प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत | Sources of Ancient Indian History


 Sources of Ancient Indian History

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत

प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन से पूर्व उन स्त्रोतो का अध्ययन कर लेना भी आवश्यक प्रतीत होता है जिसके माध्यम से हम इसका ज्ञान प्राप्त करते हैं। इन संपूर्ण स्त्रोतों को तीन भागों में बांटा जा सकता है-
  1. पुरातत्व संबंधी स्त्रोत
  2. साहित्य स्त्रोत
  3. विदेशी यात्रियों के वृतान्त

पुरात्व संबंधी स्त्रोत Archaeological sources

प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में पुरातत्व संबंधी सामग्री ने बड़ी सहायता की है। वास्तव में वैज्ञानिक इतिहास लेखन में पुरातत्व साग्री ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पुरातत्व स्वयं एक स्वतंत्र अनुशासन बन गया है। जहां साहित्य सामग्री मौन है या अस्पष्ट है वहां पुरातत्व सामग्री सहायक होती है। संदिग्ध परिस्थितियों में पुरातत्व सामग्री ही हमारी सहायत करती है और इतिहास के रिक्त स्थलों की पूर्ति करती है। यदि पुरातत्व सामग्री हमारी सहायता न करती तो हम भारत के प्रागैतिहासिक काल के विषय में कुछ भीन जान पाते। 
प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में पुरातत्व संबंधी सामग्री को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है
  1. खुदाई से प्राप्त सामग्री
  2. अभिलेख
  3. स्मारक
  4. मुद्राएं

खुदाई से प्राप्त सामग्री

भारत के विभिन्न क्षेत्रों मेें खुदाई की गई हे और प्राचीन कालीन नगरों, भवनों मंदिरों तथा अन्य अनेक किलों आदि के खण्डहर प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुए है। इससे भारत के प्राचीन इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। हमारे इतिहास के अनेक धुंधले पृष्ठ स्पष्ट होकर सामने आए हैं, तिथियां स्पष्ट हुई हैं और अनेक बिखरे तथ्यों को क्रमबद्ध किया जा सका है। मोहनजोदड़ो व हडप्पा की खुदाई में नगर, भवन, मनुष्य शरीर, पशुओं के ढांचे, देवी देवताओं की मूर्तियां बर्तन, औजार, सड़कें और स्नानागार आदि अनेक वस्तुएं प्राप्त हुई है। इनसे पॉच हजार वर्ष पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता का ज्ञान प्राप्त होता है। तक्षशिक्षला की खुदाई से कुषाण वंश के काल क्रम की संदिग्धता दूर हो गई। सॉची की खुदाई से बुद्ध की अनेक प्रतिमाएं प्राप्त हुई है ये बौद्ध व जैन धर्मों के उत्थान पतन के इतिहास की साक्षी हैं। इसी प्रकार सारनाथ से प्राप्त अवशेष बौद्ध धर्म के संबंध में जानकारी देते हैं। इस प्रकार प्राचीन भारतीय इतिहास का अधिकांश अलिखित भाग इन्हीं खुदाई से प्राप्त सामग्री पर आधारित है और उसे इसी आधार लिपिबद्ध किया गया है।

अभिलेख

प्राचीन भारत में राजनीतिक इतिहास के पुनर्निर्माण में अभिलेख अभिलेखों का विशेष महत्व है। इनसे इतिहास की अनेक कडि़यों को जोड़ने में सहायता मिलती है। अभिलेखों के माध्यम से विद्वानों ने उस जानकारी का परिशोधन भी किया है जो उन्हें अन्य साधनों से प्राप्त हुई हैं। इतिहास जहानने का स्त्रोत सर्वाधिक विश्वसनीय है। इनकी प्रमाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि ये धातुओं व पत्थरों पर अंकित हैं। ये अभिलेख पत्थर की शिलाओं, स्तंभों ताम्रपत्रों, मूर्तियों, गुहाओं व भवनों की दीवारों पर खुदे हुए हैं। इन अभिलेखों में अनेक भाषाओं का प्रयोग किया गया है। वास्तव में देश के जिस क्षेत्र के लोगो ंके लिए ये अभिलेख थे, उन लोगों की भाषा का प्रयोग किया गया है। देश के विभिन्न स्थानों से प्राप्त होने वाले इन अभिलेखों की भाषा भिन्न-भिन्न  ब्राम्ही, संस्कृत, पाली, तमिल, तेलगू, मलयालम आदि है। अधिकांश अभिलेखों की लिपि ब्राम्ही है जो देवनागरी व उत्तर भारत की अन्य लिपियों की जननती है। इसके साथ ही अनेक अभिलेख खरोष्ठी लिपि में भी मिले हैं जो दाहिनी और से बाईं ओर लिखी जाती थी और भारत के उत्तर-पश्चिम में प्रचलित थी।
भारत में प्राप्त होने वाले अभिलेखों को गुहालेख, शिलालेख, स्तंभलेख तथा ताम्रपत्रलेख के रूप में चार भागों में विभाजित किया जा सकता है। अधिकतर लेख दानपत्रों, महत्वपूर्ण घटनाओं के स्मारकों के रूप में तथा राजाओं व विजेताओं की प्रशस्तियोें के रूप में हैं। इनके माध्यम से तत्कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक व्यवस्थाओं की जानकारी होती है। साथ ही साथ प्राप्त अभिलेखों से सम्राटों की वंशावली, शासनकाल व उनके साम्राज्य विस्तार की जानकारी भी अभिलेख देते हैं।

