भारत में धार्मिक समूह |मठ, मार्ग और संप्रदाय संघ मत पंथ |The Religious Groups in India In Hindi

भारत में धार्मिक समूह (The Religious Groups in India) 

भारत में धार्मिक समूह |मठ, मार्ग और संप्रदाय संघ  मत  पंथ |The Religious Groups in India In Hindi


इस आर्टिकल  में हम धार्मिक समूहीकरण को विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में समझने का प्रयास करेंगे। हम निम्नलिखित का अध्ययन करेंगे:

 

  • मठमार्ग और संप्रदाय
  • संघ 
  • मत 
  • पंथ

 

1 मठमार्ग और संप्रदाय (Math, Marg and Sampradaya)

 

मठ क्या है 

  • भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक धार्मिक समूह की उत्पत्ति प्रायः मठ में होती है। यहाँ प्रस्तुत संदर्भ में इसका अर्थ होगा- चामत्कारिक व्यक्ति तथा / अथवा समूह का ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारने / नकारने तथा मानव के सामाजिक अस्तित्व के अर्थ से जुड़ा विचार दृष्टिकोण इस परिदृश्य के अनुसार ईश्वरीय अस्तित्व को नकारने वाला बौद्ध धर्म भी एक मठ है बौद्ध मठ ।

 

मार्ग (रास्ता ) क्या है 

  • मार्ग (रास्ता ) अनिवार्यतः मन से जुड़ी पूजा-उपासना की पद्वति द्वारा परिभाषित होता है। मार्ग प्रवर्त्तक तथा उसके उत्तराधिकारी तथा अनुयायियों का ईश्वर / धर्म तथा उनके स्वयं के संदर्भ में पारस्परिक संबंध को भी परिभाषित करता है। यह मठ की सामाजिक परिधि को भी परिभाषित करता है ।


मठ-मार्ग से संप्रदाय

  • जब मठ-मार्ग का जटिल मिश्रण आस्था रखने वालों तथा प्रचारकों द्वारा समय व स्थान की सीमाएं पार करके अंध भक्ति रूप ज्ञान परंपरा के रूप में विकसित होता है तो यह संप्रदाय का रूप धारण कर लेता है। इस अंधविश्वास तथा इसकी व्याख्या के प्रति विरोध एक नए मठ का रास्ता तैयार करता है। हीनयानमहायान व वज्रयान संप्रदाय या बौद्ध मठ के रूप में जाने जाते हैं। एक परिकल्पना के अनुसार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि धार्मिक समूह मठमार्ग और संप्रदाय की जटिल संक्रिया से उत्पन्न होते हैं। इस संक्रिया के फलस्वरूप सामाजिक इतिहास के विभिन्न कालों में धार्मिक समूहों की उत्पत्ति हुई है जिनमें से आदर्श रूप में हैं -संघमतपंथ व समाज

 

संघ (Sangh) { संघ क्या होते हैं }

 

  • बुद्ध द्वारा स्थापितसंघ स्पष्ट राष्ट्रीय चरित्र की विविधता के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित हुआ है। इसने स्थानीय परम्पराओं तथा धर्म संस्था (चर्च) से भी काफी कुछ ग्रहण किया है । तथापि यह धर्म संस्था नहीं है। 
  • धर्म का अभिप्राय है निश्चित उद्देश्य के लिए निकट संपर्क स्थापित करना अथवा कुछ लोगों का एक स्थान पर रहना। इसका अभिप्राय समाज व संस्था से भी है। एक धार्मिक संगठन के तौर पर इसके दो निश्चित उद्देश्य हैं। (1) व्यक्तिगत उत्थान के लिए संभव सर्वोत्तम परिस्थितियां उपलब्ध कराना (2) मानवजाति को धम्म ( Dhamma) (संस्कृत में धर्म के लिए उपयुक्त) की शिक्षा देना।

 

  • संघ के सदस्य व्यक्तिगत तौर पर संपत्ति के मालिक नहीं होते पर संघ एक वैधानिक संगठन के रूप में संपति रख सकता है। इसमें नियुक्त एवं निर्वाचित पदों की श्रेणीबद्धता का तंत्र होता है। यह धर्म निरपेक्षराजकीय व तर्कसंगत है। इसकी तुलना सरलता से एक संस्था से की जा सकती है।

