्था की लगातार गतिशीलता का लाभ उठाने के लिए पुराने बैंकों ने नई-नई शाखाएं खोलना प्रारम्भ किया तथा इस प्रक्रिया से प्रभावित होकर नये बैंकों को भी स्थापित किया गया। 

बैंकों की लगातार प्रगति तथा बढ़ते भूमिका के कारण बैंकों की लाभदायिकता को नियंत्रित करना मौद्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक माना गया तथा उपभोक्ताओं के हितों को सुरक्षित किया जाना भी आवश्यक समझा गया।

देश की स्वतंत्रता के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को गत्यात्मकता देने की आवश्यकता महसूस की गयी। सरकार ने माना कि भारतीय रिजर्व बैंक के राष्ट्रीयकरण से भारतीय अर्थव्यवस्था को मौद्रिक गतिविधियों की दृष्टि से एक नई दिशा प्राप्त होगी तथा देश के आर्थिक विकास में सहायता मिलेगी।

वही बैंकिंग क्षेत्र द्वारा लगातार अर्थव्यवस्था में प्राथमिकताओं का भी निर्धारण नहीं किया जा रहा था।


भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता आर्थिक तथा अन्य सामाजिक पहलुओं के आधार पर न्यायोजित ठहराई गयी। देश में औद्योगीकरण के विकास के साथ समाजवादी ढंग से समाज की संरचना के उद्देश्य को ध्यान में रखकर बैंकिंग राष्ट्रीयकरण की दिशा में कदम उठाया गया। 

राष्ट्रीयकरण से पूर्व वाणिज्यिक बैंक ऐसे कार्यों का सम्पादन सुचारू रूप से नहीं कर सके जिनकी आजादी के बाद अपेक्षा की गयी थी जिसमें मुख्य रूप से देश में छोटे तथा मध्यम क्षेणी के उद्यमकर्ताओं का विकास शामिल था। 

यह आवश्यक समझा गया कि देश में आर्थिक विकास को गति तभी मिल सकती है जब मध्यम वर्गीय समाज स्वरोजगार तथा उद्यमों से सम्बन्धित किया जा सकता है। 

आर्थिक विकास के लाभों का केन्द्रीयकरण होने की बजाय समाज के सभी वर्गों में फैलाव सुनिश्चित हो।

कुछ वर्ग विशेष तक ही आर्थिक विकास की प्रक्रिया का सिमटकर रह जाना आर्थिक विकास का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता है भारतीय नीति निर्माताओं ने यह आशा व्यक्त की थी कि आर्थिक विकास के दौर में बैंकिंग प्रणाली इन प्रभावों को समाज के मध्य फैलाने में सहायक होगी। 

1969 में चौदह वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण के `बाद देश में कृषि उद्योग तथा सेवा क्षेत्र में भी सामाजिक ढंग से विकास की रणनीति तय की गयी जिसमें बैंकों की भूमिका को और अत्यधिक बढ़ाने पर जोर दिय गया।

द्वितीय क्रम में बैंकों के राष्ट्रीयकरण तक भारत सरकार समाजवादी सामाजिक ढाँचे के विकास पर जोर देती रही।

बैंकों का राष्ट्रीयकरण

भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण की शुरूआत सरकार का एक वृहद एक सामाजिक आर्थिक परिवर्तनकारी प्रयास रहा।

भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 के अन्तर्गत 01 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की गयी।

वर्ष 1945 में भारतीय बैंकिंग प्रणाली का समन्वित नियमन करने हेतु भारतीय बैंकिंग अधिनियम पारित किया गया। इसी दौरान 01 जनवरी 1949 को भारतीय रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और देश की मौद्रिक वित्तीय व्यवस्था के प्रचालन, संगठन, निरीक्षण, विनियमन व विकास में अग्रणी भूमिका का उत्तरदायित्व भारतीय रिजर्व बैंक को सौंपा गया।

1950 के दशक में सरकार पर देश की वित्तीय व्यवस्था को मजबूती देने के साथ-साथ जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी बढ़ती गयी। 

