मानवीय सम्बन्ध सिद्धांत में के प्रमुख विचारकों का योगदान |Contribution of Other in Human Relation Theory

मानवीय सम्बन्ध सिद्धांत में अन्य विचारकों का योगदान
 (Contribution of Other in Human Relation Theory)
मानवीय सम्बन्ध सिद्धांत में के प्रमुख विचारकों का योगदान |Contribution of Other in Human Relation Theory
 

मानवीय सम्बन्ध सिद्धांत में अन्य विचारकों का योगदान

मेयो के विचारों को आगे बढ़ाने में निम्नलिखित दो विचारकों के भी योगदान अद्वितीय हैं।

 

चेस्टर०आई०बर्नार्ड (Chester I Banard): मानवीय सम्बन्ध सिद्धांत

मानवीय सम्बन्ध आन्दोलन के प्रतिभाशाली सिद्धांतवादियों में चेस्टर० आई० बर्नार्डका नाम आता है। वे मेयो के समकालीन थे। 1938 में प्रकाशित पुस्तक "The functions of the Executive "में उनके विचार प्रकाशित हुये जिसने प्रशासकीय विचारधारा के विकास नयी दिशा दी। उनके प्रमुख विचार निम्नाकित हैं :

 

1) संगठन एक सहकारी प्रणाली (Organization As A Cooperative System): 

उनके अनुसार संगठन एक ऐसी प्रणाली है जो मानवीय क्रियाओं से मिलकर बनती है तथा सदस्यों के प्रयास जो कि समन्वित होते हैंइन क्रियाओं को एक प्रणाली में बदल देते हैं। कोई भी संगठन योगदानों एवं संतुष्टि के संतुलन सिद्धांत पर काम करता है। सदस्यों के प्रयास को योगदान कहते हैं जबकि संतुष्टि संगठन द्वारा प्रदान किये जाते हैं।

 

II) प्रेरणाओं की अर्थव्यवस्था (The Economy of Incentives) : 

उसके अनुसार व्यक्तिओं के प्रयास ही संगठन की उर्जा बन जाते है । किन्तु ये प्रयास उन्हें प्रदान की गयी प्रेरणाओं पर निर्भर करते हैं । उसने प्रेरणाओं को दो भागों में विभक्त किया है:

 

(क) विशिष्ट प्रेरणायें: ये निम्नलिखित चार प्रकार के हैं - 

• भौतिक प्रलोभन जैसे - मुद्रावस्तुयें या भौतिक दशायें; 

• व्यक्तिगत अभौतिक प्रेरणायें जैसे विशिष्ट पदप्रतिष्ठामान्यता के अवसरनिजी अधिकार; 

• कार्य की उपयुक्त भौतिक दशाएं; 

• आदर्श उपकार जैसे शिल्प का गौरवपरमार्थवादी भावनाराष्ट्र भक्तिपूर्णता का अहसाससंगठन निष्ठाधार्मिक एवं सौन्दर्य बोध आदि;

 

(ख) सामान्य प्रेरणायें: ये निम्नलिखित चार प्रकार के हैं-

 

• संस्थात्मक आकर्षण जिसे बनार्ड ने सामाजिक संगतता कहा है। उन्होंने बताया कि जातीय मतभेदवर्ग संघर्षराष्ट्रीय शत्रुतायेंरीति-रिवाजसामाजिक स्तरशिक्षाआकांक्षाधर्म व नैतिकता संगठन में सहयोग को समाप्त कर देते हैं। अतः मानव प्रेमएकता व मैत्री पूर्ण संबंधों के आधार पर प्रेरणा प्रदान की जानी चाहिये ।

 

• परम्परागत कार्य की दशायें व अभ्यास जनित व्यवहारों व प्रवृतियों की अनुपालना 

• विस्तृत भागीदारी के अवसर एवं 

• बंधुत्व ओर भाईचारे की स्थिति

 

बर्नार्ड ने यह सुझाव दिया कि इन प्रेरणाओं का दिया जाना परिस्थितिसमय और व्यक्ति पर निर्भर करता है।

