राज्यसभा शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार | संसद की समिति

 

राज्यसभा  शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार

राज्यसभा शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार 

अनुच्छेद-249 

  • संविधान के अनुच्छेद-249 के तहत राज्यसभा यदि उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम 2/3 सदस्यों द्वारा समर्थित संकल्प द्वारा घोषित करती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है तो संसद भारत के संपूर्ण भाग या उसके किसी भाग के लिये विधि बना सकती है। इस विधि की अवधि एक वर्ष की होती है।
  • राज्य सूची में वर्णित किसी विषय पर विधि बनाने के लिये संसद को अधिकृत कर सकती है। संविधान के अनुच्छेद-249 में इसका उपबंध है।
  • यदि राज्यसभा राष्ट्रीय हित में 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देती है तो संसद संविधान के अनुच्छेद-249 के तहत राज्य सूची के विषय में विधि बना सकती है।

अखिल भारतीय सेवा-अनुच्छेद-312

  • संविधान के अनुच्छेद-312 में इस संबंध में उपबंध किया गया है कि राज्यसभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम 2/3 सदस्यों द्वारा समर्पित संकल्प द्वारा यह घोषित करती है कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो संसद, संघ और राज्यों के लिये सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन कर सकती है।

यदि राष्ट्रीय आपात की घोषणा प्रवर्तन हो तो संसद संविधान के अनुच्छेद 250 के तहत विधि बना सकती है।

दो या दो से अधिक राज्यों के लिये उनकी सहमति से संसद राज्य सूची के विषय में संविधान के अनुच्छेद-252 के तहत विधि बना सकती है।

अंतर्राष्ट्रीय करारों/समझौतों को प्रभावी बनाने के लिये संसद संविधान के अनुच्छेद-253 के तहत कोई भी विधि बना सकती है।

राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू रहने की स्थिति में संसद संविधान के अनुच्छेद-357 के तहत राज्य सूची के विषय में विधि बना सकती है।

अनुच्छेद (3)

  • संविधान के अनुच्छेद (3) में उपबंध किया गया है कि भारत के किसी वर्तमान राज्य की सीमाओं में परिवर्तन करने से संबंधित कोई विधेयक संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही पुरः स्थापित किया जाएगा।
  • संविधान के अनुच्छेद (3) के तहत संसद नए राज्यों के निर्माण, वर्तमान राज्यों के क्षेत्र, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने के लिये सशक्त है।

लोकसभा और राज्यसभा की समान शक्तियाँ

  • संविधान में संशोधन करने के लिये संसद के दोनों सदनों की शक्ति समान है। दोनों सदनों द्वारा पारित होने पर ही संविधान संशोधन माना जाएगा, अन्यथा नहीं। इसलिये इसमें संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है। इसे भारत का राष्ट्रपति पुनर्विचार के लिये नहीं लौटा सकता है।
  • अखिल भारतीय सेवा (अनुच्छेद-312) और राष्ट्रीय हित में राज्य सूची पर विधि बनाने का राज्यसभा का विशेषाधिकार है (अनुच्छेद-249)
  • अनुदान की मांग पर कटौती प्रस्ताव केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है।

विशेषाधिकार 

  • संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संसद, उसके सदस्यों एवं उसकी समितियों को विशेषाधिकार प्राप्त है, जबकि राज्यों के विधानमंडलों, उसके सदस्यों और उसकी समितियों को संविधान के अनुच्छेद-194 के तहत विशेषधिकार प्राप्त है।
  • संसद सदस्य को संसद या उसकी समिति में कही गई किसी बात के लिये न्यायालय में दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।
  •  सदस्य द्वारा कही गई किसी बात के लिये कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। दूसरी ओर संविधान के अनुच्छेद-121 में उपबंध किया गया है कि संसद का कोई सदस्य संसद की  अन्दर सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन के लिये आचरण के विषय में चर्चा नहीं करेगा।

