बुद्ध के बाद बौद्धधर्म |बौद्ध संघ |हीनयान एवं महायान सम्प्रदाय | Budhha Ke Baudh Dharm

 

बुद्ध के बाद बौद्धधर्म
प्रथम बौद्ध सभा द्वितीय बौद्ध सभा तृतीय बौद्ध सभा
बौद्ध संघ 
हीनयान एवं महायान सम्प्रदाय
बुद्ध के बाद बौद्धधर्म |बौद्ध संघ |हीनयान एवं महायान सम्प्रदाय | Budhha Ke Baudh Dharm


बुद्ध के बाद बौद्धधर्म

 

अपने सिद्धांतों का प्रचार महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन पर्यन्त किया तथा उनकी मृत्यु के पश्चात् भी उनके संघ के भिक्षुओं ने भारत के कोने-कोने में इन सिद्धांतों को प्रसारित करने का काम जारी रखा। बुद्ध के सिद्धांतों के उपरोक्त विवरण से हमें होता है कि बौद्धधर्म को पनपने का काफी था क्योंकि हिन्दुओं के लिए बौद्ध सिद्धांतों में अनेक ग्राह्य थे। बौद्धधर्म के सीधे-सादे सरल सिद्धांतों को जनता आसानी से समझ सकती थी और इनका अनुसरण भी कर सकती थी। बुद्ध ने जनसाधारण की भाषा में अपने धर्म का प्रसार कियाजिससे बहुत शीघ्र ही यह धर्म सम्पूर्ण भारत में प्रसारित हो गया।

 

प्रथम बौद्ध सभा

  • महात्मा बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् बौद्धधर्म के ग्रंथों का संकलन करने अथवा संघ की व्यवस्था करने के लिए समय-समय पर बौद्ध सभाओं के अधिवेशन होते रहे। 
  • मृत्यु - शय्या पर अपने प्रिय शिष्य आनन्द को बुलाकर महात्मा बुद्ध ने आदेश दिया था कि मेरे मरने के पश्चात् जो सिद्धांत मैंने इस जीवन में प्रतिपादित किये हैं वे ही तुम्हारा पथ प्रदर्शन करेंगे।" 
  • बौद्धधर्म वैदिक धर्म की बुराइयों के प्रति एक प्रतिक्रिया थी लेकिन समय के साथ-साथ इसमें कई तरह के परिवर्तन आने लगे। 
  • इन समस्याओं पर विचार करने के लिए बुद्ध की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद 487 ई.पू. में राजगृह के निकट सतपन्नी में बौद्ध मतावलम्बियों की प्रथम बौद्ध सभा हुई जिसमें लगभग पाँच सौ भिक्षुओं ने भाग लिया। यहाँ बुद्ध के भाषणों वार्तालापों और प्रवचनों को संकलित किया गया और उन्हें कई श्रेणियों में विभक्त कर दिया गया। इन संकलनों को अधिकारिक ग्रन्थों का रूप दिया गया। 
  • बुद्ध की शिक्षाओं को दो भागों में बाँट दिया गया और ये दोनों भाग विनयपिटक तथा धम्मपिटक के नाम से पुकारे गये। बौद्धधर्म के त्रिपिटक में सुत्तिपिटकविनयपिटक और धम्मपिटक आते हैं। सुत्तपिटक में बौद्धधर्म के धार्मिक सिद्धांत प्राप्त होते हैं। विनयपिटक में बौद्ध संघ का संगठन तथा भिक्षुओं के नियमों का वर्णन उपलब्ध होता है तथा अभिधम्मपिटक में इन सिद्धांतों की आध्यात्मिक विवेचना मिलती है। 
  • सुत्तपिटक में ही जातक कथाओं का संकलन है। 


द्वितीय बौद्ध सभा

  • बुद्ध की मृत्यु के एक सौ वर्ष पश्चात् 387 ई.पू. में बौद्धों की दूसरी सभा हुई। वैशाली के बौद्ध भिक्षुओं ने कुछ ऐसी प्रथाओं को मान लिया था जो विनयपिटक से विपरीत थीं। फलतः बौद्ध मठों में एक भारी विवाद उठ खड़ा हुआ और बौद्ध भिक्षु स्थविर तथा महासंघिक भागों में विभक्त हो गये। इनमें से स्थविर परिवर्तन विरोधी और महासंधिक परिवर्तन पक्षीय हो गये।

 

