सुकरात का दार्शनिक सम्प्रदाय | सिनिकवाद सम्प्रदाय| सिरिनैक सम्प्रदाय| Sukraat (Socrates) Darshnik Sampraday

सुकरात का दार्शनिक सम्प्रदाय  

Sukraat (Socrates) Darshnik Sampraday

सुकरात का दार्शनिक सम्प्रदाय | सिनिकवाद सम्प्रदाय| सिरिनैक सम्प्रदाय| Sukraat (Socrates) Darshnik Sampraday



सुकरातीय दार्शनिक सम्प्रदाय

 

  • सुकरात का स्वप्न लोगों को प्रबुद्ध बनाना थाताकि वे आत्म-परीक्षण एवं ज्ञान सुकरात का स्वप्न लोगों को प्रबुद्ध बनाना थाताकि वे आत्म-परीक्षण एवं ज्ञान के समस्त स्रोतों की परीक्षा करते हुए अपनी अन्तरात्मा के आदेशों पर चल सकें।
  • लेकिन सुकरात ने न तो किसी दार्शनिक सम्प्रदाय की स्थापना की और न ही कुछ लिखाजिससे संस्थाओं या शब्दों के माध्यम से उसका स्वप्न आगे साकार होता रहता।
  • लेकिन विभिन्न विचारकों नेजो न्यूनाधिक रूप से सुकरात के शिष्य रह चुके थेउनकी शिक्षाओं में से किसी एक या अधिक बिन्दुओं पर बल दिया तथा इस के साथ दूसरे स्रोतों से ग्रहीत तत्वों को जोड़कर ने सुकरात के नाम से विभिन्न सम्प्रदायों की स्थापना की। 
  • द्यपि सुकरात ने किसी सम्प्रदाय की स्थापना नहीं की थी फिर भी वह अपने पीछे शिष्यों की एक मंडली छोड़ गए, जिसमें से एक सर्वाधिक प्रसिद्ध शिष्य प्लेटो ने एकेडमी की स्थापना की। हम प्लेटों को अलग कर दें तो सुकरात की मंडली के जो सदस्य उसकी वैचारिक विरासत को आगे ले गएउनमें एन्टिस्थनीजसीरीन का अरिस्टिपस मेगारा का यूक्लिड्स और एलिस का फिडो था: इन्होंने क्रमशः सिनिकवादसिरीनैक सम्प्रदाय मेगारी सम्प्रदाय और एलियन सम्प्रदाय क स्थापना की। इनमें से प्रत्येक सम्प्रदाय का संक्षिप्त विवरण आगे दिया जा रहा है।

 

सिनिकवाद क्या है , सिनिकवाद सम्प्रदाय

 

  • सिनिकवाद का प्रारम्भ ईसा पूर्व चौथीं शताब्दी के मध्य में हुआ था और यह सुकरातीय परम्परा की सर्वाधिक मौलिक व प्रभावशाली शाखा थी। सुकरात के एक शिष्य एन्टीस्थिनीज और सिनोप के डायोजिनीस को सिनिकवाद का संस्थापक माना जाता है।
  • सिनिकवाद को मानव में निहित पशु-स्वभाव की क्रान्तिकारी पुनः परीक्षा के लिए जाना जाता है। सिनिकजो कि सिनिकवाद के संस्थापकों द्वारा स्वआरोपित एक उपनाम था का शाब्दिक अर्थ है "कुत्ता सदृश" या "कुत्ते का शिष्य" ।


  • सिनिकवाद ने व्यंगविद्रप एवं सूक्ति जैसी प्रभावशाली साहित्यिक शैलियों का प्रयोग अपने समय की प्रबल विचारधाराओं को निरस्त करने के लिए किया। 
  • इसने मुख्य रूप से दो बातों पर आधारित नवीन नैतिकता का विचार रखाजिसमें प्रथम है- आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं को कम करना तथा दूसरा है भाषण स्वतंत्रता एवं कार्य करने की स्वतंत्रता को बढ़ाना।
  • इसमें से प्रथम को तो शारीरिक प्रशिक्षण द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और दूसरे को मान्य सामाजिक वर्जनाओं की खुलेआम अवहेलना के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। अपने व्यवस्था विरोधी दृष्टिकोण के चलते उन्होंने विद्यमान सरकारों को मानव द्रोही बताया। 
  • सिनिकों ने परम्परागत संस्कृति को प्रसन्नता के मार्ग में बाधक बताया। उन्होंने प्रकृति से साक्षात सम्बन्ध का सर्मथन किया तथा प्रतिपादित किया कि मनुष्य सकल विश्व का नागरिक है।

 

