मध्यप्रदेश में प्राप्त सिक्के (मुद्रायें) और उनसे संबन्धित राजवंश । MP (Madhya Pradesh ) se prapt mudrayen

मध्यप्रदेश में प्राप्त सिक्के (मुद्रायें) और उनसे संबन्धित राजवंश 

मध्यप्रदेश में प्राप्त सिक्के (मुद्रायें) और उनसे संबन्धित राजवंश । MP (Madhya Pradesh ) se prapt mudrayen


 

मध्यप्रदेश (म.प्र.) के प्राचीन इतिहास के विभिन्न कालों से संबंधित मुद्राएँ

  • सोने, चांदी, तांबा और मिश्र धातु से निर्मित विभिन्न आकार-प्रकार, मूल्य की तथा म.प्र. के प्राचीन इतिहास के विभिन्न कालों से संबंधित मुद्राएँ, मध्यप्रदेश के इतिहास और संस्कृति के पुनर्निमाण के दूसरे मुख्य पुरातात्विक स्रोत हैं। कालक्रम के अनुसार उनकी एक झलक निम्नलिखित है:

 

मध्य प्रदेश से प्राप्त आहत मुद्राएँ : 

चांदी और तांबे की आहत मुद्राओं की साम्राज्यिक और गैर साम्राज्यिक श्रृंखला बड़ी मात्रा में पूरे म.प्र. में पाई गई है। स्थल जहां से ये पाए गये हैं निम्न हैं:

 

  • आबरा, इन्दौर, उज्जैन, एरण, करचूल्हा, कसरावद, नागदा, कायथा, केसूर, धापेवारा, बड़वानी, बार (या बायार), बेसनगर, विदिशा, महेश्वर, मामदार, सारंगपुर, त्रिपुरी, तुमैन, साँची, रूनीजा, ककरहटा नांदनेर, नांदौर।

 

  • ये मुद्राएँ विभिन्न आकार और मूल्य की हैं और इन्हें मौर्यपूर्व मौर्यकालीन और मौर्योत्तर कालं का माना गया है।

 

मध्य प्रदेश से प्राप्त अनुत्कीर्ण, ढली तथा ढप्पांकित मुद्राएँ : 

  • नर्मदा और बेतवा घाटी में हाल ही में हुई खोजों से त्रिपुरी, उज्जैन, विदिशा, एरण, माहिष्मति, भगीला और कुररा के नगर राज्यों की अंकित मुद्राएँ मिली हैं। त्रिपुरी, उज्जैन, विदिशा, एरण, महेश्वर, नान्दौर, नान्दनेर, जमुनिया, खिड़िया और पवाया से अनेक मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। इनमें से कुछ इन्दौर, रायपुर, जबलपुर, भोपाल, होशंगाबाद, ग्वालियर, नागपुर और विदिशा के संग्रहालय और व्यक्तिगत संग्रहों में संग्रहीत हैं। 
  • नगर राज्य की ये मुद्राएँ तांबे या मिश्र धातु की बनी हैं। ये गोल और चौकोर दोनों आकार की हैं। ये मुद्राएँ साँचा और ढप्पा पद्धति से निर्मित हैं तथा विविध प्रकार की हैं। 
  • बेतवा और नर्मदा घाटी में हाल ही में की गई खोज में 200-100 ई.पू. काल के पूर्वी मालवा क्षेत्र के स्थानीय शासकों की उत्कीर्ण मुद्राएँ प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुई हैं। विभिन्न आकार वाली ये मुद्राएँ आहत शैली की हैं। ये मित्र और मित्र-इतर शासक द्वारा जारी की गई थीं।
  • जिन शासकों के नाम इन मुद्राओं से ज्ञात होते हैं वे हैं :- मित्र शासक : नारायणमित्र, भानुमित्र, वासु (या वज) मित्र और रविमित्र
  • मित्र इतर शासक : रामभद्र, दामभद्र, हस्तीदेव, रविभूति, भूमिदत्त, मदाविका। उज्जैन के एक ढप्पांकित मुद्रा पर जो अब ब्रिटिश संग्रहालय में है, रज्ञो धर्मपालस नाम उत्कीर्ण है। भवदत्त, अजदत्त और अभयदत्त की सीसे की मुद्राएँ त्रिपुरी में मिली हैं जो दूसरी शताब्दी के अंत या पहली शताब्दी की हैं जब इस क्षेत्र में सातवाहन शासन की शुरूआत नहीं हुई थी। त्रिपुरी में एक मित्र- मुद्रा के पाए जाने की भी जानकारी है।

