शिशुनाग वंश | शिशुनाग का पुत्र काकवर्ण | Shishu Nag Vansh

शिशुनाग वंश | शिशुनाग का पुत्र काकवर्ण | Shishu Nag Vansh


शिशुनाग वंश


महावंश में शिशुनाग को तिथिक्रम की दृष्टि से बिम्बिसार के बाद रखा गया एवं उसे पृथक् वंश का संस्थापक बताया गया है। हर्यकवंशी शासक पितृहन्ता थे अतः जनता ने नागदासक को अपहृत करके मंत्री (अमात्य) एवं काशी के उपशासक को राजा बना दिया।

  • शिशुनाग ने अपने पुत्र को उपराजा नियुक्त किया तथा गिरिव्रज का जीर्णोद्धार करवाकर अपनी राजधानी बनाया।
  • शिशुनाग को वैशाली की नगरशौभिनी एवं एक लिच्छवि राजा की सन्तान कहा गया है। संभवत: इसी कारण वैशाली दूसरी राजधानी बनाई गई। 
  • पुराणों का कथन है कि शिशुनाग प्रद्योतों की शक्ति का विनाश करेगा। यह भी उल्लेख मिलता है कि अवन्ति में विद्रोहों के परिणास्वरूप आर्यक ( अजक) शासक बना एवं बाद में नन्दिवर्धन (वर्तिवर्धन)। प्रद्योत के पुत्रों का नाम गोपाल एवं पालक मिलता है। इनके उत्तराधिकारी विशाख एवं आर्यक थे और नन्दिवर्धन इनके बाद शासक बना।
  • पुराणों में आगे कहा गया है कि शिशुनाग प्रद्योत की मान-मर्यादा को नष्ट कर राजा होगा।
  • अवन्ति की पराजय का कारण आर्यक एवं गोपाल आदि में मतभेद माना गया है।
  • पुराणों में आया है कि शिशुनाग का पुत्र काकवर्ण था। दिव्यावदान ने इसका समर्थन किया है।
  • सैंहल ग्रंथों में कालाशोक नाम आता है जो बनारस में राज्यपाल रह चुका था।
  • काकवर्ण के काल की दो घटनायें उल्लेखनीय हैं-वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन जिसमें बौद्ध संघ के दो भाग हो गये। दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना थी राजधानी को पुनः वैशाली से पाटलिपुत्र स्थानान्तरित किया जाना। 
  • हर्षचरित में विवरण मिलता है कि काकवर्ण (शैशुनागी) की मृत्यु नगर के समीप छुरा भोंकने से हुई थी। महाबोधिवंश में उसके उत्तराधिकारी का नाम नन्दिवर्धन मिलता है। दिव्यावदान में उसके चार पुत्रों के नाम आये हैं। जबकि पुराणों में मात्र नन्दिवर्धन का नाम मिलता है। इसका समीकरण डॉ. के. पी. जायसवाल ने खारवेल के हाथी गुफा अभिलेख में उल्लिखित नन्दराज से किया है। 


  • डॉ. जायसवाल के अनुसार पटना (पवया) से प्राप्त सिरविहीन मूर्ति जिस पर सप (सव) खते वट नन्दि" उत्कीर्ण हैवह भी इस राजा की थी। किन्तु आर. पी. चन्दा राय चौधरी आदि जायसवाल के मत से सहमत नहीं हैं और उस मूर्ति को यक्ष मूर्ति माना गया है। राय चौधरी ने लिखा है कि शिशुनाग वंश नन्द वंश से बिल्कुल अलग था। पुराणों में ऐसी कोई बात नहीं कही गई जिसके आधार पर नन्दिवर्धन को कलिंग से संबंधित किया जा सके। काकवर्ण के पश्चात् उसके दस पुत्रों ने 22 वर्ष राज्य किया। इसके बाद शिशुनाग वंश का उन्मूलन हो गया एवं नन्द वंश का प्रादुर्भाव हुआ। इस प्रकार साम्राज्यवादी विस्तार का एक युग समाप्त हुआ। इस युग के सम्राटों ने यद्यपि भारत में एकता स्थापित करने के प्रयत्न किये किन्तु वे इसमें आंशिक रूप से ही सफल हुए।

 

राय चौधरी के अनुसार संभावित तिथि क्रम

  • 563 ई. पू. बुद्ध का जन्म 
  • 560 ई. पू. बिम्बिसार का जन्म 
  • 545-44 ई.पू. बिम्बिसार का राज्याभिषेक 
  • 536 ई.पू. बुद्ध का संन्यास 
  • 530 ई. पू. बुद्ध एवं बिम्बिसार का मिलन 
  • 527 ई.पू. महावीर का निर्वाण 
  • 493 ई.पू.- अजातशत्रु का राज्याभिषेक 
  • 486 ई. पू. बुद्ध का परिनिर्वाण 
  • 461 ई. पू. उदायिन का राज्याभिषेक 
  • 457 ई. पू. पाटलिपुत्र की स्थापना 
  • 437 ई. पू. नागदासक 
  • 413 ई.पू. शिशुनाग 
  • 395 ई.पू. काकवर्ण 
  • 386 ई. पू. वैशाली की सभा 
  • 367 ई.पू. काकवर्ण के पुत्र एवं महापद्मराज्य 
  • 345 ई. पू.- शिशुनाग वंश का अन्त

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