मध्यकाल में महिलाओं की स्थिति |नारी मुक्ति आंदोलन |Status of women in medieval period in Hindi

मध्यकाल में महिलाओं की स्थिति
Status of women in medieval period in Hindi

 

मध्यकाल में महिलाओं की स्थिति |नारी मुक्ति आंदोलन |Status of women in medieval period in Hindi

मध्यकाल में महिलाओं की स्थिति 

  • मध्यकाल 7वीं शताब्दी के अंत में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया जिसके साथ ही देश में मुसलमान शासकों का प्रमुत्व बढ़ने लगा। इसी युग में विदेशी आक्रांताओं से बचने के लिए स्त्रियाँ जौहर की अग्नि में भस्म होने लगीं। इस युग में अनेक कुप्रथाओं का जन्म हुआ। इनमें पर्दा प्रथाबाल विवाहसती प्रथाबांझ जैसी कुरीतियों ने समाज को चारों ओर से जकड़ लिया।

 

पर्दा प्रथा

  • मुगलों के आगमन के पश्चात सुरक्षा की दृष्टि से कुछ कुलीन वर्ग के लोगों ने पर्दा प्रथा को अपनाया। धीरे-धीरे समाज के अन्य वर्गों ने भी इसका अनुसरण किया।

 

बाल विवाह

  • यद्यपि इस कुरीति का प्रारंभ बहुत पहले हो चुका था तथापि मध्यकाल में यह बर्बरता की स्थिति थी। बाल्यावस्था में विवाह के कारण अधिकांश लड़कियों की प्रथम प्रसवकाल में ही मृत्यु हो जाती थी। बाल्यावस्था में स्त्रियों का विधवा हो जाना उनके सम्पूर्ण जीवन के लिये अभिशाप बन गया था।

 

विधवाओं की स्थिति

  • कम आयु की बच्चियों का विवाह अधेड़ तथा वृद्ध से होना आम बात थी। जिनके कारण समाज में विधवाओं की संख्या बढ़ने लगी। समाज में विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार प्राप्त नहीं था बल्कि विधवा होने के पश्चात उन्हें धर्म सम्मत ढंग से जीवन व्यतीत करने का निर्देश दिया जाता था। इन निर्देशों में बाल मूड़ दिया जाना सफेद धोती पहननातामसिक भोजन न करनाजीवन के आमोद-प्रमोद से दूर रहना आदि शामिल था। कई बार विधवाएं अपने ही परिवार के पुरुष की कुदृष्टि का भी शिकार बन जाती थीं। अपनी इस स्थिति की कल्पना करते हुए कई बार स्त्रियाँ स्वयं ही पति की चिता में कूदकर प्राण त्याग देती थीं।

 

सती प्रथा 

  • इस युग में यह प्रथा अपने वीभत्स रूप में थी। पति की चिता के साथ जलकर मरने वाली स्त्रियों का महिमा मण्डन किया जाता था। परिस्थितियाँ ऐसी निर्मित हो चुकी थीं कि पति की मृत्यु के बाद जो पत्नी उसके साथ सती नहीं होना चाहती उसे निंदनीय माना जाता था। अर्थात स्वयं को पतिव्रता सिद्ध करने के लिए उनका सती होना आवश्यक था।

 

नारी मुक्ति आंदोलन-अन्याय के विरुद्ध पहली आवाज 

 

  • वैदिक युग में अपनी विद्वता सिद्ध कर चुकी स्त्रियों को मध्ययुग में इस सत्य का भान हुआ कि जिस नियम उपबंधों को वह अपने तथा अपने परिवार के हित में समझ रही थीं वह दरअसल उनके पांव में बांधी जाने वाली बेड़ियाँ थीं। परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अधिकांश स्त्रियाँ नियति मानकर अन्याय को चुपचाप सहन कर रही थीं। मध्ययुग के उत्तरार्द्ध में कुछ ऐसी वीरांगनाएं भी सामने आईं जिन्होंने परिणाम की परवाह न करते हुए अन्याय के विरूद्ध न केवल आवाज उठाई बल्कि तत्कालीन समाज को पुनर्विचार के लिए विवश कर दिया।