तृतीय बौद्ध सभा

  • बौद्धों की तीसरी सभा अशोक के राजत्वकाल में पाटलिपुत्र में हुई थी। इस सभा द्वारा प्रामाणिक बौद्ध ग्रंथों को फिर से विभाजित कर एक नये ग्रंथ की वृद्धि की गयी। इस बार बुद्ध के प्रामाणिक ग्रंथों को इस दृढ़ता से निश्चित किया गया कि इन्हें पुनः भंग करने का अवसर न मिले और संघ में फूट डालने वालों को दण्ड मिल सके। इन नियमों के द्वारा एक बार पुनः बौद्धभिक्षुकगण धर्मप्रचार में उत्साह लेने लगे। इस सभा का दूसरा प्रमुख कार्य था कि एक नवीन पिटक - अभिधम्मपिटक का निर्माण इस पिटक में प्रथम दो पिटकों की दार्शनिक व्याख्या की गयी है। इस प्रकार बौद्धों के प्रसिद्ध त्रिपिटक का निर्माण इसी काल में होता है।

 

चतुर्थ बौद्ध सभा

  • बुद्ध धर्म को संगठित रखने के लिए बौद्धों की चौथी सभा कनिष्क के शासनकाल में हुई थी लेकिन इन सभाओं के बावजूद कालान्तर में बौद्धधर्म स्पष्टतः दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया। एक था महायान और दूसरा हीनयान सम्प्रदाय। ऐसा प्रतीत होता है कि चतुर्थ सभा में बौद्ध सम्प्रदायों में काफी वाद-विवाद हुआ। इस सभा में तीनों पिटकों के तीन महाभाष्य रचित हुए तथा महायान धर्म की प्रधानता घोषित की गयी। इसी समय से उत्तरी भारत में महायान धर्म का प्रचार हुआ। महायान सम्प्रदाय ने मूर्तिपूजा को बौद्धधर्म में प्रचलित कियाकिन्तु हीनयान सम्प्रदाय बुद्ध मार्गों पर चलता रहा। धीरे धीरे उत्तरी भारत से हीनयान सम्प्रदाय का बिल्कुल लोप हो गया तथा भारत के दक्षिणी भागों में और विदेशों में भी हीनयान सम्प्रदाय का ही प्रचार हुआ।

 

बौद्ध संघ 

  • बौद्धधर्म के प्रचार के लिए महात्मा बुद्ध ने सुसंगठित संघ का निर्माण किया थाजहाँ पर गृहत्याग करके व्यक्ति भिक्षुकों का जीवन व्यतीत करते थे तथा जीवन भर बौद्धधर्म के सिद्धांतों का प्रचार करते थे। बुद्ध के दो तरह के अनुयायी थे- उपासक और भिक्षु । बुद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया था कि भिक्षु बने बिना निर्वाण की प्राप्ति नहीं हो सकती है। जब तक व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का त्याग नहीं करता तब तक निर्वाण प्राप्ति असम्भव है। इस प्रकार बौद्धधर्म में संघ की महत्ता पर अत्यधिक जोर दिया गया। संघ के भिक्षु बड़े ही त्यागी और संयमी होते थे। वे भिक्षाटन द्वारा अपना पेट भरते थे और बहुत ही कम वस्त्र धारण करते थे। प्रारम्भ में वे लोग गुफाओं या जंगलों में निवास करते थेपर बाद में कुछ अनुयायियों ने उनके लिए विहारों का निर्माण करा दिया जो भिक्षुकों का निवास स्थान होता था।

 