स्मारक

जिस प्रकार अभिलेखों के माध्यम से प्राचीन भारतीय इतिहास के राजनीतिक पक्ष की जानकारी में सहायता मिली है, उसी प्रकार स्मारकों के द्वारा प्राचीन भारत के सांस्कृतिक व धार्मिक जीवन का ज्ञान प्राप्त होता है। इन स्मारकों में भवन, मूर्तियां, कलाकृतियां, स्तूप, मठ, विहार, चैत्य, मंदिर व चित्रकारी आदि को सम्मिलत किया जाता है। अध्ययन की दृष्टि से इन्हें देशी स्मारकों व विदेशी स्मारकों में विभाजित किया जा सकता है।
देशी स्मारकों में प्रमुख स्मारक तक्षशिला, मथुरा, कोसम, सारनाथ, पाटलिपुत्र, राजगिरी, झांसी, नालंदा आदि स्थानों पर मौजूद हैं। तक्षशिला क्षेत्र की खुदाई से प्राप्त स्मारकों से कुषाणकालीन तिथि  की जानकारी प्राप्त होती है। इसी प्रकार हड़प्पा और मोहनजोदड़ो मंे खुदाई से सिंधु घाटी की पॉच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता की जानकारी प्राप्त होती हैं
विदेशों में जो स्मारक मिलते हैं उनमें भारत के वैदेशिक संबंधों पर प्रकाश पड़ता है। ये स्मारक देवालयों व मूर्तियों आदि के रूप में होने के कारण वहां पर भारतीय धर्म व संस्कृति के प्रचार की जानकारी देते हैं। जावा और कंबोज में प्राप्त स्मारकों से भारतीय कला मुखरित हो उठी है। मलाया, लंका, व बाली आदि द्वीपों में भी मंदिरों, मूर्तियों व अन्य स्मारकों की भरमार है। ये स्मारक यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि भारत के लोग इन देशों में अपने धर्म व संस्कृति का प्रचार व प्रसार के लिए गए। उन्हें अपने विचारों से भारतवासियों ने प्रभावित किया और अपना सांस्कृतिक साम्राज्य प्रस्थापित किया। हिन्दू लोग बड़ी संख्या में वहाँ जा बसे भी थे।

मुद्राएँ

प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में मुद्राओं, सिक्कों, व मोहरों का भी बड़ा महत्व है। भारत के विभिन्न भागों से विविध प्रकार की मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। 206 ई.पू. से 300 ई. तक का इतिहास तो मुख्यतः मुद्राओं से प्राप्त जानकारी पर ही लिखा गया है। इस काल की मुद्राओं के अभाव मेें यह युग अंधकारमय ही बना रहता। भारतीय मुद्राओं पर पहले देवतओं के चित्र अंकित होते थे, राजाओं के चित्र व तिथियां आदि नहीं होती थीं। भारत के उत्तर-पश्चिम में बैक्ट्रिया के यूनानी राजाओं ने जब भारत पर शासन प्रारंभ किया तो उनके संपर्क में आकार भारतीय राजाओं ने भी मुद्राओं पर अपने चित्र व तिथियां देनी आरंभ की। शक,पल्लव व कुषाण राजाओं ने भी यूनानी राजाओं का अनुसरण किया। शक राजाओं और मालव व यौधेव गणराज्यों पर तत्कालीन मुद्राएं पर्याप्त प्रकाश डालती हैं। इन मुद्राओं पर देवी-देवताओं के चित्रों से तत्कालीन धार्मिक स्थिति की जानकारी मिलती है। भारत में रोमन मुद्राएं भी प्राप्त हुई हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि किसी समय भारत का रोमन साम्राज्य से पर्याप्त व्यापारिक संबंध था। उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले में 110 तांबे की मुद्राएं और आंध्रप्रदेश के गण्टूर जिले में नागार्जुन कोण्ड के इक्ष्वाकु राजाअेां की 277 मुद्राएं मिली हैं।

