पुर्तगाली व्यापारियों का भारत में आगमन | भारत में युरोपियों का आगमन | Purtagaaliyon Ka Bharat Aagman


पुर्तगाली व्यापारियों का भारत में आगमन | भारत में युरोपियों का आगमन | Purtagaaliyon Ka Bharat Aagman


 भारत और यूरोप के बीच व्यापार संबंध 

  • भारत और यूरोप के बीच व्यापार संबंध कोई नया नहीं था बल्कि इसकी शुरुआत प्राचीन काल में ही हो गई थी।  
  • सन 1453 में तुर्को द्वारा कुस्तुनतूनिया जीत लेने के कारण यूरोप के साथ भारत का व्यापारिक मार्ग अवरुद्ध हो गया।  अब यूरोप के लोगों को पूर्व का माल मिलना दुर्लभ हो गया ।  पूर्व के मसाले और कपड़ा यूरोप के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र थे . अतः यूरोपीय व्यापारियों ने भारत के साथ व्यापार करने के लिए नवीन जल मार्ग की खोज करने का निश्चय किया।  इस प्रकार तुर्क सता के अभ्युदय ने यूरोपीयों को एक महान साहसिक कार्य करने की प्रेरणा दी ।
  • डाक्टर ईश्वरी प्रसाद के अनुसार तुर्क साम्राज्य के उत्थान के साथ 15 वीं शताब्दी में व्यापारिक मार्गों पर तुर्कों का अधिकार हो गया ।  पूर्वी व्यापार अवरुद्ध हो गया . प्राचीन मार्गों के बंद हो जाने से नए मार्गों की खोज को भारी महता प्राप्त हुई 14 वीं तथा 15 वीं शताब्दी में यूरोप के पुनर्जागरण ने वाणिज्यवाद या समुद्री व्यापार को प्रोत्साहित किया।  इस समय के आविष्कारों, मुख्यरूप से दिग्दर्शक यंत्र की सहायता से इटली, स्पेन तथा पुर्तगाल के व्यापारियों ने नए समुद्री मार्गों की खोज की, जिससे भारत तथा एशिया से सीधा सम्पर्क तथा व्यापार संभव हो सका। 

 

पुर्तगाली व्यापारियों का भारत में आगमन

 

  • इस समय भारत के यूरोपियन देशों से व्यापार के तीन मार्ग थे | पहला मार्ग भारत से आक्सस, कैस्पियन एवं काला सागर होते हुये यूरोप तक था दूसरा मार्ग सीरिया होते हुये भूमध्य सागर तक था तीसरा मार्ग समुद्री था, जो भारत से मिश्र तथा मिश्र की नील नदी से यूरोप तक था भारत का माल पहले वेनिस एवं जेनेवा नगर में जाता था एवं वहाँ से विभिन्य यूरोपीय देशों में जाता था, जिससे ये नगर समृद्ध हो गए
  • इटली के नगरों की समृद्धि से प्रलोभित होकर पुर्तगाली भी भारत से व्यापार करना चाहते थे | इस समय तीनों मार्गों पर तुर्कों का कब्जा था, अतः भारत से व्यापार करने के लिए नए मार्गों की खोज की आवश्यकता हुई इस नए मार्ग की खोज की आवश्यकता की पूर्ति हेतु प्रिंस हैनरी दी नेवी ग्रेटर ने महत्वपूर्ण पहल की उससे व्यापारियों को बाहर भेजने के लिए समुद्री जहाजरानी प्रशिक्षण स्कूल खोले कुछ पर्यटक मुख्यरूप से मा पोलो भारत तथा चीन की यात्रा कर चुके थे, तथा उन्होने वहाँ के विषय में जानकारी अपने भ्रमण वृतांत में लिख दी थी
  • हेनरी की मृत्यु के बाद बारथेलोम्यू डियाज़ ने मार्गों के खोज कार्यों को प्रोत्साहन दिया तथा 1488 ई० में अफ्रीकी महाद्वीप के दक्षिणी किनारे केप ऑफ गुड होप तक पहुँच गया | वहाँ से वास्कोडिगामा 1497 ई. में मालिन्दी तक तथा 1498 ई. में एक अरब व्यापारी की सहायता से कालीकट तक पहुंचा . जब उससे, उसके आने का उद्धेश्य पूछा गया तो उसने उत्तर दिया कि वह भारत में इसाई धर्म के प्रचार तथा गर्म मसालों के व्यापार के लिए आया है | इस प्रकार 1498 में, इस नए समुद्री मार्ग की खोज का श्रेय वास्कोडिगामा को जाता है यूरोप से भारत की जलमार्ग की खोज एक युगांतकारी घटना सिद्ध हुई । 
  • ईश्वरी प्रसाद के अनुसार  गामा की इस खोज ने भारत और यूरोप के पारस्परिक इतिहास के संबंध में एक नए अध्याय का सूत्रपात किया, उसके फलस्वरूप यूरोप के लोग भारतीय इतिहास के की अन्य रंगमंच पर पहले व्यापारियों के रूप में और फिर बस्तियों के बनाने वालों के रूप में उतर आए। 
  • इस समुद्री मार्ग की खोज के संबंध में सर ई. डी. राँझ कहते हैं, "संभवतः मध्य युग किसी भी घटना का सभ्य संसार पर इतना गहरा प्रभाव नहीं पड़ा, जितना की भारत जाने के समुद्र मार्ग खुलने का जब वास्कोडिगामा कालीकट पहुंचा तो वहाँ के राजा जो जमोरिन कहलाते थे, ने उसका स्वागत किया लेकिन पुर्तगालियों को अरब व्यापारियों के विरोध का सामना करना पड़ा। 
  • इसका कारण यह था कि भारत और यूरोप के बीच के व्यापार पर प्रमुख रूप से अरब व्यापारियों का नियंत्रण था | इस नए मार्ग के खुलने तथा पुर्तगाली व्यापारियों के भारत आगमन को अरब व्यापारियों ने अपने आर्थिक हितों के खतरे के रूप में देखा भारत में कुछ समय रुकने के बाद वास्कोडिगामा पुर्तगाल लौट गए जब वह वापस लौटा तो अपने साथ कुल यात्रा व्यय का 60 गुना अधिक माल पुर्तगाल ले गया वास्कोडिगामा की इस सफलता से उत्साहित होकर पुर्तगाल ने कैब्राल को 13 जहाजों के एक अन्य बेड़े के साथ अगले ही वर्ष भारत भेजा कैब्राल 1500 ई. में कालीकट पहुंचा । 

