भारतीय राजनीतिक चिन्तक के रूप में महात्मा गांधी |मोहनदास करमचन्द गांधी का जीवन परिचय | Mohan Das Karam Chand Gandhi

 भारतीय राजनीतिक चिन्तक के रूप में महात्मा गांधी |मोहनदास करमचन्द गांधी का जीवन परिचय | Mohan Das Karam Chand Gandhi


 

भारतीय राजनीतिक चिन्तक के रूप में महात्मा गांधी 

महात्मा गांधी के राजनीतिक चिंतन का इस प्रकार अध्ययन करेंगे -


सामान्य परिचय 

 

  • आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तकों में महात्मा गांधी की पहचान एक ऐसे चिन्तकसुधारकविचारक के रूप में होती है जिनके विचार न केवल स्वतन्त्रता संग्राम तक सीमित रहे अपितु आजादी के पश्चात् जिस भारतीय संविधान का निर्माण किया गया तथा देश को चलाने के लिए जो व्यवस्था व प्रतिभान स्थापित किये गये उन सभी पर न केवल गांधी जी के विचारों का प्रभाव पड़ा अपितु गांधी जी के विचारों को आधार मानकर उन्हें क्रियान्वित किया गया। जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। 


  • गांधी दर्शन आज भी विश्व का मार्गदर्शन कर रहा है चाहे वह शांति व अहिंसा या लोकतन्त्र या राम राज्य या परमो धर्म कही न कही किसी न किसी रूप में उनके विचारों की झलक देखी जा सकती है यद्यपि गांधी जी स्वयं यह कहा करते थे कि उनका उद्देश्य को वाद नहीं छोड़ना हैअपितु उनका मूलमंत्र लोगों को मानवीय मूल्योंनैतिक आदर्शअहिंसा जैसे मापदण्डों के अनुसार जीवन जीना है। 


  • गांधी के विचारों पर कई अन्य विचारकों का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। रस्किन की अन्टू दिलास्ट ने उन्हे नेटाल से जुलुलेड के विर्जन बनो की ओर प्रवृत किया जहाँ उन्होंने स्वेच्छिक गरीबी का जीवन व्यतीत करना प्रारम्भ किया। 


  • टालस्टाय का गांधी पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा आधुनिक राज्य की संगठित हिंसा के विरोध में सविनय अवज्ञा का विचार उन्हें टालस्टाय से मिला गांधी जी के राज्य संबंधी विचारों पर भी इनका प्रभाव देखा जा सकता है। 


  • गांधी के चिन्तन में मूल स्वतन्त्रता हैयह स्वतन्त्रता व्यक्ति की है और साथ यह परिस्थिति निरपेक्ष की है। व्यक्ति का ध्येय आत्म साक्षात्कार अथवा सत चित + आनन्द की प्राप्ति करना है। 


  • अतः सामाजिक एवं राजनीतिक संस्थाये ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति की स्वतन्त्रता में तनिक भी बाधक न होबल्कि सहायक हो। सामाजिक संस्था के रूप में समाज व परिवार बिना किसी अनावश्यक अवरोध पैदा किये कार्य करना चाहिए परन्तु इस समय सामाजिक दोषों के चलने समाज अपने वास्तविक स्वरूप से विमुख होकर इस तरह से कार्य कर रहा था जो व्यक्ति की उन्नति के बजाए अवनति का कार्य कर रहा है। 


  • वर्ग समाजजाति बन्धनछुआछुतकर्म काण्डमहिला उत्पीड़नअसामनता जैसे कुरीतियां होती थी। जिनका भारतीय समाज से कोई भी सरोकार नहीं था परिणामस्वरूप हमारा समाज असभ्यता का प्रतीक हो गया। व्यक्ति पर अनावश्यक प्रतिबन्ध उसकी स्वतन्त्रता व प्रगति के प्रतिकूल थे। इसी तरह राजनीतिक संस्था के रूप में राज्य एक महत्वपूर्ण इकाई रही है। 


  • व्यक्ति की राजनीति में भागीदारीअधिकार स्वतन्त्रतान्याय व सम्पूर्ण राज व्यवस्था राज्य की नीतियों व इच्छा पर निर्भर करती हैं जब से राजनीतिक इकाई के रूप में राज्य शक्तिशाली हुआ है तब से मनुष्य से सम्बन्धित अन्य पहलू पूरी तरह राज्य पर निर्भर हो गए है। सामाजिकआर्थिकसांस्कृतिकधार्मिक इत्यादि क्रियाकलाप राज्य पर निर्भर करता है और राज्य अपनी सुविधाओं व नीतियों के अनुसार इनके लिए नियम बनाता हो परन्तु गांधी जी राज्य का विरोध करते थे।