साहित्यक स्त्रोत

प्राचीन भारत की जानकारी देने वाले साहित्यक स्त्रोत में हम उस समस्त सामग्री को सम्मिलत करते हैं, जो हमें ग्रंथों के रूप में प्राप्त है। इस समस्त सामग्री को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-
  1. धार्मिक साहित्य
  2. लोक साहित्य

धार्मिक साहित्य

भारत धर्म प्रधान देश है अतः प्राचीन भारतीय साहित्य का रूप भी धार्मिक ही रहा है। इस साहित्य की विशेषता यह है कि न यह ने केवल धार्मिक सिद्धांतो का विवेचन करता है बल्कि तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व राजनीतिक परिस्थितियों का भी परिचय मिलता है। इस प्रकार साहित्य इतिहास की महत्वपूर्ण धरोहर बन गई हैं। संपूर्ण भारतीय धार्मिक साहित्य को प्रमुख तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-
  1. वैदिक साहित्य
  2. बौद्ध साहित्य
  3. जैन  साहित्य

वैदिक साहित्य

वैदिक साहित्य भारत का ही नहीं संसार का सर्वाधिक प्राचीन साहित्य है। वैदिक साहित्य में भी सर्वाधिक वेदों का है। वेद चार हैं- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद यद्यपि, वेद धार्मिक साहित्य में गिना जाता है किन्तु इसकी ऐतिहासिकता उपादेयता भी कम नहीं है। ऋग्वेद व अथर्ववेद का महत्व अधिक है। ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है, इसमें आर्यों के जीवन की संपूर्ण जानकारी मिली है और सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों पर प्रकाश पड़ता है। अथर्ववेद आर्यों की सांस्कृतिक प्रगति का सजीव चित्रण उपस्थित करता है।
वेदों के बाद ब्राम्हण ग्रंथ आते है जो वैदिक मंत्रों का विस्तार से वर्णन करते हैं इतना ही नहीं, ये तत्कालीन आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक जीवन का उल्लेख भी करते हैं। ब्राम्हण ग्रंथों में ऐतरेय, शतपथ, गोपथ, पंचदिश आदि महत्वपूर्ण हैं, जो ऐतिहासिक सामग्री के रूप में महत्वपूर्ण हैं। आरण्यक और उपनिषद् ब्राम्हण ग्रंथों के अंतिम भाग हैं जिनमें दार्शनिक प्रश्नों पर विचार किया गया है। ये आंरभिक हिन्दुओं के धार्मिक व सांस्कृतिक जीवन पर भी प्रकाश डालते हैं।
उपरोक्त साहित्य के पश्चात सूत्र आते हैं जो तीन भागों- कल्प सूत्र, गृह्य सूत्र तथा धर्म सूत्र में विभक्त हैं । वैदिक कालीन यज्ञों का शास्त्रीय वर्गीकरण और विस्तृत वर्गीकरण कल्प सूत्र की की विषय सामग्री है। गृहस्थ से संबंधित विभिन्न संस्कारों और विभिन्न यज्ञों का वर्णन गृह्य सूत्र में है। इसमें तत्तकालीन सामाजिक जीवन का वर्णन भी मिलता है। धर्म सूत्र में राजनीतिक, सामाजिक व वैधानिक व्यवस्थाओं का उल्लेख है। सूत्र साहित्य के साथ-साथ छः वेदांगों- शिक्षा, कल्प, निरूक्त, व्याकरण तथा ज्योतिष का भी पर्याप्त ऐतिहासिक महत्व है।
महाकाव्य काल में भी महत्वपूर्ण साहित्य की रचना हुई। इसमें रामायणा और महाभारत दो महाकाव्य प्रमुख हैं। महाकाव्यों के अतिरिक्त पुराण व स्मृतियां भी वैदिक साहित्य के अंग हैं। पुराणों की संख्या 18 है।  स्मृतियां भी आर्यों के साहित्य का विशिष्ट अंग हैं, विभिन्न ऋषियों के नाम से प्रचलित स्मृतियां भी ऐतिहासिक महत्व की जानकारी देती हैं।

