रिजर्व बैंक के कार्य | भारतीय रिजर्व बैंक के मुख्य कार्य


भारतीय रिजर्व बैंक के मुख्य कार्य

रिजर्व बैंक के कार्य Functions of Reserve Bank

सन् 1934 ई. में पारित रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट की प्रस्तावना के अनुसार रिजर्व बैंक प्रमुख रूप पर से भारत में मौद्रिक स्थिरता स्थापित करने तथा देशहित में मुद्रा तथा साख प्रणाली का संचालन करने के उद्देश्य से नोटों के निर्गमन का नियमन करना तथा रक्षित कोषों को रखने का कार्य करता है। इसके अतिरिक्त देश में वर्तमान की परिस्थितियों के अनुरूप रिजर्व बैंक को समय-समय पर अनेक कार्य करने पड़ते हैं रिजर्व बैंक को समय-समय पर अनेक प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं रिजर्व बैंक के कार्यों को मुख्यतः निम्न भागों में बांटा जा सकता है।

  • 1.केन्द्रीय बैंकिग के कार्य
  • 2. सामान्य बैंकिग कार्य
  • 3. उपभोक्ता केन्द्रित कार्य


1. केन्द्रीय बैंकिग कार्य

1. रिजर्व बैंक करेन्सी अधिकारी के रूप में

  • भारत में एक रूपये को नोट, सिक्के ओर छोटे सिक्कों को छोड़कर सभी करेंसी नोटों का निर्गमन का एकाधिकार रिजर्व बैंक को प्राप्त है। एक रूपये के नोट, सिक्के तथा छोटे सिक्कोें को भारत सरकार द्वारा जारी किया जाता है।
  • वर्तमान में रिजर्व बैंक भारतीय करेंसी का बड़ा भाग 2, 5, 10, 20, 50, 100, 200, 5000, 1000 तथा 2000 रूपये के नोटों के रूप निर्गमन करता है। पूर्व में यह 5000 एवं 10000 रूपये के नोटों का भी निर्गमन करता था लेकिन बाद में अर्थव्यवस्था में काले धन को चलन से बाहर करने तथा कालेधन पर रोकथाम करने के लिए उन्हें विमुद्रीकृत कर दिया गया।
  • वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदार दास मोदी ने 8 नंवबर की आधी रात को 500 तथा 1000 रूप्ये के नोटों को विमुद्रीकृत किया तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया कालेधन की रोकथाम के लिए 500 तथा 2000 रूपये का नया नोट लेकर आया।
  • रिजर्व बैंक द्वारा जारी सभी नोट असीमित विधिग्राहा होते हैं और केन्द्र सरकार की उन पर गारंटी होती है। बैंक द्वारा नोट निर्गमन का कार्य अन्य बैंकिंग कार्य से अलग होता है। इसलिए रिजर्व बैंक केे दो अलग-अलग विभाग होते हैं पहला- नोट निर्गमन विभाग और दूसरा बैकिंग विभाग।
  • नोट निर्गमन विभाग की स्थिति विवरण बैकिंग विभाग की परिसम्पत्तियों तथा देनदारियों से अलग रखी जाती है। देश की करेंसी पर जनता का विश्वास कायम रहे इसके लिए रिजर्व बैंक का नोट निर्गमन विभाग करेंसी मूल्य के नोटों के बराबर सुरक्षित कोष में स्वर्ण के सिक्के, बहूमूल्य धातुएं, विदेशी प्रतिभूतियां भारत सरकार की प्रतिभूतियॉ तथा ऐसे विनिमय बिल तथा प्रतिज्ञा पत्र रखता है जिनका भुगतान भारत सरकार में होना है।
  • बैकिंग विभाग की मांग तथा इसके द्वारा हस्तांतरित विनिमय बिलों अथवा सरकारी प्रतिभूतियों आदि के आधार पर निर्गमन विभाग नोट जारी अथवा रद्द करता है। चलन में मुद्रा को लाने तथा हटाने का कार्य बैंकिग विभाग द्वारा किया जाता है।