  • सिनिकों ने सुनियोजित ढंग से यह बताने का प्रयास किया कि प्रसन्नता समाज पर अथवा किसी परिस्थिति पर निर्भर नहीं करतीबल्कि यह आत्म-स्वातन्त्रय पर निर्भर करती हैजिसे अनुकरणीय कृत्यों और शारीरिक प्रशिक्षण द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। 
  • सिनिकों ने दार्शनिकों द्वारा अनुशासित सैद्धान्तिक विषयों की मूल्यता को तथा समाज द्वारा मान्य धनहैसियत परिवार आदि राजनैतिक शक्ति की मूल्यता को सिरे से खारिज कर दिया।

 

  • यदि सिनिकों के पास नैतिकता और प्रसन्नता के कारणों से सम्बन्धित भिन्न संकल्पना थी तो इसका कारण यह था कि उनकी मनुष्य की संकल्पना ही दूसरों से भिन्न थी। सिनोप के डायोजिनीस नें मनुष्य की जो तस्वीर प्रस्तुत की वह परम्परा से आदर्श के रूप में चली आ रही मानव की तस्वीर से भिन्न थी।
  • डायोजिनीस के सिनिकवाद में अतिवादिता दिखाई देती है। उसका विश्वास था कि मनुष्य पशु हैजिसे स्वतन्त्रता और आत्म-निर्भरता के विषय में अपने सहजीवी प्राणियों से बहुत कुछ सीखना है। पशुओं को आदर्शस्वरूप प्रस्तुत  करने का कारण संस्कृति की तुलना में प्रकृति की सर्वोच्चता को स्थापित करना था। 
  • डायोजिनीस नें कुत्ते की तरह जीना पसन्द किया। उसने यह दिखाया कि वह मनुष्य को इस योग्य बना देगा कि वे अपनी जातीय सीमाओं का परीक्षण कर सकें और स्वतंत्रता की उस असीमितता से परिचित हो सकें जिसका आनन्द पशु उठाते हैं। 

 

सिरिनैक सम्प्रदाय

 

  • सिरीन के एरिस्टीपस ने सिरिनैक सम्प्रदाय की स्थापना की। वह 435 ई.पू. में पैदा हुआ था। सिरीन में वह प्रोटागोरस की शिक्षाओं से परिचित हुआ और उसके बाद एथेंस में रहते हुए सुकरात के संपर्क में आया।

 

  • एरिस्टिपस ने कहा कि केवल इन्द्रिय-संवेदनों से ही हमें निश्चित ज्ञान प्राप्त होता है। यह सुकरात की इस धारणा के ठीक विपरीत था कि हमें निश्चित ज्ञान की प्राप्ति सामान्यों के संप्रत्यय से होती हैविशेषों के इन्द्रिय प्रत्यक्ष से नहीं। स्पष्टतः यदि केवल इन्द्रिय संवेदन ही हमें निश्चित ज्ञान प्रदान करते हैं तो ऐसे ज्ञान का उद्देश्य सुख की प्राप्ति होना चाहिए।

 

  • एरिस्टिपस ने बताया कि संवेदन परिवर्तन में निहित होते हैं। जब परिवर्तन धीमा होता है तो संवेदन सुखदायक होते हैं। जब परिवर्तन तीव्र होता है तो वहाँ कष्ट होता है। जब परिवर्तन अतिसूक्ष्म होता है या जब कोई परिवर्तन नहीं होता तो वहाँ कोई आनन्द या कष्ट नहीं होता है। तीव्र परिवर्तन नैतिक लक्ष्य नहीं हो सकता। परिवर्तन के अभाव की तटस्थता में भी नैतिक लक्ष्य संभव नहीं है। नैतिक लक्ष्य मृदु गति में पाया जाता है जो आनन्द उत्पन्न करता है। इस प्रकार आनन्द मानवीय आचरण का नैतिक लक्ष्य बन जाता है।


  • सुखएरिस्टिपस के अनुसारजीवन का लक्ष्य है। किस प्रकार का सुख जीवन का लक्ष्य हो सकता हैएरिस्टिपस का कहना है कि सकारात्मक तथा वर्तमान सुख ही जीवन का लक्ष्य हो सकता है। सिरिनैक्स यह विश्वास करते थे कि शारीरिक सुख ही एक मात्र सकारात्मक तथा वर्तमान सुख है। 
  • यदि सिरैनिक्स यह मानते थे कि शारीरिक सुख ही जीवन का लक्ष्य है तब क्या उन्हें शुद्ध सुखवादी नहीं कहा जा सकता है सिरैनिक्स इस आक्षेप से अवगत थे। अतः एरिस्टिपस ने अपने अनुयाइयों से कहा कि "बुद्धिमान मनुष्य को भविष्य को संज्ञान में लेना चाहिए।" 
  • बुद्धिमान मनुष्य को प्रसन्नता और संतुष्टि को बनाए रखने के लिए इच्छाओं पर अंकुश रखना चाहिए। एरिस्टिपस का यह चेतावनीपूर्ण दृष्टिकोण यह संकेत करता है कि सुख भले ही जीवन का नैतिक लक्ष्य है तो भी "बुद्धिमान मनुष्य को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि वह जीवन के विभिन्न सुखों के बीच गुणात्मक अन्तर कर सके।"