बौद्ध साहित्य

आर्यों के द्वारा रचित विभिन्न साहित्य के समान ही बौद्ध साहितय भी ऐतिहासिक महत्व का है। जातक महात्मा बुद्ध के पूर्व जीवन की अतिश्योक्तिपूर्ण घटनाओं का सजीव चित्र उपस्थित करते हैं। यद्यपि इसमें कल्पना का सहारा लिया गया मालूम पड़ता है किन्तु फिर भी ये बुद्ध के पूर्व  की सामाजिक स्थिति जानने का उत्तम स्त्रोत है।
बौद्धों के धर्म ग्रंथ त्रिपिटक के नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनमें बौद्ध धर्म सिद्धांतों का सविस्तार वर्णन मिलता है। प्रत्येक पिटक में पृथक-पृथक विषय का विवेचन है। सुतपिटक में महात्मा बुद्ध के सिद्धांतों का संग्रह है जो पॉच निकायों पर आधारित है। दूसरे अभिधम्म पिटक में वेदान्तिक सिद्धांतों की चर्चा की गई है। तीसर पिटक विनय पिटक बौद्ध मठों के संगठन व अनुशासन का वर्णन करता है।
बौद्ध साहित्य में पाली, व संस्कृत भाषा में अन्य बहुत सा साहित्य मिलता है। पाली भाषा के मिलिन्द पन्हों में यूनानी राजा मिलिन्द व बौद्धभिक्षु नागसेन का वार्तालाप है। इसके अतिरिक्त दीपवंश और महावंश में भी ऐतिहासिक वर्णन है, जो मुख्यतः लंका से संबंधित है किन्तु इससे भारत के इतिहास पर भी प्रकाश पड़ता है। चन्द्रगुप्त मौर्य के संबंध में बहुत से तथ्य इन्हीं बौद्ध ग्रंथो से प्राप्त हुए हैं। बौद्ध साहित्य संस्कृत भाषा में भी मिलता है , जो हीनयान व महायान सम्प्रदायों से संबंधित है। महावस्तु, ललित विस्तार, बुद्ध चरित्र, मंजू श्री मूलकल्प आदि संस्कृत के अंग हैं।

जैन साहित्य

प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन में जैन साहित्य भी महत्वपूणर्ण स्थान है। जैन साहित्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें हमें इतिहास के कुछ ऐसे पक्षों की जानकारी भी मिलती है, जो वैदिक तथा बौद्ध साहित्य में प्राप्य नहीं है। ई. पूर्व पॉचवी व छठी शताब्दी में लिखे गए जैन ग्रन्थों में कल्पसूत्र, आचारॉगसूत्र और भद्रबाहु चरित्र महत्वपूर्ण हैं। जैन ग्रन्थों की विशेषता यह है कि इनमें कथाओं को इस ढंग से प्रस्तुत किया गया है जिससे इतिहासकार को तथ्य संकलित करने में कठिनाई नहीं होती। आचारांगसूत्र में जैन भिक्षुओं के आचार नियमों का उल्लेख है। परिशिष्ट पर्वन की रचना आचार्य हेमचन्द्र ने की। महावीर स्वामी के समय से राजाओं व जैन सम्राटों का विस्तृत वर्णन इस ग्रंथ में मिलता है। अशोक का पौत्र सम्प्रति (चन्द्रगुप्त द्वितीय) जैन था, जिसका वर्णन इस ग्रंथ में तथा अन्य जैन ग्रंथों में मिलता है। भद्रबाहु चरित्र में सम्राट के गुरू आचार्य मद्रबाहु का चरित्र है। जैन आगम ग्रथों में बारह अंगो का प्रमुख स्थान है।

लौकिक साहित्य

प्राचीन इतिहास के स्त्रोतों में लौकिक या धर्मेत्तर साहित्य का भी अपना स्थान है। इस संपूर्ण साहित्य को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-
साहित्य ग्रंथ
  1. ऐतिहासिक ग्रंथ
  2. जीवन चरित्र
  3. साहित्य ग्रंथ-