  • संघ में प्रवेश करने के लिए निश्चित व्यवस्था थी। पन्द्रह वर्ष की आयु से अधिक के व्यक्ति को माता-पिता की आज्ञा प्राप्त करके संघ में प्रविष्ट होने की अनुमति मिल जाती थी। तत्पश्चात् उसे अपने बाल तथा मूंछ दाढ़ी मुंडवानी पड़ती थीगेरुआ वस्त्र धारण करना पड़ता था तथा बौद्ध धर्म और संघ के प्रति निम्नलिखित शपथ लेनी पड़ती थी– “बुद्धं शरणं गच्छामिधम्मं शरणं गच्छामिसघं शरणं गच्छामि।" तत्पश्चात् भिक्षु के लिखे गये दस आदेशों को दुहराना पड़ता था और वह एक भिक्षु का शिष्य बन जाता था जो उसको बौद्धधर्म ग्रन्थों तथा सिद्धांतों के विषय में समझाता था। जब वह सम्पूर्ण सिद्धांतों से परिचित हो जाता तब एक परिषद् के सम्मुख उपस्थित किया जाता था जिसमें कम से कम दस भिक्षुक होते थे। जब वे लोग सर्वसम्मति से स्वीकृति दे देते तभी वह भिक्षुक बनता था और उसको संघ का अनुशासन मानना पड़ता था। अनुशासन भंग करने पर भिक्षुक को दण्ड देने का अधिकार भी संघ के सदस्यों को ही था। संघ की सभा में दस भिक्षुकों का होना अनिवार्य होता था तथा स्त्री भिक्षुणियां और नवीन भिक्षुक को इस संस्था में सम्मिलित नहीं किया जाता था। वह सभा बहुमत द्वारा अपराधी भिक्षुक को दण्ड दे सकती थी। इस प्रकार संघ की व्यवस्था गणमंत्रात्मक थी जहाँ बहुमत का ध्यान हमेशा रखा जाता था। प्रत्येक संघ में संघ का सभापति हर पन्द्रहवें दिन महात्मा बुद्ध के आदेश पढ़कर सुनाता था। भिक्षुकों को निजी सम्पत्ति रखने का अधिकार नहीं होता था।

 

  • संघ में भिक्षु एवं भिक्षुणियों के लिए कठोर नियम थे तथा उन सभी नियमों का उनको पालन करना पड़ता था। मादक द्रव्यसम्पत्तिसुवासित वस्तुएँ आदि इनके लिए वर्जित थीं। वर्ष में आठ महीने तो भिक्षु संघ के बाहर ही रहते थे। तथा घूम-घूम कर बौद्धधर्म के सिद्धांतों का प्रचार करते थे। वर्षा ऋतु में चार माह तक संघों में निवास करते थे। उस समय बौद्ध धर्मग्रन्थों का अध्ययन किया जाता था तथा इनके द्वारा अनेक शंकाओं का समाधान करने का अवसर मिलता था। इस संघ के द्वारा भिक्षुओं की निःस्वार्थ सेवात्याग तथा धर्म प्रचार के कारण ही बौद्ध धर्म का विकास इतना शीघ्र सम्भव हो सका।

 

  • बौद्ध संघों ने भारतीय संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया। ये संघ धर्म प्रचार के ही नहीं वरन् शिक्षा प्रचार के भी केन्द्र थे। दूर-दूर से आने वाले जिज्ञासुओं की ज्ञान पिपासा को शांत करने का यहाँ प्रयास किया जाता था। इस संघ ने अनेक विद्वानों को जन्म दिया जिनके द्वारा साहित्य के भंडार में वृद्धि हुई। लेकिनसंघप्रथा के कतिपय दोष भी थे। इसका सबसे बड़ा दोष एक केन्द्रीय सत्ता का अभाव था। भारत में हजारों की संख्या में संघ थे किन्तु उनके ऊपर कोई ऐसी सत्ता नहीं थी जो उन सबका संचालन एवं संगठन रख सके। सारे संघ स्वतंत्र थे। इसी का परिणाम हुआ कि किसी संघ में यदि कुछ परिवर्तन भी हो जाये तो अन्य संघों को इसका समाचार नहीं मिल सकता था और यह भी सम्भव था कि अन्य संघ उस परिवर्तन को स्वीकार न करें। परिणामस्वरूपसंघों ने बौद्धधर्म को अनेक सम्प्रदायों में विभक्त कर दिया।

 बौद्धधर्म का विभाजन

हीनयान एवं महायान सम्प्रदाय

 

  • जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे वैसे बौद्धधर्म में कई परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे और सिद्धांतों में भिन्नता आने लगी। इस कारण कालान्तर में बौद्धधर्म स्पष्टता दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया। एक था महायान और दूसरा था हीनयान।

 

  • महायान सम्प्रदाय का अभ्युदय कनिष्क के शासनकाल में ही हुआ। बौद्धधर्म की यह शाखा हीनयान शाखा से भिन्न थी। बात ऐसी हुई कि बौद्ध सुधारकों ने अपने धार्मिक नियमों और सिद्धांतों की कठोरता को कम करने का प्रयास किया ताकि जनसाधारण सरलतापूर्वक बौद्धधर्म का आलिंगन कर सके। लेकिन जो लोग कट्टर बौद्ध थे वे किसी भी तरह के परिवर्तन के विरोधी थे। अतः मतभेद की खाई चौड़ी होने पर कट्टर अपरिवर्तनशील बौद्धों का परिवर्तन चाहने वाले नरम प्रकृति के बुद्ध मत प्रचारकों से पृथक्करण हो गयाजिससे बौद्ध धर्म प्राचीन कठोर मार्ग पर अनुसरण करने वाले कट्टर अपरिवर्तनशील बौद्धों के हीनयान तथा परिवर्तन के इच्छुक बौद्धों के महायान नामक दो प्रमुख सम्प्रदायों में विभक्त हो गया। इस प्रकार महायान सम्प्रदाय मूलतः बौद्धधर्म में संशोधनवाद का रूप था। यद्यपि यह दोनों सम्प्रदाय एक ही धर्म की दो शाखाएं हैंपरन्तु उनमें कई भेद दृष्टिगोचर होते हैं।