 संघ की संरचना

  • इसकी संरचना त्रिरत्न (तीन रत्न) के सिद्धांत के आधार पर की जाती है जो इस प्रकार हैशिक्षकशिष्य तथा इसका अनुसरण करने वाले शिक्षार्थी । जैसा कि बुद्ध ने निर्देश दिया था कि उनके बाद त्रिरत्न को 'धम्मतथा 'विनयद्वारा निर्देशित किया जाये। बुद्ध के अनुसार 'धम्म धर्म के प्रचलित रूप का प्रतीक नहीं है वरन एक प्रयोग सिद्ध-तर्कसंगत नियमों व कर्तव्य का संग्रह है जो व्यक्ति विशेष को सही दिशा की ओर ले जाता है और कष्ट और पीड़ा से बचाता है। 
  • समय के साथ संघ "एक पीत वस्त्रधारी भिक्षुओंजिनसे दो सौ सत्ताइस नियमों के पालन की अपेक्षा की जाती है तथा इसके उल्लंघन के संबंध में पाक्षिक स्वीकारोक्ति की व्यवस्था के रूप में विकसित हो गया है। 

 

संघ का विस्तार

  • संघ का विस्तार प्रजातांत्रिक सीमित द्वारा संचालित धर्म निरपेक्ष संगठन के रूप में हुआ  इसका विकास 'चैत्यव 'विहारभिक्षु के रहने के स्थल के विकास के साथ हुआ जैसे जैसे भिक्षुओं की संख्या में वृद्धि हुईशिष्यों की संख्या बढ़ीसम्पति उपहार स्वरूप मिलने लगी तथा बुद्ध की शिक्षाओं को सुनने के लिए लोग आने लगेमठों को संगठित किया जाने लगा। 
  • संघ का प्रारंभ भिक्षुओं के समूह के रूप में हुआ जिसका कार्य संपत्ति की देख रेख करनेवस्त्रों को बांटने निवास स्थानों का आबंटन तथा संघ के लिए संपत्ति स्वीकार करने के कार्य के लिए पद धारकों का चुनाव व नियुक्ति करना था।
  • अपनी प्रणाली के नियमों के अतिरिक्त संघ का आधार था भिखुतत्व अर्थात उन भिक्षुओं (संस्कृत में भिक्षु ) का तंत्र जो बौद्ध मठ के निवासी होते हैं। इन भिक्षुओं को सत्ता तंत्र के अनुसार संगठित किया जाता है।

  •  इस श्रेणीबद्धता में सबसे नीचे है 'समनेरा' (नवदीक्षित अथवा नया सदस्य) । उसे नया नाम व वस्त्र दिए जाते हैं तो वह नए भिक्षु के चरण तक पहुंचता है। अगले चरण के भिक्षुओं को 'झेरा' (बुजुर्ग) कहते हैं तथा 'महाठेरासबसे ऊँचे चरण का पद है। मठ के मुखिया को 'नायककहा जाता।

 

  • एक निर्धारित दीक्षा समारोह के द्वारा भिक्खु के रूप में एक नए सदस्य को संघ में ग्रहण किया जाता है। जैसा कि बौद्ध धर्म का सिद्धांत है समाज में व्यक्ति की स्थिति उसके जन्म से नहीं वरन उसके कर्म से निर्धारित होती है। अतः भिक्खु समूह में प्रवेश सभी 20 वर्ष की उम्र से ऊपर तथा स्वस्थ स्वतंत्र व्यक्तियों के लिए खुला है। भिक्खु से ब्रह्मचर्य का पालन करने तथा भिक्षा के रूप में प्राप्त दान से जीवन बिताने की अपेक्षा की जाती है। जिसका उद्देश्य है अध्ययन और तपस्या के द्वारा आंतरिक ज्ञान की प्राप्ति तथा लोगों को 'धम्मकी शिक्षा देना। 

 

  • भिक्खु से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह एक सादामितव्ययी तथा संपति के मोह से परे संतुष्ट जीवन बिताए व केवल उतना ही ग्रहण करे जितनी उसकी आवश्यकता है। उसकी संपति केवल तीन वस्त्रएक कमर का वस्त्रभिक्षा का पात्र एक उस्तराएक जलपात्र तथा एक सूई होती है। वह उसमें एक छाताएक जोड़ी खड़ाऊ तथा कुछ पुस्तकें जोड़ सकता है।

 

