सेक्स एवं जेंडर विभेद - नारीवादी विचारधारा में नये विकास | New Developments in Feminist Ideology

 सेक्स एवं जेंडर विभेद - नारीवादी विचारधारा में नये विकास

 

सेक्स एवं जेंडर विभेद - नारीवादी विचारधारा में नये विकास | New Developments in Feminist Ideology

नारीवादी विमर्श में सेक्स एवं जेंडर विभेद 

  • नारीवादी विमर्श में सेक्स एवं जेंडर विभेद का महत्वपूर्ण स्थान है। यह स्पष्ट करता है कि महिलाओं की वर्तमान अधीनताअपरिवर्तनीय जैविक असमानताओं की वजह से नहीं है। बल्कि यह उनके सामाजिक मूल्यों मान्यताओं विचारधाराओं व संस्थाओं की देन हैजो स्त्री की अधीनता सुनिश्चित करते हैं। नारीवादी विचारधारा ने जेंडर की समझ को विस्तार दिया है। 


नारीवादी सिद्धांतों में सेक्स जेंडर विभेद के संबंध में निम्न चार धारायें हैं -

 

 सेक्स एवं जेंडर विभेद - नारीवादी विचारधारा-01

1. एलीसन जैगर के अनुसार सेक्स व जेंडर 

  • सेक्स व जेंडर एक दूसरे के साथ द्वंदात्मक रूप से संबंधित हैं और अविभाज्य हैं। सेक्स का रिश्ता प्रकृति से है और जेंडर का संस्कृति से यह परिभाषा हमें ज्यादा दूर तक नहीं ले जाती क्योंकि सेक्स एवं जेंडर दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। 
  • जैगर कहती है इंसान का हाथ श्रम का औजार ही नहींश्रम की उपज भी है। अर्थात् दोनों प्रक्रियाएं जुड़ी हुई हैं। मानवीय हस्तक्षेप बाहरी वातावरण को परिवर्तित करते हैं। उदाहरण के लिए पूरे विश्व में अलग-अलग वातावरण में मानव शरीर स्थानीय आहारमौसमजलवायु और किये जाने वाले विशिष्ट कार्यों की वजह से अलग-अलग और विशिष्ट रूप से विकसित हुये हैं। 


  • अर्थात् एक लंबी उद्विकास प्रक्रिया में वातावरण मानव शरीरों पर प्रभाव डालता है। अतः हम कह सकते हैं कि मानव शरीर की जैविक बनावट संस्कृति से भी उतनी ही प्रभावित होती है जितनी प्रकृति से जैविक बनावट के अनुसार संस्कृति बंधन लादे जाते हैं। उदाहरण के तौर पर दो दशक पहले की एथलीट रिकॉर्ड देखें तो पायेंगे कि पूर्व के रिकॉर्ड से आज के रिकॉर्ड में बढ़ोत्तरी हुई है। 
  • इससे यह पता चलता है कि महिलाओं के शरीर पर जो सामाजिक बंधन लादे गये थे उनकी वजह से उसका शारीरिक विकास अवरूद्ध हो रहा था। जैसे- चीन में लड़कियों के पैर बांधने की प्रथा का होना। फ्रांस में कोर्सेट पहनने की प्रथा का होना। इस प्रकार हम कह सकते है कि जैविक शरीर का दुरूपयोग या उपयोग सांस्कृतिक मांगों के अनुसार होता है। 


  • महिला एथलीटमुक्केबाजों का शरीर व पुरुष नर्तकों के शरीर के आकार क्षमता निर्माण प्रशिक्षण का परिणाम है। नारीवादी मानव शास्त्रीयों ने अपने अध्ययन में बतलाया है कि नृजातीय समूहों में स्त्री-पुरुष के मध्य शारीरिक असमानताएं बेहद मामूली है। अतः जैगर के अनुसार सेक्स कोई स्थायीअपरिवर्तनशील आकार नहीं है जिस पर समाज जेंडर का निर्माण करता हैबल्कि सेक्स स्वयं ही बाहरी कारकों से प्रभावित होता है।