2. साख नियंत्रण एवं मुद्रा पूर्ति

  • भारत के केन्द्रीय बैंक के रूप में रिजर्व बैंक का एक महत्वपूर्ण कार्य है मुद्रा पूर्ति तथा बैंको की साख की मात्रा को राष्ट्रीय हित में उच्चतम स्तर पर नियंत्रण करना। 
  • साख नियंत्रण से अभिप्राय बैंको को ऋण देने की नीति को नियंत्रित करने से है। इन्हें प्राप्त करने हेतु साख नियंत्रण भी अति आवश्यक है। रिजर्व बैंक को साख नियंत्रण के विविध अधिकार प्राप्त है जिन्हें आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाया जा सकता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट के अनुसार बैंक के पास साख नियंत्रण के विभिन्न अधिकार उपाय हैं। जिनमें से मुख्य रूप से बैंक दर में परिवर्तन खुले बाजार की क्रियायें करने, बैंकों के नकद कोषों की मात्रा में परिवर्तन करने जैसे अधिकार हैं। आवश्यकता पड़ने पर रिजर्व बैंक वाणिज्यक बैंको की ऋण नीति, निवेश नीति तथा ब्याज नीति को पूर्णतया नियंत्रित कर सकता है।

3. बैकिंग तथा वित्तीय व्यवसाय का नियमन

  • बैंकिंग तथा वित्तीय व्यवस्था के नियमन/नियंत्रण हेतु भारतीय बैंकिग अधिनियम 1949 के अंतर्गत देश के वाणिज्यक बैकों पर नियंत्रण रखने के उद्देश्य से रिजर्व बैंक को कुछ विशेषाधिकार प्रदान किए गए हैं । कुछ विशेषाधिकार इस प्रकार हैं-
  • भारत में बैंकिग व्यवसाय करने वाले बैंक को रिजर्व बैंक से इस संबंधित लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है। बैंक की नीति एवं स्थिति व कार्य प्रणाली  संतोषजनक न होने पर यह लाइसेंस रद्द किया जा सकता हैं
  • किसी भी बैकिंग कंपनी को दूसरी बैंकिग कंपनी के साथ एकीकरण करने से पूर्व रिजर्व बैंक की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। अदालत को भी यह अनुमति नहीं है कि वह रिजर्व बैंक की अनुमति के बिना किसी एकीकरण को स्वीकृति दे दें।
  • रिजर्व बैंक अपनी इच्छा से या केन्द्र सरकार के निर्देश पर किसी भी बैंक का निरीक्षण कर सकता है। असंतोषजनक स्थिति होने पर वह परीक्षण रिपोर्ट पर विचार करने हेतु अपने संचालकों की बैठक बुला
  • किसी बैंक की आर्थिक स्थिति यदि असंतोषजनक है तो रिजर्व बैंक उस बैंक के लिए कानूनी तौर पर विलम्बकाल घोषित करने की सिफारिश करता है जिसकी अवधि 6 महा तक बढ़ाई जा सकती है।

4. बैकों का बैंक एवं पर्यवेक्षक के रूप में

  • भारत में रिजर्व बैंक के अतिरिक्त व्यापारिक बैंक व अन्य बैकों का चलन है तथा रिजर्व बैंक व्यापारिक बैंकों के बैंक के रूप में कार्य कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस कार्य के द्वारा वह बैकिंग व्यवस्था का संरक्षण नियमन तथा नियंत्रण करता हैं रिजर्व बैंक को बहुत से ऐसे अधिकार प्राप्त है जिनका प्रयोक कर वह देश की अर्थव्यवस्था के हित में समय-समय पर विभिन्न प्रकार के फैसले लेकर बैंकिग व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने का काय्र करता है।
  • बैंको के बैंक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक अन्य बैंकों से उनके नकद कोषों का एक निश्चित प्रतिशत अपने पास जमा कराता है। देश का केन्द्रीय बैंक होने की वजह से रिजर्व बैंक अधिकृत है कि वह देश के वाणिज्यक बैकों से उनके कुल शुद्ध देयताओं का उसे 15 प्रतिशत तक अपने पास जमा कराये और इस अनुपात को नकद कोष कहा जाता है। बैकों के आपात काल में रिजर्व बैंक इन्हें पैसे भी उधार देता है लेकिन यह अल्प अवधि के लिए ही किया जाता है। रिजर्व बैंक समय-समय पर देश की अर्थव्यवस्था को देखते हुए नकद कोष अनुपात को घटाया या बढ़ाया जा सकता हैं बैंको को आपातकाल से उबारने के साथ-साथ इस अनुपात का प्रयोग रिजर्व बैंक बैंकिग साख को नियंत्रित करने तथा उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए भी किया जाता जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हो सकता है।

