सम्प्रेषण: अर्थ, उद्देश्य एवं प्रकार प्रक्रिया तत्व |Communication: Meaning, Purpose and Types Process Elements

सम्प्रेषण: अर्थ, उद्देश्य एवं प्रकार प्रक्रिया तत्व

सम्प्रेषण: अर्थ, उद्देश्य एवं प्रकार प्रक्रिया तत्व |Communication: Meaning, Purpose and Types Process Elements


 

सम्प्रेषण: अर्थउद्देश्य एवं प्रकार- प्रस्तावना 

सम्प्रेषण की प्रक्रिया हमारे सामाजिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है। सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत सूचनाओंए निर्देशों तथा निर्णयों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुचाना अत्यंत आवश्यक होता है क्यूंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं एवं समस्याओं के हल हेतु दूसरे व्यक्ति की सहायता पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर होता है। समाज के सभी सदस्य किसी समस्या पर विचार विमर्श करते है तथा उसका उपयुक्त समाधान खोजने का प्रयास करते है इसप्रकार से प्राप्त समाधान जिसमे अधिकांश लोगो की सहभागिता तथा विचारध्मत शामिल होता है अधिक कारगर साबित होते है। समाज अपनी नयी पीढ़ी को संस्कृति से परिचित करने के लिए भी औपचारिक तथा अनौपचारिक रूप से विचारों को उन तक पहुचाने का प्रयास करता है। व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्धों का आधार उनकी आवश्यकताएँ एवं समस्याएँ होती है इन आवश्यकताओं की पूर्ति एवं समस्याओं के हल हेतु विचारों का परस्पर आदान प्रदान करना पड़ता है। सामाजिक सम्बन्धों का निर्वहन विचार विनिमय के बिना संभव नहीं है व्यक्तियों के मध्य विचारों का यही आदान प्रदान सम्प्रेषण है प्रस्तुत इकाई में आप सम्प्रेषण का अर्थए सम्प्रेषण के उद्देश्य तथा सम्प्रेषण के प्रकार के बारे में अध्ययन करेंगे।

 

सम्प्रेषण का अर्थ 

प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली समस्याओं के हल हेतु या अन्य किसी कारण से दूसरे लोगों से सूचनाओंध्विचारों का आदान प्रदान करता है या सामान्य भाषा में कहा जाए कि अपनी भावनाओं, विचारों, समस्याओं से दूसरे लोगों को अवगत कराने के लिए या दूसरे व्यक्ति की समस्या से स्वयं परिचित होने के लिए सूचनाओं का आदान प्रदान करता है। किसी भी कारण से परस्पर सूचनाओं तथा विचारों का आदान प्रदान करना ही सम्प्रेषण है। शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करने का प्रयास किया जाता है। इसमें अनुभवी व्यक्तियों द्वारा कम अनुभवी व्यक्तियों के व्यक्तित्व का विका विभिन्न तरीकों एवं साधनों की सहायता से किया जाता है। अब आप लोग यह बात आसानी से समझ गए होंगे कि शिक्षा की प्रक्रिया बिना सम्प्रेषण के संभव नहीं है क्योंकि शिक्षा और शिक्षण में शिक्षक प्रशिक्षक विद्यार्थियों के समक्ष अपने विचारों को प्रकट करते हैं। विद्यार्थियों से प्रश्न पूछते हैं। विद्यार्थी प्रतिक्रिया उत्तर देते हैं अपनी शंकाओं के समाधान हेतु शिक्षक से प्रश्न भी पूछते हैंए शिक्षक विद्यार्थियों की प्रशंसा या आलोचना भी करते हैंए अपने ज्ञानएकौशल एवं अनुभव से उनकी जिज्ञासाओंध्कठिनाइयों का निवारण कर उनका ज्ञानवर्धन करते हैं। उपरोक्त क्रियाओं से यह स्पष्ट है कि सम्प्रेषण की प्रक्रिया चल रही है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि बिना सम्प्रेषण के शिक्षा की प्रक्रिया संभव ही नहीं है।

 