 

III) औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठन (Formal and Informal Organization): 

बर्नार्ड का विचार है कि औपचारिक संगठन बनावटी व्यवस्थायें होतीं है तथा अनौपचारिक संगठनों जो कि प्राकृतिक व्यवस्थायें हैंमें से विकसित हुये है। उसके अनुसार औपचारिक संगठन के तीन आवश्यक तत्त्व होते हैं जो कि सभी प्रकार के संगठनों में पाए जाते हैं : I) सदस्यों के बीच सम्प्रेषण II) सदस्यों द्वारा सहयोग या योगदान की इच्छा III) सामान्य उद्देश्य की प्राप्ति । दूसरी ओरअनौपचारिक संगठनों का निर्माण व्यक्तिगत संपर्कों तथा अन्तः क्रियाओं के कारण होता है। ये संगठन औपचारिक संगठन के लिये ऐसी कार्य दशाओं का निर्माण करते हैं जिसमें वे कुशलता पूर्वक कार्य कर सकें।

 

IV) सत्ता का सिद्धांत (Theory of Authority): 

बर्नार्ड का यह मत है कि स्वीकृति ही सत्ता का आधार होती है। एक अधिकारी की सत्ता सदैव उसके अधीनस्थों द्वारा सत्ता के प्रति दी गयी स्वीकृति/अनुमति पर निर्भर करती है। प्रशासकीय सत्ता का वास्तविक श्रोत उच्च पद या स्थिति न होकर अधीनस्थों की स्वीकृति होती है। वे आगे कहते है कि व्यक्ति निम्नांकित चार दशाओं में आदेश को स्वीकार करता है:

 

• जब वह आदेशों को पूर्ण रूप से समझ पता है 

• जब आदेश संगठन के उद्देश्य के प्रतिकूल नहीं हो । 

• जब आदेश उसके निजी हितों के अनुकूल हों तथा उसके लिये किसी प्रकार से अहितकर नहीं हों। 

• जब वह शारीरिक और मानसिक रूप से आदेशों का पालन करने में समर्थ होता है।

 

V) उदासीनता का क्षेत्र ( Zone of Indifference ) :

 उन्होंने आदेशों की स्वीकृति के सम्बन्ध में उदासीनता का क्षेत्र के विचार का प्रतिपादन किया है। उनके अनुसार स्वीकृति योग्यता की दृष्टि से समस्त आदेशों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। कुछ आदेश ऐसे हप्ते हैं जो स्वीकृति योग्य नहीं होते हैं। दूसरे शब्दों में अधीनस्थों द्वारा उनका पालन नहीं किया जाता है। कुछ आदेश तटस्थता की पंक्ति में होते हैं अर्थात् उन्हें मुश्किल से स्वीकार या अस्वीकार किया जाता है तीसरी श्रेणी में वे आदेश आते हैं जो अधीनस्थों द्वारा निर्विवाद रूप से स्वीकार किये जाते हैं । बर्नार्ड के अनुसार तीसरी श्रेणी के आदेश ही उदासीनता के क्षेत्र में आते हैं। व्यक्ति कुछ आदेशों के प्रति सत्ता की दृष्टि से उदासीन होते हैं। वे यह जानने कि कोशिश नहीं करते कि आदेश क्या हैं क्योंकि सामान्य रूप से उनके परिणामों व प्रभावों का संगठन में आने के समय ही पूर्वानुमान कर लेते हैं। उदाहरण के लियेजिन व्यक्तियों की न्युक्ति राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा डिग्री कॉलेजों में प्रवक्ता के पद पर होती हैउन्हें यह पहले से पता रहता है कि स्थानान्तरण होना एक सामान्य बात है। ऐसे में स्थानान्तरण के आदेश के प्रति ज्यादा चिंतित नहीं रहते हैं। ये लोग उदासीन ही रहते हैं चाहे उनका स्थानान्तरण कहीं भी कर दिया जाये। दूसरे शब्दों मेंजिन आदेशों के प्रभाव से व्यक्ति परिचित होता हैउसके प्रति प्रायः उदासीन हो जाता है। ऐसे आदेश उसके उदासीनता क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का उदासीनता क्षेत्र पृथक-पृथक होता है।