5. रिजर्व बैंक सरकार के बैंकर, अभिकर्ता एवं सलाहकार के रूप में

  • भारतीय रिजर्व बैंक भारत सरकार तथा राज्य सरकारों के बैंकर, अभिकर्ता तथा सलाहकार की भूमिका भी निभाता है। सरकारी बैंकर के रूप में वह भारत सरकार तथा राज्य सरकारों की बैकिंग संबंधी सभी लेन-देन के कार्यों को करता है। इसके अंतर्गत वह सरकार की तरफ से नकदी जमा करता है। अन्य संस्थाओं या व्यक्तियों द्वारा सरकार को चुकाई जाने वाली राशि वसूल कर सरकार के खाते में जमा करता है तथा सरकार की ओर से किये जाने वाले भुगतान संपन्न करता है, इससे विनिमय का कार्य, सरकारी कोषों के स्थानांतरित का कार्य तथा सरकारों के लिए विदेशों से विनिमय की व्यवस्था करना सम्मिलत होता है।
  • सरकार को बैंकर होने के कारण कभी-कभी सरकारी जमाओं से ज्यादा भुगतान रिजर्व बैंक को करना पड़ता है। इस होने वाले घाटे को पूरा करने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा सरकार को अल्पकालीन ऋण दिया जाता है।

6. विदेशी विनिमय का प्रबंध एवं नियंत्रण

  • भारतीय रिजर्व बैंक देश के विदेशी विनिमय कोषों के संरक्षक के रूप में कार्य करता है। विनिमय नियंत्रण का प्रबंध करते हुए भारत सरकार के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आईएमएफ के सदस्य के रूप में सरकार के अभिकर्ता के तौर पर कार्य करता है। रिजर्व बैंक का विनिमय नियंत्रण विभाग देश में विदेशी विनिमय का मॉग और पूर्ति का सम्पूर्ण हिसाब-किताब रखता है। केन्द्रीय बैंक होने के कारण भारत में विदेशी मुद्राओं का समस्त राष्ट्रीय कोष रिजर्व बैंक के अधीन तथा नियंत्रण में रहता है तथा इनमें से किसी भी तरह का भुगतान रिजर्व बैंक की स्वीकृति से ही किया जाता है।

7. कृषि वित्त प्रवर्तन एवं साख व्यवस्था

  • रिजर्व बैंक की स्थापना के समय से ही इसकी वैधानिक जिम्मेदारी के रूप में कृतिष वित्त प्रवर्तन इसका प्रमुख कार्य रहा है तथा बीते दशकों में रिजर्व बैंक ने कृषि क्षेत्र में अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन वित्त व्यवस्था  के लिए अनेक सराहनीय कार्य किये हैं। कृषि के उत्थान के लिए रिजर्व बैंक द्वारा दिया गया वित्त किसानों तक राज्य सहाकरी बैकों तथा भूमि विकास बैकों के माध्यम से पहुंचाता था।  रिजर्व बैंक ने सहकारिता के विकास तथा सहकारी साख के विस्तार के लिए अनेक प्रकार से सहायता प्रदान की है। वाणिज्यक बैकों को भी आदेशित किया है कि वह कृषि  को प्राथमिकता दे इसी क्रम में 1975 में क्षेत्रीय ग्रमाीण विकास बैंको की स्थापना की गई तथा 1982 में स्थापित किये गये राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक की  100 करोड़ की पूंजी भारत सरकार तथा रिजर्व बैंक द्वारा समान अनुपात में लगायी गई।