  • भिक्खु विशेषतया नवदीक्षित भिक्षु (समनेरा) का कर्तव्य है कि वह प्रातः भिक्षा मांगने जाए और दोपहर तक खाने के लिए वापिस लौट आए। शेष दिन वह अध्ययनमनन व शिक्षा प्रदान करने में व्यतीत करता है। वर्षा के दिनों को छोड़कर 'भिक्खुका कर्त्तव्य है कि पूरे वर्ष यात्रा करे और शिक्षा प्रदान करने का कार्य करे। वर्षा के दिनों में वापस संघ के जीवन की ओर लौट आता है तथा अध्ययन व धम्म के नियमों को दोहराता है। धम्म के उपहार को लोगों तक पहुंचाना भिक्खु का मुख्य कर्तव्य है। धम्म के रास्ते पर आगे बढ़ना व्यक्ति विशेष का अपना कार्य है न कि उसका वह ईसाई धर्म के समान पादरी अथवा चर्च सेवक नहीं है। वह केवल धम्म के ज्ञान के बारे में बताने वाला है । 

 

1) संगठन (Organisation) :

  • प्रत्येक बौद्ध भिक्षु एक विशेष क्षेत्र के संघ का सदस्य बन सकता है। सदस्यों को चारों दिशाओं ( चतुर्दिशा) का प्रतिनिधित्व करना आवश्यक समझा जाता है। दस सदस्यों के कोरम का नियम है पर आजकल सब जगह इसे एक सा नहीं माना जाता। पूरे कोरम का बिना समूह द्वारा लिए गए निर्णय व जारी निर्देशों को कोई मान्यता प्राप्त नहीं थी। ऐसे निर्णयों को अनुपस्थित सदस्यों की सहमति लेकर विधिमान्य नहीं बनाया जा सकता था।

 

  • संघ के सदस्यों द्वारा स्थान ग्रहण करने की व्यवस्था के बारे में पहले से नियम तय थे। संघ के सामने निर्णय के लिए रखे जाने वाले मामलों को औपचारिक रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक था। हर सदस्य को अपनी बात व अपना वोट प्रस्तुत करने का अधिकार था क्योंकि बहुमत के द्वारा पारित निर्णय ही लिए जाते थे। जटिल समस्याओं को एक विशेष समिति के हवाले किया जाता था तथा उसके सुझाव संघ के सामने विधिवत मान्यता प्रदान करने के लिए प्रस्तुत किए जाते थे। मूलभूत नियमों संबंधी प्रश्नों के निर्णय के लिए धार्मिक समिति बनाई जाती थी।

 

  • बुद्ध ने हालांकि अनमने ढंग से ही पर नारी भिक्षुओं (भिक्षुनियों) के समूह की भी सर्जना की थी। पुरुषों से पद व अन्य मामलों में निचले स्तर पर रहने वाली भिक्षुनी की व्यवस्था भारत में सम्राट अशोक के समय तक प्रायः समाप्त हो चुकी थी। आज भी यहाँ तक की थेरवाड ( Therawad) परम्परा वाले देशों में भी व्यवस्था के किसी स्तर पर नारी सदस्य नहीं हैं।

 

2) संघ और समाज

  • बौद्ध मठ में संघ सर्वोपरि है। इसकी भूमिका सामाजिक जीवन के सभी मामलों में अंतिम न्यायालय की है। "मैं अपने आपको भगवान बुद्ध धम्म व संघ को समर्पित करता हूँऐसा बुद्ध के लिए प्रार्थना में कहा जाता है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि धम्म के प्रति समर्पण स्वैच्छिक है व अंततः बुद्ध द्वारा दिखाए रास्ते पर चलकर यह स्वैच्छिक समर्पण संघ के प्रति हो जाता है।

 

  • बुद्ध ने यह शिक्षा दी कि सभी वस्तुओं को उनकी वस्तुस्थिति में ही ग्रहण किया जाए। इसलिए यह कहा जाता है कि संघ दार्शनिक रूप से राजनीतिक शक्तिओं के प्रति सामान्य दृष्टिकोण रखता है। अधिकांशतः राजनीतिक शक्ति इसकी मित्र बनी रहीपर यह सदैव सभी परिस्थितियों में संभव नहीं हो सका। जैसा कि बर्मा और श्रीलंका की हाल की घटनाओं से लक्षित होता हैयह सांसारिक राजनीति में उलझ गया है । 

 