 

सीमांतनी उपदेश

 

  • सन् 1882 में एक अज्ञात महिला ने सीमांतनी उपदेशनामक पुस्तक लिखी और उसकी तीन सौ प्रतियाँ गुप्त रूप से बँटवा दीं। इस पुस्तक में लेखिका का नाम दर्ज नहीं है। डॉ. धर्मवीर ने इस लेखिका पर शोध किया और पाया कि इसका पहला लेख एक भाषण है जो इस महिला ने बम्बई के प्रार्थना समाज द्वारा आयोजित एक स्त्री सभा में दिया था। (16, सीमंतनी उपदेश) अर्थात पुस्तक में अज्ञात यह लेखिका अपने व्यक्तिगत जीवन में बढ़-चढ़कर स्त्री आंदोलन में हिस्सा ले रही थी। सीमांतनी उपदेश पुस्तक के कुछ अंश निम्नांकित हैं

 

  • सीमंतनी उपदेश नामक पुस्तक में 'ऑनर किलिंग रिश्तेदारों द्वारा होने वाले यौन शोषणपति से मार खाती औरत की कहानी है। इस पुस्तक में उन बाल विधवाओं की भी कथा है जो मानसिक और यौनिक शोषण सहती हुई अंत में वेश्या बन जाती हैं। इन कहानियों में औरतों के लिए शिक्षाएँ भी दी हुई हैं। जैसे औरतें खुद पसंद करके शादी करें। घर वाले अनुमति न दे तो कानून का सहारा लें। स्वयं के लिए शिक्षा का मार्ग तलाशें।

 

नारी मुक्ति आंदोलन

  • 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध से भारत में स्त्रियों द्वारा अन्याय के खिलाफ स्वर उठना प्रारंभ हो गया था परंतु नारी मुक्ति आंदोलन यूरोपीय समाज की देन कही जा सकती है। स्त्रियों के प्रति भेद-भाव की भावना दुनिया भर में फैली थी। पश्चिमी देशों में नारीवाद की शुरुआत फ्रांसीसी क्रांति (1789-1799 ) से मानी जाती है। फ्रांसीसी क्रांति में स्त्रियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। 


  • इससे पूर्व स्वतंत्रतासमानता तथा बंधुत्व पुरुषों के लिए आरक्षित था। पुरुषों के अधिकार के लिए विंडिकेशन आफ राइट्स ऑफ मैन' जैसी किताबें भी लिखी गई थीं। इस पुस्तक के जवाब में मेरी वुल्सटनक्राफ्ट ने 'विंडिकेशन ऑफ राइट्स ऑफ वीमेनलिखा। कहा जाता है हैरियट टैलर नाम की महिला ने 'औरतों की गुलामीनाम से पुस्तक लिखी जो उनके पति जॉन स्टुअर्ट मिल के नाम से प्रकाशित हुई। इसी प्रकार हरवर्ट स्पेंसर द्वारा नारी मुक्ति पर रचित पुस्तक की असल लेखिका जार्ज इलियट बतायी जाती हैं।

 

  • उन्नीसवीं शताब्दी में पश्चिमी देशों की स्त्रियाँ शिक्षानौकरीसम्पत्ति के अधिकार मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं और उन्हें काफी हद तक अर्जित भी कियालेकिन उनकी नागरिकता दोयम दर्जे की ही थी और पूंजीवादी उत्पादन तन्त्र में वे निम्नस्तरीय गुलामों में तब्दील कर दी गयी। फिर भी कुछ समकालीन क्रांतियाँ ऐतिहासिक तौर पर नारी मुक्ति संघर्ष को एक कदम आगे ले आई। उन्हें सामंती समाज के निरंकुश दमन से एक हद तक छुटकारा दिलाया। सामाजिक उत्पादन में उनकी भागीदारी की स्थितियाँ पैदा की और उनके भीतर अपने अधिकारोंस्वतंत्र अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ने की सामाजिक-राजनीतिक क्रियाकलापों और में हिस्सा लेने की और एक नई जमीन पर खड़े होकर यौन-असमानता एवं यौन उत्पीड़न का विरोध करने की चेतना पैदा की ।