8. समाशोधन गृहों की व्यवस्था

  • समाशोधन कार्य का महत्व इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि समाशोधन का कार्य धीमी गति से हुआ या इसमें रूकावट आयी तो अर्थव्यवस्था की क्रियायें मंद पड़ने लगती हैं। बैंको का बैंक तथा अंतिम ऋणदाता होने के कारण रिजर्व बैंक प्रारंभ से ही समाधोधन कार्य कर रहा है। अर्थव्यवस्था के विस्तार व विकास के कारण अधिक समाशोधन गृहों की अवश्यकता महसूस की जाने लगी।
  • समाशोधन गृहों की कार्यविधि समझने के लिए यह आवश्यक हे कि केन्द्रीय बैंक की क्रियायें समझी जायें। केन्द्रीय बैंक के पास सभी बैकों के नकद कोषों का एक हिस्सा या एक निश्चित प्रतिशत जमा होता है अर्थात केन्द्रीय बैंक में सभी बैकों के खाते होते हैं। समाशोधन से आशय है विभिन्न बैकों के आपसी लेन-देन को व्यवहारिक रूप से न करके सीधे इनके खातों को प्रभावित कर दिया जाये।

9.औद्योगिक वित्त प्रवर्तन

  • किसी भी अल्पविकसित या विकासशील देश के लिए आगे बढ़ने के लिए औद्योगिक विकास बहुत आवश्यक होता है लेकिन औद्योगिक विकास कके लिए पूॅजी की आवश्यकता होती है। सामान्यतया औद्योगिक विकास के लिए दीर्घकालीन वित्त ऋण की आवश्यकता होती है जिसे वाणिज्यक बैकों के द्वारा प्रदान नहीं किया जाता है। इस तरहा के दीर्घकालीन साख को देने का कार्य औद्योगिक वित्त की विशिष्ट शाखाओं का होता है। स्वतंत्रता के समय तक भारत में इस कार्य हेतु कोई भी संस्था अस्तित्व मे नहीं थी। 1935 में रिजर्व बैंक की स्थापना के बाद इस बैंक ने संस्थागत औद्योगिक वित्त की स्थापना करने के उद्देश्य से भारतीय औद्योगिक वित्त निगम और राज्य वित्त निगमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
  • औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला भारतीय औद्योगिक विकास बैंक 16 फरवरी 1976 तक रिजर्व बैंक की एक सहायक संस्था के रूप में कार्य करता रहा। अब यह बैंक एक स्वायत्त संस्था के रूप में कार्य कर रहा है। 1 जुलाई 1960 से भारत सरकार द्वार साख गारंटी योजना चालू की गई है जिसका मुख्य उद्देश्य लघु एवं मध्यम आकार के उद्योगों को बैंक तथा वित्तीय संस्थाओं द्वारा वित्तीय सहायता दिलाना था। इस योजना का संचालन रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है। परंतु साख की गारंटी भारत सरकार द्वारा दी जाती है।

2. सामान्य बैंकिग कार्य

बैंकिग विकास संबंधित कार्य

भारतीय रिजर्व बैंक देश के बैकों तथा बैंकिग व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ उनके विकास के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य करता है। बैंकिग विकास के स्वरूप शाखा विस्तार की एक निश्चित नीति अपनाकर बैंक विहीन क्षेत्रों खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बैंको की शाखायें खोली गई हैं।
लीड बैंक योजना के अंतर्गत बैंको को आर्थिक विकास के कार्यों में भागीदार बनाने का प्रयास किया गया है। जमा निगम जिसकी स्थापना 1961 में की गई थी। 1970 में साख गारंटी निगम के साथ मिलाकार जमा बीमा तथा साख गारंटी निगम बना दिया गया।  रिजर्व बैंक आॅंफ इडिया ने 1954 में बंबई में बैंकर्स ट्रेनिंग काॅलेज‘  की स्थापना की जहां बैंको के अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाता है।
रिजर्व बैंक के विकास एवं प्रवर्तन से संबंधित महत्वपूर्ण कार्य इस प्रकार हैं-
  • वाणिज्यिक बैंक व्यवस्था का विकास
  • सहकारी बैकिंग व्यवस्था का विकास
  • बिल मार्केट का विकास
  • प्राथमिकता वाले क्षेत्र में साख उपलब्ध कराना।
  • साख गारंटी
  • विभेदात्मक ब्याज दर योजना
  • निर्यात के लिए  वित्त का प्रवर्तन
  • औद्योगिक वित्त का प्रवर्तन

