बलबन के बारे में जानकारी | सुल्तान बलबन | Balban GK in Hindi

बलबन के बारे में जानकारी 

सुल्तान बलबन

बलबन के बारे में जानकारी | सुल्तान बलबन | Balban GK in Hindi


दिल्ली सल्तनत वन लाइनर आउटलाइन  

बलबन का राज्यारोहण

 

  • बलबन तुर्काने चहलगानी का सदस्य था। रज़िया के पतन में उसकी भी भूमिका थी। 
  • सुल्तान अलाउद्दीन मसूद शाह के शासनकाल में मंगोलों के आक्रमणों को विफल कर उसने अपनी शक्ति में वृद्धि की। 
  • बलबन सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद का वज़ीर बना और उसके लगभग दो दशकों के शासनकाल में उसी की प्रधान भूमिका रही । 
  • बलबन ने स्वयं अपना विवाह इल्तुतमिश की विधवा से तथा अपनी बेटी का विवाह सुल्तान के साथ कर अपना राजनीतिक कद और ऊँचा कर लिया। 
  • वज़ीर के रूप में दोआब में हिन्दू प्रतिरोध को कुचलनेमंगोल आक्रमणों का सफलतापूर्वक मुकाबला करने के अतिरिक्त बलबन ने बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँमुल्तानउच के सूबेदार किश्लू खाँ तथा अवध के सूबेदार कुतलुग खाँ के विद्रोहों को भी विफल करने में सफलता प्राप्त की। 
  • सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु में बलबन का हाथ होना प्रमाणित नहीं हो सका है किन्तु यह निश्चित है कि अवसरवादी बलबन ने उसकी मृत्यु के बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर स्वयं को सुल्तान के रूप में प्रतिष्ठित कर लिया।

 

बलबन की रक्त एवं लौह की नीति

 

  • प्रशा के कूटनीतिज्ञ बिस्मार्क से लगभग छह सौ साल पहले सुल्तान बलबन ने रक्त एवं लौह की नीति अपना कर अराजकताकुशासनसैनिक दुर्बलताराजनीतिक षडयन्त्र व नैतिक पतन पर अंकुश लगाने में सफलता प्राप्त की थी। 
  • बलबन स्वयं प्रभावशाली तुर्काने चहलगानी का एक सदस्य था। वह अमीरों की महत्वाकांक्षा व उनकी षडयन्त्रकारी प्रवृत्तियों से भलीभांति अवगत था। तुर्काने चहलगानी का दमन करना उसके लिए पहली चुनौती था। 
  • उसने अमीरों की गतिविधियों पर तीखी नज़र रखने के लिए अपने गुप्तचर विभाग को अत्यन्त सक्षम बनाया। 
  • केन्द्रप्रान्तजिलों और नगरों के गुप्तचरों को अपने आसपास घटित सभी गतिविधियों की दैनिक जानकारी सुल्तान तक पहुंचानी होती थी और ऐसा न कर पाने पर उन्हें कठोर से कठोर दण्ड का भागी होना पड़ता था। 
  • अमीरों का मान मर्दन करने का उसने हर सम्भव उपाय अपनाया। अपने कर्तव्यों के प्रति असावधान रहने के कारण बदायूं के सूबेदार मलिक बकबक को पिटवा-पिटवा कर मार डाला और अवध के सूबेदार हैबात खाँ के कोड़े लगवाए। 
  • बंगाल में विद्रोहियों से पराजित होकर लौटे हुए एक अमीर को उसने नगर के फाटक पर लटकवा दिया। उसने अपने चचेरे भाई शेर खाँ की योग्यता से सशंकित होकर उसे विष देकर मरवा डाला। बंगाल के विद्रोही सूबेदार तुगरिल को पराजित कर उसने उसे उसके हज़ारों समर्थकों सहित सार्वजनिक स्थान पर प्राण दण्ड दिया। 
  • सुल्तान बनने पर बलबन को विरासत में एक असंगठित सेना मिली थी। राज्य की सैन्य शक्ति मुख्यतः अमीरों की सैनिक टुकड़ियों की अनुकम्पा पर आश्रित थी। 
  • बलबन ने एक केन्द्रीय सेना का संगठन किया। उसने सैनिकों के वेतन के लिए इक्ता प्रणाली को समाप्त कर उनके नकद वेतन की व्यवस्था की। सैनिकों की भर्ती का आधार उनकी शारीरिक क्षमता व सैन्य कौशल रखा गया।
  • केन्द्रीय सत्ता के शिथिल होने के कारण अराजकतावादी तत्वों का दुःसाहस बढ़ता जा रहा  था। दिल्ली नगर को मेवाती लुटेरे दिन-दहाड़े लूटते रहते थे। दिल्ली के असपास के जंगल उनके छिपने का ठिकाना बने हुए थे। 
  • बलबन ने दिल्ली के आसपास के जंगलों को साफ़ करवायादिल्ली की सुरक्षा के लिए उसके दक्षिण में एक दुर्ग का निर्माण करवा कर उसमें अपनी पुनर्संगठित सेना को रखा। मेवातियों के उन्मूलन के लिए निरन्तर अभियान कर लगभग एक लाख मेवातियों को मार दिया गया। दोआबकटेहर तथा पंजाब प्रान्त के नमक में विद्रोहियों को उसने निर्ममतापूर्वक कुचल कर वहां शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित की। 
  • 12 वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के अस्तित्व के लिए मंगोल आक्रमण एक बड़ा संकट बने हुए थे। बलबन ने इस समस्या के निराकरण के लिए ठोस उपाय के रूप में जहां एक शक्तिशाली सेना का संगठन किया वहीं दूसरी ओर राज्य की सुरक्षा के लिए सल्तनत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर दुर्गों की श्रृंखला का निर्माण करवाया। 
  • शेर खाँ जैसे योग्य सेनानायक को मंगोलों का सामना करने के लिए राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर नियुक्त किया गया ।
  • सन् 1270 में उसकी मृत्यु के बाद उसने यह दायित्व क्रमशः अपने पुत्रों बुगरा खाँ व मुहम्मद को सौंपा। 
  • सन् 1286 में मुहम्मद मंगोलों से लड़ता हुआ मारा गया। मंगोलों से अपने राज्य को सुरक्षित रखने में बलबन आमतौर पर सफल रहा।