  • आज संघ अधिकतर पूर्ववत ही हैयद्यपि प्रचार तथा पंथ संबंधी पद्वति में कुछ परिवर्तन अवश्य आए हैं। भिक्षु की ग्राम शिक्षक के रूप में भूमिकाआधुनिकीकरण के क्रम में एक भाग के रूप में शिक्षा क्षेत्र पर धर्म निरपेक्ष शक्तिओं के बढ़ते नियंत्रण के फलस्वरूप समाप्त हो गई है। जापान में भिक्षु केवल संप्रेषक मात्र हैं न कि प्रदर्शक यदि वह चाहे तो विवाहित जीवन बिता सकता है। संघ की भी अब पूर्व शक्ति का हास हुआ है।

 

3 मठ (Mats )

 

  • मठ की स्थापना ईसा पश्चात 8वीं शताब्दी में शंकर के नाम से प्रचलित आदि शंकराचार्य द्वारा की गई। 
  • वे अद्वैत ( Adwait ) दर्शन के भी संस्थापक हैं। जो ज्ञान व भक्ति का समन्वय करते हैं तथा अति उच्च वैचारिक धरातल पर विभिन्न धार्मिक विश्वासों को एक करने का प्रयास करते हैं। 
  • मठ का अर्थ है उन संन्यासियों का निवास स्थान जो "निर्गुण / सगुण के आधार पर अद्वैत सिद्धांत का प्रचार करते हैं। 
  • मठ का अर्थ ऐसे स्थान से भी है जहां दूसरों के भले के लिए जीवन और ज्ञान के संबंध में अधिक जानकारी प्राप्त करने के इच्छुक छात्र निवास करते हैं। इस प्रकार मठ इसके संस्थापक द्वारा प्रतिपादित आध्यात्मिक सिद्धांत के विकास तथा प्रचार को समर्पित आध्यात्मिक झुकाव के लिए निर्मित शिक्षण संस्थान है।
  • श्री चैतन्य मठ चैतन्य महाप्रभु की कृष्ण-भक्ति का प्रचार करता है तथा रामकृष्ण मठ सभी धार्मिक अनुभवों विशेषतया हिन्दू धर्मव ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म की एकलक्ष्यता के बारे में प्रचार करता है। 
  • मठ की जड़ें संघ में निहित होती हैं। संगठन के रूप में इसमें संघ जैसी कई विशेषताएं हैं यद्यपि सैद्धांतिक रूप से यह संघ से भिन्न है। मठ जिसकी जड़ें वेदांत में हैंनिरीश्वरता पर आधारित है। 
  • मठ तथा अद्वैत तथा उनका संगठनात्मक अंतसंबंध बौद्ध धर्म और मीमांसका के विरोध के फलस्वरूप विकसित हुए।
  • आदि शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों में भारत की क्षेत्रीय एकता के प्रति बढ़ती चेतना को उजागर करते चार मठों ( बद्रीनाथपुरीद्वारका तथा श्रींगेरी) की स्थापना की।
  • (जवाहरलाल नेहरू 1960-182) मठ को आठवीं शताब्दी में हिन्दू धर्म की सुधार प्रक्रिया का उत्पादन भी माना जाता है।  
  • मठ की स्थापना अद्वैत मठ (Adwait Math) अर्थात एक ईश्वरवादी विश्वास के प्रसार के लिए स्वार्थरहित आध्यात्मिक प्रचारकों के संगठन व शिक्षण के लिए की गई थीं।

 

  • मठ परंपरा का यह गुण रामकृष्ण मठ के संस्थापक विवेकानन्द की शिक्षाओं में अधिक प्रभाव के साथ प्रतिध्वनित होता है। श्री चैतन्य गोड़िया मठ का उद्देश्य राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण तथा विभिन्नताओं के बावजूद लोगों में एकता के सूत्र को पहचानने में लोगों की मदद करना है। (पारलौकिक तथा इहलौकिक ) परम्परा तथा आधुनिकता और आध्यात्मिक तथा परोपकारी समाज कार्य में सामंजस्य स्थापित करते हुए आज मठ मध्ययुगीन आधुनिक दार्शनिक विश्व दृष्टिकोण तथा इसके प्रतिपादन की एक परम्परा बन गया है। सामाजिक तौर पर यह एक उच्च जाति-मध्यम वर्गीय व्यवस्था है। इसके सामान्य सदस्य अधिकतर व्यवसायी तथा व्यापारी व नव धनाढ्य हैं। मध्यम वर्ग के विस्तार के साथ इसका भी विकास तथा विस्तार हुआ है।