रिजर्व बैंक के सामान्य बैंकिग कार्य

भारत का केन्द्रीय बैंक होने के कारण केन्द्रीय बैंकिग कार्यों के अतिरिक्त रिजर्व बैंक सामान्य बैंकिग कार्य भी करता है जो निम्नांकित हो सकते हैं।
  • रिजर्व बैंक द्वारा केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों को काम चलाऊ ऋण दिया जा सकता है जिसकी अवधि 90 दिन से अधिक नहीं हो सकती है।
  • रिजर्व बैंक केन्द्र सरकार, राज्य सरकार तथा वाणिज्यक बैकों के अतिरिक्त अन्य अर्द्धसैनिक गैर सरकारी, सरकारी संस्थाओं तथा व्यक्तियों से जमा स्वीकार कर सकता है। परन्तु इन जमाओं पर किसी भी तरह का ब्याज रिजर्व बैंक द्वारा नहीं दिया जाता है।
  • रिजर्व बैंक सदस्य बैंकों से विदेशी विनिमय का क्रय-विक्रय कर सकता है किन्तु यह क्रय-विक्रय एक लाख रूपये से कम मूल्य का नहीं होना चाहिए।
  • फसल की बिक्री तथा कृषि के लिए वित्तीय सहायता देने के उद्देश्य से निर्मित कृषि बिलों को रिजर्व बैंक खरीदने-बेचने के साथ-साथ भुना भी सकता है। किंतु इनकी अवधि 15 माह से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के किसी सदस्य देश के केन्द्रीय बैंक के यहां रिजर्व बैंक अपना खाता खोल सकता है। अथवा उससे अभिकर्ता संबंध स्थापित कर सकता है। तथा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के साथ  लेन देन कर सकता है।
  • रिजर्व बैंक स्वर्ण के सिक्के तथा स्वर्ण धातु खरीद बेच सकता है।

3 उपभोक्ता केन्द्रित कार्य

रिजर्व बैंक का एक महत्वपूर्ण कार्य है बैंक उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण । रिजर्व बैंक द्वारा उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण का संज्ञान 1949 में ही लिया गया था जब उपभोक्ता सेवा आश्य सिर्फ यही था कि उपभोक्ता सबसे ऊपर है।  रिजर्व बैंके द्वारा उपभोक्ता सेवा को सुधारने व बेहतर बनाने के लिए निर्धारित सेवा किये गये कदमों या मानकों का वर्णन निम्न प्रकार है
  • बैकों में उपभोक्ता सेवा केन्द्रों की स्थापना।
  • रिजर्व बैंक में उपभोक्ता सेवा केन्द्र की स्थापना।
  • उधार देने वालो के लिए स्वच्छ/अभ्यास कोड- रिजर्व बैंक कर्ज लेने वालोें के हितों के प्रति भी जागरूक था इसलिए  सन 2003 में रिजर्व बैंक ने उधार लेने वालों के हितों को सुरक्षित रखा जा सके तथा बैंको की यातना से बचाया जा सके यह कोड सन 2007 में पुनरीक्षित किये गये है।
  • पारदर्शी तथा यथोचित बैंक चार्ज।
  • बैंकिग अवमड्रसमैन योजना- सन 1995 में रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने बैंकिग सेवाओं से संबंधित उपभोक्ताओं की विभिन्न शिकायतों को शीघ्र तथा तितव्ययी निस्तारण के लिए बैंकिग अवमड्रसमैन योजना का शुभारंभ किया। योजना के तहत वर्तमान में शिकायतकार्त अपनी शिकायत आॅनलाईन दर्ज करा सकता है।

