दीप्तिकालिता क्या होती है ? | PHOTOPERIODISM IN HINDI

दीप्तिकालिता क्या होती है ? (PHOTOPERIODISM IN HINDI)

दीप्तिकालिता क्या होती है ? | PHOTOPERIODISM IN HINDI
 

दीप्तिकालिता क्या होती है ?

आवृतबीजी (Angiosperms) अथवा पुष्पों पौधों (Flowering plants) का लाक्षणिक गुण है कि में पुष्प अवश्य उत्पन्न करते हैं। बीजों को बोने के पश्चात् पौधों का निर्माण होता है। इनमें हुई वृद्धि वृद्धि (Vegetative growth) कहलाती है। विभिन्न पौधों में वध वृद्धि का समय अलग-अलग होता है। परोप पौधों में पुष्पन (Flowering) की क्रिया होती है। पौधों में पुष्पन की क्रिया मुख्यतः दो कारकों से प्रभावित होती है-

 

(1) प्रकाशकाल (Photoperiod)-प्रकाशकाल का पुष्यन पर प्रभाव दीप्लिकालिता (Photoperiodism) कहता है। 

(2) तापमान (Temperature) तापमान का पुष्पन पर प्रभाव बसन्तीकरण (Vernalization) है।

 

दीप्तिकालिता (Photoperiodism) 

  • सर्वप्रथम गार्नर और एलार्ड (Garner and Allard, 1920) ने तम्बाकू की एक किस्म मैरीलैण्ड मैमोद (Maryland) mammoth) पर अध्ययन करने पर यह पाया कि पौधों को सभी आवश्यकताएँ पूर्ण करने के पश्चात् भी जब तक प्रकाश की उचित अवधि उन्हें नहीं मिलतीउनमें पुष्पन नहीं होता है। इस घटना को उन्होंने दीप्तिकालिता (Photoperiodism) का नाम दिया। पुष्प के जितने प्रकाश काल की आवश्यकता होती हैदिन की लम्बाई (Day length) अथवा दीप्तिकाल अथवा प्रकाश-काल (Photoperiod) कहलाता है। 


दीप्तिकाल के आधार पर पौधों का वर्गीकरण  

गार्नर और और एलार्ड (Garner and Allard) ने दीप्तिकाल के आधार पर पौधों को तीन वर्गों में विभाजित किया। बाद में इसमें तीन और शामिल कर लिए गये- 

(1) अल्प प्रदीप्तकाली पौधे (Short Day Plants, SDP), 

(2) दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे (Long Day Plants, LDP), 

(3) दिन उदासीन पौधे (Day Neutral Plants, DNP), 

(4) अल्प दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे (Short-Long Day Plants, SDLDP), 

(5) दीर्घ अल्प प्रदीप्तकाली पौधे (Long-Short Day Plants, LDSDP), 

(6) मध्यवर्ती प्रदीप्तकाली पौधे (Intermediate Day Plants) I

 

(1) अल्प प्रदीप्तकाली पौधे अथवा छोटे दिन वाले पौधे (Short Day Plants, SDP) 

  • इन पौधों की पुष्पन के लिए अपेक्षाकृत छोटे दीप्तिकाल को आवश्यकता होती है। इन पौधों में पुष्पन के लिए दीप्तिकाल एक निश्चित क्रान्तिक काल से कम होना चाहिए (Photoperiod must be less than certain critical period)। ऐसी स्थिति में जब इनका दीदिकाल क्रान्तिक दोतिकाल से अधिक हो जाता है तो ये पौधे कायिक अवस्था में ही बने रहते हैं और इनमें पुष्पन नहीं होता है। इनमें तभी पुष्पन लाया सकता है जबकि इन्हें दिन में कृत्रिम रूप से इतने घन्टों के लिए अंधरे में रखा जाय कि इनका दीतिकाल क्रान्तिक दीप्तिकाल से कम हो जाय। यह क्रान्तिक दीप्तिकाल विभिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न होता है। उदाहरण के लिएतम्बाकू की किस्म मैरीलैण्ड (Maryland mammoth) में पुष्पन के लिए दौप्तिकाल 12 घण्टे से कम तथा अँधेरा 12 घंटे से अधिक होना चाहिए। यदि इस पौधे को 12 घण्टे से अधिक का दीप्तिकाल तथा 12 घण्टे से कम का अन्धकार दिया जाय तो इसमें पुष्पन नहीं होगा। सोयाबीन (Glycine max), तम्बाकू (Nicotiana tabacum) बथुआ (Chenopodium rubram), क्राइसेन्वीयम (Chrysanthemum), यम (Xanthium) अन्य अल्प प्रदीप्तकाली पौधों के कुछ सामान्य उदाहरण है।

