वीरमदेव अथवा वीरमेन्द्र शासक पर टिप्पणी लिखिए ? | Veeram Dev Gwalior Shashak

 वीरमदेव अथवा वीरमेन्द्र शासक पर टिप्पणी लिखिए ?

वीरमदेव अथवा वीरमेन्द्र शासक पर टिप्पणी लिखिए ? | Veeram Dev Gwalior Shashak


वीरमदेव अथवा वीरमेन्द्र शासक पर टिप्पणी लिखिए ?


वीरमदेव (1402-1423)

 

  • ग्वालियर राज्य पर उद्धरणदेव के बाद उनका पुत्र वीरमदेव अथवा वीरमेन्द्र शासक बना। वीरमदेव ने 4 जून सन् 1401 ई. के बाद से दिसम्बर सन् 1402 ई. के बीच ग्वालियर पर राज्य किया। इस बात की पुष्टि 14 जून के उद्धरणदेव के शिलालेख से एवं तारीखे- मुबारक- शाही के एक लेख से होती है, जिसमें अंकित है कि जमादि-उल-अव्वल हिजरी 805 में मल्लू इकबाल ने ग्वालियर पर जब खिराज न देने के कारण आक्रमण किया तब उस समय ग्वालियर पर वीरमदेव शासन कर रहे थे। 

 

वीरमदेव का शासन कब तक रहा, इसका उल्लेख षट्कर्मोपदेश ग्रन्थ की प्रतिलिपि में वर्णित है। इसके अनुसारवीरमदेव के काल में आषाढ़ सुदि 5 बुधवार को षट्कर्मोपदेश की प्रतिलिपि उतारी गई। इसके बाद वैशाख सुदि 3 शुक्रवार को गणपतिदेव के राज्य का उल्लेख मिलता है । इस कथन की सत्यता के निम्नलिखित आधार हैं जो कि वीरमदेव के शासनकाल के ऐतिहासिक स्रोत हैं।

 

वीरमदेव के शासनकाल के ऐतिहासिक स्रोत हैं-

  • वीरमदेव के राज्यकाल के आठ शिलालेख प्राप्त हुए हैं। इनमें से दो तिथिरहित शिलालेख हैं, जिनमें से एक मितावली (मुरैना के पास) के गोल मंदिर के द्वार पर है। इसमें किसी देऊ के पुत्र बासु का उल्लेख है। । दूसरा तिथि-रहित शिलालेख मितावली के इसी गोल मंदिर के पास शिला पर उत्कीर्ण है जिसमें वीरमदेव को 'तेजोरत्नम्' कहा गया है। 

 

तिथियुक्त शिलालेखों में एक गोपाचलगढ़ के त्रिकोनियाँ ताल पर वि संवत् 1465 का अर्थात् 1408 ई. का है, जिसका विवरण स्पष्ट रूप से पढ़ने में नहीं आता। कुतवार-सिंहोनिया के अम्बिकादेवी के मंदिर पर दो शिलालेख मिलते हैं जिनमें एक विक्रम संवत् 1462 अर्थात् सन् 1405 ई. का है। इसमें लिखा है— 


'ॐ सिद्धि संवत् 1462 वर्ष माघ सुदि 10 सोम दिन महाराजाधिराज श्री वीरसिंहदेव ने श्री अंबिका को मंडप करवायो। 

प्रधान पंडित जनार्दन फुजदारू... सूत्रधार हरिदासु । मठाधिपति गोविन्द चन्द्रान्वयी।

 

  • सिंहोनिया का दूसरा शिलालेख चैत्रनाथ की जैन मूर्ति पर अंकित है। यह विक्रम संवत् 1467 अर्थात् 1410 ई. का है। इस शिलालेख में वीरमदेव को ग्वालियर का शासक बताया है। 


विक्रम संवत् 1475 अर्थात् 1418 ई. का एक ताम्रलेख नरवर के बड़े जैन मंदिर में अंकित है जिसमें 'महाराजाधिराज वीरमेन्द्र तथा उसके मंत्री साधु कुशराज का उल्लेख है। यह ताम्रपत्र नरवर कैसे पहुँचा, यह ज्ञात नहीं होता किन्तु इस ताम्रपत्र के नरवर में मिलने से यह भी सिद्ध नहीं होता कि नरवर भी वीरमदेव के आधीन था। इस ताम्रपत्र लेख को श्री कुन्दनलाल जैन ने जिस रूप में पढ़ा है उसका सम्बन्धित अंश निम्नलिखित प्रकार है- 

 

'सं. 1475 अषाढ़ सुदि 5 गोपाद्रियम (हा) राजाधिराज 

वीरमेन्द्र राज्ये श्री कर्षतां जनैः संघीद्र वंशे... 

