मगध राज्य का उत्कर्ष | मगध का उदय | बिम्बिसार (544 492 ई०पू०)

 मगध राज्य का उत्कर्ष 

 Magadh Rajya Ka Uday

Magadh Rajya Ka Uday

 मगध राज्य के उत्कर्ष के अध्ययन को सुविधा की दृष्टि से छह भागों में बांटा गया है

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मगध का प्राचीन इतिहास

 

  • हर्यक वंश के पहले मगध का इतिहास बहुत स्पष्ट नहीं है मगध का उल्लेख पहली बार अथर्ववेद में मिलता है। 
  • ऋग्वेद में यद्यपि मगध का उल्लेख नहीं मिलता तथापि कोकट (किराट) नामक जाति और इसके शासक प्रेमचन्द्र का उल्लेख मिलता है । इसकी पहचान मगध से की जाती है। 
  • मगध और व्रात्यों का उल्लेख वैदिक साहित्य में उपेक्षा और अवहेलना की दृष्टि से किया गया है। अथर्व संहिता के व्रात्य भाग में ब्राह्मण सीमा के बाहर रहने वाले व्रात्य को पुंश्चली या वेश्या और मगध से सम्बन्ध कहा गया है। 
  • वेदों में मगध के ब्राह्मणों को निम्न श्रेणी का माना गया है क्योंकि उनके संस्कार ब्राह्मण विधियों के अनुसार नहीं हुए थे, वैदिक साहित्य से मगध की इतिहास की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती। इसमें प्रमगन्द के अतिरिक्त मगध के अन्य किसी शासक का उल्लेख नहीं हुआ है। मगध के प्राचीन इतिहास की रूपरेखा महाभारत तथा पुराणों में मिलती है। 
  • इन ग्रन्थों के मुताबिक मगध के सबसे प्राचीन राजवंश का संस्थापक बृहद्रथ था। वह जरासंध का पिता एवं वसु वैश्य-उपरिचर का पुत्र था। 
  • मगध की आरम्भिक राजधानी वसुमती या गिरिव्रज की स्थापना का श्रेय वसु को ही दिया जाता था।
  • वृहद्रथ का पुत्र जरासंध एक पराक्रमी शासक था, जिसने अनेक राजाओं को पराजित किया। अन्ततोगत्वा उसे श्रीकृष्ण के हाथो पराजित होकर मरना पड़ा।


मगध का स्वतंत्र वातावरण

 

  • मगध का वातावरण अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्र था। चूंकि इसे अनार्यों का देश माना जाता था। इसलिए यहां ब्रह्मण व्यवस्था का कट्टरपन नहीं था। 
  • अनार्य तत्वों की बहुलता के कारण आर्यों का प्रभाव यहां कम था । 
  • यहां के लोगों में प्रसार की प्रवृत्ति और उत्साह उन राज्यों की अपेक्षा अधिक थी। जो बहुत दिनों से आर्यो के प्रभाव में थे इन बदलती हुई आर्थिक परिस्थितियों का एक परिणाम विभिन्न प्रादेशिक और लोकप्रिय भाषाओं का विकास भी था। 
  • संस्कृति उस समय तक श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों और पुरोहितों की भाषा बनकर रह गयी थी। इस कारण जन भाषाओं की आवश्यकता थी। इस कारण उस समय संस्कृत पर आधारित विभिन्न लोकप्रिय भाषाओं की उत्पत्ति हुई। 
  • संस्कृत का एक अधिक लोकप्रिय स्वरूप प्राकृत भाषा बनी। इसी कारण पाली और मगधी भाषा जिसमें महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश दिये, इस समय में विकसित और लोकप्रिय हुई। 
  • आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव भारतीयों के धार्मिक विचारों पर आया। 
  • नवीन व्यापारी औद्योगिक मजदूर वर्ग तथा उपजातियों के निर्माण ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को चुनौती देने वाली परिस्थितियों का निर्माण किया। 
  • नवीन जैन और बौद्ध धर्मों की उत्पत्ति और विकास का एक कारण बदलती हुई सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ थी।

 

मगध का प्रथम राजवंश-हर्यक या शिशुनाग वंश

 

  • मगध साम्राज्य पर शासन करने वाले प्रथम राजवंश के विषय में पुराणों तथा बौद्ध ग्रन्थो में अलग-अलग विवरण मिलता है। 
  • पुराणों के अनुसार मगध पर सर्वप्रथम बृहद्रथ वंश का शासन था। इसी वंश का राजा जरासंध था जिसने गिरिव्रज को अपनी राजधानी बनाई थी। 
  • उसके बाद वहां प्रद्योत वंश का शासन स्थापित हुआ प्रद्योत वंश का अन्त करके शिशुनाग ने अपने वंश की स्थापना की। 
  • शिशुनाग वंश के बाद नन्द वंश ने शासन किया।