 

मेरी पार्कर फोलेट ( Mary Parker Follet) मानवीय सम्बन्ध सिद्धांत: 

मानव सम्बन्ध विचारधारा के इतिहास में मेरी पार्कर फोलेट की एक पृथक पहचान है । उन्होंने व्यवसायिक संगठनों में संबंधों के मनोविज्ञान पर महत्वपूर्ण कार्य किये। उनके योगदानों का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है :

 

1) रचनात्मक संघर्ष (Constructive Conflict): 

सामान्यतया संघर्ष या मतभेद को किसी उपक्रम/संगठन में बुरा माना जाता है। फोलेट ने पहली बार इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया कि संघर्ष अच्छा होता है न बुराबल्कि यह अच्छे या बुरे परिणामों के लिये प्रशासकों को अवसर प्रदान करता है संघर्ष किसी भी संगठन में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है। यह इनके उपयोग पर निर्भर करता है। यह कोई युद्ध नहीं हैवरन यह विचारों अथवा हितों की भिन्नता का आभास है। उनके अनुसार संघर्ष के समाधान की तीन विधियाँ होती है:

 

• प्रभुत्व (Domination) : 

इसका आशय एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार पर विजय प्राप्त है। इसमें दबावबल प्रयोग एवं दूसरे के हितों पर चोट करने जैसी घटनाएँ शामिल होती हैं। इसी वजह से पार्कर ने इस विधि को अनुचित बताया है

 

• समझौता (Compromise) : 

इस विधि में दोनों पक्ष अपनी मांगों के कुछ अंश परित्याग करके किसी मध्य बिन्दू पर अनिच्छापूर्वक सहमत हो जाते हैं। यह विधि प्रभुत्व से अच्छी होती है।

 

• एकीकरण (Integration): 

एकीकरण संघर्ष समाधान की सर्वोत्तम विधि होती है। एकीकरण से आशय किसी ऐसे नए समाधान या विकल्प की खोज करना है जिसमें दोनों पक्षों की वास्तविक मांगें पूरी हो सकें। यह नये व्यवहार द्वारा दोनों पक्षों को संतुष्टि प्रदान करता है।

 

II) आदेशों का मनोविज्ञान एवं स्थिति का नियम (The Psychology of Order Giving and The law of situation) : 

फोलेट ने 1925 अपने पेपर "The Giving of Orders" में प्रशासकों द्वारा किये जाने वाले आदेशों के मनोवैज्ञानिक पहलूओं का विश्लेषण किया था । ये विश्लेषण निम्नलिखित बिन्दूओं के रूप में स्पष्ट किये गये हैं:

 

• आदेश देने मात्र से ही संतोषपूर्ण परिणाम प्राप्त हो जायेंगेयह आवश्यक नहीं है। 

• किसी आदेश के प्रति बौद्धिक सहमति प्रकट करना भी स्वयं में अच्छे निष्पादन की गारंटी नहीं है। 

• कोई कार्यवाही आदेश की अपेक्षा व्यक्ति के पूर्व अनुभवों के आधार पर निर्मित उसके स्वभाव प्रारूपों (Habit Pattern) पर अधिक निर्भर करती है। 

• प्रशासकों को अपने सदस्यों में आदत प्रारूपों एवं मानसिक अभि-वृतियों का निर्माण करना चाहिये 

• ये प्रारूप एवं अभिवृतियाँ प्रशिक्षण द्वारा विकसित की जा सकतीं हैं। 

• प्रशासकों को अपने कार्यों की सम्भावित प्रक्रियाओं का पूर्वानुमान करते हुये उनके किये पूर्व तैयारी कर लेनी चाहिये । 