साधु कुशराज भूद्भार्ये रल्हो लक्ष्मणश्रियौ तत्पुत्रैः 

कल्याणमलंभुद्भार्ये धर्म की जयतम्हिदे इत्यादि 

परिवारेण सममं सा. कुशराजौ नित्यं यंत्रं प्रणमति।'

 

इस यंत्र लेख से ज्ञात होता है कि विक्रम संवत् 1475 अर्थात् 1418 ई. में गोपाद्रि पर वीरमदेव तोमर का राज्य था । 

 

  • संवत् 1469 माघ सुदि 6 रविवार को राजकुमार लक्ष्मणसिंह की प्रेरणा से गुणकीर्ति द्वारा एक धातु की मूर्ति की प्रतिष्ठा कराने का उल्लेख मिलता है। इस लेख के आधार पर राजकुमार लक्ष्मणसिंह वीरमदेव के 20 राजकुमारों में से एक थे। ग्वालियर दुर्ग में 'लक्ष्मणपौर' द्वार का निर्माण और उसका नामकरण, दोनों ही उपरोक्त तथ्य की पुष्टि करता है। खड्गराय ने अपने गोपाचल आख्यान में वीरमदेव के बाद लक्ष्मणसेन का उल्लेख किया है। कनिंघम ने उसे पहाड़गढ़ का सामन्त भी बताया है। गुणकीर्ति वीरमदेव के समय के भट्टारक थे। संवत् 1473 में भी उन्होंने एक अन्य मूर्ति की प्रतिष्ठा कराई 158 इनका समय संवत् 1460 से 1486 तक का जान पड़ता है।

 

  • वीरमदेव के उपरोक्त शिलालेख यह स्पष्ट करते हैं कि वीरमदेव का राज्य 1405 और 1418 के बीच सुनिश्चित रूप से था। उनके राज्य के अन्तर्गत मितावली और सिंहोनिया भी आते थे। वे मितावली और सिंहोनिया के मन्दिरों के पोषक थे। उनके समय में जैन धर्म भी उन्नति पर था। हिन्दी भाषा भी अपने विकास की गति पकड़ चुकी थी। हिन्दी भाषा की विकासोन्मुख दशा का अध्ययन उसके विक्रम संवत् 1462 के अम्बिकादेवी के मन्दिर सिंहोनिया के शिलालेख से किया जा सकता है।

 

  • तिथिरहित शिलालेख जो कि मितावली में गोल मन्दिर के द्वार पर तथा पास की शिला पर मिले हैं उनसे यह प्रकट होता है कि गोपाचल दुर्ग के 25 मील उत्तर में वर्तमान सिंहोनिया कस्बा है। उसके पश्चिम में वर्तमान कुतवार नामक स्थान है और दक्षिण की ओर मितावली ग्राम है। कुतवार और मितावली के बीच में पढ़ावली ग्राम है। यह पूरा क्षेत्र नागों की प्रसिद्ध नगरी कान्तिपुरी के आसपास का क्षेत्र रहा है। मध्ययुग में तोमरों के प्रभावशाली होने से पहले इस क्षेत्र ने अनेक राजवंशों का राज्य देखा- प्रतिहारों, कच्छपघातों, पुनः प्रतिहारों ने राज्य किया।

 

  • यह क्षेत्र रणथंभौर के महाराजा हम्मीरदेव की राज्य सीमा में भी शामिल था। यह विक्रम संवत् 1349 अर्थात् 1292 ई. के शिलालेख से तथा मितावली के एकोत्तर सौ महादेव के मंदिर के द्वार पर प्राप्त तिथि रहित शिलालेख 9 से स्पष्ट है। इस मंदिर में रणथंभौर के हम्मीरदेव की ओर से पूजा-अर्चना का प्रबन्ध था। उनकी ओर से ही वहाँ पुजारी-पुरोहित तथा राज्याधिकारी रहते थे।  मितावली के इस मंदिर पर ही पृथ्वीसिंह चौहान और थानसिंह चौहान नामोल्लेख युक्त शिलालेख प्राप्त हुए हैं। इसमें से पृथ्वीसिंह चौहान अवश्य ही कोई प्रतिष्ठित सामन्त मालूम होता है क्योंकि शिलालेख में उसकी विशेष प्रशंसा की गई है। पृथ्वीसिंह और थानसिंह चौहानों के नामयुक्त शिलालेख तिथि- रहित हैं, अतएव यह कहना कठिन है कि वे हम्मीरदेव के ही सामन्त थे, अथवा उनकी मृत्यु के पश्चात् तब तक इस क्षेत्र पर अधिकार किए रहे जब तक तुर्कों ने उन्हें अपदस्थ नहीं कर दिया।

 