 

हीनयान और महायान में अन्तर 

  • बौद्धधर्म के इन दोनों सम्प्रदायों में गहरा मतभेद है। हीनयान सम्प्रदाय में बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध को मानव मानकर धर्म के शुद्ध एवं प्रारम्भिक रूप को स्वीकार किया गया था। अतएवइसमें मूर्ति पूजाबुद्ध की प्रार्थना कर्म कांड और अवतारवाद के लिए कोई स्थान नहीं था। इसमें भावनाओं को मान्यता नहीं दी गयी थी। फलतः यह सम्प्रदाय अधिक अनुदारकठोर तथा संकुचित दृष्टिकोण का व अनात्मवादी था। इस सम्प्रदाय में इच्छाओं के दमन को ही मोक्ष प्राप्ति का सहज मार्ग माना जाता था। इसके धर्म ग्रन्थ पाली भाषा में लिखे गये थे। स्यामलंकाबर्मा देशों में इसी मत का प्रचार हुआ।
  • इसके विपरीत महायान सम्प्रदाय में महात्मा बुद्ध को दिव्य आत्माईश्वर ईश्वर का अवतार तथा भगवान मानकर उसके प्रति भक्ति प्रदर्शित की जाती और उनकी पूजा की जाती थी। बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियाँ बनाकर उनकी प्रतिष्ठा की जाती थी। धीरे-धीरे इस सम्प्रदाय ने मन्दिर बनाकर उसमें बौद्ध की मूर्तियाँ स्थापित की और उनके सम्मुख भेंटउपहार आदि के रूप में मूल्यवान पदार्थ चढ़ाने की प्रथा प्रचलित होने लगी। इस प्रकार सम्प्रदाय में मूर्ति पूजाकर्मकाण्डदेवमण्डल और अवतारवाद का महत्त्व प्रदान किया जाने लगाजिससे यह सम्प्रदाय भावना प्रधानआत्मवादी और उदार दृष्टिकोण से युक्त हो गया तथा धर्म के निकट सम्पर्क में आने लगा। इस सम्प्रदाय के ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे जाने लगे। पार्श्वअश्वघोषनागार्जुनवसुमित्र आदि उच्च कोटि के विद्वान तथा कनिष्क जैसे महाप्रतापी एवं शक्तिशाली सम्राट उस सम्प्रदाय का पोषण और समर्थन करने लगे। चतुर्थ बौद्धधर्म की संगति में भी इसी मत को मान्यता प्रदान की गयी थी। इस मत का प्रचार तिब्बतचीनजापान और मध्य एशिया में अधिक हुआ था। इस सम्प्रदाय के अनुयायियों की संख्या करोड़ तक जा पहुँची और इसकी गणना संसार के प्रमुख धर्मों में की जाने लगी। महायान के धर्म प्रचारक भिक्षु और भिक्षुणियां जनता को समझाया करते थे कि बुद्ध ने केवल स्वयं ही मोक्ष प्राप्त नहीं किया वरन् उन्होंने संसार के सभी प्राणियों को निर्वाण प्राप्ति का सरल मार्ग बताया है। उन्होंने संसार के दुखी और आवागमन के फेर में पड़े हुए व्यक्तियों के दुख दूर करके उन्हें सुखी और मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी बनाना ही अपने जीवन का परम लक्ष्य बनाया।

 

  • उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि हीनयान सम्प्रदाय केवल अपनी उन्नति और उद्धार पर बल देता है जबकि महायान अपने उद्धार के साथ-साथ दूसरों के उद्धार के लिए भी प्रयत्नशील था। हीनयान प्राचीन नियमों को ज्यों का त्यों मानता है जबकि महायान उनमें संशोधन करके उन्हें सरल बनाकर साधारण व्यक्तियों के पालन करने योग्य बनाता है।

 

No comments:

Post a Comment

Powered by Blogger.