पुनर्जागरण का प्रभाव |पुनर्जागरण का कला,साहित्य, विज्ञान,चित्रकला, मूर्तिकला के क्षेत्र में प्रभाव |Development and impact of the Renaissance

पुनर्जागरण का कला,साहित्य, विज्ञान,चित्रकला, मूर्तिकला के क्षेत्र में प्रभाव 

पुनर्जागरण का प्रभाव |पुनर्जागरण का कला,साहित्य, विज्ञान,चित्रकला, मूर्तिकला के क्षेत्र में प्रभाव |Development and impact of the Renaissance



पुनर्जागरण ने साहित्यकलाभौगोलिक खोज आदि विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित किया। पुनर्जागरण की इन सभी प्रवृत्तियों को पृथक्-पृथक शीर्षकों में वर्णित करना अधिक उपयुक्त होगा। 


1 साहित्य के क्षेत्र में पुनर्जागरण

 

  • साहित्य में नवीन प्रवृत्ति का आरम्भ इटली से हुआ और शीघ्र ही इसने यूरोप के अन्य देशों को भी कियापहले साहित्य मध्यकालीन धार्मिक अन्धविश्वासों को श्रृंखला में जकड़ा हुआ था पर अब उसने सम्पूर्ण मानव जीवन और व्यक्तिगत आकाक्षाओं के विशाल क्षितिज में पंख पसारे यूनानी और लेटिन भाषाओं के प्राचीन साहित्य के साथ ही प्राचीन भाषाओं का भी वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। 
  • नई भाषाओं के विकास पर गहरा प्रभाव पड़ा। 16वीं सदी के मध्य यूरोप के सभी प्रमुख देशो की भाषाओ मे एक सशक्त गद्य शैली का विकास होने लगा और सृजनात्मक साहित्य का निर्माण आरम्भ हुआ। नाटकों ने विशेष प्रगति की प्राचीन यूनानी नाटककारो की सुखान्त और दुखान्त रचनाओ का अध्ययन और अनुकरण किया जाने लगापर साथ ही मौलिक शैलियों का भी विकास हुआ। पहला आधुनिक नाटक इंग्लैण्ड में तैयार किया गया। (1564-1593) ने मुक्त छन्दो का आविष्कार किया जिससे शेक्सपियर की महान् रचनाओं का मार्ग सुगम हो गया।

 

  • बौद्धिक पुनर्जागृति इटली से आरम्भ हुई। 13वीं शताब्दी में महाकवि दाते ने इटली की बोल-चाल की भाषा मे विचार प्रकट करना और लिखना शुरू किया। वह वास्तव में पुनर्जागरण का अग्रदूत (14वीं शताब्दी में पेट्रार्क और बोकेकिओ ने नवीन विचारों को प्रोत्साहित किया। पेट्राक प्रथम विद्वान् था जिसने मध्ययुग का परित्याग कर अपने समकालीन लोगों को यूनानी और रोमन साहित्य की और आकर्षित किया। उसने दुर्लभ और विस्तृत पुस्तकों की खोज के अथक प्रयत्न किएजिसके फलस्वरूप लोगों में पुस्तकालय स्थापित करने का नया उत्साह उत्पन्न हुआ।
  • पंडुवा विश्वविद्यालय में यूनानी साहित्य की कक्षाएं खुली और यूनानी विद्वान् बेसारिप्रोन नेवेनिस के एक चर्च को अपना पुस्त भेंट कर दिया। बौद्धिक पुनर्जागरण के फलस्वरूप साहित्य में मानववाद का नया दृष्टिकोण विकसित हुआ और इसका प्रचारक पेट्रार्क ही था। उसके मित्र वेकोकिओ ने आधुनिक इटली के गद्य का जन्मदाता होने का श्रेय अर्जित किया। कुस्तुन के विद्वान् क्रसोलोरस (1415 ई) ने एक राजदूत के रूप में इटली में अपनी विद्वता और शिक्षा की धाक जमाई।

 