सम्प्रेषण शब्द अंग्रेजी के कम्युनिकेशन Communication का हिन्दी पर्यायवाची शब्द है । इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द communes से मानी जाती है। communes शब्द का अभिप्राय है Common या सामान्य। अतः कहा जा सकता है कि सम्प्रेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति परस्पर सामान्य अवबोध के माध्यम से आदान-प्रदानकरने का प्रयास करता हैं। व्यक्ति अपने विचार अभिव्यक्त करते समय केवल मुंह से बोलता नहीं है अपितु साथ-साथ हाव-भाव मुख मुद्रा तथा मुख-भंगिमाओं का प्रयोग करके भाषण वक्तव्य को प्रभावशाली बनाने का प्रयास करता है। अतः कहा जा सकता है कि सम्प्रेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने ज्ञानए हाव भाव तथा मुख मुद्रा तथा विचारों आदि का परस्पर आदान प्रदान करते हैं तथा इस प्रकार से प्राप्त प्राप्त विचारों अथवा संदेशों को समान तथा सही अर्थों में समझने और प्रेषण करने में उपयोग करते हैं।

 

एंडरसन के अनुसार सम्प्रेषण

सम्प्रेषण एक गत्यात्मक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति चेतनतया अथवा अचेतनतया दूसरों के संज्ञानात्मक ढाँचे को सांकेतिक हाव-भाव आदि रूप में उपकरणों या साधनों द्वारा प्रभावित करता है।

 

लीगंस के अनुसार सम्प्रेषण

सम्प्रेषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा दो या दो से अधिक लोगए विचारों, तथ्यों, भावनाओं तथा प्रभावों आदि का इस प्रकार परस्पर विनिमय करते हैं कि सभी लोग प्राप्त संदेशों को समझ जाते हैं। सम्प्रेषण में संदेश देने वाले तथा संदेश ग्रहण करने वाले के मध्य संदेशों के माध्यम से समन्वय स्थापित किया जाता है।

 

एडगर डेल के अनुसार सम्प्रेषण

सम्प्रेषण विचार विनिमय के मूड में विचारों तथा भावनाओं को परस्पर जानने तथा समझने की प्रक्रिया है।

 

सम्प्रेषण के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें निम्नलिखित हैं.

 

  • सम्प्रेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोई विचार एक श्रोत से प्राप्त कर्ता तक भेजने का प्रयास किया जाता है ताकि प्राप्तकर्ता का व्यवहार परिवर्तन हो जाए। 
  • सम्प्रेषण सूचना का प्रेषक से प्राप्तकर्ता तक इस प्रकार से स्थानांतरण है कि सूचना प्राप्तकर्ता द्वारा समझी जा सके।

 

सम्प्रेषण की प्रकृति एवं विशेषताएँ

 

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर सम्प्रेषण की निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं- 

1 सम्प्रेषण एक प्रक्रिया है जिसमें पारस्परिक सम्बंध स्थापित किया जाता है। 

2 इसमें विचारों के आदान प्रदान पर विशेष ध्यान दिया जाता है। 

3 यह द्विध्रुवीय प्रक्रिया है अर्थात इसमें दो पक्ष होते हैं। एक संदेश देने वाला तथा एक दूसरा संदेश ग्रहण करने वाला। 

4 यह एक उद्देश्ययुक्त प्रक्रिया है। 

5 सम्प्रेषण प्रक्रिया में प्रत्यक्षीकरण समावेशित होता है। 

6 सम्प्रेषण की प्रक्रिया में परस्पर अंतः क्रिया तथा पृष्ठ पोषण होना आवश्यक होता है। 

7 सम्प्रेषण में विचारों या सूचनाओं को मौखिक, बोलकर, लिखित, लिखकर, अथवा सांकेतिक,संकेतों के रूप में प्रेषित किया जाता है एवं ग्रहण किया जाता है। 

8 सम्प्रेषण सदैव गत्यात्मक होता है।

 