रिजर्व बैंक द्वारा साख नियंत्रण

साख नियंत्रण के अभिप्राय बैकों को ऋण देने की नीति को नियंत्रित करने से है।

रिजर्व बैंक का केन्द्रीय बैंक होने के कारण मुख्य कार्य, व्यापारिक बैकों के साख निर्माण की क्षमताको नियंत्रित करना है। अतः सामान्य शब्दों में रिजर्व बैंक द्वारा व्यापारित बैकों के साख निर्माण की क्षमता तथा साख मी मात्रा को समय-समय पर कम या ज्यादा करना ही साख की मात्रा कहलाता है। आधुनिक समय में साख मुद्रा का चलन अत्यधिक बढ़ जाने के कारणा साख की मात्रा में होने वाले परिवर्तनों का देश की अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष तथा परोख प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः व्यापारिक बैंक जितना ऋण देते हैं वह उनके पास एकत्रित नकद जमा से कई गुना अधिक होता है। इस अधिकता को ही साख का निर्माण्या कहा जाता है। परन्तु व्यापारिक बैंक साख निर्माण में अपनी मनमानी नहीं कर सकते हैं क्योकि इस साख निर्माण पर देश के केन्द्रीय बैंक का प्रत्यक्ष व परोक्ष नियंत्रण रहता है। साख निर्माण की सीमा देश की अर्थव्यवस्था तथा अन्य हालात देखते हुए केन्द्रीय बैंक द्वारा व्यापारिक बैकों के लिए समय-समय पर निर्धारित की जाती है। इसे ही साख नियंत्रण कहा जाता है।

साख नियंत्रण के उद्देश्य

केन्द्रीय बैंक देश की अर्थव्यवस्था के हित में निम्नांकित उद्देश्यों के लिए साख नियत्रंण के विभिन्न तरीके अपनाये जाते हैं-
  • आर्थिक विकास ककी गति में स्थिरता या बढ़ोतरी
  • कीमत स्तर में स्थिरता
  • आय और रोजगार के उच्च स्तर पर स्थिरता
  • विभिन्न दरों में स्थिरता
  • एक अच्छी मौद्रिक तथा साख नीति किसी भी देश के लिए वही मानी जाती है जो विकास तथा स्थिरता के उद्देश्यों में बेहतर समन्वय स्थापित कर सके।

साख नियंत्रण की रीतियां

केन्द्रीय बैंक देश की परिस्थितियों को देखते हुए मुख्यतः साख निंयत्रण की दो विधियों को अपनाता है-
अ. परिणामात्क साख नियंत्रण-
  • बैंक दर नीति
  • खुले बाजार की क्रियायें
  • परिवर्तनीय नकद कोषानुपात
  • गौण कोषों की माॅग

ब. गुणात्मक साख नियंत्रण

परिणात्मक साख नियंत्रण में केन्द्रीय बैंक द्वारा विभिन्न तरीकों से सदस्य/वाणिज्यक बैंकों के पास उपलब्ध नकद कोषों की मात्रा को कम कर मुद्रा के चलन तथा साख सृजन को नियंत्रण किया जाता है। इसके विपरीत गुणात्मक साख नियंत्रण द्वारा केन्द्रीय बैंक द्वारा कुल मुद्रा चलन मात्रा तथा साख सृजन पर अंकुश लगा साख प्रयोग को नियंत्रित करना होता है। इसक उद्देश्य साख के उपयोग को प्रभावित कर आवश्यक तथा उपयोगी प्रयोजनों के लिए आवश्यक मात्रा में साख उपलब्ध कराना होता है।

वस्तुतः गुणात्मक साख नियंत्रण परिणात्मक साख नियंत्रण की भांति पूरे बैंकिग व्यवसाय को एक साथ तथा एक ही तरीके से प्रभावित नहीं करता है बल्कि केन्द्रीय बैंक समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों तथा उद्योगों के लिए आवश्यक ऋणों का अनुमान लगाकर गुणात्मक साख को नियंत्रित करता है।

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