 

सेक्स एवं जेंडर विभेद - नारीवादी विचारधारा-02

2. सेक्स जेंडर के बारे में रेडिकल नारीवादियों का मत 

  • सेक्स जेंडर के बारे में रेडिकल नारीवादियों का मतहै कि स्त्री-पुरुष के मध्य का जैविक अंतर महत्वपूर्ण होता है। रेडिकल नारीवादियों के अनुसार प्रजनन की जैविक क्षमता के कारण स्त्रियाँ ज्यादा संवेदनशील और प्रकृति के ज्यादा निकट होती हैं। उदाहरण के लिए रेडिकल नारीवादी सुजेन ग्रिफिन और एंड्रया वार्किन मानती हैं कि मातृत्व का अनुभव बाहरी दुनिया से स्त्रियों के संबंध को प्रभावित करता है इसलिए महिलाएं दुलारपालन-पोषण व संवेदनशीलता के कारण प्रकृति के गुणों की वाहक हैं। पितृसत्ता ने स्त्रियों के इन गुणों का अवमूल्यन करके खारिज किया है। नारीवादियों का काम महिला संस्कृति के जरिये इन गुणों को पुनः स्थापित करना है। इनके अनुसार जेंडर निर्माण में संस्कृति को ही सारा महत्व देने का मतलब उन्हीं पितृसत्तात्मक मूल्यों को स्वीकारना है जो नारीत्व को महत्वहीन मानते हैं।

 

  • कुछ विचारकों का मानना है कि पुरूषत्व व नारीत्व का संकीर्ण द्विध्रुवीय मॉडल और नारीत्व का अवमूल्यन पश्चिमी सभ्यता की देन है। प्राचीन भारतीय संस्कृति में विभिन्न प्रकार की यौनिक पहचानों के लिए अधिक स्थान उपलब्ध था। उदाहरण के लिए इस काल में किन्नरों के लिए ज्यादा स्वीकार्यता थी जो आज के समाज में नहीं है। सूफी और भक्ति परंपराएं उभय लैगिकता पर आधारित थी जो दुनिया के द्विलिंगी मॉडल को स्वीकार नहीं करते थे। 


बारहवीं सदी में कन्नड़ भाषा के शैव मत को मानने वाले कवि बासवन्ता की कविता उभयलिंगता का उदाहरण है -

 

"यहां देखो मेरे हमसफर,

मैंने पुरुषों के कपड़े धारण किये हैसिर्फ तुम्हारे लिये 

कभी मैं पुरूष हूँकभी मैं स्त्री हूँ।" 

या जैसे कबीर कहते हैं कि राम मेरे प्रियतममैं राम की बहुरिया।"

 

 सेक्स एवं जेंडर विभेद - नारीवादी विचारधारा-03 

  • सेक्स व जेंडर विभेद की यह अवधारणा रेडिकल नारीवाद से बिल्कुल विपरित है। जुडिथ बटलर कहती है कि सोचने के एक तरीके और अवधारणा के रूप में जेंडर जैविक सेक्स की श्रेणी को जन्म देता है। इस अवधारणा के अनुसार जेंडर एक ऐसा अर्थ है जो सत्ता संबंधों द्वारा निर्मित होता है। विशेष कायदे कानूनों के जरिये स्त्री पुरुष शरीरों को एक विशेष प्रकार की पहचान दी जाती है। अमेरिका में अन्तरलिंगी शिशुओं (ऐसे शिशु जिनमें डिंब व वृषण ग्रंथि दोनों होते हैं या जिनके जननांग अस्पष्ट होते हैं) के अध्ययन में सुजैन कैस्टर ने बतलाया कि ऐसे शिशुओं के लिंग निर्धारित करने के लिए चिकित्सीय निर्णय जैविक लक्षणों के बजाय सांस्कृतिक मान्यताओं के आधार पर लिये जाते हैं। उदाहरण के लिए अन्तरलिंगी शिशुओं को पुरुष बना दिया जाता है फिर उसे जीवन भर हार्मोन थैरेपी दी जाती है। एलीसन जैगर भी मानती है कि उम्र बढ़ने पर बच्चे का सेक्स उभर कर जो सामने आने लगता हैमाँ-बाप उस जैवकीय सत्य को न स्वीकार कर जो लिंग बच्चे का बताया जाता है उसके आधार पर सर्जरी को प्राथमिकता देते हैं। इससे प्रतीत होता है कि जेंडर जैवकीय तत्व से अधिक प्रभावी होता है।

