जल निकास, जलाक्रान्ति |Class 12 Crop Production and Horticulture

जल निकास [Drainage]

जल निकास, जलाक्रान्ति  |Class 12 Crop Production and Horticulture


जल निकास

 पौधों की वृद्धि व विकास जिस प्रकार जल की कमी से प्रभावित होते हैं ठीक उसी प्रकार जल की अधिकता भी पौधों की वृद्धि व विकास पर विपरीत प्रभाव डालती है। कभी-कभी खेतों में वर्षा या सिंचाई द्वारा आवश्यकता से अधिक पानी भर जाता है। फसलों के विकास पर इसका प्रभाव हानिकारक होता है। पानी भर जाने से मृदा के कण आपस में चिपक जाते हैं और मृदा गीली हो जाती है, जिससे मृदा के समस्त रन्ध्रावकाश जल से भर जाते हैं और मृदा की भौतिक व रासायनिक क्रियाओं में बाधा पड़ती है। इसके फलस्वरूप पौधे की वृद्धि की अनुकूल स्थितियाँ नष्ट हो जाती हैं, फलतः पौधों की वृद्धि रुक जाया करती है। इस प्रकार मृदा खेती के अनुपयुक्त हो जाती है। अतः आवश्यकता से अधिक जल को खेतों से बाहर निकालना आवश्यक हो जाता है। इसी को जल निकास कहते हैं।

 

"फसल की पैदावार बढ़ाने हेतु भूमि की सतह अथवा अधो-सतह से अनावश्यक जल को कृत्रिम रूप से बाहर निकालना जल निकास कहलाता है।" 

अथवा

"Drainage is removal of excess gravitational water from the soil by artificial means to enhance crop production."

 

जल निकास को निम्नलिखित प्रकार से भी परिभाषित किया जा सकता है-

 

(i) "अनावश्यक (फालतू) जल को खेतों से बाहर निकालना 'जल निकास' कहलाता है।" 

(ii) "भूमि के आवश्यकता से अधिक जल को कृत्रिम विधि द्वारा बाहर निकालने को जल निकास कहते हैं।" 

(iii) "जल निकास फसलों की अनुकूल वृद्धि एवं विकास हेतु भूमि में उचित लवण सन्तुलन एवं जल स्तर बनाये रखने के लिए फालतू जल/नमी को निकालने को कहते हैं।"

 

जल निकास का अभिप्राय पौधों की वृद्धि के लिए मृदा में अनुकूल नमी बनाये रखना होता है। प्रायः दो स्थितियाँ देखने को मिलती है या तो भूमि के पृष्ठतल पर पानी भरा रहता है अर्थात् भूमि पानी में पूरी तरह से डूबी रहती है अथवा भूमि के पृष्ठतल पर तो पानी दिखायी नहीं पड़ता परन्तु भूमि पूर्णरूप से जल संतृप्त रहती है। ऐसी मृदा को जलाक्रान्ति (Water-logging) कहा जाता है। ऐसी मृदा पौधों की वृद्धि के लिए हानिकारक है। 

जलाक्रान्ति के कारण [Causes of Water Logging] 

किसी भूमि में जलाक्रान्ति के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-

 

(1) भूमि की अधो-सतह में सख्त तह (Hard soil) का उपस्थित होना जिसके कारण जल नीचे की सतहों में नहीं पहुँच पाता तथा ऊपरी सतह पर एकत्रित हो जाता है। 

(2) अधिक वर्षा वाले स्थानों पर जहाँ जल की निकासी छोटे-छोटे नाले या नालियों द्वारा सीमित हो जाती है। 

(3) प्राकृतिक जल निकास मार्ग का सड़क या रेल मार्ग द्वारा अवरुद्ध होने से भी जलाक्रान्ति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। 

(4) कच्ची नहरों, नहरों की शाखाओं एवं जल-भरण क्षेत्रों से भारी जल रिसाव के कारण भी जलाक्रान्ति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। 

(5) चिकनी मृदाओं में जल अवशोषण की क्षमता बहुत कम होती है। अतः ऐसी मृदाएँ जल को कम मात्रा में शोषित कर पाती हैं तथा जल की अधिक मात्रा ऐसी मृदाओं की ऊपरी सतह पर जमा हो जाती है। 

(6) ऐसे क्षेत्रों में जहाँ पर भूमि में जल स्तर (Water level) ऊपरी सतहों में ही पाया जाता है, वहाँ भी यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

 

जल निकास के उद्देश्य/महत्त्व [Objectives/Importance of Drainage] 