 

  • इस प्रकार हम स्पष्ट रूप से एरिस्टिपस की शिक्षाओं में विरोधाभास पा सकते हैं। सुख के सिद्धान्त और विवेक के सिद्धान्त के बीच एक विरोधाभास है। यह विरोधाभास उनके शिष्यों निरीश्वरवादी थियोडोरसहेगेशिया और एनीकेरिस के बीच वैचारिक बिखराव पैदा करता है। इनमें से सभी ने अपने गुरु की मूल शिक्षाओं से भिन्न विचार और भिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत की है।

 

मेगारा का सम्प्रदाय

 

  • मेगारियन सम्प्रदाय की स्थापना मेगारा के यूक्लिड द्वारा की गयी थी। वह सुकरात का घनिष्ठ सहयोगी थालेकिन सुकरात से पूर्व वह ईलिएटिक दर्शन से प्रभावित था। इसलिए इस सम्प्रदाय के प्रधान सिद्धान्त नैतिक और तत्वमीसांसीय दोनों थे। इनका मुख्य नैतिक सिद्धान्त था- शुभ की एकता। 


  • यूक्लिड ने कहा- "शुभ एक ही वस्तु है लेकिन इसे विभिन्न नामों से पुकारा जाता है-कभी ज्ञानकभी ईश्वर और कभी प्रज्ञा इत्यादि। उसने इसकी संभाव्य विरोधी स्थितियों के अस्तित्व को अस्वीकार कर दिया। युक्लिड ने अपने सिद्धान्त का निर्माण सुकरात के नैतिक सिद्धान्त कि सद्गुण एक है और पार्मेनाइड्स के इस तत्वमीमांसीय सिद्धान्त कि सभी नामयहाँ तक कि उनके संभावित विरोधी नाम भी वास्तव में एक ही सत्ता की तरफ संकेत करते हैके द्वारा किया।

 

एलियन और इरीट्रियन सम्प्रदाय

 

  • विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार इन सम्प्रदायों की स्थापना सुकरात के सहयोगी एलिस के फिडो और इरीट्रिया के मेन्डेमस द्वारा हुई थी। इसलिए इनका नाम एलियन और इरीट्रियन सम्प्रदाय पड़ा। ऐसा प्रतीत होता है कि एलिस का फेडो अपनी द्वन्द्वात्म विधि के प्रयोग में मेगारी सम्प्रदाय से प्रभावित थाजबकि मेन्डेमस प्राथमिक रूप से सुकरातीय-मेगारी नीतिशास्त्रज्ञान और सद्गुण की एकता से प्रभावित था।

 

  • सुकरात के लिए सद्गुण ही ज्ञान है और ज्ञान शुभ के प्रत्यय पर आधारित है। इसलिए सुकरात के लिए नैतिकता शुभ का सार्वभौम ज्ञान हैं। शुभ मनुष्य के लिए लाभकारी है और उसकी प्रसन्नता में वृद्धि करता है। तब प्रसन्नता क्या हैजैसा कि कहा गया है कि सुकरात ने शुभ और प्रसन्नता के बारे में कभी कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा। सुकरात की इन अस्पष्टताओं के चलते उनके विचारों की भिन्न-भिन्न व्याख्याएं सामने आयी है। जिनमें से कुछ पहले हम देख चुके हैं। कुछ परंपरायें ऐसी भी हैं जो बहुत दूर जाकर अतिरंजित ढंग से सुकरात से स्वयं को जोड़ती हैं।


  • जिनमें से मुख्य दो हैंस्टोइकवाद और एपिक्यूरियनवाद । स्टोइक सम्प्रदाय के दार्शनिक सुकरात की परंपरा के प्रारम्भिक दार्शनिकों खासकर सिनिकवादियों से सम्बद्ध था। स्टोइक दर्शन का केन्द्र बिन्दु था- मनुष्यबुद्धिमान मनुष्य। दूसरी ओरइंपीक्यूरियनवाद सुकरात के इस विचार का अतिरंजित रूप था कि नीतिशास्त्र का लक्ष्य सुख है। इस धारणा को उन्होंने सुखवादी रूप दे दिया।

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