सम्प्रेषण की प्रक्रिया 

सम्प्रेषण की प्रक्रिया के दो मॉडल लोकप्रिय हैं। पहले मॉडल के अनुसार संदेश भेजने वाला व्यक्ति पहले स्वयंसंदेश लिखता है फिर किसी न किसी माध्यम के द्वारा ; जैसे, रेडियो, टेलीफोन, तार, भाषण आदि संदेश प्रेषित किया जाता है। प्रेषित संदेश जहाँ पहुँचता है वहाँ उसे पढ़ कर कम व कम करते हैं और संदेश जिसके लिए है उस तक उसे पहुंचाते हैं। यह व्यक्ति यदि आवश्यकता होती है तो संदेश प्राप्ति की सूचना देता है।दूसरे मॉडल के अनुसार सर्वप्रथम संदेश देने वाला व्यक्ति संदेश का निर्माण करता हैए लिखता है और उसे आवश्यकतानुसार प्रसारित करता है। यह संदेश या विषयवस्तु सूत्र के रूप में या अन्य किसी शाब्दिक अथवा अशाब्दिक माध्यम के द्वारा संदेश ग्रहण करने वाले व्यक्ति तक पहुंचाया जाता है। संदेश ग्रहण करने वाला प्राप्त संदेश को पढ़ता है, उसे समझता है तथा आवश्यकतानुसार प्राप्त संदेश के अनुकूल उचित माध्यम से संदेश वाहक तक अपना प्रत्युत्तर पहुंचाता है। इस मॉडल के अनुसार सम्प्रेषण प्रक्रिया में संदेश और संदेश का प्रत्युत्तर दोनों ही समावेशित रहता है। इस प्रकार आप समझ गए होंगे कि सम्प्रेषण की प्रक्रिया में किन-किन तत्वों की भूमिका होती है।

 

सम्प्रेषण प्रक्रिया के तत्व 

उपरोक्त मॉडलों के आधार पर सम्प्रेषण प्रक्रिया में निम्नांकित तत्वों का होना आवश्यक होता है.

 

1 सम्प्रेषण सन्दर्भ - 

सम्प्रेषण की प्रक्रिया में भौतिक सन्दर्भ जैसे- स्कूल, शिक्षण कक्ष आदि होते हैं। सामाजिक सन्दर्भ के अंतर्गत कक्षा या विद्यालय का वातावरण आता है। मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ के अन्तर्गत औपचारिकता अथवा अनौपचारिकता आती है। दिन का समय तथा समय की अवधि समय सन्दर्भ के अन्तर्गत आते हैं।

 

2 संदेश का श्रोत- 

संदेश का श्रोत या तो वह व्यक्ति होता है जो शाब्दिक या अशाब्दिक संकेत प्रदान करते हैं या वह घटना होती है जिससे शाब्दिक या अशाब्दिक संकेत प्राप्त समझने का प्रयास किया जाता है। जब यह व्यक्ति होता है तो उसे संदेश भेजने वाला कहते हैं। संदेश भेजने वाला ही संदेश की विषयवस्तु निर्धारित करता है उसकी कोडिंग करता है एवं उचित माध्यम का चुनाव करके उसे प्रसारित भी करता है । सम्प्रेषण प्रक्रिया संदेश श्रोत से ही प्रारम्भ होती है। संदेश भेजने वाला संदेश का वांछित प्रभाव डालने के लिए हर संभव प्रयास करता है।

 

3 संदेश- 

संदेश एक उद्दीपक होता है जो संदेश भेजने वाला भेजता है। संदेश मौखिक या लिखित संकेतों के रूप में हो सकता है तथा व्यक्ति की मुखमुद्रा या हावभाव के रूप में हो सकता है। संदेश पोस्टर या चार्ट के द्वारा किसी आकृति - संकेत के माध्यम से प्रेषित किया जा सकता है या सूचना पैकेज के रूप में भी इसे विभिन्न माध्यमों से भेजा जा सकता है।

 

4 सम्प्रेषण का माध्यम- 

सम्प्रेषण का माध्यम वह साधन होता है जिसके द्वारा कोई संदेश संदेश श्रोत से संदेश प्राप्त करने वाले तक पहुंचता है। माध्यम प्रत्यक्षीकरण की संवेदनाएं होती हैं जो दिखने वाली सुनने वाली स्पर्श करने वाली स्वाद बताने वाली अथवा गन्ध बताने वाली हो सकती हैं।

 