• व्यक्ति आपने भीतर संघर्ष का अनुभव कर सकते हैं। 

• आदेशों के फलस्वरूप संघर्षों की उत्पत्ति नहींबल्कि उनका समाधान होना चाहिये ।

 

फोलेट ने ही सर्वप्रथम स्थिति के तत्त्व का संगठन के सन्दर्भ में विश्लेषण किया। उन्होंने स्थिति के नियम का प्रयोग आदेश देने के सम्बन्ध में किया था। उनका सुझाव था कि "आदेशों के निर्व्यक्तिकरण (Depersonalization of Orders ) " का प्रयोग होना चाहिये। प्रशासकों एवं सदस्यों को संयुक्त रूप से स्थिति का अध्ययन करना चाहिये । एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति पर आदेश जारी नहीं करने चाहियेबल्कि उन्हें स्थिति से ही आदेश प्राप्त करने चाहिये। दूसरे शब्दों मेंयहाँ स्थिति क्रिया- विकल्प उपलब्ध कराती है जिसे दोनों पक्षों द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। आदेश स्थिति से प्राप्त करने पर सदस्यों को यह महसूस नहीं होगा कि वे किसी व्यक्ति के अधिकार और नियन्त्रण में कार्य कर रहे हैं। फलस्वरूप उनके पारस्परिक संबंधों में 'मधुरता बनी रहेगी।

 

III) समन्वय सिद्धांत (Principle of coordination): 

मेरी फोलेट ने समन्वय को प्रशासन का केन्द्रीय सार भाग बताया है। उनके अनुसार प्रभावशाली समन्वय के निम्नलिखित चार सिद्धांत होते हैं:

 

• प्रत्यक्ष संपर्क का सिद्धांत (The Principle of Direct Control): 

इसके अंतर्गत अन्तर्वैक्तिक समतल संबंधों व व्यक्तिगत सम्प्रेषण की व्यवस्था के द्वारा समन्वय करने का सुझाव दिया

 

• प्रारंभिक अवस्था में समन्वय का सिद्धांत (The Principle of Coordination in Early Stages): 

समन्वय की प्रक्रिया योजना बनाने और नीति निर्धारण करते समय ही आरम्भ हो जानी चाहिये । योजनाओं और नीतियों के निर्माण के पूर्व ही विभिन्न विभागों के अध्यक्षों से तथा कर्मचारियों से परामर्श कर लिया जाना चाहिये

 

• पारस्परिक सम्बन्ध का सिद्धांत (The Principle of Reciprocal Relationships): 

समन्वय के इस सिद्धांत के अनुसार किसी स्थिति विशेष में सभी घटक पारस्परिक रूप से संबंधित होते हैं । अर्थात् किसी संगठन के सभी सदस्य अपने पारस्परिक संबंधों एवं अन्तः क्रियाशीलता के कारण एक दूसरे को प्रभावित करतें हैं तथा स्वयं भी एक दूसरे से प्रभावित होते हैं ।

 

• सतत प्रक्रिया का सिद्धांत (The Principle of Continuous Process): 

समन्वय एक सतत प्रक्रिया है अर्थात् समन्वय का कार्य संगठन में सदैव ही चलता रहना चाहिये और इसे अवसरों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिये ।

 

IV) सहमति एवं सहभागिता का मनोविज्ञान (The Psychology of Consent and Participation): 

फोलेट ने यह कहा है कि संगठन / उपक्रम एक क्रियाशील इकाई है जो सभी के विचारों एवं ज्ञान से संचालित होता है। अतः विभिन्न कार्यों एवं निर्णयों में सदस्यों की सहमति प्राप्त करने के साथ उनकी सहभागिता भी आवश्यक है सहमति एवं सहभागिता प्राप्त करने के लिए उन्होंने तीन उपाये बताये हैं जो कि निम्नलिखित हैं:

 

• संगठन की संरचना में द्वि-मार्गीय सम्प्रेषण एवं परामर्श की व्यवस्था होनी चाहिये । 