 

  • अनुत्कीर्ण, ढले, ठप्पांकित तांबे और सीसे के सिक्कों के अतिरिक्त एरण, उज्जैन, विदिशा और तक्षशिला की जनपद मुद्राएँ संग्रहित हैं जो इन्दौर, उज्जैन, एरण, विदिशा, कसरावद, खिड़िया, जमुनिया, तेवर, ककरहटा, पवाया, बालाघाट और महेश्वर में पाई गई हैं या फिर संग्रहित हैं।

 

मध्य प्रदेश से प्राप्त इन्डो-ग्रीक मुद्राएँ: 

  • इन्दौर के अडवानी संग्रह में विभिन्न स्थानों से संग्रहित की हुई चांदी और तांबे की कुछ मुद्राएँ हैं। मिनेन्डर की एक मुद्रा बालाघाट से भी मिली है। संबंधित शासक हैं: प्लेटो, हेलियोक्लीज, स्ट्रेटो, एपान्डेर, आर्केबियस, फेलोक्जेनस, निकियस, एपोलोफेनेस, अमीनतस, हर्मियस, यूकेटाइडस, और जिलौस इन मुद्राओं से म.प्र. के प्रारंभिक इतिहास की पुनर्रचना में कितना सहयोग मिला है, यह कहना कठिन है।

 

मध्य प्रदेश में सातवाहनों की मुद्राएँ : 

  • दक्षिण में सातवाहनों द्वारा म.प्र. पर शासन करने की बात, इस राज्य के क्षेत्राधिकार वाले क्षेत्रों से प्राप्त इनकी ढेर सारी मुद्राओं से पुष्ट होती है। 
  • उज्जैन, देवास, विदिशा, जमुनिया, तेवर, भेड़ाघाट और त्रिपुरी से प्राप्त सातकर्णी प्रथम की मुद्राओं से यह स्पष्ट होता है कि सातवाहनों का साम्राज्य मालवा और डाहल तक फैला हुआ था। गौतमीपुत्र सातकर्णी की मुद्राएँ उज्जैन से मिली हैं।
  •  भिलसा और देवास से वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं जिनसे संकेत मिलता है कि सातवानों का मध्यभारत के एक बड़े भाग पर शासन था। 
  • अंतिम शाक्तिशाली शासक यज्ञश्री सातकर्णी की मुद्राएँ बेसनगर, त्रिपुरी और देवास में पाई गई हैं। एक अन्य शासक कुंभ सातकर्णी को देवास से प्राप्त उसके सिक्कों से ही जाना गया है। दो सौ सातवाहन मुद्राओं का एक भंडार इन्दौर से भी मिला है। 
  • सातवाहन शासन के दौरान भारत के रोम के साथ व्यवसायिक सम्बन्ध विकसित थे। आवरा, त्रिपुरी और मामदाखेड़ी से मिली रोमन मुद्राएँ इस बात का संकेत देती हैं।

 

मध्य प्रदेश में शक क्षत्रप की मुद्राएँ: 