5 संकेत या प्रतीक- 

ये प्रतीक या संकेत वे हैं जो किसी अन्य चीज का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये संकेत शाब्दिक अथवा अशाब्दिक भी हो सकते हैं। शब्दए स्वयं में संकेत या प्रतीक होते हैं।

 

6 एनकोडिंग- 

एनकोडिंग वह प्रक्रिया है जिसमें किसी विचार या भावना की अभिव्यक्ति के लिए संकेतों या प्रतीको का प्रयोग किया जाता है।

 

7 डीकोडिंग- 

यह वह प्रक्रिया होती है जिसमें संदेश प्राप्त करने वाला व्यक्ति संदेश श्रोत से प्राप्त संकेतों का कूट अनुवाद कर संदेश ग्रहण करता है।

 

8 पृष्ठपोषण- 

यह वह प्रतिउत्तर होता है जो संदेश प्राप्त करने वाला व्यक्तिए संदेश प्राप्त करने के पश्चात संदेश भेजने वाले के पास प्रेषित करता है।

 

9 संदेशग्रहणकर्ता- 

संदेश ग्रहण कर्ता वह व्यक्ति है जो सम्प्रेषण की प्रक्रिया में संदेह श्रोत द्वारा भेजे गए संदेश प्राप्त करता है जैसे. श्रोताए दर्शकए पत्र पत्रिकाओं के पाठक आदि ।

 

सम्प्रेषण के उद्देश्य 

सम्प्रेषण के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं.

 

1 सम्प्रेषण का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के सामाजिक जीवन में गतिशीलता लाना है । 

2 सम्प्रेषण के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक विचारोंध्भावनाओं को प्रेषित किया जाता है। 

3 सम्प्रेषण का उदेश्य अनुभवी व्यक्तियों द्वारा अपने अनुभवों तथा विचारों को अपने से कम अनुभव वाले व्यक्ति तक पहुचाना है। 

4 सम्प्रेषण शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में सहायता प्रदान करता है। 

5 सम्प्रेषण का उद्देश्य विचारोंधसूचनाओं का परस्पर आदान प्रदान करना होता है। 

6 सम्प्रेषण का उद्देश्य मानवीय तथा सामाजिक वातावरण को बनाये रखना तथा उसे सुदृढ करना होता है 

7 सम्प्रेषण के द्वारा निर्देश अथवा आदेश या संदेश प्रेषित करना होता है 

8 सम्प्रेषण शिक्षक द्वारा शिक्षार्थियों तक विषय संबंधी तथ्य एवं संकल्पनाओं को पहुचाने एवं समझाने का कार्य करता है 

9 सम्प्रेषण द्वारा एक व्यक्ति अपनी समस्याओं से दूसरे व्यक्तियों को परिचित कराता है। 

10 सम्प्रेषण का उद्देश्य विद्यार्थियोंए श्रोताओं एवं पाठकों को विभिन्न प्रकार के विचारोंधसूचनाओं से परिचित करना होता है। 

11 सम्प्रेषण का उद्देश्य संदेश श्रोत से संदेश ग्रहण कर्ता तक प्रभावशाली तरीके से संदेश पहुंचाना होता है। उपरोक्त उद्देश्यों से आप यह समझ गए होंगे कि बिना सम्प्रेषण के शिक्षा प्रदान करना संभव नहीं है।

 

सम्प्रेषण के प्रकार 

सम्प्रेषणको निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-शाब्दिक तथा अशाब्दिक शैक्षिक तथा लोक सार्वजनिक सम्प्रेषण आदि ।

 

1 शाब्दिक सम्प्रेषण 

ऐसा सम्प्रेषण जिसमें सदैव भाषा का प्रयोग होता हैए शाब्दिक सम्प्रेषण कहलाता है। इसमें भाषा का प्रयोग या तो मौखिक रूप से या लिखित रूप में शब्दों अथवा संकेतों के द्वाराए विचार अथवा भावनाओं को दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए प्रयोग किया जाता है। शाब्दिक सम्प्रेषण को पुनः दो प्रकार के सम्प्रेषणों में वर्गीकृत किया जा सकता है. मौखिक सम्प्रेषण व लिखित सम्प्रेषण

 