  • संसद के प्रत्येक सदस्य को सदन के अंदर बहस और कार्यवाही की स्वतंत्रता प्राप्त है और संसद के प्रत्येक सदन में जो कुछ कहा या किया जाता है, न्यायालय उसकी जाँच नहीं कर सकता है। संसद का प्रत्येक सदस्य सदन के भीतर उत्पन्न होने वाले मामलों पर न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना निर्णय ले सकती है।
  • संसद के प्रत्येक सदन को बहस एवं कार्यवाही को प्रकाशित करने का अधिकार तथा अन्य व्यक्तियों को प्रकाशन से रोकने का अधिकार है।
  • संसद का प्रत्येक सदन बाहरी व्यक्तियों को अपवर्जित कर सकता है। सदन को यह अधिकार है कि वह अपनी बैठक को गुप्त बना ले।

संसद के प्रत्येक सदन को सदस्यों एवं बाहरी व्यक्तियों को विशेषाधिकारों के उल्लंघन पर दण्डित करने की शक्ति है, जैसेः-

  • एच.सी. मुद्गल को वर्ष 1951 में लोकसभा से निष्कासित किया गया।
  • सुब्रह्मण्यम स्वामी को 1976 में राज्यसभा से निष्कासित किया गया। वे राज्यसभा की सदस्यता से निष्कासित होने वाले पहले सदस्य थे।
  • श्रीमति इन्दिरा गांधी को वर्ष 1970 में लोकसभा से निष्कासित किया गया।
  • सदन की अनुमति के बिना उसकी साठ लगातार बैठकों से अनुपस्थित रहने वाला प्रथम सांसद राज्यसभा से था। नवम्बर 2000 में पंजाब के निर्दलीय राज्यसभा सांसद बरजिंदर सिंह हमदर्द को सदन की अनुमति के बिना 60 लगातार बैठकों में अनुपस्थिति के कारण सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया गया।

क्षेत्रफल की दृष्टि से लोकसभा का सर्वाधिक बड़ा निर्वाचन क्षेत्र लद्दाख है, तथा सबसे छोटा निर्वाचन क्षेत्र चाँदनी चौक है।

लोक लेखा समिति में किसी भी मंत्री का निर्वाचन नहीं हो सकता है। प्रतिवर्ष संसद द्वारा अपने सदस्यों में से समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल संक्रमणीय मत के माध्यम से इसके सदस्यों का चुनाव किया जाता है।

लोक लेखा समिति

  • लोक लेखा समिति भारत शासन अधिनियम, 1919 के अंतर्गत वर्ष 1921 में पहली बार अस्तित्व में आई।
  • वर्तमान में लोक लेखा समिति की कुल सदस्य संख्या 22 है, जिसमें लोकसभा के 15 और राज्यसभा के 7 सदस्य हैं।
  • इस समिति का अध्यक्ष विपक्षी दल से चुना जाता है। यह परम्परा 1967 में विकसित हुई। लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा सदस्यों में से इसके अध्यक्ष की नियुक्ति करता है। राज्यसभा का सदस्य इस समिति का अध्यक्ष नहीं हो सकता।
  • इस समिति का कार्यकाल एक वर्ष का होता है।
  • यह संसद की स्थायी वित्तीय समिति है।
  • लोक लेखा समिति भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के वार्षिक प्रतिवेदनों की जाँच करती हैकिंतु राष्ट्रपति द्वारा संसद में रखवाने के पश्चात्न कि पूर्व।
  • यह समिति अपना प्रतिवेदन लोकसभा में या लोकसभा अध्यक्ष को सौंपती है न कि राष्ट्रपति को। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है और राष्ट्रपति उसकी रिपोर्ट को संसद में रखवाता है। संसद उस प्रतिवेदन को लोक लेखा समिति को सौंपती है।
  • इस समिति के द्वारा केंद्र सरकार के विनियोग तथा वित्त लेखाओं की जाँच के साथ-साथ लोकसभा में प्रस्तुत किसी अन्य लेखा की भी जाँच की जाती है