  • उनके अनुसार ये मनुष्य की स्वतन्त्रता एवं आत्म निर्णय के - अधिकार को कुठित करती है। अतः ऐसी सारी संस्थाएं समाप्त कर देनी चाहिए जो हिंसाउत्पीड़न एवं पाशविक शक्ति पर आधारित है। 

  • चूंकि राज्य हिंसा पर आधारित हैअतः यह समाज के लिए बहुत आवश्यक और उपयोग नहीं है। आदर्श स्थिति में राज्य की आवश्यकता ही नहीं होगी लेकिन जब तक इसकी आवश्यकता है तब तक राज्य का न्यूनतम प्रयोग होना चाहिए। इस प्रकार गांधी का यह विचार यथार्थ एवं व्यावहारिकता पर आधारित है। वे राम राज्य का सपना संजोये थे।

 

  • मोहनदास कमरचन्द गांधी का नाम विश्व के उन महानतम व्यक्तियों में आता हैजिन्होंने सत्य एवं अहिंसा के आधार पर राजनैतिक चेतना लाने का प्रयास किया। यद्यपि स्वयं महात्मा गाँधी का कहना था कि उनका उद्देश्य किसी नए वाद या विचारधारा को जन्म देना नहीं है। 
  • लेकिन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों एवं धार्मिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं को आधार मानकर उन्होंने भारतीय समाज को न पर चलने की प्रेरणा प्रदान की। महात्मा गांधी के विचार आज भी अपनी प्रासंगिकता लिए हुए है। 
  • इसलिए जहाँ कहीं भी आज जिस गति से हमारा युवा और समाज गर्त की ओर जा रहा हैउसे सही दिशा प्रदान करने में गांधीजी के मूल्य सार्थक सिद्ध हो सकते है। इनसे व्यक्ति के व्यक्तित्वएवं चारित्रिक निर्माण में सहायता मिलती है और एक आदर्श समाज की स्थापना संभव हो सकती है।

 

  • महात्मा गांधी ने 1915 के पश्चात् राष्ट्रीय आन्दोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया और सर्वप्रथम चम्पारण आन्दोलन का नेतृत्व किया ये ऐसा समय थाजिसमें अंग्रेजो के प्रति जनाक्रोश अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था और उग्रवादी एवं क्रांतिकारी आन्दोलन जारी थे।

 

  • जिनका गाँधीजी ने विरोध किया और सत्य और अहिंसा पर आधारित आन्दोलन करने की प्ररेणा प्रदान की। वे कांग्रेस के साथ आजीवन जुड़े रहे और उसके कार्यक्रमों एवं संगठन को वैचारिक आधार प्रदान किया। बैलगांव अधिवेशन में प्रथम एवं अंतिम बार कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। अंग्रेजों के विरुद्ध जन जागृति लाने के लिए उन्होंने असहयोग आन्दोलन (1920), सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930), भारत छोड़ो आन्दोलन (1942 ) आदि का नेतृत्व किया और ब्रिटिश हुकूमत को हिला कर रख दिया।

 

  • कांग्रेस के संबंध में महात्मा गांधी का मानना था कि कांग्रेस को देश की राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेना चाहिएउसे केवल समाज सुधार के क्षेत्र में कार्य करना चाहिए। लेकिन पण्डित जवाहरलाल नेहरूसरदार वल्लभ भाई पटेल आदि अनेक कांग्रेसजन इससे सहमत नहीं थे।

 

  • गांधी के आर्थिक विचारों को स्पष्ट करते हुए यह कहा कि समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता को दूर करना होगा। इसके लिए उन्होनें ट्रस्टशिप के सिद्धान्त का समर्थन किया और कहा कि जमींदारों और पूंजीपतियों के पास आवश्यकता से अधिक धन है तो उन्हें चाहिए कि वे इन्हें समाज को प्रदान कर दें और इन पर उन लोगों का स्वामित्व स्थापित किया जाए जो निर्धन है।

 

  • सामाजिक क्षेत्र में गांधीजी ने समाज में व्याप्त बुराईयों के प्रति जागरूक किया और छूआछूतदलितों के साथ अन्यायजातीय बन्धन आदि के भारतीय समाज की एकता के लिए विध्वंसक माना। यद्यपि गांधीजी वर्ग-व्यवस्था के औचित्य को स्वीकार करते थे लेकिन वर्ग का आधार कर्म के स्थान पर जन्म होने के कारण जाति हावी हो गई थी। समाज के एक बड़े वर्गजिसके लिए गांधीजी ने 'हरिजनशब्द काम में लिया हैउसकी स्थिति भी चिंताजनक थीइससे समाज खण्डित नजर आ रहा था। अतः उन्होनें अपने विचारों एवं राजनीतिक भाषणों में सुधार लाने की प्ररेणा दी।