प्राचीन भारतीय साहित्य ऐसे ग्रंथों का भंडार है जो इतिहास की दृष्टि से बड़े महत्वपूर्ण हैं। पातंजलि का महाभाष्य शुंग वंश के प्रारंभिक काल की जानकारी देता है। मौर्यवंश का विवरण पाणिनी के अष्टाध्यायी से मिलता है। इसी प्रकार चालुक्य वंशीय सम्राट विक्रमॉक देव की प्रशंसा में रचित विल्हण का विक्रमांक देव चरित्र उस काल की प्रमुख घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करता है। शुंग कालीन भारत की राजनीतिक दशा का वर्णन कालीदास के मालविकाग्निमित्र से भी प्राप्त होता है। नंद वंश के अंतिम काल और मौय वंश के प्रारंभिक काल की राजनीतिक दशा का चित्र विशाखदत्त के मुद्राराक्षस नाटक से मिलता है। दण्डी की दशकुमार चरितम् के माध्यम से सातवीं शताब्दी के बौद्ध धर्म की अवनति का चित्र प्रस्तुत किया गया है।

ऐतिहासिक ग्रंथ

ऐतिहासिक ग्रंथों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण व विश्वसनीय कौटिल्य का अर्थशास्त्र है। इसमें सम्राट चंद्रगुप्त के महामंत्री चाणक्य ने उस काल की राजनीतिक स्थिति, शासन पद्धति और सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक जीवन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। दूसरा महत्वपूर्ण ग्रंथ कश्मीरी पंडित कल्हण की राजतरंगिणी है। इसमें कश्मीर के बारहवीं शताब्दी के मध्य के इतिहास पर समुचित प्रकाश पड़ता है बाणभट्ट रचित हर्ष चरित्र का भी बहुत ऐतिहासिक महत्व है, इसमें सातवी शताब्दी के इतिहास को चित्रित किया गयाहै। दक्षिण भारत के राज्यों का वर्णन तमिल और प्राकृत भाषाओं में लिखित ग्रन्थों में मिलता है। प्राकृत भाषा के वाक्पति द्वारा रचित ग्रंथ गौडवहा में कन्नौज नरेश यशोवर्मन के शासन काल का वर्णन है।

जीवन चरित्र

बाण के हर्ष चरित्र में हर्षकालीन भारत, सन्ध्याकर नंदी के रामचरित में पालवंश का वर्णन, आनन्द भट्ट  के बल्लाल चरित्र में सेनवंश का वर्णन व जयनाद की पृथ्वीराज विजय तथा चन्दरबरदाई का पृथ्वीराज रासो तत्कालीन भारत की राजनीतिक स्थिति का वर्णन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसी प्रकार विक्रमांक देव चरित्र में चालुक्य वंश का वर्णन किया गया है। नवसाहसांक चरित्र में परमार वंश का इतिहास मिलता है।

विदेशी यात्रियों का वृतांत

प्राचीन भारत के इतिहास की जानकारी के लिए भारत में आए विदेशी यात्रियों का वर्णन भी विशेष महत्वपूर्ण है। इन विदेशियों से भारत की अतिश्योक्तिपूर्ण प्रशंसा नहीं की जा सकी । उनके वर्णन अधिकांशतः निष्पक्ष दिखाई देते हैं, किन्तु भारतीय समाज व उसकी भाषा की जानकारी न होने के कारण उन्होंने कुछ स्थाना पर कल्पित बातें भी लिखी हैं। कुल मिलाकर ये वृतांत भारतीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन यात्रियों में ईरानी, चीनी व मुसलमान यात्रियों के वृतांत मिलते हैं, जो उस काल की भारत की परिस्थिति का सजीव चित्र उपस्थित करते हैं।

क-ईरानी यात्रा

जब भारत की समृद्धि की चर्चा पश्चिमी देेशों में जोर-शोर से होने लगी तो ईरान के राजा ने ई. पूर्व छठी शताब्दी के प्रारंभ में स्काईलैक्स नाम विद्वान को भारत भेजा, उसने सेना सहित भारत आकर यहाँ की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन किया। उसका भारत वृतांत बड़ा रोचक है। इतना ही ईरान के सम्राट डेरियम ने भी भारत के बारे में लेख लिखे हैं। इन लेखों से भारत व ईरान के संबंधो पर प्रकाश पड़ता है। भारतवासियों की युद्ध कला का यहां की खेती का भी वर्णन उनके लेखों में मिलता है। ईरान के राजवैद्य टेशियस ने भी भारत का वर्णन किया है किन्तु विश्वसनीय नहीं है।