  • कूटनीति में कैब्राल, वास्कोडिगामा कि बराबरी न कर सका और शीघ्र ही कालीकट के हिन्दू शासक जमोरिन के साथ उसका मनमुटाव हो गया . कैब्राल और जमोरिन के बीच तनाव का एक कारण अरब व्यापारियों द्वारा जमोरिन को कैब्राल के विरुद्ध भड़काना भी था इसके फलस्वरूप कैब्राल को कालीकट छोड़कर कोचीन जाना पड़ा ।  यधपि कैब्राल को पूरी तरह सफलता प्राप्त नहीं हुई और उसे वापस जाना पड़ा फिर भी हम कह सकते हैं कि उसकी यह यात्रा पूरी तरह असफल भी नहीं रही | वह जब अपने देश वापस गया तो अपने साथ भारतीय माल लदे पाँच जहाज भी वापस ले गया, जिससे उसकी से इस यात्रा का खर्च पूरा हो जाता है |
  • इस आंशिक असफलता के कारण कैब्राल के स्थान पर वास्कोडिगामा को एक बार फिर भारत भेजा गया 1502 में जब वह भारत आया तब तक पुर्तगालियों ने यह महसूस कर लिया था कि भारतीय व्यापार में उनका हित तभी सुरक्षित हो सकता है जब अरब व्यापारियों को भारतीय व्यापार से निकाला जाए। 
  •  पुर्तगालियों ने यह सोचा कि कालीकट और कोचीन के हिन्दू शासकों का मुस्लिम शासकों तथा अरब व्यापारियों से अच्छा संबंध नहीं है। लेकिन वास्कोडिगामा अरब व्यापारियों के विरुद्ध कालीकट के शासक से, अपने पक्ष में समर्थन पाने में सफल नहीं हुआ बल्कि ठीक इसका उल्टा हुआ और अरबों के भड़काने पर कालीकट के शासक ने पुर्तगालियों पर आक्रमण कर दिया | इस युद्ध में पुर्तगालियों की जीत हुई।
  • अतः पुर्तगालियों का आधिपत्य स्थापित हुआ जिसके फलस्वरूप पुर्तगालियों ने, कालीकट, कोचीन, तथा केन्नोर में अपना व्यापारिक केंद्र स्थापित किये | इस प्रकार भारत पर यूरोपीय अधिपत्य की राजनीति की शुरुआत हो जाती है |