 

  • इसलिए आजादी के बाद भारत में जितने भी सामाजिकआर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्र के प्रयास और सुधार किए गयेउनमें उनके विचारों की स्पष्ट छाया दिखाई पड़ती हैं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर गांधीजी के आदर्शों को सहर्ष स्वीकारा जाता है। यह धारणा विश्वव्यापी बन गई है कि हिंसा से किसी भी समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

 

  • 15 जून, 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए प्रति वर्ष 2 अक्टूबर को विश्व अहिंसा दिवस मनाने का फैसला लिया हैजो इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में गांधीजी के विचारों एवं दर्शन का व्यापक महत्व है।

 

मोहनदास करमचन्द गांधी का जीवन परिचय

 

  • गांधीजी का पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 ई. को गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ। उनकी मृत्यु 30 जनवरी, 1948 ई. को नई दिल्ली में नाथुराम गोडसे द्वारा गोली चलाने से हो गई थी।
  • गाँधीजी का विवाह कस्तुरबाई से हुआ था गांधीजी के पिता श्री करमचन्द गांधी काठियावाड़ की छोटी रियासत के दिवान थे। पारिवारिक परम्पराओं के अनुरूप गांधी का जीवन पवित्र और सादगी भरा था। 
  • उनकी प्रारम्भिक शिक्षा पोरबंदर में ही पूर्ण हुईपरन्तु बाद में वे वकालत करने इंग्लैण्ड चले गयेइंग्लैण्ड जाते समय जैन साधु बेचरजी से तीन प्रतिज्ञा लेते है कि मैं मदिरापरायी औरत और मांस को नहीं छुऊंगा। इनका पालन गांधी जी ने अंतिम समय तक किया। 
  • इंग्लैण्ड में शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् वकालत करने दक्षिणी अफ्रीका चले जाते हैं। वहां की राजनीतिक स्थिति का गांधीजी पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। क्योंकि रंगभेद के नाम पर मूल अफ्रीकी लोगों का शोषण किया जा रहा था। अतः उन्होंने औपनिवेशक साम्राज्यवादी एवं रंगभेदी सरकार के विरुद्ध अभियान चलाया था और यहीं से गांधीजी का राजनीतिक क्षेत्र में विधिवत प्रवेश हो जाता है।
  • यहां पर वे सत्य एवं अहिंसा के आधार पर अंग्रेजों के प्रति असहयोग की नीति का अनुसरण करते हैं और अफ्रीकी समाज को रंगभेद से मुक्त होने के लिए प्रेरित करते हैं 
  • 1915 में गांधीजी पुनः भारत लौटते हैं और पाते है कि भारत में उग्रवादी व क्रांतिकारी गतिविधियाँ अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी हैं। कांग्रेस के द्वारा भी अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन किया जा रहा था लेकिन इन सभी प्रयासों से महात्मा गांधी सहमत नहीं थे। वे भारत आकर कांग्रेस के साथ जुड़ते है और उसे एक वैचारिक आधार प्रदान करते है।
  • गांधीजी को महात्मा रविन्द्रनाथ टैगोर ने तथा राष्ट्रपिता सुभाषचन्द्र बोस ने कहा। 
  • 1920 में गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन चलाया। जिसका प्रभाव सम्पूर्ण भारतवर्ष में देखा गया। 
  • 1924 बैलगांव अधीवेशन में गाँधीजी प्रथम व अंतिम बार कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 
  • 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया और उसमे करो या मरोका नारा दिया। 
  • जब 1946 में माउण्ट बेटन योजना प्रस्तुत हुईजिसमें यद्यपि भारत की स्वतन्त्रता का प्रावधान था लेकिन विभाजित भारत की स्वतन्त्रता काजिसका गांधीजी ने विरोध किया और कहा- भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा। 
  • आजादी के पश्चात् जिस गति से सम्पूर्ण भारत साम्प्रदायिकता की आग में जल रहा था। उससे गांधीजी बहुत चिंतित हुएइसीलिए अंत में उन्हें खण्डित भारत स्वीकार करना पड़ा।


No comments:

Post a Comment

Powered by Blogger.