 

जहांदारी प्रथा क्या है 

 

  • बलबन ने अपने साम्राज्य को स्थायित्व देने के लिए यह आवश्यक समझा कि नवीन विजय-अभियानों की नीति (जहांगीरी) का परित्याग कर केवल उसको सुरक्षित एवं सुसंगठित रखने की नीति (जहांदारी) को महत्व दिया जाए। 

  • इस नीति के अन्तर्गत विद्रोहों के दमनसीमा सुरक्षा के समुचित प्रबन्धराज्य में शान्ति एवं व्यवस्था को कायम रखने को विजय -अभियानों पर वरीयता दी गई।

 

बलबन का राजत्व का दैविक सिद्धान्त

 

  • बलबन का राजत्व का सिद्धान्त प्रत्यक्षतः निरंकुश, स्वेच्छाचारी शासन का समर्थक दिखाई देता है परन्तु वास्तव में यह अनेक उपयोगी नियमों, नैतिक व धार्मिक आदर्शों से बंधा हुआ था।
  • बलबन ने सुल्तान के पद की खोई हुई प्रतिष्ठा फिर से स्थापित करने और जनता व आभिजात्य वर्ग में सुल्तान के प्रति श्रद्धा तथा भय का भाव फिर से संचारित करने के लिए राजत्व के दैविक सिद्धान्त का पोषण किया। 
  • इस्लाम के इतिहास से यह विदित होता है किं खलीफ़ा का चयन किया जाता था और खलीफ़ा के अधिकारों का उसके कर्तव्यों से अटूट सम्बन्ध था किन्तु राजत्व के दैविक सिद्धान्त के अन्तर्गत शासक पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है और उसके आदेश में ईश्वर का आदेश प्रतिध्वनित होता है। 
  • राज्य में शासक का कोई समकक्ष नहीं हो सकता और न ही शासक के रूप में उसका कोई सम्बन्धी हो सकता है। शासक के सगे रक्त सम्बन्धियों के लिए भी उसके प्रति श्रद्धा और स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करना, उनका कर्तव्य होता है। इस परिकल्पना को व्यवहार में लाने के लिए उसने वैभवशाली एवं गरिमापूर्ण दरबार लगाया। 
  • शासक के लिए आम इंसान की तरह हँसना या रोना निषिद्ध हो गया। बलबन ने दरबार में अपने पुत्र महमूद की मृत्यु का समाचार सुनकर भी रोना उचित नहीं समझा। 
  • आभिजात्य वर्ग, उलेमा तथा विद्वानों के अतिरिक्त उसने आम आदमियों से मिलना-जुलना बिलकुल बन्द कर दिया। बलबन ने स्वयं को पौराणिक अफरीसियाबों का वंशज घोषित किया।
  • यह सिद्धान्त इस्लाम की मूल अवधारणाओं के विरुद्ध था किन्तु तत्कालीन विषम परिस्थितियों को देखते हुए इसका अपनाया जाना अनुचित नहीं था। बलबन के राजत्व के सिद्धान्त को हम पूर्ववर्ती कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा परवर्ती मैकियावेली के दि प्रिंस में उल्लिखित राजत्व के सिद्धान्त के समकक्ष रख सकते हैं।

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