 

  • इसी समयावधि में 28 फरवरी 1909 को अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आह्वान पर महिला दिवस सबसे पहले मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा। 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन सम्मेलन में इसे अंतर्राष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलवाना था। उस समय अधिकतर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था। 1911 से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की परंपरा शुरु हुई। 1917 में रूस की महिलाओं ने महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल ऐतिहासिक महत्व की मानी जाती है।

 

  • भारत में नारी मुक्ति तथा देश की गुलामी से मुक्ति की लड़ाई समानांतर रूप से लड़ी गई। राष्ट्रीय आंदोलन में एक बार फिर समाज को स्त्री शक्ति की आवश्यकता महसूस हुई। यह वही स्त्रियाँ थीं जो सदियों पूर्व अज्ञानता के अंधकार में धकेली जा चुकीं थीं। नेतृत्वकर्तासमाज से अज्ञान व कुरीतियों से मुक्त होकर स्वतन्त्रता संग्राम में सम्मिलित होने की अपील कर रहे थे। इस अर्थ में भारतीय स्त्रियों का मुक्ति आंदोलन पश्चिमी वुमेन लिबरेशन से थोड़ा सा भिन्न है। 


  • 1828 में राजा राममोहन राय ने महिलाओं की दशा सुधारने हेतु गहन आंदोलन चलाया। परिणामस्वरूप 1829 में सती प्रथा विरोध अधिनियम पारित किया गया। इसी समय बाल विवाह की समाप्ति स्त्री शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु प्रयत्न किए गए। प्रसिद्ध समाज सुधारक दयानंद सरस्वती ने ब्रह्म समाज की स्थापना कर कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन चलाया। स्त्री शिक्षाबाल विवाह निषेध और विधवा विवाद हेतु अनेक समाज सुधार कार्य किये अनेक मुद्दों पर समाज के कड़े विरोध के बावजूद कई अभियान आज भी जारी है।

 

  • राष्ट्रीय आंदोलन में भारतीय महिलाओं ने हर कदम पर पुरुषों के साथ कधा से कंधा मिलाकर अंग्रेजी सत्ता से संघर्ष किया। आगे चलकर महात्मा गांधी के आह्वान पर हजारों की संख्या में अमीर-गरीबशिक्षित अशिक्षित स्त्रियाँ दहलीज से बाहर निकल पड़ीं। राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भागीदारी ही नहीं नेतृत्व क्षमता भी सिद्ध हुई। 


  • राष्ट्रीय आंदोलन में भीकाजी कामाऐनी बेसेंटसरोजनी नायडूराजकुमारी अमृत कौरविजय लक्ष्मी पंडितदुर्गाबाई देशमुखकमला देवी चट्टोपाध्याय तथा बाद की नेत्रियों में अरुणा आसफअलीसुचेता कृपलानीकैप्टन लक्ष्मी सहगल जैसी अनेक नेत्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहीं। दरअसल राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय समस्त उदारवादी नेतागण यह समझ चुके थे कि स्त्री की दशा सुधारकर ही स्वतंत्रता की लड़ाई जीती जा सकती है तथा एक मजबूत राष्ट्र की नींव रखी जा सकती है। गांधी आंदोलन में हिस्सा लेने वाली अधिकांश स्त्रियाँ वही थीं जिनके पति आंदोलन में सक्रिय थे। राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाली अधिकांश महिलाएं पति की अनुमति के पश्चात ही आंदोलन में प्रवेश कर सकीं। इसलिए यह महज एक शुरूआत थी। 