  • उत्तर और पश्चिमी भारत के एक विशाल क्षेत्र में शक क्षत्रप, इन्डो-ग्रीक शासकों के उत्तराधिकारी बने। इन्दौर में स्वर्गीय श्री अडवानी के संग्रह में प्रारंभिक शक शासक, जैसे मौस, एजेस, एजीलीसेस और एजेस द्वितीय की मुद्राएँ हैं। 
  • क्षहरात वंशावली के पश्चिमी क्षत्रप शासक भूमक नामांकित मुद्राएँ शिवपुरी के मुनिराज संग्रह में देखी जा सकती हैं। 
  • हाल ही में भूमक का एक सिक्का त्रिपुरी से प्राप्त हुआ है। शिवपुरी से पश्चिमी क्षत्रप शासकों में सबसे शक्तिशाली शासक नहपान की चांदी की मुद्राएँ भी हैं। इन मुद्राओं को सातवाहन शासक गौतमीपुत्र सातकर्णी, जिसने उसे हराया, द्वारा फिर चलाया गया। मऊ, दास और सोम की मुद्राएँ उज्जैन से एकत्रित की गई हैं। इसी प्रकार क्षहरात अर्त की एक मुद्रा मुनिराज, शिवपुरी के संग्रह में संग्रहीत है। 
  • पश्चिमी क्षत्रप की कार्दमक वंशावली के शासकों की मुद्राएँ भी म.प्र. में पाई गई हैं। इस शाखा के संस्थापक चष्टन की मुद्राएँ उज्जैन और शिवपुरी से मिली हैं। उज्जैन, चष्टन और उसके उत्तराधिकारियों की राजधानी थी। 
  • महाक्षत्रप रूद्रसिंह, रूद्रसेन प्रथम, दामजदश्री, दामसेन, विश्वसिंह, भत्रीदामन, विश्वसेन, रूद्रसेन तृतीय, रूद्रसिंह द्वितीय और तृतीय जैसे चष्टन के उत्तराधिकारियों के बहुत से सिक्के हैं। 
  • ईश्वरदत्त और श्रीदामन् की मुद्राएँ पूरे मालवा से मिली हैं और यह दर्शाता है कि इस क्षेत्र पर उनका अधिकार लम्बे समय तक कायम रहा।
  • छिन्दवाड़ा जिले के सोनपुर से मिले पश्चिमी क्षत्रप के 670 सिक्कों का एक भंडार महाकोसल में उनकी गतिविधियों पर प्रकाश डालता है।

 

मध्य प्रदेश से प्राप्त कुषाण मुद्राएँ : 

  • म.प्र. के कुछ भाग पर कुषाणों ने भी अधिकार कर लिया था। विदिशा और शहडोल में इस वंश के प्रारंभिक शासक विम कडफीसस की दो मुद्राएँ मिली हैं। लेकिन इन दो सिक्कों के आधार पर उसके राज्य के मध्यप्रदेश पर फैलाव के विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता है। 757 मुद्राओं का एक भंडार शहडोल में मिला है और इस भंडार में कलचुरि वंश के सभी शासकों के साथ कनिष्क प्रथम की 324 मुद्राएँ भी हैं। 
  • कनिष्क प्रथम के उत्तराधिकारी वासिष्क के शासनकाल का एक अभिलेख साँची से प्राप्त हुआ है। 
  • गला शासक हुविष्क था और उसकी मुद्राएँ बड़ी संख्या में शहडोल और हरदा से मिली हैं। हरदा से कनिष्क द्वितीय या कनिष्क तृतीय की मुद्राएँ भी मिली हैं।
  • वासुदेव प्रथम, हुविष्क का उत्तराधिकारी बना और उसके समय का एक तांबे का सिक्का तेवर में पाया गया है। 
  • भेड़ाघाट से प्राप्त कुषाण काल के अभिलेख भी जबलपुर क्षेत्र पर कुषाणों के शासन की पुष्टि करते हैं।
  • म.प्र. में वासुदेव के उत्तराधिकारियों की एक भी मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है।

 

मध्य प्रदेश में नागों की मुद्राएँ 

  • दूसरी शताब्दी के लगभग नागों की एक शाखा विदिशा पर शासन कर रही थी। विदिशा से इस वंश के संस्थापक वृषनाग की एक मुद्रा मिली है। 
  • भीमनाग अगला शासक था और उसके शासनकाल के दौरान नागों की इस शाखा की राजधानी को पद्मावती स्थानांतरित कर दिया गया था। 
  • इसके बाद के लगातार तीन शासक- स्कंदनाग, वसुनाग और वृहस्पतिनाग की मुद्राएँ पवाया (प्राचीन पद्मावती) में पाई गई हैं। 
  • पद्मावती के नागों के अंतिम 6: शासक क्रमश: रविनाग, विभुनाग, भवनाग, प्रभाकरनाग, देवनाग और गणपतिनाग थे। 
  • पवाया से इन सभी शासकों की मुद्राएँ पाई गई हैं। अकोडा, इन्दौर, उज्जैन, एरण, कुतवार, गोहद, नरवर और बेसनगर से भी नाग मुद्राएँ मिली हैं।

 

