लोक प्रशासन विज्ञान है या कला |Is public administration a science or an art?

लोक प्रशासन विज्ञान है या कला |Is public administration a science or an art?


लोक प्रशासन विज्ञान है या कला 

लोक प्रशासन की प्रकृति को पूर्ण रूप से समझने के लिए आपको यह भी जानना होगा कि यह विषय कला है अथवा विज्ञान अथवा दोनों का समन्वित रूप एक प्रक्रिया के रूप में लोक प्रशासन को सामान्तया एक कला समझा जाता है। कला का अपना कौशल होता है और वह व्यवस्थित ढंग से व्यवहार में लायी जाती है। प्रशासन एक विशेष क्रिया है जिसमें एक विशेष ज्ञान तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है। कलाओं की भाँति प्रशासन को भी अभ्यास से सीखा जा सकता है। 

  • वर्तमान में प्रशासनिक दक्षता के लिए 'निपुणतथा 'विशिष्ट प्रकार के दक्ष लोगों की आवश्यकता सरकार के विभिन्न आयामों में महसूस की जा रही है।
  • प्रशासनिक कला में निपुणता हासिल करने के लिए व्यक्ति में धैर्यनियन्त्रणहस्तान्तरणआदेश की एकता आदि गुणों का होना आवश्यक है। इन गुणों के अभाव में प्रशासक अपने कर्तव्यों का सफलतापूर्वक निष्पादन नहीं कर सकता। 
  • लूथर गुलिक के अनुसार एक अच्छे प्रशासक को 'पोस्डकार्बतकनीकों में पारंगत होना चाहिए।” 
  • जो विचारक प्रशासन का कला नहीं मानतेउनका तर्क है कि प्रशासन की सफलता और असफलता मानवीय वातावरण एवं परिस्थितियों पर निर्भर करती है। एक स्थान पर एक प्रशासक उन्हीं तकनीकों से सफल हो जाता है और दूसरे स्थान पर असफल हो जाता है। यह सच है कि सामाजिक और मानवीय पर्यावरण प्रशासन की कार्यकुशलता को उसी प्रकार प्रभावित करते हैं जिस प्रकार खेल का मैदान बदलने पर नया वातावरण खिलाड़ी के कौशल को प्रभावित करता है। किन्तु प्रशासन एक कौशल है। प्रत्येक व्यक्ति इस कौशल को हासिल नहीं कर सकता। प्रशिक्षण और अभ्यास के बाद ही इस उच्चतम कला को ग्रहण किया जा सकता प्रशासन एक कला है।  अतः यह कहना उचित होगा कि लोक प्रशासन एक कला है । 


लोक प्रशासन को विज्ञान का दर्जा दिया जाय या नहीं

  • अब प्रश्न यह उठता है कि इस विषय को विज्ञान का दर्जा दिया जाय या नहीं। यह एक विवादित प्रश्न है तथा इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि हम विज्ञान शब्द का प्रयोग किस अर्थ में करते हैं। 
  • साधारणतः विज्ञान शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है व्यापक और संकीर्ण। 
  • व्यापक अर्थ में इस शब्द का प्रयोग 'अनुभव एवं पर्यवेक्षण से प्राप्त क्रमबद्ध ज्ञानके रूप में किया जाता है। इसी अर्थ में हम सामाजिक विज्ञानों को जिनमें राजनीतिशास्त्रअर्थशास्त्रसमाजशास्त्रआदि शामिल हैंविज्ञान की संज्ञा प्रदान करते है। दूसरे अर्थ में विज्ञानज्ञान का वह निकाय है जो ऐसे परिशुद्ध सामान्य सिद्धान्तों की स्थापना करता है जिनके आधार पर एक बड़ी सीमा तक परिणामों के सम्बन्ध में पूर्वकथन किया जा सकता है। इस प्रकार के विज्ञानों को 'शुद्ध विज्ञानके नाम से पुकारा जाता है, जैसे- भौतिकीरसायनशास्त्र और गणित। 
  • सामान्यता लोक प्रशासन को एक 'सामाजिक विज्ञानमाना जाता हैयद्यपि इस विषय पर सभी विद्वान एकमत नहीं है। विद्वानों का एक ऐसा वर्ग भी है जो इस विषय को विज्ञान नहीं मानते। ऐसे विद्वानों द्वारा निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं

 

लोक प्रशासन को को विज्ञान नहीं मानने के लिए विद्वानों द्वारा दिये गए तर्क 

मानवीय क्रियाओं से सम्बन्धित हो ने के कारण लोक प्रशासन के नियम कम विश्वसनीय होते है। ये स्थान और काल के अनुसार बदलते रहते हैं।

 

1. लोक प्रशासन के क्षेत्र में सर्वसम्मत एवं सार्वभौमिक सिद्धान्तों का अभाव है। 

2. विज्ञान की भाँति लोक प्रशासन के पास कोई ऐसी प्रयोगशाला नहीं है जहाँ पूर्व अर्जित तथ्यों की सत्यता स्थापित की जा सके। 

3. विज्ञान में नैतिक मूल्यों एवं आदर्शों का कोई स्थान नहीं होता जबकि लोक प्रशासन के सिद्धान्त निरन्तर प्रशासकीय क्रिया की तथ्यपरक एवं आदर्शपरक धारणाओंअर्थात 'क्या हैऔर 'क्या होना चाहिएके बीच झूलते रहते हैं। 