 

अल्प प्रदीप्तकाली पौधों की मुख्य विशेषताएँ (Main features of SDP)-

एक अल्प प्रदीप्तकाली पौधे जैन्धियम (Lanthium) पर किये गये विभिन्न प्रयोग यह प्रदर्शित करते हैं कि- 

(i) अल्प प्रदीप्तकाली पौधों में पुष्पन के लिए प्रकाश का इतना महत्त्व नहीं हैजितना लगातार अन्धकार के एक लम्बे काल का. 

(ii) इन पौधों में अन्धकार की अवधि एक विशेष क्रान्तिक काल (Critical period) से अधिक होनी चाहिए। इस अन्धकार की अवधि को बीच में सफेद या लाल प्रकाश देकर एक क्षण के लिए भी भंग कर दिया जाय तो इन पौधों में पुष्पन नहीं होगा। 

(iii) यदि अन्धकार की अवधि में कुछ समय के लिए बहुत ही कम तीव्रता (Intensity) का प्रकाश इन पौधों को दिया जाय तो इन पौधों में पुष्पन नहीं होगा। 

(iv) यदि इन पौधों को प्रकाश एवं अन्धकार अवधि एकान्तर क्रम में दी जाय तो भी इनमें पुष्पन नहीं पड़ेगा। 

(v) यदि प्रकाशकाल को अन्धकार से भंग कर दिया जाए तो इन पौधों के पुष्पन पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।

 

  • हिलमैन (Hillman, 1959) ने बताया कि यदि अल्प प्रदीप्तकाली पौधों को लगातार अन्धकार अवधि में सुक्रोज दिया जाए तो उनमें पुष्पन हो जाता है। इससे पता चलता है कि केवल भोजन संश्लेषण के लिए ही इन पौधों को प्रकाश की आवश्यकता होती है। इन सभी बातों से यह निष्कर्ष निकलता है कि अल्प प्रदीप्तकाली पौधों में पुष्पन शुरू करने के लिए वास्तव में अन्धकार अवधि की लम्बाई (रात्रि की लम्बाई) एवं उसकी निरंतरता (Continuity) ही महत्त्वपूर्ण है। इसी कारण से इन पौधों को दीर्घ रात्रि वाले पौधे (Long Night Plants) भी कहते हैं।

 

(2) दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे अथवा लम्बे दिन वाले पौधे (Long Day Plants, LDP)- 

  • इन पौधों को पुष्पन के लिए अपेक्षाकृत लम्बे दीप्तिकाल की आवश्यकता होती है। इन पौधों में पुष्पन के लिए दीप्तिकाल एक निश्चित क्रान्तिक काल से अधिक होना चाहिए (Photoperiod must be greater than certain critical period)। जई (Avena sativa), मूली (Raphars sativus), गेहूँ (Triticum aestivum), चुकन्दर (Beta vulgaris) आदि दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों के कुछ सामान्य उदाहरण हैं।

 

दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों की मुख्य विशेषताएं (Main features of LDP) - 

(i) ये पौधे अपेक्षाकृत बहुत कम या बिल्कुल अन्धकार नहीं चाहते। ये पौधे निरन्तर प्रकाश में भी पुष्पन करते देखे गये हैं। 