मध्य प्रदेश में बोधियों की मुद्राएँ

  • दूसरी-तीसरी शताब्दी में बोधि जबलपुर जिले के त्रिपुरी में शासन कर रहे थे। इस वंश के श्रीबोधि, वसुबोधि, चन्द्रंबोधि और शिवबोधि जैसे शासकों की मुद्राएँ और मुहरें त्रिपुरी की खुदाई में निकली हैं। 
  • जबलपुर में एम.सी. चौबे एवं के. पी. पाण्डेय के संग्रह में इस वंश के आठ शासकों की मुद्राएँ हैं। ये हैं श्रीबोधि, चन्द्रबोधि, शिवबोधि, वसुबोधि, वीरबोधि, वीरबोधिदत्त, सिरीवसक और सिरीशिव। त्रिपुरी से प्राप्त मिट्टी की एक मुहर से एक अन्य शासक धर्मबोधि के नाम का पता चलता है। 


मध्य प्रदेश में सेन वंश की मुद्राएँ

 

  • त्रिपुरी से मृण्मय मुहर और महासेन, सुजेष्ठसेन और सुन्दरसेन की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं जो 350 ई. के लगभग इस क्षेत्र पर शासन कर रहे थे। सुदर्शनसेन या सुन्दरसेन की दस मुद्राएँ जबलपुर के एम.सी. चौबे के संग्रह में हैं। 
  • चौबे और के. पी. पाण्डे संग्रह में त्रिपुरी से प्राप्त सीसे और पोटिन की मुद्राएँ और मिट्टी की मुहरों से सेनवंश के सात शासकों के नामों का पता चलता है। ये हैं यशसेन, सुन्दरसेन, महासेन प्रथम, सुजेष्ठसेन, सिंहसेन, वितिलय स्कंद और महासेन द्वितीय। ये शासक बोधियों के बाद और गुप्तों के पहले त्रिपुरी पर शासन कर रहे थे।

 

मध्य प्रदेश में मघ वंश मुद्राएँ: 

  • बघेलखंड क्षेत्र पर शासन कर रहे मघ वंश के शासक बोधियों के समकालीन थे। भद्रमघ और शिवमघ इस वंश के महत्पूर्ण शासक थे। उनके सिक्के और मुहरें कौशाम्बी, भीटा, बांधवगढ़, और त्रिपुरी से मिले हैं। उन्होंने कुषाण शासन को म. प्र. के महाकोसल क्षेत्र तक रोक रखा था।

 

मध्य प्रदेश में गुप्त और उनके समकालीनों की मुद्राएँ: 

  • जिस पहले गुप्त शासक की मुद्रा म. प्र. पाई गई है, वह है समुद्रगुप्त ये बमनाला, सकौर, रूनीजा और नरवर से मिली हैं। 
  • काच की मुद्राएँ विदिशा, सकौर और पगारा से प्राप्त हुई हैं। 
  • विदिशा में रामगुप्त की ताम्र मुद्राएँ पाई गई हैं। पाटन, बमनाला, सकौर, रूनीजा, सिवनी, सिहोरा, हरदा, पगारा और अनूपपुर से चंद्रगुप्त की स्वर्ण मुद्राएँ निकली हैं। उसी की ताम्र और कांस्य की मुद्राएँ साँची, विदिशा और उज्जैन से प्राप्त हुई हैं। .
  • बमनाला, पगारा और इन्दौर से कुमारगुप्त की मुद्राओं की खोज की गई है। 
  • इसी तरह से म. प्र. के दमोह जिले के सकौर में स्कंदगुप्त की मुद्राओं की खोज की गई है। उसी का चांदी का सिक्का, जिस पर 141 तिथि खुदी है, विदिशा से मिली है। 
  • उज्जैन- विदिशा क्षेत्र से मालवा पर शासन कर रहे गुप्तों के समकालीन जिष्णु की तांबे की कई मुद्राएँ मिली हैं। 
  • हूण, जो गुप्तों के समकालीन थे, मध्यभारत तक प्रवेश कर चुके थे। एरण के उत्खनन से निकले तोरमाण की ताम्र मुद्राएँ और अभिलेखों से इसकी पुष्टि होती है। 
  • आदिवराह द्रम्म 513 आदिवराह द्रम्म के एक मुद्रा भण्डार को जबलपुर जिले के सिहोरा तहसील में उमरिया से खोजा गया है।

 