  • इटली के पुनर्जागरण की अन्य देशों में भी व्याप्त हो गई। इंग्लैण्ड में सर्वप्रथम रोजर बेकन ने अज्ञान के विरूद्ध लम्बे-चौड़े लेख लिखे। उसने घोषणा की कि "सिद्धान्तों और धर्म के प्रामाणिक ग्रन्थो का सहारा छोड़कर अब संसार की और देखो।” फ्रांस के निबन्ध लेखक मान्टेन ने अपने निबन्धों में मानव जीवन की दिन-प्रतिदिन की घटनाओं का समावेश किया और व्यक्तिगत बातो की चर्चा की एक लेखक रेखीलेस ने अपने उपन्यासो द्वारा मानव के स्वतन्त्र चिन्तन के महत्व पर प्रकाश डाला। 


  • स्पेन के सर्वाण्टीज ने डान क्विकजोट नामक पुस्तक लिखी इटली के मेकियावली ने अपने महान् ग्रन्थ दी प्रिन्स में राजनीति और समाज का एक नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उसने पूरी तरह वैज्ञानिक तटस्थता अपनाकर समकालीन परिस्थितियों और समस्याओं को समझा और फिर अपने निष्कर्षो का प्रतिपादन किया। वह धार्मिकतापरम्परावादितारूढ़िवादिता और पाण्डित्य प्रदर्शन का घोर विरोधी था। उसने ये निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि नीति शास्त्र और राजनीति एक न होकर अलग-अलग है तथा शासन-कला का आचार शास्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं है। 


  • जर्मनी में रूडोल्फ एग्रीकोलाक्रोटस रूविप्रानसवान हटन आदि ने समीक्षात्मक और धर्म रपेक्ष विच को प्रोत्साहन ऐरेसमस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "मूर्खता की प्रशंसा में तत्कालीन रूढ़िवादी सिद्धान्तो और मानव दुर्बलताओं पर प्रहार किया।

 

  • सारांशत विभिन्न यूरोपीय देशों के सैकड़ों विद्वानों और लेखकों ने अपनी रचनाओ द्वारानवयुग के सिद्धान्तो और सन्देश का प्रचार किया। परिणाम यह हुआ कि विद्या और संस्कृति को चर्च की अधनीता से मुक्ति मिली। जहां पहले ईसाई धर्म और धार्मिक

 

  • साहित्य का ही अध्ययन होता था वहां अब इतिहासभूगोलराजनीति शास्त्र दर्शन शास्त्र आदि विषयों का स्वतन्त्र रूप से अध्ययन होने लगा। देवत्व और आध्यात्मिकता के स्थान पर मानव को प्रमुखता दी जाने लगी तो वैयक्तिक स्वतन्त्रता का विकास हुआ।

 

पुनर्जागरण का कला के क्षेत्र में प्रभाव

 

  • प्राचीनता के प्रति यूरोपवासियों का मोह केवल दर्शन और साहित्य तक ही सीमित नहीं था बल्कि कला को भी नया रूप प्रदान करने में उन्होंने पहल की। इस युग की कला का उद्देश्य जीवन एवं प्रकृति से तारतम्य स्थापित करना था किन्तु मध्यकाल में जीवन तथा प्रकृति के सौन्दर्य में लोगों की विशेष अभिरूचि नहीं थी। कला का सार्वजनिक जीवन में घनिष्ठ संबंध नहीं था और उस पर धर्म का विशेष प्रभाव था लेकिन पुनर्जागरण काल में कला धार्मिक बन्धनों से मुक्त होकर यथार्थवादी बन गयी कला एवं सौन्दर्य के प्रदर्शन में कलाकार की रूचि बढ़ने लगी। कला का क्षेत्र व्यापक हो गया और सर्वसाधारण को भी उसमें स्थान मिला। इसको सन्देह नहीं कि कला के लए अभी भी धार्मिक विषयों का चयन किया जाता था। परन्तु अब सौन्दर्य सजावट की उपेक्षा नहीं की गयी और मानवीयता पर अधिक ध्यान दिया गया। इस काल के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कला का अधिक विकास हुआ और  एक नयी कला का जन्म हुआ। 

 