 

  • आज स्त्री अपनी जैविक पहचान से वर्गीय पहचान ऊपर रख सकती है। प्राथमिक रूप से स्वयं को जेंडर के संदर्भ में देख सकती है दुनिया की सभी स्त्रियों के हित जीवनपरिस्थितियाँ साझा हो यह जरूरी नहीं है। इसलिए देखा गया है कि उन्हें एक महिला आंदोलन की तुलना में अन्य आंदोलनों के जरिये संगठित कर पाना ज्यादा सरल है। दुनिया के लगभग सभी संगठित धर्म महिलाओं को पुरूषों की तुलना में कम मानता है। यह माना जा सकता है कि महिलाएँ अपनी जेंडर पहचान को ऊपर रखती हैं। अतः सेक्स जेंडर पहचान में हमेशा जेंडर पहचान चाहती है।

 

  • लैंगिक असमानता या जेंडर असमानतायह एक ऐसा मुद्दा है जिसमें स्त्री पुरुष दोनों ही शामिल हैं। पितृसत्तात्मक सोच को खत्म करने के लिए जरूरी है कि पुरुषत्व की अहंवादी सोच पर भी अंकुश लगाया जाये और इसीलिए अब इसे नारीवादी आंदोलन के में न देख कर लैंगिक समानता या जेंडर के रूप में देखा जाता है।

 

लिंग आधारित काम का बंटवारा

 

  • महिला पुरुष के लिए अलग-अलग काम का बंटवारा है। महिलाएं वही कार्य करती हैं जिसका कहीं कोई मान्यता नहीं है। घरों में किय जाने वाले काम की गिनती श्रम में नहीं है। वही गर्भधारण से लेकर बच्चा पैदा करने तक जो शारीरिक-मानसिक हानि होती है उसको भी मान्यता नहीं है। घरों में किये जाने वाले कार्य जैसे खाना पकानाकपड़े धोनाप्रेस करनाबच्चों की देखभालपानी भरनाबगीचे में काम करना बर्तन साफ करनाखाना परोसनासफाई करना आदि पुरूष करते हैं तो उसके लिए उन्हें भुगतान प्राप्त होता है। यही कार्य यदि महिला घर में करती है तो उस श्रम की गणना नहीं होती न ही उसका उन्हें कोई भुगतान प्राप्त होता है।

 

  • उपर्युक्त प्रक्रिया सामाजीकरण की प्रक्रिया में सदिया से दोहराई जा रही है। स्त्री पुरुष की रूढ़ अवधारणा सामाजिक सीख के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संस्कृति की भांति हस्तान्तरित होती है। अर्थात विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से समाज बाल्यावस्था से ही सिखाती है कि यदि लड़की हो तो ऐसा व्यवहार करोलड़का हो तो ऐसा व्यवहार करो। इन धारणाओं का प्रचलन अपने तथा आस-पास के घरों में सरलता से देखा जा सकता है। इस श्रृंखला को तोड़े बिना स्त्री-पुरूष सह-संबंध की नवीन अवधारणा विकसित नहीं की जा सकती। इसलिए वर्तमान में समस्त प्रचिलित अवधारणाओं की पड़ताल आवश्यक है।

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