सन 1960 के दशक में हरित क्रान्ति के लागू करने से देश की अर्थव्यवस्था के विकास की जिम्मेदारी बैंकिंग प्रणाली पर आना स्वाभाविक हो गया। कृषि का विकास ग्राम भृण की समुचित व्यवस्था के बिना सम्भव नहीं था। 

राष्ट्रीयकरण के पूर्व से ही बैंकिंग प्रणाली में समय-समय पर सुधार एवं परिवर्तन सम्बन्धी विचार उत्पन्न होने लगे थे।

सरकार को सकारात्मक तथा प्रतिकूलात्मक दृष्टिकोणों के मध्य सामन्जस्य स्थापित करने की आवश्यकता थी जिसके लिए वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया को एक कारगार उपाय समझा गया था।

01 जुलाई 1955 को इम्पीरियल बैंक ऑफ इण्डिया का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा इसका नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया कर दिया गया। इसके साथ 8 अन्य बैंकों की सहायक बैंक के रूप में बदलकर स्टेट बैंक समूह' गठित किया गया।

स्टेट बैंक समूह

1. स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर

2. स्टेट बैंक ऑफ जयपुर

3. स्टेट बैंक ऑफ हैदाराबाद

4. स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर

5. स्टेट बैंक ऑफ मैसूर

6. स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र

7. स्टेट बैंक ऑफ पटियाला

8. स्टेट बैंक ऑफ द्रावनकोर

स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर के एकीकरण के बाद इस समूह में बैंकों की संख्या 7 रह गयी।

जुलाई 2008 में स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र तथा जून 2009 को स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर का स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया में विलय के परिणामस्वरूप एस.बी.आई. समूह में बैंकों की संख्या वर्तमान में 5 रह गयी है।

वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण

19 जुलाई 1969 को 14 बड़े वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया जो निम्नवत हैं

  1. सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
  2. यूनाइटेड बैंक ऑफ इण्डिया (CBI)
  3. यूनियन बैंक ऑफ इण्डिया
  4. बैंक बॉफ इण्डिया (BOI)
  5. देना बैंक
  6. पंजाब नेशनल बैंक (PNB)
  7. इलाहाबाद बैंक
  8. केनरा बैंक
  9. इण्डियन बैंक
  10. इण्डियन ओवरसीज बैंक (IOB) 
  11. यूनाइटेड कामर्शियल बैंक
  12. सिंडीकेट
  13. बैंक ऑफ बड़ौदा (BOB)
  14. बैंक ऑफ महाराष्ट्र

15 अप्रैल 1980 को निजी क्षेत्र के 6 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया जिनमें शामिल

बैंक निम्नलिखित थीं :

  1. आन्ध्रा बैंक
  2. पंजाब एण्ड सिन्ध बैंक
  3. न्यू बैंक ऑफ इण्डिया
  4. विजया बैंक
  5. कॉर्पोरेशन बैंक
  6. ओरियण्टल बैंक ऑफ कॉमर्स

बैंकों के विलयन की प्रक्रिया जारी रही तथा 4 सितम्बर 1993 को भारत सरकार द्वारा न्यू बैंक ऑफ इण्डिया का विलय पंजाब नेशनल बैंक में कर दिया गया।

1 अप्रैल 2020 से 6 बैंक सिंडीकेट बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, कारपोरेशन बैंक और आंध्रा बैंक का अस्तित्व समाप्त हो गया है । इन बैंकों को 4 बैंकों में मर्जर कर दिया गया है । जो 4 बैंक होंगे केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, इंडियन बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया। अब देश में राष्ट्रीयकृत बैंक की संख्या 12 हो गयी । 

राष्ट्रीयकृत बैंक की सूची देखने के लिए यहाँ क्लिक करें 


Question


  • भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी तथा भारतीय अर्थव्यवस्था में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का क्या महत्व है?
  • राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया क्या है तथा भारतीय रिजर्व बैंक व अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किस प्रकार हुआ?
  •  बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग क्षेत्र में क्या प्रगति हुई तथा उसकी गति क्या रही?
  • राष्ट्रीयकृत बैंकों की प्रगति के साथ-साथ बैंकों की प्रगति किस प्रकार रही तथा निजी क्षेत्र की बैंकों की क्या उपयोगिता रही?

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