 

मठ क्या होते हैं 

  • मठ वास्तव में एक पेंडुलम की भांति हैं जो पृथकत्व तथा मेल के बीच झूलता है। इसका आध्यात्मिक सिद्धांत इसका रीति तंत्रइसका पुरोहित वर्ग तथा इसके साधारण अनुयाय और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि इसे विशिष्टता अथवा पृथकता का चोगा पहनाती है। सैद्धांतिक रूप से यह सभी का स्वागत करता है। अतः अब यह स्पष्ट है कि मठ ऐसे सदस्यों का संगठन है जिसमें किन्हीं महत्वपूर्ण मुद्दों पर आपसी मतभेद हो सकते हैंऔर जिससे उनमें फूट पड़ जाती है। जब लगभग सारे ही मुद्दों पर सदस्यों के विचार अलग होते हैं या धार्मिक विश्वासों का खुलासा वे अपने अपने नजरिए से करते हैं तो मठ में इसी पथ का अनुसरण किया जाता है जिससे फूट पड़ जाती है।

 

मठं के तीन उद्देश्य हैं: 

(1) इसका प्रथम उद्देश्य आध्यात्मिक है इसके द्वारा प्रस्तुत आध्यात्मिक ज्ञान को परिभाषित करनाबनाए रखना व इसका प्रचार करना। इस कार्य के लिए यह आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचारकों के शिक्षण तथा नियुक्ति के लिए संस्थागत साधनों की संरचना करता है। 


(2) यह दार्शनिक नैतिक मूल्यों को मनुष्यों में उजागर करने का प्रयास करता है। जिसका मुख्य उद्देश्य परिवारराजनीति तथा समाज में व्यक्तिक चरित्र का पुनःस्थापन है। 


(3) परोपकारी सामाजिक कार्यों का संगठन तीसरा उद्देश्य है। इसमें दवाखानों तथा चिकित्सालयोंशैक्षणिक संस्थाओं व संस्कृत पाठशालाओं का संचालन सम्मिलित है। अपने आध्यात्मिक उद्देश्य के अनुसरण के लिए मठ बहुधा पुस्तकों तथा पत्रों के प्रकाशन के लिए मुद्रण की व्यवस्था भी करता है। यह शिक्षण तथा अनुसंधान के लिए पुस्तकालय भी बनाता है।

 

  • आजकल मठ अधिकतर एक संविधान के अनुरूप संचालित न्यास के तत्वाधान में स्वीकृत समिति के रूप में कार्य करता है। मठ तथा आश्रम को ट्रस्ट में परिवर्तित करने की प्रवृति लगातार प्रबल होती रही है तथा इसके कई कारण बताए जाते हैं। यह मठ की सम्पति का उपलब्ध सर्वोतम संस्थागत बचाव है। नामांकित / दीक्षित अनुयायी को उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति के पैंतृक अधिकार का प्रचलित नियम संघर्ष को जन्म देता है तथा यह नियम सभी परिस्थितियों में मठ की सम्पति को बिखरने अथवा दुरुपयोग होने से नहीं बचा सकता। ट्रस्ट का यह रूप इसे धन एकत्र करने में भी मदद करता है क्योंकि पंजीकृत धर्मार्थ संस्था को दिए जाने वाला दान व्यक्ति विशेष की आय के एक निश्चित प्रतिशत तक आयकर से मुक्त होता है। 

 

4 पंथ (Panth)

 