संक्षेप में जल निकास के उद्देश्य निम्नलिखित हैं- 

(1) जल निकास का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रमुख उद्देश्य उपज को बढ़ाना है। 

(2) भूमि की भौतिक दशा में सुधार करना। 

(3) भूमि में उचित तापक्रम बनाये रखना। 

(4) भूमि में हानिकारक लवणों को एकत्रित न होने देना। 

(5) फसलों के लिए कृषि क्रियाएँ समय पर कराना। 

(6) लाभदायक जीवाणुओं की क्रियाशीलता में वृद्धि करना। 

(7) भूमि को दलदल बनने से रोकना। 

(8) भूमि में पर्याप्त वायु संचार बनाये रखना। 

(9) हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करना।

 (10) पौधों की जड़ों को समुचित विकास का अवसर देना।

 (11) फसलों को समय पर तैयार करना।

 जल निकास की आवश्यकता [Need of Drainage] 

जल निकास की आवश्यकता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

 (1) भूमि में जल भरा रहने से मृदा गीली हो जाती है और गीली मृदा में किसी भी प्रकार की कृषि-क्रियाएँ नहीं हो पार्टी जिससे फसल देर से तैयार होती है। अतः इस अतिरिक्त जल को निकालकर समय पर कृषि-क्रियाएँ, जैसे-बुवाई आदि की जा सकती है। 

(2) भूमि में नमी अधिक होने पर वायु का संचार खराब हो जाता है। इससे जड़ों की कोशिकाओं में श्वसन, कार्बनिक पदार्थों का विघटन एवं मृदा जीवाणुओं की क्रियाशीलता प्रभावित होती है। परिणामस्वरूप उपज कम हो जाती है। अतः अतिरिक्त नमी को दूर करना आवश्यक हो जाता है। 

(3) मृदा में जल की अधिकता से मृदा का ताप गिर जाता है, अतः फलस्वरूप बहुत-सी आवश्यक भौतिक एव जैविक क्रियाएँ सुचारु रूप से नहीं चल पार्टी। अतः जल निकास आवश्यक हो जाता है। 

(4) खड़ी फसलों में अधिक जल के कारण उनके नष्ट होने की सम्भावना बनी रहती है, अतः उसे बाहर निकालना अति आवश्यक हो जाता है। 

(5) ऐसे क्षेत्र जहाँ की भूमि चिकनी मृदा युक्त है, वहाँ की भूमि की ऊपरी सतह पर जल एकत्र हो जाता है जो फसल को नुकसान पहुँचा सकता है। अतः जल निकास आवश्यक हो जाता है। 

(6) जब जल एक स्थान पर एकत्र हो जाता है तो सभी स्थानों के लवण उसी स्थान पर एकत्र हो जाते हैं जिससे पौधों की जड़ों को अपनी खुराक प्राप्त करने में कठिनाई होने लगती है। अतः लवणीय भूमि को सुधारने के लिए जल निकास की आवश्यकता होती है। 

(7) अधिक जल की उपस्थिति में पौधों की जड़ें छोटी, मोटी एवं माँसल हो जाती हैं परिणामस्वरूप जड़ों द्वारा पोषक तत्वों को ग्रहण करने की गति एवं पौधों की वृद्धि दर घट जाती है। अतः अतिरिक्त जल को बाहर निकालना आवश्यक है। 

(8) यदि सिंचाई के तुरन्त बाद वर्षा हो जाये तो अतिरिक्त जल को खेत से बाहर निकालना आवश्यक हो जाता है। 

(9) मृदा में सदैव नमी बनी रहने के कारण फसलों के कुछ रोगों तथा कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है। अतः इन्हें कम करने के लिए जल निकास आवश्यक है। 

(10) जल के अधिक समय तक भरे रहने से किसी भी स्थान की मृदा दलदली हो जाती है और फसलोत्पादन के योग्य नहीं रहती है। अतः जल निकास आवश्यक हो जाता है।

 

जल निकास का मृदा एवं फसलों पर प्रभाव अथवा जल निकास के लाभ 

[Effect of Drainage on Soil and Crop or Advantages of Drainage]

 

(1) जल निकास द्वारा भूमि की भौतिक दशा में सुधार होता है जिससे उत्पादन बढ़ता है। 

(2) भूमि में वायु संचार बढ़ता है जिससे जड़ों की वृद्धि अधिक होती है तथा ज गहराई से पोषक तत्व ग्रहण करती हैं। 

(3) जल निकास से भूमि का तापमान अनुकूल रहता है जिसके कारण जीवांश पदार्थ का विघटन अधिक होता है जिससे पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है। फलस्वरूप अंकुरण अच्छा होता है तथा अन्य कृषि क्रियाएँ सुचारु रूप से होती हैं। 