पुनर्जागरण काल में चित्रकला 

  • पुनर्जागरण काल में सबसे अधिक विकास चित्रकला के क्षेत्र में हुआ। पन्द्रहवी तक चित्रकला न केवल धार्मिक विषयों तक सीमित थी वरन् रंगो एवं विषयों का चयन भी सीमित था। उस काल के चित्रो दोसी एवं एकरसता दृष्टिगोचर होती है। उनके विषय ईसा और मरियम ही थे किन्तु ये आदमी को भी चित्रित करने लगे। 'रंग वर्जित नही रहे। चित्रकला की शैली चित्तकर्षक हृदयग्राही बुद्धिग्राही और अत्यन्त लावण्यमय बनकर चरमोत्कर्ण तरफ बढ़ रही थी।

 

  • सर्वप्रथम इटली के जियटो ने परम्परागत बाइजेन्टाइन शैली से हटकर मानव प्रकृति पर अनेक चित्र चित्रित किये। जियेटो को चित्रकला का जन्मदाता माना जाता है। यद्यपि जियटो की चित्रकला में थी किन्तु उनके चित्रो ने अनेक चित्रकारों को प्रेरणा दी। बाद के चित्रकारों ने उनकी कमियों को दूर करने का प्रयास किया ओरप्रकाश व छाया के रंगों का समन्वय तथा आकृति का सही अंकन पर अधिक जोर दिया गया। 
  • पुनर्जागरण काल के चित्र ने मानव शरीर का सूक्ष्म अध्ययन किया और यह प्राप्त किया कि मनुष्य के शरीर की पेशिया और जोड़ किसी विशिष्ट स्थिति में कैसे उभरते है। इसीलिए वे अपनी कलाकृतियों को अधिक जीवंत बना सके। 

 

  • नई शैली के प्रारम्भिक चित्रकारों में इटली के फ्रान्जेलिको और मेशेशियों का नाम गिना जाता है परन्तु इटली के तीन कलाकरों ने चित्रकला के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया तथा र्जागरण की भावना को पूर्ण अभिव्यक्त किया। वे चित्रकार है- लिओनादो का विन्ची माइकेल एजेलो तथा राफेल ।

 

  • फ्लोरेन्स निवासी लिओनादो की अद्वितीय एवं बहुमुखी थीं वह वैज्ञानिक, गणितज्ञ, इंजीनियर संगीतकार दार्शनिक और चित्रकार संघ एक साथ था। काल जगत में उसका नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उसकी चित्रकला की विशेषताएं है- "सादगी तथा व्यक्ति प्रकाश और छाया रंगों का उपयुक्त चयन और शरीर के प्रत्येक अंगों का स्वाभाविक एवं सुन्दर प्रदर्शन उसके में लास्ट सुपर और मोनालिसा प्रमुख और अनुपम समझे जाते है । 
  • लास्ट सपर में ईसा को अपने अनुयायियों के साथ (भोजन के समय बैठा दिखाया गया है। ईसा के चेहरे पर शान्ति का भाव है परन्तु उसके शिष्य हतप्रभ दिखाई देती है। मोनालिसा किसी सुन्दरी का चित्र नहीं है लेकिन उस साधारण सी दिखाई पड़ने वाली महिला की रहस्यमय मुस्कान का अर्थ आज भी दर्शक के लिए रहस्य बना हुआ है।

 

  • माइकल एंजेलो की गिनती अद्वितीय चित्रकारों में की जाती है। वह कलाकार के साथ मूर्तिकार स्थापत्यकार इंजीनियर और कवि भी था। वह मनुष्य को सृष्टि को सबसे सुन्दर अभिव्यक्ति मानता था। उसके बनाए लगभग 145 चित्रो मे सौन्दर्य भावना, कौशल और प्रतिभा का स्पष्ट प्रमाण मिलता है सिस्टाइन गिरजाघर की भीतरी छत पर उसने जो चित्रांकन किया वह आज भी कला मर्मज्ञों के लिए विस्मय की वस्तु है। उसका एक चित्र लास्ट जजमेन्ट जिसे पूरा करने में एंजेलो को लगभग आठ वर्ष लगे, सर्वश्रेष्ठ है। अनेक आकृतियों वाले इस विशाल चित्र में जीवन के अनेक रूप विद्यमान है।