(ii) इन पौधों में पुष्पन पर लम्बे अन्धकार का विपरीत प्रभाव पड़ता है लेकिन लम्बे अन्धकार को एक क्षण के लिए प्रकाश देकर इनमें पुष्पन को बढ़ाया जा सकता है। 

(iii) एक दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे में अल्प प्रदीप्त दशाओं (Short day conditions) में भी पुष्पन कराया जा सकता हैयदि इन पौधों को अल्प प्रदीप्त काल (Short light period) के उससे भी कम अन्धकार अवधि period) दे दी जाए 

 

अल्प प्रदीप्तकाली पौधों (SDP) के समान दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों में पुष्पन का निर्धारण दिन की लम्बाई से नहीं बल्कि छोटी रात्रि की अवधि (Period of short night) द्वारा होता है अतः दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों को अल्प रात्रि वाले पौधे (Short Night Plants) कहना ज्यादा उपयुक्त रहेगा।

 

(3) दिन उदासीन पौधे (Day Neutral Plants, DNP)

  •  इन पौधों में पुष्पन के लिए किसी विशिष्ट दीप्तिकाल (Specific photoperiod) की आवश्यकता नहीं होती है ऐसे पौधों में पुष्पनदीप्तिकाल के अत्यन्त व्यापक परिसर (Range) में होता हैजो कुछ घण्टों से लेकर 24 घण्टे तक का हो सकता है। ये पौधे निरन्तर प्रकाश अथवा अन्धकार की दशा में भी पुष्पन कर सकते हैं। खीरा (Cucumis sativus), मक्का (Zeu mays), कपास (Gossypium hirsutium) आदि दिन उदासीन पौधों के सामान्य उदाहरण है। 


(4) अल्प- दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे (Short Long Day Plant, SDLDP) - 

  • कुछ पौधों में पुष्पन क्रिया हेतु दो प्रकार के दीप्तिकाल की आवश्यकता होती है। ऐसे पौधों को कुछ समय के लिए प्रारम्भ में अल्प दीप्तिकाल (Short photoperiod) फिर दीर्घ दीप्तिकाल (Long photoperiod) की आवश्यकता होती है। यदि यह क्रम उल्टा हो अर्थात् दीर्घ दीप्तिकाल पहले तथा अल्प दीप्तिकाल बाद में पौधे को प्राप्त हो तो इन पौधों में पुष्पन की क्रिया नहीं होती है। उदाहरण--कैन्डीटफ्ट (Iberis amara), शरद राई (Secale cereale) आदि।

 

(5) दीर्घ अल्प प्रदीप्तकाली पौधे (Long-Short Day Plants, LDSDP) – 

  • इन पौधों में भी पुष्पन के लिए दो प्रकार के दीप्तिकाल की आवश्यकता होती है। सिर्फ अन्तर इतना है कि प्रारम्भ में इन्हें दीर्घ दीप्तिकाल (Long photoperiod) फिर अल्प दीप्तिकाल (Short photoperiod) चाहिए। क्रम उल्टा होने पर पुष्पन क्रिया नहीं होगी। उदाहरण- अजूबा (Bryophyllum), रात की रानी (Cestrum nocturnun) आदि ।

 

(6) मध्यवर्ती प्रदीप्तकाली पौधे (Intermediate Day Plants) - 

ये पौधे प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और इन्हें पुष्पन क्रिया हेतु एक निश्चित दीप्तिकाल की आवश्यकता होती है और इससे अधिक अथवा कम दीप्तिकाल में वे कायिक अवस्था में रहते हैं। उदाहरण-मिकेनिया (Michania), एण्ड्रोपोगन (Andropogan) आदि। ये पौधे प्रतिदिन 12-14 घण्टे दीप्तिकाल मिलने पर पुष्पन क्रिया करते हैं। इससे कम या अधिक का दीप्तिकाल मिलने पर ये पौधे कायिक अवस्था में ही रहते हैं।

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