मौखिक सम्प्रेषण - 

मौखिक सम्प्रेषण में तथ्यों एवं सूचनाओं का आदान प्रदान मौखिक रूप से होता है। इस विधि में संदेश देने वाला तथा संदेश ग्रहण करने वाला दोनों ही परस्पर आमने सामने होता हैं। मौखिक सम्प्रेषण में वार्ताए व्याख्यानए परिचर्चाए समूहिक चर्चाए प्रश्नोत्तर तथा कहानी के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति की जाती है। इसका एक उदाहरण एक शिक्षक द्वारा कक्षा में विद्यार्थियों के समक्ष दिया गया व्याख्यान है।

 

लिखित सम्प्रेषण- 

इसमें संदेश देने वाले तथा संदेश पाने वाले व्यक्तियों का आमने सामने होना आवश्यक नहीं है। इसमें सन्देश लिखित रूप में शब्दों या संकेतों के रूप में होता है। सन्देश प्राप्त करने वाला इन्ही शब्दों या संकेतों के माध्यम से सन्देश भेजने वाले की भावना को समझ लेता है। इस सम्प्रेषण में सन्देश की भाषा सरल सुगम स्पष्ट तथा आसानी से समझ में आने वाली हो ताकि संदेश बिना किसी भ्रम के सही रूप में ग्रहणकर्ता ग्रहण कर सके । लिखित संप्रेषण का एक उदाहरण दूरस्थ शिक्षा के पाठ्यक्रमों की स्वअधिगम सामग्री है।

 

2 अशाब्दिक सम्प्रेषण 

अशाब्दिक संप्रेषण में भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता है इसमें शरीर के हाव भावए मुख मुद्रा एवं स्पर्श संपर्क, भाव, भंगिमाओं के माध्यम से संदेश प्रेषित किया जाता है। अशाब्दिक संप्रेषण निम्नलिखित प्रकार के होते है.

 

वाणी संप्रेषण 

इस संप्रेषण में विचारों तथा भावनाओं की अभिव्यक्ति व्यक्तिगत रूप से अथवा छोटे समूहों में आमने सामने रहकर वाणी द्वारा की जाती है। उदाहरण के लिए बात चित के बीच  में हाँ हाँ कहना या हूँ. हूँ कहते चले जाना या मुसकुरानाए चीखना ठहाके लगाना आदि ।

 

चक्षु संपर्क एवं मुख्य मुद्राएँ 

व्यक्तिगत संप्रेषण में चक्षु संपर्क तथा मुख मुद्राओं का प्रदर्शन अत्यन्त प्रभावशाली माना जाता है। कक्षा में चक्षु संपर्क के द्वारा शिक्षक अपने छात्रों की मनःस्थिति का सही सही आकलन करने में सफल होते है इसी के द्वारा वह विद्यार्थियों के मुख मुद्राओं से संवेगों की स्थिति समझ जाते है जैसे प्रसन्नताए भयए क्रोधए शोक तथा आश्चर्य आदि का संप्रेषण आसानी से होता है। मुकबधिर व्यक्तियों के लिए यह संप्रेषण अत्यन्त उपयोगी है।

 

स्पर्श संपर्क 

स्पर्श संपर्क में स्पर्श को ही संप्रेषण का प्रमुख माध्यम बनाया जाता है। स्पर्श के माध्यम से व्यक्ति अपनी भावनाओं एवं विचारों की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। हाथ मिलाने के तरीके से ही अंदाजा लग जाता है की यह हाथ दोस्ती का है या दुश्मनी का है। माँ के हाथ का एक स्पर्श मात्र उसके शिशु को बहुत कुछ कह देता है । प्रशंसा के एक शाबाशी प्यार का एक चुंबन अपने आप बहुत सी भावनाओं, संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। दृष्टिहीन छात्रों के लिए स्पर्श संप्रेषण का बहुत महत्वपूर्ण एवं उपयोगी साधन है। सकता है। 

उपयोग के आधार पर संप्रेषण को शैक्षिक तथा लोक संप्रेषण के दो वर्गों में विभाजित किया जा

 