 

  • पुनर्जागरण के कला के इतिहास के क्षेत्र में राफेल का नाम भी अत्यन्त उल्लेखनीय है उस पर एंजेलो और लिओनादो दोनो का प्रभाव पड़ा। इसलिए उसके चित्रों में दोनों की चित्र शैलियो का समन्वय दिखाई देता है। राफेल के चित्र भी सजीवता एवं सुन्दरता के कारण आज भी विश्व प्रसिद्ध है। उसने वात्सल्य और मातृत्व का मनोहर चित्रण किया है। उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना जीसस क्राइस्ट की मेडोना का चित्र हैं। मेडोना का दिव्य नारीत्व आज भी दार्शनिकों का मनमोह लेता है। उसके द्वारा बनाए भित्ति चित्र और समकालीन लोगों के चित्र अद्वितीय है।

 

  • इटली की चित्रकला का प्रभाव अन्य यूरोपीय देशों पर भी पड़ा। इस काल में जर्मनी में लूकस, ड्योरार हैन्स दालवीन, स्पेन में डीगोबेलेस कैथ हालैण्ड में यान आइक बन्धु आदि प्रसिद्ध चित्रकार हुए।

 

पुनर्जागरण काल में स्थापत्य कला 

  • पुनर्जागरण काल में स्थापत्य के क्षेत्र में भी प्रगति हुई। मध्यमयुग में गोथिक शैली पुनर्जागरण में जंगली शैली का करार दिया गया, की प्रधानता थी। मध्यकाल में इसी शैली के आधार पर अधिकांश भवनों का निर्माण हुआ था किन्तु पुनर्जागरण युग में एक नई शैली का जन्म हुआ। 
  • नवीन शैली के यूनानी, रोमन तथा अरबी शैलियों का समन्वय हुआ। इसमें डिजाइन तथा सजावट पर विशेष महत्व दिया गया। गोल मेहराबों का उपयोग किया जाने लगा। इस नवीनशैली की शुरूआत से हुई और बाद में अन्य देशों में इसका प्रसार हुआ फ्लोरेन्स निवासी ब्रूनेलेस्की इस नवीन शैली के प्रवर्तक था। इस शैली और स्तम्भों को प्रधानता दी गयी। उसने नुकीले महराबों के स्थान पर गोल मेहराबों का निर्माण किया। 
  • सोलहवी शताब्दी मे इस नवीन शैली का पूर्ण विकास हो चुका था। इस शताब्दी का सबसे प्रसिद्ध स्थापत्यकार माइकेल एंजेलो था। उसने तथा राफेल ने मिलकर रोम में सेट पीटर के गिरजाघर का निर्माण किया। जाघर का विशाल और भव्य गुम्बज पुनर्जागरण स्थापत्य की अन्यतम देन है। इटली के पुनर्जागरण से प्रभावित स्थापत्यशै भी पश्चिम यूरोप पर प्रभाव पड़ा। पेरिस का लूबे प्रसाद, लन्दन का सन्तपाल का गिरजाघर स्पेन का इस्कोरियल का आदि इस युग के अद्वितीय नमूने है।

 

पुनर्जागरण काल में मूर्तिकला 

  • स्थापत्य तथा मूर्तिकला का विकास समवेत रूप से हुआ। इस काल मे लोरेजो गिबेर्ती, दोनातेल्लो और माइकेल एजेलो जैसे महान् मूर्तिकार हुए। इन्होंने केवल ईसा या मरियम का ही नहीं वरन समकालीन प्रमुख व्यक्तियों की भी मूर्तियां बनाई। इस का मूर्तिकार जितना शौर्य को मूर्त करने में सक्षम था उतना ही करूणा क इस काल में मूर्तिकला भी अन्य कलाओं की तरह धर्म के बन्चन से मुक्त हुई।

 