  • बाद में स्वतंत्र भारत में महिलाओं को मतदान का अधिकार होना चाहिये अथवा नहीं यह गंभीर प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ सन् 1924 में श्रीमती चमेली देवी चौरसिया ने अपने लेख में स्त्रियों को राजनैतिक अधिकार न दिये जाने के विरोध में लिखती हैं मैं यहाँ देश की भविष्य पार्लियामेंट भारतीय कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का ध्यान इस ओर दिलाना चाहती हूँ कि वे एक प्रस्ताव के द्वारा यह घोषणा कर दें कि स्वतंत्र भारत में पुरुषों के समान स्त्रियों को भी अधिकार प्राप्त होंगे।


संविधान सभा में शामिल महिलाएं

  • स्वतंत्रता के पश्चात संविधान निर्माण हेतु गठित संविधान सभा में 15 महिलाएं भी शामिल थीं। जिनका नाम है अम्मू स्वामी नाथनएन्नी मास्करेनीबेगम एजाज रसूलदक्षयिनी वेलायुधनदुर्गाबाई देशमुखहंसा मेहतापूर्णिमा बनर्जीरेणुका रॉयसरोजनी नायडूविजया लक्ष्मी पंड़ित भारतीय स्त्रियों के जीवन में स्वतंत्र भारत का संविधान मानो नव जीवन संदेश लेकर आया इन प्रबुद्ध महिलाओं ने भारत के संविधान के निर्माण में अपने समृद्ध विचारों को व्यक्त कर अमूल्य योगदान दिया है।


  • भारत का संविधान सभी भारतीय महिलाओं को सामान अधिकार (अनुच्छेद 14). राज्य द्वारा कोई भेदभाव नहीं करने (अनुच्छेद 15 (1)) अवसर की समानता (अनुच्छेद 16 ), समान कार्य के लिए समान वेतन (अनुच्छेद 39 (घ)) की गारंटी देता है। इसके अलावा यह महिलाओं और बच्चों के पक्ष में राज्य द्वारा विशेष प्रावधान बनाए जाने की अनुमति देता है (अनुच्छेद 15 ( 3 )), महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक प्रथाओं का परित्याग करने (अनुच्छेद 51 (ए) (ई)) और साथ ही काम की उचित एवं मानवीय परिस्थितियाँ सुरक्षित करने और प्रसूति सहायता के लिए राज्य द्वारा प्रावधानों को तैयार करने की अनुमति देता है। (अनुच्छेद 42 ) 


नारीवादी आंदोलन का दूसरा चरण

  • 1970 के दशक में नारीवादी आंदोलन का दूसरा चरण प्रारंभ हुआ। अब तक अनेक महिला संगठनों का निर्माण किया जा चुका था तथापि उनमें लामबंदी का अभाव था। 70 के दशक में महिलाओं के संगठनों को एक साथ लाने वाले पहले राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों में से एक मथुरा बलात्कार का मामला था। 1979 1980 में एक थाने ( पुलिस स्टेशन) में मथुरा नामक युवती के साथ बलात्कार के आरोपी पुलिसकर्मियों के बरी होने की घटना बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का कारण बनी। परिणामस्वरूप सरकार को साक्ष्य अधिनियमदंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता को संशोधित करने और हिरासत में बलात्कार की श्रेणी को शामिल करने के लिए बाध्य होना पड़ा। महिला कार्यकर्ताकन्या भ्रूण हत्यालिंग भेदमहिला स्वास्थ्य और महिला साक्षरता जैसे मुद्दों पर एकजुट हुई। 1975 में भारतीय महिलाओं के बड़े जत्थे ने बर्लिन में आयोजित प्रथम विश्व स्तरीय महिला कांफ्रेंस में हिस्सा लिया।

 