 अल्मीडा वाइसराय नियुक्त 

  • 1504 में पुर्तगाल से अल्मीडा को विधिवत रूप में वाइसराय नियुक्त करके भेजा गया | इसने यह निश्चय किया कि जब तक पुर्तगाल के पास अपने किलों को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त शक्ति एवं सेना मौजूद न हो तब तक वह अपने क्षेत्रों का विस्तार नहीं करेगा वह अपनी फैक्ट्रियों की स्थापना तटवर्तीय क्षेत्रों में ही करना चाहता था ताकि वह पुर्तगाली नौसेना के बल पर सुरक्षित रह सके।
  • उसने कहा था, "यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि जब तक समुद्र पर तुम्हारा प्रभाव है, तब तक तुम भारत पर अपना प्रभाव बनाए रखोगे और यदि तुम्हारे पास वह शक्ति नहीं है, तब समुद्र के एक-दो दुर्ग अधिक महत्वशाली नहीं हो सकते |

अल्फान्सो डी अलबुकर्क (1509-1555)

  • अल्मीडा ने भारत में पुर्तगाली राज्य स्थापित करने कि दिशा में विशेष योगदान दिया परन्तु भारत में पुर्तगाल के व्यापार को आगे बढ़ाने तथा स्थायी रूप से फैक्ट्रियों को स्थापित करने का श्रेय अल्फान्सो डी अलबुकर्क (1509-1555) को प्राप्त हुआ। 
  • अलबुकर्क एक महान प्रशासक था | उसका मानना था कि पुर्तगाली व्यापारिक तभी सुरक्षित हो सकता है जब भारत में पुर्तगाली सन्त की प्रत्यक्ष स्थापना तथा विस्तार हो |
  • स्टेफन के अनुसार अलबूकर्क के दिमाग में चार उद्धेश्य थे प्रथम, व्यापार के उद्देश्य के लिए वह कुछ क्षेत्रों पर कब्जा करना तथा उनपर प्रत्यक्ष नियंत्रण चाहता था दूसरा, पुर्तगाली तथा स्थायी मूल की महिलाओं के बीच विवाह के माध्यम से वह कुछ जिलों को अपना उपनिवेश बनाना चाहता था | तीसरा, अगर प्रथम दोनों तरीकों से सफलता न मिले तो किले का निर्माण किया जाए| चौथा, अगर ऊपर के तीनों उपाय संभव न हो तो, स्थानी व्यापारियों को पुर्तगाली राजा को उपहार भेंट करने के लिए विवश किया जाए।उपर्युक्त चारों सिद्धांतों के माध्यम से अलबुकर्क ने भारत पुर्तगाली राज्य की स्थापना का प्रयत्न किया में |
  • 1510 में उसने बीजापुर युसूफ आदिलशाह से गोवा जीत लिया| 1511 में पूर्वी एशिया में मलक्का पर अधिकार कर लिया | 1512 में बीजापुर राज्य से बानासेरिय का किला जीता | 1515 ई. में फारस की खाड़ी में व्यापारिक अड्डे आर्मुज पर अधिकार कर लिया
  • अफ्रीका में सोक्रोवा तथा लंका में कोलम्बो पर भी अधिकार किया गुजरात के दियु पर पुर्तगालियों का अधिकार हो गया अलबुकर्क गोवा को अपनी राजधानी बनाया तथा वहाँ वाणिज्यिक गतिविधियों को तेज किया
  • इस प्रकार अलबुकर्क भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक बन गया
  • अलबुकर्क एक दूरदर्शी व्यक्ति था| उसने नौसेना की शक्ति विस्तार के स्थान पर क्षेत्रों पर अधिकार करना उचित समझा| रोस के अनुसार अलबुकर्क ने यह महसूस किया कि पूर्वी व्यापार के मुख्यतः तीन केंद्र है, मलक्का, आर्मूज और ऐडेन प्रथम दो पर तो उसने प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया और तीसरे को भी अपने लगभग अपने नियंत्रण में रखने में कामयाब रहा| उसने कई नौसैनिक अड्डों की स्थापना की जिसकी सहायता से पुर्तगालियों का न केवल समुद्री व्यापार पर अधिकार हुआ बल्कि अन्य देशों के जहाज़ी बेड़ों को भी पुर्तगाली दया पर निर्भर रहना पड़ा अल्बूर्क के उत्तराधिकारीयों ने समुद्र के किनारे कई बस्तियों की स्थापना की, जैसे, दमन, दियू, बेसिन, चौल, सेन टौम तथा हुगली इत्यादि


यद्धपि आने वाले समय में गोवा, दमन एवं दियू को छोड़कर अधिकतर बस्तियाँ उनके अधिकार में नहीं रहीं ये तीनों क्षेत्र 1961 तक पुर्तगालियों के ही नियंत्रण में रहीं इस प्रकार पुर्तगालियों ने भारत में भीतरी क्षेत्रों पर अधिकार करने की कोशिश नहीं की और तटवर्तीय क्षेत्रों तक ही अपनी गतिविधियों को सीमित रखा । 

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