  • गिबेर्ती एक महान् मूर्तिकार था। उसने फ्लोरेन्स के गिरन के लिए सुन्दर दरवाजो को निर्मित किया ये कांसे के बने हुए है और इन पर प्राचीन टेस्टामेंट में वर्णित दृश्यों को अंकन किया गया है। माइकेल एंजेलो ने इनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि ये स्वर्ग में रखे जाने योग्य है। दोनातेललो के द्वारा निर्मित का विषय मानव जीवन था। दोनातेललो द्वारा निर्मित वेनिस की संतमार्क की आमदकद मूर्ति श्रेष्ठ कलाकृति मानी दोनातेल्लो ने बच्चों की अनेक सज्जी मूर्तियां बनाई। 
  • एंजेलो द्वारा अनेक सुन्दर मूर्तियों का निर्माण किया गया। उसकी गई मूर्तिया मेडिची के गिरजाघर में रखी गयी। उसके द्वारा बनाई गयी मूर्तियो में दो अति प्रसिद्ध है। एक, पेता जिसका निर्माण रोम में किया गया था और उसे सेंट पीटर के गिरजाघर के मुख्य द्वार पर रखा गया। दूसरी, डेविड की मूर्ति है जिसे फ्लोरेन्स के नागरिको ने बनवाया था। उसने डेविड को वीर पुरूष के रूप में तो प्रस्तुत किया ही साथ ही उसके व्यक्तित्व में कोमलता प्रस्तुत किया। 
  • इटली की मूर्तिकला से इंग्लैण्ड, जर्मनी, फ्रांस और स्पेन की कला भी प्रभावित हुई। स्पेन में ईसाबेला और सम्राट फर्डिनेट की समाधियों में नई शैली के दर्शन होते है। इंग्लैण्ड में हेनरी सप्तम् और फ्रांस में फ्रांसिस प्रथम ने इस शैली को विकसित किया। दोनों शासकों ने अपने-अपने दशों में इटली के मूर्तिकारों को आमंत्रित किया। धीरे-धीरे सम्पूर्ण पश्चिमी यूरोप में मूर्तिकला की नवीन शैली का प्रसार हो गया 

 

पुनर्जागरण का विज्ञान के क्षेत्र में प्रभाव 

  • पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। पुनर्जागरण काल के विद्वान प्राचीन विद्वानो के कथन में अन्धविश्वास रखकर उस पर आचरण करने के पुरानेढंग से सन्तुष्ट न हुए। वे संसार की समस्याओं को अधिक महत्वपूर्ण समझते थे और प्रत्येक तर्क को कसौटी पर कसना चाहते थे। इससे विज्ञान की उन्नति सम्भव हुई।
  • फ्रांसिस बेकन ने इस काल के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का वर्णन करते हुए लिखा है कि ज्ञान की प्राप्ति केवल प्रेक्षण और प्रयोग करने से ही हो सकती है। बेकन के अनुसार जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। उसे पहले घटनाओं का अध्ययनकरना चाहिए जो संसार में उसके चारो और हो रही है। फिर उसे स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि यह घटनाएं किस कारण से होती है। जब वह किसी घटना के सम्भावित करण के विषय में एक सिद्धान्त बना ले या उसका विश्वास हो जाये तो उसकी प्रयोगात्मक ढंग से जांच करें। इसी प्रकार की वैज्ञानिक विधि का इस युग में प्रारम्भ किया गया।

 