  • धार्मिक संगठन के रूप में पंथ (रास्ता) एक विशिष्ट स्थान रखता हैयद्यपि इसकी बहुत सी बातें संघ व मठ की परम्परा से ली गई हैं। 
  • पंथ का उदय भारत में इस्लाम के राजनीतिक-धार्मिक प्रभुत्व के विरोध में तथा धार्मिक सामाजिक संघारों व पुनःसंगठन के उद्देश्य से हुआ। तब से पंथ परम्परा चली आ रही है। 
  • इसे निर्गुण भक्ति विद्यापीठ ( निराकार ईश्वर की उपासना ) भी कहा जा सकता हैअतः इसे निर्गुण पंथ भी कहा जाता है। एक ईश्वर में विश्वास रखने वाले होने पर भी ये मोक्ष के विचार पर विश्वास नहीं रखते। 
  • शंकराचार्य के अद्वैतवाद की तुलना में ये अधिक सांसारिक हैं। सामाजिक रूप से यह 'भगतव गुरू पर आधारित है। भगतगुरू व उसके पक्ष से जुड़ा है। यह रीति-रिवाज की औपचारिकताओं को न मानता तथा उससे अपेक्षा की जाती है कि वह पक्का शाकाहारी रहे तथा मदिरा पान न करें। उससे एक साधारण व मितव्ययी जीवन की भी अपेक्षा की जाती है। 
  • गुरु उसके आध्यात्मिक सिद्धांतपंथ तथा परिवार व अपने जाति आधारित आर्थिक क्रियाकलाप के प्रति समर्पित हैं। 'भगतएक गृहस्थ साधु है (जो आध्यात्मिक ज्ञान का समावेश पारिवारिक जीवन में करता है) 


  • पैथ वर्णाश्रम का विरोध करता है जो जन्म आधारित जातियों में असमानतारीति रिवाज की औपचारिकताएं तथा हिन्दू व इस्लाम धर्म के कट्टरपन का विरोधी है। यह साधनों की पवित्रताकर्म आधारित है तथा ईश्वर के सामने सबकी समानता पर जोर देता है। वास्तविक जीवन में पंथ अपनी पंथिक रीति-औपचारिकताओं से दूर नहीं रह सका जो कि सरलता तथा जटिलता से परे है। पंथ हिन्दू धर्म और इस्लाम से अलग होते हुए उनके अंदर तथा साथ साथ विकसित हुआ है। यह जाति प्रथा की भर्त्सना करता है पर यह उसके साथ ही विकसित हुआ है। यह पूरी तरह से जातिप्रथा के शिकंजे से मुक्त नहीं हो सका।

 

  • पंथ एक धार्मिक बंधुत्व है जिसका आधार आदि गुरू (प्रवर्तक) द्वारा दिखाया गया रास्ता है जिसके नाम पर यह एक समूह के रूप में जाना जाता है जैसे कबीर पंथदादू पंथ आदि । क्रम में आगे आने वाला उत्तराधिकरी आदि गुरू के चमत्कारी व्यक्तित्व का प्रतीक हो सकता है। आदिगुरू तथा उसके उत्तराधिकारियों द्वारा रचित काव्य ही पंथ का धार्मिक ग्रंथ होते हैं तथा इसके आध्यात्मिक सिद्धांत को प्रकट करते हैं। गुरू के अतिरिक्त सर्वमान्य धार्मिक उपदेशपंथिक रीतियांरीति चिह्न तथा पहचान का निशान (जिस अनुयायी द्वारा व्यक्तिगत आभूषणों के रूप में अपनाया जाता है) पंथिक बंधुत्व के लिए बंधन का कार्य करते हैं तथा इसे विशिष्टता की छाप देते हैं।

 

  • पंथ का सत्ता तंत्र सीमित लोगों द्वारा संचालित है। आदि गुरू की चामत्कारिक गुरु शक्ति उत्तराधिकार द्वारा अथवा नामांकन द्वारा आगे सौंपी जाती है। आदि गुरू अथवा उसके उत्तराधिकारी के नीचे गुरुओं और महंतों का तंत्र होता है। पंथ का संबंध भी गद्दी से होता है। वह स्थान जहाँ मूल रूप से इसकी स्थापना हुई थी। मूल 'गद्दीको आगे गद्दियों (शाखाओं में विभाजित किया जा सकता है। ये गद्दियां अथवा शाखाएं विभिन्न केन्द्रों में स्थापित होती हैं। शाखा का संचालन स्थानीय महंतों तथा कार्यकर्ताओं द्वारा किया जाता है जिसकी नियुक्ति स्थानीय अनुयायियों की सर्वसम्मति से होती है।

 

  • पंथिक संगठन में गुरु की महत्ता के कारण गुरुद्वारा प्रभावी सामाजिक जातीय महत्व है तथापि गुरूंद्वारा दैनिकअवसर विशेष पर तथा त्योहारों पर जनसमूह के जुड़ने का स्थान है। यह बंधुत्व की भावना को मजबूत करता है। पर धार्मिक सामाजिक संवाद का माध्यम भी है। ऐसे पंथ जिसमें संत या महंत (मुखिया) के प्रति पूरी स्वामीभक्ति होती हैउन्हें भी प्रवर्तक की मृत्यु के समय और पंथ में विभिन्न समूहों के उभरने पर फूट का सामना करना पड़ता है।