मध्य प्रदेश में इन्डो-ससैनियन मुद्राएँ

  • म.प्र. में समय-समय पर चांदी और सोने की इन्डो-ससैनियन मुद्राओं के समूह और अकेले सिक्के प्राप्त हुये हैं। 
  • प्राप्ति स्थल हैं:- आवरा, इन्दौर, उज्जैन, एरण, खेरुआ, गुइदा, घटौदा, चंदेरी, छिन्दवाड़ा, देवतपुर, पाटन, बरदिया, बालाघाट, भाटपचलाना, महाराजपुर, मान्धाता, मुरवाड़ा, मुल्ताई, मोहनियाखुर्द, बहोरीबन्द, सिवनी, हरसूद, होशंगाबाद और पिपल्यानगर।

 

मध्य प्रदेश में चंदेलों की मुद्राएँ: 

  • कुछ चंदेल शासकों ने मुद्राएँ जारी की थीं। कीर्तिवर्मा मुद्रा जारी करने वाला पहला शासक था और उसकी मुद्राएँ सोने की थीं। इनमें से एक मुद्रा कलकत्ता के इंडियन म्यूजियम में संग्रहित है और एक अन्य कनिंघम के संग्रह में थी। 
  • उसके उत्तराधिकारी सल्लक्षणवर्मा ने तांबे और सोने की मुद्राएँ जारी की थीं और ये रायसेन जिले में तुलापार की खुदाई से निकली हैं।  कनिंघम के संग्रहण में भी इनमें से कुछ मुद्राएँ थीं। 
  • अगले शासक जयवर्मा ने चाँदी और तांबे की मुद्राएँ जारी की थीं। उसके सिक्के ब्रिटिश म्यूजियम के संग्रह में हैं उनके आधे द्रम्म की ताम्रमुद्रायें खजुराहो में मिली हैं। 
  • उसके उत्तराधिकारी पृथ्वीवर्मा ने भी ताम्र मुद्रायें जारी की। ये कनिंघम के संग्रहण में मौजूद थीं। 
  • अगले शासक मदनवर्मा के सिक्कों का एक समूह रीवा से प्राप्त हुआ है। उसकी स्वर्ण और ताम्र मुद्राएँ विभिन्न संग्रहणों में हैं। ये विभिन्न मूल्यों की हैं।
  • अगले शासक परमर्दीदेव की स्वर्ण और ताम्र मुद्राएँ त्रिपुरी से मिली हैं। खजुराहो से प्राप्त उसकी एक स्वर्ण मुद्रा कलकत्ता के इंडियन म्यूजियम में है। 
  • होशंगाबाद, अजयगढ़ और बांदा से अगले शासक त्रैलोक्यवर्मा की तांबे और सोने की मुद्राएँ मिली हैं। वीरवर्मा उसका उत्तराधिकारी था। उसके कुछ ही सिक्के त्रिपुरी और खजुराहो से मिले हैं। कुछ कनिंघम के संग्रह और कुछ कलकत्ता के इंडियन म्यूजियम में संग्रहीत हैं।

 

मध्य प्रदेश में परमारों की मुद्राएँ 

  • मालवा के परमार वंशों के कुछ शासकों ने भी मुद्राएँ जारी की थीं।
  • उदयादित्य की स्वर्ण मुद्राएँ उज्जैन और पिपलियानगर से मिली हैं। नागपुर के सेन्ट्रल म्यूजियम और आसाम संग्रहालय में जगदेव की स्वर्ण मुद्राएँ संग्रहण में हैं। 
  • इसी तरह से इन्दौर से नरवर्मा की सोने और तांबे की मुद्राएँ मिली हैं। 
  • रायसेन जिले के तुलापार में हुई खुदाई में जयवर्मा, उदयादित्य और नरवर्मा की स्वर्ण मुद्राएँ निकली हैं।
  • तुलसीपुर में भी परमारों की कुछ स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।

 

मध्य प्रदेश में माहिष्मति और त्रिपुरी के कलचुरियों की मुद्राएँ: 