4. इसमें पूर्व कथनीयता अर्थात भविष्यवाणी करने की क्षमता का अभाव है। 

5. प्रशासकीय आचरण न तो पूर्णतः विवेकनिष्ठ होता है और न ऐसा होना सम्भव ही है। ऐसी स्थिति में उसके विज्ञान होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

 

इसमें कोई दो राय नहीं कि संकीर्ण अर्थ में लोक प्रशासन को विज्ञान की संज्ञा प्रदान नहीं की जा सकतीपरन्तु विषय से सम्बद्ध अधिकांश विद्वानों में इस बात पर मतैक्य पाया जाता है कि व्यापक अर्थ में लोक प्रशासन के विज्ञान होने के दावे को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

 

लोक प्रशासन के विज्ञान होने के समर्थन में दिए गए तर्क

 

1. एक विषय के रूप में लोक प्रशासनप्रशासन से सम्बन्धित ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन करता है।

 

2. इस विषय के अध्ययन के लिए लगभग सुनिश्चित क्षेत्र निर्धारित कर लिया गया है तथा इस आधार पर इसे अन्य शास्त्रों से पृथक किया जा सकता है।

 

3. गत वर्षों में प्रशासन के क्षेत्र में जो पर्यवेक्षणपरीक्षण तथा अनुसंधान हुये हैंउनके परिणामस्वरूप अनेक सुनिश्चित अवधारणाऐं तथा परिकल्पनाऐं विकसित हुई हैं।

 

4. भारी संख्या में ऐसे तथ्यों का संग्रह कर लिया गया हैजिन पर वैज्ञानिक अध्ययन की पद्धतियों का प्रयोग किया जा रहा है।

 

5. अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति लोक प्रशासन में भी कुछ ऐसे सामान्य सिद्धान्त विकसित किये जा चुके हैंजो प्रभावी शासन की स्थापना के लिए पथ प्रदर्शक का काम कर सकते हैं।

 

6. यह विषय तथ्यों एवं घटनाओं की वैज्ञानिक विवेचना करता है और इसके माध्यम से प्रशासक अनुमान लगा सकते हैं कि इन घटनाओं के क्या परिणाम होंगेअर्थात इसमें भविष्यवाणी करने की क्षमता है।

 

7. इस विषय से सम्बन्धित घटनाओं का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करने के उपरान्त इस प्रकार के कारण खोजें की जा सकती हैंजिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि समान कारणों का काफी बड़ी सीमा तक समान प्रभाव होता है।


उक्त सन्दर्भ में सच तो यह है कि प्रत्येक ज्ञान के दो पहलू होते हैं- एक कला का और दूसरा विज्ञान का उदाहरण के लिएफोटोग्राफी अथवा औषधि विज्ञान कला भी है और विज्ञान भी इसी प्रकार लोक प्रशासन विज्ञान और कला दोनों का समन्वित रूप है।

 

चार्ल्स बेयर्ड के अनुसारलोक प्रशासन उतना ही विज्ञान है जितना कि अर्थशास्त्र उनके मत में जिस प्रकार प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में अनुसंधानवैज्ञानिक समितियों तथा वैज्ञानिकों द्वारा ज्ञान एवं परिकल्पनाओं के आदान-प्रदान ने ज्ञान की परिशुद्धता में वृद्धि की हैउसी प्रकार हम यह आशा कर सकते हैं कि प्रशासन के क्षेत्र में भ अनुसंधानप्रशासकीय समितियों तथा प्रशासकों के पारस्परिक आदान-प्रदान भी ज्ञान की परिशुद्धता में वृद्धि करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि लोक प्रशासन केवल तथ्यों अर्थात क्या हैका ही अध्ययन नहीं करतावरन् आदर्शों अर्थात 'क्या हो ना चाहिएका भी अध्ययन करता है। इस प्रकार अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति यह तथ्यपरक एवं आदर्शपरक दोनों प्रकार का विज्ञान हो सकता है। अपने पारंपरिक रूप में यह एक तथ्यपरक विज्ञान ही बना रहा है। परन्तु

 

आधुनिक विचारकों ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना है कि प्रशासन का ध्येय श्रेष्ठ प्रशासन है। इस धारणा को स्वीकार कर लेने के बाद यह प्रश्न सहज ही उठता है कि श्रेष्ठ प्रशासन की कसौटी क्या हैस्पष्टतः इन प्रश्नों में प्रयोजनों और मूल्यों की समस्या निहित है और यह प्रश्न लोक प्रशासन को आदर्शमूलक अध्ययन का स्वरूप प्रदान करता है।

 

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि लोक प्रशासन एक प्रगतिशील विज्ञान हैजिसके निष्कर्ष अथवा सिद्धान्त भी नये अनुसंधान तथा नये अनुभव के अनुसार अपने आप को भी बदल डालते हैं। यह सही है कि समय-समय पर प्रतिपादित किये जाने वाले विभिन्न मतों से लोक प्रशासन की समस्या के बारे में सही समझ कायम करने में सहायता मिली हैतथापि उनके सम्बन्ध में पूर्णता का दावा नहीं किया जा सकता है।


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