 

  • पंथिक समूह भी विरोध मतभेद व विभाजन से परे नहीं है। विभाजन का आधार काफी हद तक सैद्धांतिक मामले न होकर आंतरिक मतभेद तथा धार्मिक और धर्मेतर शक्ति को हथियाने के लिए अंतर-गुट प्रतिस्पर्धा होती है। पंथ बंधुत्व को संत तथा जनसाधारण दो भागों में विभाजित किया जाता है। संत पंथ का आध्यात्मिक प्रवक्ता है। वह इसके सिद्धांत का प्रसार करता है तथा इसका प्रचारक व धुमंत मिशनरी है। वह संसार को त्याग चुका अथवा गृहस्थ संत भी हो सकता है। उसके वस्त्र भगवा रंग अथवा अन्य किसी निर्दिष्ट रंग के हो सकते है। (गृहस्थ साधु) होने पर वह साधारण वस्त्र धारण कर सकता है पर पंथ का निशान धारण करना आवश्यक है।

 

  • विशिष्ट दीक्षा पद्धति के कारण पंथ एक विशिष्ट मतीय बंधुत्व है। पंथ में सम्मिलित होने का अर्थ है गुरू अथवा उसके उत्तराधिकारी के प्रति पूर्ण आस्था । एक पंथ में गुरू और महंत एक ही हो सकते हैं। जबकि किसी अन्य पंथ में उन्हें अलग रखने का प्रावधान है। महंत वास्तव में गुरू नहीं है। वह मठ अथवा संतों के गुट का मुखिया है। किसी अति गोपनीय पंथ के अपने गोपनीय रीति-रिवाज व कोड (सांकेतिक) भाषा हो सकते हैं। कुछ समय पहले तक शिवनारायणी दीक्षा प्राप्त न किए लोगों को अपने गुरुद्वारे में प्रवेश की अनुमति नहीं देते थे तथा उनकी अपनी गोपनीय भाषा भी थी जो अब लुप्त हो रही है। उनके यहाँ महिलाओं को भी गुरुद्वारे में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। शिवनारायणी सदस्य के लिए आवश्यक है कि वह अपने साथ पहचान पत्र (परवाना) रखे जिसे संबंधित गुरुद्वारे के मुख्य महंत द्वारा जारी किया जाता है।

 

  • महत्वपूर्ण बात है कि पंथ के अनुयायी अधिकतर जाति-तंत्रों निचले हिस्सों से ही आए तथा मध्य वर्ग से कभी कभी ही वर्णाश्रम का विरोध करते पंथ ने संस्कृतिकरण का एक लोकप्रिय संस्करण प्रस्तुत किया। रीतियों के तौर पर अधिक जटिल न होने के कारण यह सैद्धांतिक व सांस्कारिक-सामाजिक जाति गतिशीलता पैदा करने में समर्थ रहा पर अधिक दूर तक नहीं जा सका।

 

  • वर्णाश्रम के विरोध के द्वारा इसने वर्ण-भेद में निहित शक्ति - तंत्र का विरोध किया। कुछ स्थानों पर इसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हुआ था तथा कुछ अन्य स्थानों पर इसका राजनीति से संघर्ष भी हुआ। संघर्ष का कारण अक्सर इसके नेतृत्व का धर्मेतर स्वार्थ रहा । तथापि टकराव जितना अधिक तीव्र होता है पंथ उतना ही आक्रामक होता है।

 

  • आज मठ की ही भांति पंथ को भी संविधान संचालित व ट्रस्ट के रूप में कार्य करते देखा जा सकता है। इसकी प्रकृति सिद्धांतवादी तथा राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य की होती है। कुछ निश्चित स्थानों पर जैसे कि चमार जाति में पंथ के प्रति आस्था में भटकाव आया है। बिजनौर में रविदास के अनुयायी सिक्ख धर्म की ओर मुड़ गए । देहरादून में बिजनौर के चार विस्थापित आर्य समाज में चले गए। अब नव-बौद्ध धर्म अधिक धार्मिक सुधारवादी अपील करता प्रतीत हो रहा है। अधिकांशतः आंतरिक जाती मतभेद ही - धर्म-भेद व टकराव को प्रश्न करते हैं।

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