  • दूसरी शताब्दी ई. में मिश्र के यूनानी खगोल शास्त्री टॉलमी ने यह प्रतिपादित किया था कि पृथ्वी विश्व के केन्द्र में स्थित है किन्तु सोलहवी शताब्दी में पोलैण्ड के वैज्ञानिक कोपर्निकस ने इस सिद्धान्त को असत्य सिद्ध कर दिखाया। उसने बताया कि पृथ्वी एक उपग्रह है तथा यह सूर्य के चारों और घूमती है। प्रेक्षण और गणना के पश्चात ही कोपर्निकस ने यह निष्कर्ष निकाला। किन्तु विश्वविद्यालय के प्राध्यापक अब भी प्राचीन सिद्धान्त में आस्था रखते थे। धार्मिक विद्वानों ने भी कोपर्निकस का घोर विरोध किया। उन्होंने उसके नये सिद्धान्त को इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योकि यह बाइबिल के वक्तव्य के अनुकूल न था। पोप के आदेश से कोपर्निकस को अपने नये विचारों का प्रचार बन्द करना पड़ा। परन्तु जब इटली के वैज्ञानिक जाइडिनी ब्रूनो ने कोपर्निकस के सिद्धान्त का अनुमोदन कर उसके विचारों का प्रसार किया तो रोम के धर्माधिकारियों ने उसे जिंदा जला दिया जर्मन खगोल शास्त्री जॉन केपलर कोपर्निकस के सिद्धान्तों की गणित के प्रमाणों से पुष्टि की। उसने बताया कि ग्रह सूर्य के चारों और चक्कर लगाते है और उनका पथ वर्तुल नहीं अपितु दीर्घवृतीय होता है। इटली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक गैलिलियों ने भी कोपर्निकस के सिद्धान्त को स्वीकार किया और एक दूरबीन के द्वारा जो उसने स्वयं बनाया था, सूर्य, तारों और ग्रहो को देखा गैलिलियों को उसके विचारों के कारण चर्च का कोपभाजन बनाना पड़ा। गैलिलियो ने अरस्तु के सिद्धान्त के विपरीत यह भी सिद्ध किया कि हुए पिण्डो की गति उनके 'भार पर नहीं अपितु दूरी पर निर्भर करती है, जहां से वे गिरती है।

 

  • इसी युग में इंग्लैण्ड के महान् वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ आइजजक, न्यूटन ने गुर्त्वकर्षण का सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसने खगोल विज्ञान को काफी प्रभावित किया। उसने सिद्ध किया कि प्रत्येक की आकर्षक शक्ति के कारण ऊपर से पृथ्वी की और खींचती है। न्यूटन के अन्वेषण का व्यापक प्रभाव पड़ा। अब यह स्पष्ट लगा कि विश्व कोई देव योग या आकस्मिक घटना नहीं जैसे कि बहुत लोग साचते थे, अपितु एक ऐसी वस्तु है जो प्रकृति सुव्यवस्थित नियमों के अनुसार चल रही है।

 

  • उस युग मे खगोल विज्ञान के अतिरिक्त चिकित्सा, रसायन, भौतिक एवं गणितशास्त्र के क्षेत्र में भी अपूर्व उन्नति हुई। नीदरलैण्ड के बेसेलियस ने औषधि तथा शल्य प्रणाली का गहन अध्ययन किया और मानव शरीर की बनावट नामक एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी और शरीर के विभिन्न अंगों का समुचित विवरण प्रस्तुत । इंग्लैण्डवासी विलियम हार्वे ने पशुओं का सावधानी से प्रयोग करके रक्त प्रवाह के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इस ज्ञान के कारण प्राचीन काल की अनेक भूले ठीक हो गयी और स्वास्थ्य तथा रोग की समस्याओं का अध्ययन नये ढंग से शुरू हुआ।

 

  • रसायन शास्त्र के क्षेत्र में पैरासेल्सस, आदि ने विशेष योगदान दिया। पैरासेल्सस ने रसायन ती चिकित्सा शास्त्र का निकट सम्बन्ध सिद्ध किया हैलमौट ने डाई ऑक्साइड नामक गैस की खोज की।

 

  • डकाते एक फ्रांसीसी गणितज्ञ दार्शनिक था। उसने सर्वप्रथम यह बताया कि बीजगणित का उपयोग जयातिकत में कैसे किया जाता है। उसने विज्ञान में सन्देहवाद को जन्म दिया। इससे विज्ञान की प्रगति में काफी सहायता मिली।

 

  • गैलिलियो ने के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उसने पेण्डुलम के सिद्धान्त का आविष्कार किया जिससे आजकल की घड़ियों का सम्भव हुआ। उसी ने वायु माप संयंत्र का आविष्कार किया।

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