ख- यूनानी यात्री

सिकन्दर के साथ आए विद्वानों के भारत वर्णन अधिक विश्वसनीय व उपयोगी हैं। इनमें निर्याकस नामक एक जन सेनापित था, दूसरा विद्वान सह नाविक एरिस्टोबुलस था, जिसने अपनी वृद्धावस्था में अपनी यात्रा का वर्णन लिखा हैं किन्तु उनके वृतांत अब उपलब्ध नहीं है। सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात उसके सेनापति सेल्युकस ने उसके पूर्वी साम्राज्य पर अधिकार कर लिया था। उसने भारत में मौर्या सम्राटों के दरबार में अपने राजदूत भेजे। चंद्रगुप्त मौर्य से पराजित होकर उसने संधि कर ली और मेगस्थनीज को राजदूत बनाकर भेजा था। वह लम्बे समय तक भारत में रहा और अपने ग्रंथ इण्डिकामें भारत के शासन प्रबंधन तथा भारतीय समाजिक जीवन पर प्रकाश डाला। यद्यपि अब यह पुस्तक उपलब्ध नहीं है। किन्तु बाद के लेखकों - एरियन, अप्पियन, स्ट्रैबो व जस्टिन आदि ने मेगास्थनीज की पुस्तक से अनेक उद्धरण लिए हैं। एरियन के ग्रंथों का ऐतिहासिक महत्व अधिक है। टॉलमी ने भारत का भूगोल तथ प्लिनी ने पशुओं व वनस्पति का वर्णन किया है।

ग-चीनी यात्री

अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अनेक धर्म प्रचारक मध्य एशिया में भेजे, यहां से भारतीय संस्कृति व बौद्ध धर्म का  प्रचार सम्पूर्ण चीन में हो गया और चीनी लोग भारत को बड़े आदर से धर्म भूमि समझने लगे। अपनी धार्मिक जिज्ञासा को शांत करने के लिए तथा बौद्ध धर्म के साहित्य का अध्ययन करने के लिए अनेक चीनी यात्री भारत आए और वह लंबे समय तक यहीं रहे। यद्यपि उनक वृतांत धार्मिक है किन्तु उनमे तत्तकालीन सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का भी ज्ञान होता है। चीनी यात्रियों में सर्वाधिक महत्व फाहियान, ह्वेनसांग तथा इत्सिंग का है। फाहियान के द्वारा चंद्रगुप्त द्वितीय  के काल के भारत का वर्णन मिलता है। वह मूलतः धार्मिक वर्णन तक अपने को सीमित रखता है फिर भी उसके वृतांत का पर्याप्त ऐतिहासिक महत्व है। ह्वेनसांग सम्राट हर्ष के काल में भारत आया था, लंबे समय तक भारत में रहा। उसने धार्मिक वर्णन के साथ-साथ तत्कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिति का भी वर्णन किया है। इत्सिंग सातवी शताब्दी में भारत आया और बहुत समय तक विक्रमशिला व नालन्दा विश्वविद्यालयों मं अध्ययन करता रहा। उसने भी उस समय की सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का वर्णन किया है। एक अन्य चीनी लेखक हुइली का नाम भी उल्लेखनीय है, उसने ह्वेनसांग की जीवनी लिखी है। इस जीवनी से भारत की स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। तिब्बती लेखकों में लामातारा नाम से प्रसिद्ध है। उनके ग्रन्थों कंग्युरतथा तंग्युरमें भारत का वर्णन मिलता है।

घ- मुसलमान यात्री

नवीं शताब्दी के मध्य में एक अरब यात्री सुलेमान भारत आया, उसके वृतांत में पाल व प्रतिहार राज्यों की जानकारी मिलती है। दूसरा, अलमसूदी दसवीं शताब्दी के मध्य भारत में रहा और उसने राष्ट्रकूट राजाओं का वर्णन किया। अबुजइद ने भारत व पूर्वी देशों के बीच होने वाले व्यापार के बारे में लिखा है। भारत के विषय में लिखने वाले अरबी विद्वानों में सबसे ऊंचा स्थान अलबरूनी का है जो महमूद गजनवी के साथ भारत में आया था। जब महमूद गजनवी देश की लुटपाट में व्यस्त था तब अलबरूनी संस्कृत के अध्ययन में संलग्न था। संस्कृत के अध्ययन के बाद उसने विविध विषयों से संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन किया और यहां की संस्कृति और सभ्यता से परिचय प्राप्त किया। इसी अध्ययन के बात उसने तहकीके हिन्दनामक ग्रंथ लिखा। यह भारत के विषय का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यद्यपि इस गंथ में भारत की राजनीतिक दशा का वर्णन बहुत कम है फिर भी क्षेत्रीय विवरण की दृष्टि से यह अधिक महत्वपूर्ण है।

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