 

मगध साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक राजा बिम्बिसार (544 492 ई०पू०)

 

  • मगध साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा बिम्बिसार(544 492 ई०पू०) था। वह हर्यक कुल से सम्बन्धित था। 
  • हर्यक कुल के लोग नागवंश की एक उपशाखा थे। 
  • डी0आर0भण्डारकर का विचार है कि बिम्बिसार प्रारम्भ में लिच्छवियों का सेनापति था जो उस समय मगध में शासन करते थे। सुत्तनिपात में वैशाली को मगध पुरम कहा गया है । कालान्तर में वह मगध का स्वतंत्र शासक बन बैठा। 
  • परन्तु बौद्ध ग्रन्थो के अनुसार बिम्बिसार जब 15 वर्ष का था तभी उसके पिता ने उसे मगध का राजा बनाया था दीपवंश में बिम्बिसार के पिता का नाम बोधिस मिलता है। जो राजगृह का शासक था। 
  • मत्स्य पुराण में बिम्बिसार नाम क्षेत्रोजस दिया गया है। यह इस बात का सूचक है कि बिम्बिसार का पिता स्वयं राजा था। ऐसी स्थिति में उसका लिच्छवियों का सेनापति होने का प्रश्न ही नहीं उठता । 
  • जैन साहित्य में उसे श्रेविक कहा गया है। सम्भवतः यह उसका उपनाम था । जिस प्रकार अजातशत्रु का उपनाम कुणिक था । 
  • बिम्बिसार एक महत्वकांक्षी शासक था। गद्दी पर बैठते ही उसने विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया। वह एक कूटनीतिज्ञ एवं दूरदर्शी सम्राट था । 
  • सर्वप्रथम उसने अपने समय के प्रमुख राजवंशो में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपनी स्थिति सुदृढ़ किया। इन वैवाहिक सम्बन्धों का तत्कालीन राजनीति में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। 

बिम्बिसार द्वारा स्थापित वैवाहिक सम्बन्ध 
  • पहले उसने लिच्छवि गणराज्य के शासक चेटक की पुत्री चेलना (छलना) के साथ विवाह कर मगध की उत्तरी सीमा को सुरक्षित किया। 
  • वैशाली व्यापार का प्रसिद्ध केन्द्र भी था। इसकी दक्षिणी सीमा से होकर गंगा नदी बहती थी और उसके जरिये यह कुछ सीमा तक पूर्वी भारत के जलीय व्यापार को नियन्त्रित किये हुए था। इस वैवाहिक सम्बन्ध ने परोक्ष रूप से मगध के आर्थिक विकास में भी योगदान दिया। 
  • विनयपिटक के अनुसार लिच्छवि लोग रात को मगध की राजधानी पर उत्तर की ओर से आक्रमण करके लूट-पाट करते थे। इस वैवाहिक सम्बन्ध से वे शान्त हो गये

  • दूसरा प्रमुख वैवाहिक सम्बन्ध कोशल राज्य में स्थापित हुआ। उसने कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला के साथ विवाह किया इस विवाह के फलस्वरूप उसका न केवल कोशलनरेश के साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित हुआ। अपितु दहेज में उसे एक लाख की वार्षिक आय का काशी का प्रान्त एवं उसके कुछ भाग भी प्राप्त हुए। सम्बन्ध में उसने मद्र देश (कुरन के समीप) वत्स की ओर से भी मगध को सुरक्षित बना दिया। क्योंकि कोशल तथा वत्स परस्पर मिले हुए थे। 

  • इसके बाद उसने मद्र देश की राजकुमारी क्षेमा के साथ अपना विवाह कर मद्रों का सहयोग तथा समर्थन प्राप्त कर लिया। सम्भव है कुछ अन्य राजवंशों के साथ भी उसने वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया हो क्योंकि महावंश में उनकी 500 रानियों का उल्लेख हुआ है।

 

बिम्बिसार के मैत्री सम्बन्ध 

  • अवन्ति के शक्तिशाली राजा प्रद्योत के साथ भी उसने मैत्री संबंध स्थापित किया एक बार जब वह पाण्डु रोग से ग्रसित था तो बिम्बिसार ने अपने राजवैध जीवक को उसके इलाज के लिए भेजा। 
  • रोरूक (सिंध) के शासक रूद्रायन तथा गान्धार के पुक्कुसाति भी उसके मित्र थे। 
  • गन्धार नरेश ने उनके पास एक दूत भेजा था। 


इस प्रकार उसके कूटनीतिज्ञ तथा वैवाहिक सम्बन्धों ने उसके द्वारा प्रारम्भ की गयी आक्रमण नीति में पर्याप्त सहायता प्रदान किया होगा। 