• दैनिक प्रबंध व्यवहार में सहभागिता के सिद्धांत को मान्यता दी जानी चाहिये तथा सदस्यों के विचारों का निरंतर उपयोग किया जाना चाहिये । 

• संघर्षों के समाधान तथा विभिन्न प्रवृतियोंप्रकृति एवं ज्ञान वाले व्यक्तियों के विविध विचारों में सामंजस्य एवं उपयोग की उपयुक्त विधि का विकास किया जाना चाहिये ।

 

V) अधिकार एवं उत्तरदायित्व की अवधारणा (The Concept of Authority and responsibility):

 फोलेट का यह मत था कि किसी संगठन के सम्पूर्ण अधिकार व शक्ति उच्चतम अधिकारी को सौंप देना उचित नहीं है। प्रशासन में अंतिम सत्ता (Ultimate Authority) व सर्वोच्च नियंत्रण (Supreme Control) जैसे शब्दों का प्रयोग भ्रामक है। समस्त शक्तियों का संगठन के शीर्ष पर केन्द्रीकरण कर देना अत्यंत अव्यवहारिक एवं निराधार धारणा है। 

उनका यह मत था कि किसी व्यक्ति को अधीनस्थ मान कर उस पर अधिकार रखना व्यक्तित्व की भावनाओं के प्रति अपमान और अपराध है। यह स्थिति कभी भी सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की नींव नहीं बन सकती है। उन्होंने यह सुझाव दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को कार्य सत्ता (Authority of Function) दी जानी चाहिये अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति जिसे जो कार्य सौंपा जाये वह उस कार्य के लिए अंतिम रूप से उत्तरदायी होना चाहिये उसे अपने कार्य शेत्र के बारे में अधिकार मिलना चाहिये। उन्होंने लिखा है " अधिकार कार्य के साथ संबंधित है और कार्य के साथ ही रहता है (Authority belongs to the job and stays with the job)". 

उत्तरदायित्व के सम्बन्ध में उनका विचार था कि वैयक्तिक स्तर पर व्यक्ति को कार्य के प्रति उत्तरदायी होना चाहिये किसी व्यक्ति के प्रति नहीं ( A person must be responsible for work not to someone) | विभागीय स्तर पर कार्य के प्रति वे सभी उत्तरदायी होंगे जिन्होंने आपना योगदान दिया है। प्रशासक को विभिन्न वैयक्तिक एवं सामूहिक उत्तरदायित्वों में केवल समन्वय स्थापित करने वाला होना चाहिये।

 

मानवीय सम्बन्ध सिद्धांत आलोचनायें (Criticisms):

 

I) इस सिद्धांत में अनौपचारिक समूहों पर बल दिये जाने के कारण संगठन के औपचारिक स्वरुपसत्ता एवं सिद्धांतों की उपेक्षा की जाने लगी है। 

II) इस सिद्धांत के विचारकों ने मानवीय संबंधों को साधन के बजाय साध्य/लक्ष्य ही मान लिया है। जबकि वास्तविकता यह है कि सुपरिभाषित लक्ष्यों तथा प्रशासकीय निष्पादनों को मानवीय संबंधों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। 

III) इस सिद्धांत में सम्पूर्ण व्यक्ति के विचार को भुला दिया गया है। व्यक्ति सिर्फ सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवाश्यकताओं से ही प्रेरित नहीं होते है जबकि आर्थिक आयाम भी उनके जीवन से जुड़े होते है । 

IV) कुछ आलोचकों के अनुसार मानवीय सम्बन्ध सिद्धांतों से सम्बंधित प्रयोग पूर्ण रूप से वैज्ञानिक नहीं थे । कार्यश्रमिक एवं वातावरण के चयन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था और न ही इसके सम्बन्ध में कोई वैज्ञानिक विधि अपनायी गयी। 

V) मानवीय सम्बन्ध सिद्धांतों में संगठन के कार्य की प्रकृति एवं उसके संरचना की अनदेखी की गयी है जो कि किसी भी संगठन के लिये महत्वपूर्ण विषय है।

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