(4) मृदा में केशिकीय जल (Capillary water) अर्थात् प्राप्य जल की मात्रा में वृद्धि होती है जिससे जड़ों द्वारा जल का अवशोषण बढ़ जाता है। 

(5) जल निकास होने से भूमि के हानिकारक लवण जल में घुलकर बह जाया करते हैं जिससे भूमि क्षारीय अथवा अम्लीय होने से बची रहती है। 

(6) जल निकास की समुचित व्यवस्था से भूमि की सतह पर जल नहीं भरता जिसमे मच्छर एवं हानिकारक कीटों का जन्म नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप पौधों (फसलों), मनुष्यों एवं पशुओं में रोग होने की सम्भावना कम हो जाती है। 

(7) जल निकास होने से खेतों में सभी कृषि क्रियाएँ समय पर हो जाती हैं जिसका प्रभाव अधिक उपज पर पड़ता है। 

(8) जल निकास होने पर पर भूमि पर जल नहीं रुकता है जिससे एक ही भूमि पर कई फसलें प्राप्त की जा सकती हैं क्योंकि जिस समय खेत में जल भरा हो, खेत बेकार रहते हैं। 

(9) भूमि दलदली नहीं हो पाती जिससे कृषि सम्बन्धी क्रियाएँ, जैसे- जुताई-बुवाई निकाई-गुड़ाई आदि समय पर सम्पन्न की जा सकती हैं। 

(10) जल निकास से मृदा की जल शोषण तथा धारण शक्ति बढ़ जाती है जिससे सिंचाई की आवश्यकता कम रहती है और कृषि पर खर्च भी कम हो जाता है। 

(11) जल निकास में जल नियोजित ढंग से हटाया जाता है जिससे भूमि-क्षरण (Soil erosion) की गति धीमी हो जाती है। 

(12) जल निकास द्वारा भूमि के अन्दर लाभदायक जीवाणुओं की क्रियाशीलता में वृद्धि होती है तथा कृषि उपज बढ़ जाती है।

 

अतिरिक्त जल (नमी) से होने वाली हानियाँ [Harms Caused by Excessive Water (Moisture)]

 भूमि में अतिरिक्त जल अथवा अत्यधिक नमी से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं-

 (1) वायु संचार में बाधा- मृदा के रिक्त स्थानों में जल भर जाने से उसमें वायु प्रवेश के लिए स्थान नहीं रह जाता। पौधों की जड़ों की वृद्धि के लिए आवश्यक वायु (O₂) जरूरी होती है। अतः इसकी अनुपस्थिति में पौधों की वृद्धि रुक जाती है।

(2) तापमान का गिर जाना- भूमि में जल की अधिकता से मृदा का तापमान गिर जाता है जिससे पौधों की वृद्धि में रुकावट आती है।

(3) हानिकारक लवणों का एकत्र होना-किसी एक स्थान पर जल एकत्र रहने पर वहाँ की भूमि की ऊपरी सतह पर लवण एकत्र हो जाते हैं जिससे मृदा ऊसर होने लगती है।

 (4) कृषि-क्रियाओं का पिछड़ना-जल की अधिकता में किसी भी प्रकार की कृषि क्रियाएँ समय पर नहीं हो पार्टी जिससे फसल देर से तैयार होती है।

 (5) भूमि का उपजाऊपन कम होना-मृदा में अत्यधिक नमी होने से उसमें मृदा के उपयोगी तत्व घुल जाते हैं और निक्षालन (Leaching) द्वारा भूमि में गहराई तक पहुँच जाते हैं। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति घट जाती है।

 (6) जड़ों का उथला होना- भूमि में वायु की कमी से जड़ें जमीन में अधिक गहराई तक न जाकर ऊपरी सतह में ही मेंही रह जाती हैं। अतः पोषक तत्व सुचारु रूप से नहीं मिल पाते हैं। उथली जड़ें दुर्बल होने से फसल में उचित पैदावार नहीं हो पाती और पौधे तेज हवा में गिर जाते हैं।

 (7) फसलों के हानिकारक कीटाणुओं एवं बीमारियों की अधिकता- मृदा में नमी की अधिकता से भूमि में कीटाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है और नमी से उत्पन्न होने वाली बीमारियों का बाहुल्य हो जाता है।

 (8) जल अवशोषण की दर में कमी आना-मृदा में एक सीमा से अधिक नमी होने पर जड़ों द्वारा जल के अवशोषण की दर बहुत कम हो जाती है। ऐसी मृदा जल निमग्न (water-logged) कहलाती है

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