  • तुर्कों से इस क्षेत्र को तोमरों ने ले लिया था। सन् 1342 ई. के पूर्व ऐसा के राजा कमलसिंह ने हब्सी बद्र का वध कर इस क्षेत्र को उससे छीन लिया था, तब से यह क्षेत्र वीरमदेव के समय तक तोमरों के अधिकार में था।

 

  • मितावली ग्राम के पास ही पहाड़ी के ऊपर गोलाकार एकोत्तरसौ महादेव का मंदिर आज भी अपने पुराने अनकहे इतिहास का साक्षी है। मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से इसकी रचना अद्वितीय है। इसके मध्य में गोलाकार मंदिर है। मंदिर का द्वार पूर्व दिशा की ओर है। मुख्य मंदिर के चारों ओर गोलाकार खुला हुआ आँगन है। मुख्य मंदिर और उसके आँगन को घेरे हुए अनेक मंदिर बने हैं जो कि वृत्ताकार शृंखला में हैं। बीच के मुख्य मंदिर में तथा चारों ओर के मंदिरों में शिवलिंग प्रतिष्ठित हैं।

 

  • इस शिव मंदिर को वीरमदेव का संरक्षण प्राप्त था। वीरम के नामयुक्त तिथिरहित शिलालेख को उत्कीर्ण कराने वाला देऊ का पुत्र वासू कौन था ? यह उस शिलालेख से ज्ञात नहीं होता। इस शिलालेख में वीरमदेव के लिए 'तेजोरत्नम्' विरुद् प्रयुक्त हुआ है।

 

  • विक्रम संवत् 1462 का कुतवार सिंहोनिया के अम्बिकादेवी मन्दिर में प्राप्त शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि वीरमदेव अपने पूर्वज वीरसिंहदेव की तरह दुर्गा के परमभक्त थे। तोमर वंश के राजाओं में अम्बिकादेवी के मन्दिर की बहुत प्रतिष्ठा थी। प्राप्त शिलालेख से यह भी ज्ञात होता है कि इस मन्दिर का मठाधिपति गोविन्द चन्द्रान्वयी था। यहाँ का प्रधान जनार्दन था और कोई एक फौजदार भी नियुक्त था। 1405 ई. में वीरमदेव ने अम्बिकादेवी के मन्दिर का सभामण्डप बनवाया था। मार्गशीर्ष 5 वि.सं. 1467 के शिलालेख से स्पष्ट होता है कि 01 दिसम्बर सन् 1410 ई. में वीरमदेव ने यहाँ कुछ निर्माण कार्य भी करवाया था।

 

  • वीरमदेवकालीन प्राप्त शिलालेखों में सिंहोनिया से प्राप्त चैत्रनाथ की जैन मूर्ति पर विक्रम संवत् 1467 का शिलालेख एवं नरवर के बड़े जैन मंदिर से प्राप्त विक्रम संवत् 1475 के शिलालेख के आधार पर गुणकीर्ति का भट्टारक होना सिद्ध होता है। रइधु की 'सम्मइचरित' में ग्वालियर के काष्ठासंघ के भट्टारकों की गुरु परम्परा में शामिल नामों की सूचियों से भी यह स्पष्ट है। गुणकीर्ति के उपदेश से वीरमदेव के काल में पद्मनाभ द्वारा यशोधर-चरित लिखा गया। जैन धर्म के प्रचार-प्रसार की दिशा में किए गए उक्त कार्य इस बात को प्रकट करते हैं कि जैन सम्प्रदाय का पूर्ण विकास तोमरों के राज्य से ही प्रारंभ हुआ। यद्यपि वीरमदेव के समय के गोपाचल के जैन मंदिर अब उपलब्ध नहीं हैं। वर्तमान में ग्वालियर हजीरा मार्ग में स्थित मुहम्मद गौस का मकबरा है, वह पहले कभी जैन मंदिर था यहाँ कुशराज ने चन्द्रप्रभु का विशाल मंदिर बनवाया था। 


  • वीरमदेव के समय का ही मुरार नगर में नदी के किनारे कोई जैन मंदिर था जहाँ विक्रम संवत् 1496 अर्थात् 1419 ई. में हुबंड जाति के करमसिंह और देवीसिंह ने आदिनाथ की मूर्ति प्रस्थापित कराई थी। वर्तमान में नदी के किनारे एक जैन मंदिर तो है लेकिन वह नवनिर्मित प्रतीत होता है जबकि परिसर में बिखरे साक्ष्य तथा जीर्णावस्था में खड़ा विशाल दरवाजा यहाँ पर तोमरकालीन जैन मंदिर होने का समर्थन करते हैं। संभव है पुराने मंदिर के नष्ट हो जाने पर इसी परिसर में नया जैन मंदिर स्थापित कर दिया गया हो।

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