  • चूंकि शराब की लत को भारत में अक्सर महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जोड़ा जाता हैइसलिए महिला संगठनों द्वारा आंध्र प्रदेशहिमाचल प्रदेशहरियाणाउड़ीसामध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में शराब-विरोधी अभियानों की शुरुआत की। कई भारतीय मुस्लिम महिलाओं ने शरीयत कानून के तहत महिला अधिकारों के बारे में रूढ़िवादी नेताओं की व्याख्या पर सवाल खड़े किये और तीन तलाक की व्यवस्था की आलोचना की।

 

  • 1990 के दशक में विदेशी दाता एजेंसियों से प्राप्त अनुदानों ने नई महिला- उन्मुख गैरसरकारी संगठनों (NGO) के गठन को सम्भव बनाया। स्वयं सहायता समूहों एवं सेल्फ इम्प्लॉयड वुमेन्स एसोसिएशन (SEWA) जैसे एनजीओ ने भारत में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक प्रमुख भूमिका निभाई है। कई महिलाएं स्थानीय आंदोलनों की नेताओं के रूप में उभरी हैं। उदाहरण के लिएनर्मदा बचाओ आंदोलन की 'मेधा पाटकर

 

  • महिला संगठनों के प्रयास से सरकार द्वारा महिला विषयक विधेयकों में समय-समय पर संशोधन किया जाता रहा। वर्ष 2001 को महिलाओं के सशक्तिकरण (स्वशक्ति) वर्ष के रूप में घोषित किया गया तथा महिलाओं के सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति 2001 में पारित की गयी थी। सरकार द्वारा 2001 में लागू की गई महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य महिलाओं की प्रगति विकास और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना और महिलाओं के साथ हर तरह का भेदभाव समाप्त कर यह सुनिश्चित करना है कि वे जीवन के हर क्षेत्र और गतिविधि में खुलकर भागीदारी करें। इस नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की गई। लैंगिक समानता के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार ने महिलाओं के समग्र सशक्तिकरण की दिशा में कई कदम उठाए हैं। योजना प्रक्रिया एक विशुद्ध कल्याण उपाय से आगे बढ़कर उन्हें विकास योजना के केन्द्र में लाने के प्रयास तक आ पहुंची है। इस नीति के अनुसार महिलाओं का भविष्य एक सशक्तआत्मनिर्भर और स्वस्य सरक्षित माहौल में सांस लेने वाले समाज का है।

 

  • 2006 में बलात्कार की शिकार एक मुस्लिम महिला इमराना की कहानी प्रकाश में आयी। इमराना का बलात्कार उसके ससुर ने किया था। कुछ मुस्लिम मौलवियों की उन घोषणाओं का जिसमें इमराना को अपने ससुर से शादी कर लेने की बात कही गयी थीव्यापक रूप से विरोध किया गया और अंततः इमराना के ससुर को 10 साल की कैद की सजा दी गयी। कई महिला संगठनों और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा इस फैसले का स्वागत किया गया। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन बाद, 9 मार्च 2010 को राज्यसभा ने महिला आरक्षण विधेयक को पारित कर दिया जिसमें संसद और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। यह विधेयक आज तक लोक सभा में लंबित है।

 

  • लंबी लड़ाई के पश्चात आज भारत की महिलाएं कानूनी स्तर पर पुरुषों के समकक्ष खड़ीं हैं। भारतीय संविधान में वर्णित समस्त मौलिक अधिकारों में स्त्री-पुरुष को समान माना गया है। इस दौरान कई उपलब्धियाँ भी हासिल हुई। उदाहरण के लिए मताधिकार तथा महत्वपूर्ण राजनैतिक पदों पर नियुक्त होने के अधिकार के साथ-साथ विवाहतथा संपत्ति में समानाधिकार उल्लेखनीय है। स्वास्थ्य की दृष्टि से बालिग होने की आयु में विवाह तथा विशेष परिस्थितियों में गर्भपात का अधिकार अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि आज ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं जहाँ महिलाएं कार्यरत नहीं हैं। यद्यपि सामाजिक स्तर पर यह संघर्ष आज भी जारी है।

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