शैक्षिक संप्रेषण 

शैक्षिक संप्रेषण से तात्पर्य शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किये गए संप्रेषण से होता है इसमें संदेश का स्रोत शिक्षक होता है तथा विद्यार्थी संदेश ग्रहण करने वाले होते है इसमें पाठ्यक्रम की विषयवस्तु या सहगामी क्रियाएँ संदेश के रूप में होती है। शिक्षक छात्रों को विषयवस्तु स्पष्ट करने के लिए शैक्षिक संप्रेषण में शाब्दिक तथा अशाब्दिक दोनों ही प्रकार के संप्रेषणों का प्रयोग प्रभावशाली ढंग से करने का प्रयास करता है। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में शिक्षक तथा विद्यार्थियों को एक साथ मिलकर कार्य करने के क्षेत्र में संप्रेषण एक प्रमुख साधन के रूप में कार्य करता है। शिक्षक शिक्षण से पूर्व पाठयोजना बनाता है। शिक्षण हेतु उपयुक्त विधियों एवं प्रविधियों का चुनाव करता है। शाब्दिक एवं अशाब्दिक माध्यमों से विषय वस्तु को समझाने में संप्रेषण का प्रयोग करता है। जब तक शिक्षक संप्रेषण की कला में निपुण नहीं होगा वह अपने शिक्षण को सफल एवं प्रभावशाली नहीं बना सकेगा । शैक्षिक संप्रेषण अधिकांशतः द्विध्रुवीय होता है। इसमें शिक्षक अपनी बात कहता है इसके बाद विद्यार्थी अपनी जिज्ञासाओं एवं शंकाओं को शिक्षक के समक्ष प्रस्तुत करके उनका समाधान प्राप्त करते हैं। शिक्षक को भी विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाओं से अपने शिक्षण के प्रति छात्रों से धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों ही प्रकार की प्रतिपुष्टि प्राप्त होती है जिसकी मदद से वह अपने शिक्षण को और अधिक प्रभावशाली बनाने का प्रयास करता है। शैक्षिक सम्प्रेषण को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए अच्छे शिक्षक शिक्षण के दौरान उचित शिक्षण सहायक सामग्रियों का प्रयोग करते हैं। शिक्षण सहायक सामग्रियों के प्रयोग से सम्प्रेषण और अधिक प्रभावशाली हो जाता है जिस कारण शिक्षण भी प्रभावशाली हो जाता है। इस प्रकार आप यह जान गए होंगे कि किसी भी शिक्षक का शिक्षण तभी प्रभावशाली होगा जब वह सम्प्रेषण की कला में निपुण होगा।

 

लोक सम्प्रेषण 

लोक सम्प्रेषण से तात्पर्य अपने विचार या अपनी बात को असंख्य लोगों तक पहुंचाना होता है। इस सम्प्रेषण में संदेश को समूहिक रूप से प्रसारित किया जाता है। इस प्रकार के सम्प्रेषण में अधिकांशतः संदेश देने वाले व्यक्ति से आमने सामने बात नहीं हो सकती है। इस कारण संदेश की भाषा अत्यन्त ही सरलए सुबोध एवं सहज होती है जिससे कि जन जन तक पहुंचे संदेश में किसी प्रकार की भ्रांति न रहे। लोक सम्प्रेषण के अंतर्गत रेडियोए टेलीविज़नए समाचार पत्रए पत्रिकाओंए पुस्तकोंए वीडियो फिल्मों तथा विज्ञापन बोर्डों का प्रयोग

 

किया जाता है। ये सभी साधन महत्वपूर्ण विचारों सूचनाओंध्खबरों को अधिक से अधिक लोगों तक आसानी से पहुँचाने का कार्य करते हैं। राष्ट्र के विकास में लोक सम्प्रेषण का बहुत बड़ा हाथ होता है। लोक सम्प्रेषण में जनसंचार माध्यम का प्रयोग किया जाता है। जनसंचार माध्यमों के द्वारा विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है जिससे बहुत अधिक संख्या में विद्यार्थीध्व्यक्ति लाभान्वित होते हैं। वर्तमान में मुक्त विश्वविद्यालय लोक सम्प्रेषण का प्रयोग करके सुदूर क्षेत्रों में शिक्षा सुलभ करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। 

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