  • कलचुरियों की सबसे प्रारंम्भिक मुद्राएँ वे हैं जिन्हें माहिष्मति शाखा के कृष्णराज ने जारी किया था और जो म.प्र. में त्रिपुरी, पाटन और बेसनगर से मिली हैं। उसकी मुद्रा महाराष्ट्र, विदर्भ, कोंकण और राजस्थान में भी चलती थी। वहां कई स्थानों से इन सिक्कों का भंडार निकला है। ये सिक्के, चांदी, तांबे और सीसे के हैं। 
  • कलचुरियों की माहिष्मति शाखा के परवर्ती सम्राट शंकरगण एवं बुद्धराज एवं विदर्भ के स्वामीराज के सिक्के भी हाल ही में प्रकाश में आये है। 
  • कलचुरियों की त्रिपुरी शाखा में सिर्फ गांगेयदेव ने मुद्राएँ जारी की थीं। 
  • मध्यप्रदेश के अतिरिक्त उसकी मुद्रायें उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, असम और महाराष्ट्र के कई स्थानों से भी मिली हैं। 
  • म.प्र. में इसके स्थल हैं: इसुरपुर, बरेठा, बरेला, मांडु, सागर, सोनसारी, त्रिपुरी, जरगवां, डुंगरिया और तिंगामाली। उसकी मुद्राएँ विभिन्न मूल्य की हैं और सोने, चांदी तथा तांबे की बनी हैं। उसकी लक्ष्मी प्रकार की मुद्राओं ने उत्तर और मध्यभारत में सिक्कों की ढलाई पर गहरा प्रभाव डाला। कलचुरियों की त्रिपुरी शाखा के किसी भी अन्य शासक ने मुद्राएँ जारी नहीं की थीं।

 

मध्य प्रदेश में देवगिरी के यादवों की मुद्राएँ: 

  • 11वीं, 12वीं शताब्दी में देवगिरी पर शासन कर रहे यादवों ने अपना अधिकार म.प्र. के भागों तक फैला लिया था। बालाघाट और लांजी में मिले अभिलेखों के अतिरिक्त उनकी मुद्राएँ कोटा, देवास और परसाडीह से मिली हैं।

 

मध्य प्रदेश में कच्छपघात् की मुद्राएँ: 

  • इस वंश के केवल दो शासकों ने मुद्राएँ जारी की थीं। पहला ग्वालियर शाखा का महिपाल था और दूसरा इसी वंश की नरवर शाखा का वीरसिंह था।
  • महिपाल के सोने और चांदी के सिक्कों के समूह ग्वालियर और झांसी से पाये गये हैं।
  • वीरसिंह के अश्वारोही प्रकार के तीन सिक्के मिले हैं जिनमें से एक ग्वालियर, दूसरा उत्तरप्रदेश के लखनऊ और तीसरा गोरखपुर जिले में प्राप्त हुआ है।

 

मध्य प्रदेश में नरवर के यज्वपालों की मुद्राएँ : 

  • यज्वपाल वंश के कुछ शासकों ने भी मुद्रायें जारी की थीं। इस वंश के संस्थापक चाहड़ द्वारा चलाई गई मुद्राएँ ग्वालियर से मिली हैं। ये 1254 और 1279 ई. के बीच की हैं। उसके उत्तराधिकारी गोपालदेव की मुद्राएँ भी मिली हैं। 
  • ग्वालियर से प्राप्त इस वंश के 791 सिक्कों का एक भंडार मिला है जिसमें चाहड़देव, आसल्लदेव एवं गोपालदेव के सिक्के सम्मिलित थे।

 

मध्य प्रदेश से प्राप्त विविध मुद्राएँ : 

  • इनके अतिरिक्त म.प्र. में विविध मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। इनमें दामसेन की एक ताम्र मुद्रा (अडवानी संग्रह), उज्जैन से जयाश्रय की एक ताम्र मुद्रा, पशुपति की चार तांबे की मुद्राएँ, ग्वालियर से श्री गुहिलपति की एक ताम्र मुद्रा, विदिशा से शिवगुप्त और सखदेव की एक-एक मुद्रा, इन्दौर के मुनिराज संग्रह से रणहस्तिन की एक चांदी की मुद्रा, त्रिपुरी से चन्द्र (?) की सीसे की एक मुद्रा, भोपाल से सिंहेन्द्रपाल की दो चांदी की मुद्राएँ, उज्जैन से विजयक की तांबे की चार मुद्राएँ और ग्वालियर से राजा शेषदत्त की दो मुद्राएँ सम्मिलित थीं।

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