बिम्बिसार का विजय अभियान 

  • विवाहों तथा मैत्री सम्बन्धों द्वारा अपनी आन्तरिक स्थिति मजबूत कर लेने के बाद उसने अपना विजय कार्य प्रारम्भ किया। 
  • इस विजय की प्रक्रिया में उसने अपने पड़ोसी राज्य अंग को जीतकर मगध साम्राज्य में मिला लिया। बिम्बिसार के पहले से ही मगध तथा अंग के बीच शत्रुता चल रही थी। 
  • ज्ञात होता है कि एक बार अंग के शासक ब्रह्मदत्त ने बिम्बिसार के पिता को युद्ध में पराजित किया था। 
  • विधुर पण्डित जातक से पता चलता है कि मगध की राजधानी राजगृह पर अंग का अधिकार था। अतः बिम्बिसार जैसे महत्वाकांक्षी शासक के लिए अंग की विजय करना अनिवार्य था।
  • उसने अंग के ऊपर आक्रमण किया। वहाँ का राजा ब्रह्मदत्त मारा गया तथा वहीं बिम्बिसार ने अपने पुत्र अजातशत्रु को उपराजा के पद पर नियुक्त किया इस विजय से मगध के विजय तथा विस्तार का दौर प्रारम्भ हुआ। जो अशोक द्वारा कलिंग विजय के बाद तलवार रख देने के बाद समाप्त हुआ । 
  • अंग के मगध में मिल जाने पर मगध की सीमा अत्यधिक विस्तृत हो गई और वह पूर्वी भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य बन किया। 
  • मगध का लगभग सम्पूर्ण बिहार पर अधिकार हो गया।
  • बुद्धघोस के अनुसार बिम्बिसार के साम्राज्य में 80 हजार गांव थे तथा उसका विस्तार लगभग 900 मील था। 
  • बिम्बिसार ने पहली बार मगध में व्यवस्थित शासन की नींव डाली। उसने सड़कों और नहरों का निर्माण कराया विभिन्न पदाधिकारियों की नियुक्ति की और नियमित रूप से लगान वसूल करने की व्यवस्था की जो उसकी आर्थिक और सैनिक शक्ति का आधार बना। बिम्बिसार के राज्य में 80,000 गांव बताये गये हैं और सभी सम्पन्न थे।

 बिम्बिसार एक महान शासक के रूप में 
  • बिम्बिसार एक महान एवं योग्य शासक था । गांव का शासन ग्राम सभाए करती थी। उसने अपने साम्राज्य में एक संगठित एवं सुदृढ़ शासन व्यवस्था की नींव डाली। 
  • मगध शीघ्र ही एक समृद्धिशाली राज्य बन गया बिम्बिसार शासन की विविध समस्याओं में व्यक्तिगत रूचि लेता था। महावंश जातक में कहा गया है कि उसकी राज्यसभा में 80 हजार ग्रामों के प्रतिनिधि भाग लेते थे। 
  • बौद्ध साहित्य में उसके कुछ पदाधिकारियों के नाम इस प्रकार मिलते हैं । सब्बतथक महामात्तबोहारिक महामात्त, सेनानायक महामात्त। इसके प्रथम सामान्य प्रशासन का दूसरा न्यायिक अधिकारी तथा तीसरा सेना का प्रधान अधिकारी होता था। 
  • प्रान्तों में राजकुमार वाइसराय अर्थात उपराजा के पद पर नियुक्त किये जाते थे। 
  • बिम्बिसार ने अपने पुत्र अजातशत्रु को चम्पा का उपराजा बनाया था। 
  • वह अपने उत्तराधिकारियों तथा कर्मचारियों को उनके गुण-दोषों के आधार पर पुरस्कृत अथवा दण्डित किया करता था। 
  • वह एक निर्माता भी था और परम्परा के अनुसार उसने राजगृह नामक नवीन नगर की स्थापना करवाई थी। 
  • बिम्बिसार महात्मा बुद्ध का मित्र एवं संरक्षक था विनय पिटक से ज्ञात होता है कि बुद्ध से मिलने के बाद उसे बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया तथा वेलुवन नामक उद्यान बुद्ध तथा संघ के मिमित्त प्रदान कर दिया। किन्तु वह जैन तथा ब्राह्मण धर्मो के प्रति भी सहिष्णु बना रहा । 
  • जैन ग्रन्थ भी उसे अपने मत का पोषक मानते हैं दीर्घनिकाय से पता चलता है कि बिम्बिसार ने चम्पा के प्रसिद्ध ब्राह्मण सोनदण्ड को वहां की सम्पूर्ण आमदनी दान में दे दी थी।

 

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