प्राक्कलन समिति

  • वर्तमान में इस समिति की कुल सदस्य संख्या 30 है। मूलतः इसमें 25 सदस्य थे, किंतु 1956 में इसकी सदस्य संख्या बढ़ाकर 30 कर दी गई, जिसमें केवल लोकसभा के सदस्य शामिल होते हैं। राज्यसभा के सदस्य इस समिति में शामिल नहीं किये जाते हैं।
  • इस समिति का अध्यक्ष हमेशा सत्ताधारी दल से चुना जाता है। लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा सदस्यों में से अध्यक्ष की नियुक्ति करता है।
  • कोई मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता है।
  • यह संसद की एक स्थायी वित्तीय समिति है, जिसका गठन पहली बार वर्ष 1950 में तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई की सिफारिश पर किया गया।
  • इस समिति का कार्यकाल एक वर्ष का होता है।
  • इसके सदस्यों का चुनाव प्रतिवर्ष लोकसभा द्वारा अपने सदस्यों में से समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जाता है।
  • प्राक्कलन समिति के प्रतिवेदन पर सदन में चर्चा नहीं होती। सरकार की अनुदान की मांगें इस समिति के प्रतिवेदन की प्रतीक्षा नहीं करती है। यह उपयोगी सुझाव देती है और आगामी वित्तीय वर्ष में सरकार को बढ़ी-चढ़ी मांग करने से रोकती है। यह समिति वर्ष भर कार्य करती है और अपने विचार सदन के समक्ष रखती है।
  • सरकार द्वारा प्रस्तावित व्यय की समीक्षा के लिये एक प्राक्कलन समिति गठित की जाती है। इसका गठन लोकसभा में बजट प्रस्तुत किये जाने के पश्चात् होता है।
  • यह समिति सुझाव देती है कि किस प्रकार मितव्ययिता की जा सकती है और संगठन में दक्षता लाने के लिये कौन से सुधार या प्रशासनिक सुधार किये जा सकते हैंजो अनुमानों से संबंधित नीति के संगत हों।
  • इस समिति को मितव्ययिता समिति भी कहते हैं।

सार्वजनिक उपक्रम समिति

  • सार्वजनिक उपक्रम समिति संसद की एक स्थायी वित्तीय समिति है, जिसका गठन प्रतिवर्ष संसद द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल संक्रमणीय मत के आधार पर किया जाता है।
  • कोई मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं बन सकता। इस समिति का अध्यक्ष लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लोकसभा सदस्यों में से नियुक्त किया जाता है।
  • इस समिति का गठन कृष्ण मेनन समिति की सिफारिश पर वर्ष 1964 में किया गया। प्रारंभ में इस समिति में 15 सदस्य थे, जिसमें 10 लोकसभा के और 5 राज्यसभा के थे। वर्ष 1974 में इस समिति की सदस्य संख्या बढ़ाकर 22 कर दी गई, जिसमें 15 सदस्य लोकसभा के और 7 सदस्य राज्यसभा के होते हैं।
  • इस समिति का कार्यकाल एक वर्ष का होता है।


विभागीय स्थायी समिति

  • संसद की प्रत्येक विभागीय स्थायी समिति में लोकसभा के सदस्य लोकसभा अध्यक्ष के द्वारा और राज्यसभा के सदस्य राज्यसभा के सभापति द्वारा चुने जाते हैं
  • लोकसभा की नियम समिति की अनुशंसाओं पर वर्ष 1993 में 17 विभागीय समितियों का गठन किया गया और वर्ष 2004 में इनकी संख्या बढ़ाकर 24 हो गई।कोई भी मंत्री विभागीय समितियों का सदस्य नहीं बन सकता। यदि कोई सदस्य मंत्री बन जाता है तो समिति से उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है।
  • इन समितियों का कार्यकाल एक वर्ष का होता है।
  • 8 समितियाँ राज्यसभा और 16 समितियाँ लोकसभा के अंतर्गत कार्य करती हैं।

लोक/सरकारी आश्वासन समिति 

  • लोक/सरकारी आश्वासन समिति जाँच एवं नियंत्रण के लिये संसद की स्थायी समिति है। यह समिति मंत्रियों द्वारा सदन में समय-समय पर दिये गए आश्वासनों, वचनों एवं प्रतिज्ञाओं की जाँच करती है और किस पर कितना क्रियान्वयन हुआ है, इस पर प्रतिवेदन देती है।

अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण समिति

  • अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कल्याण से संबंधित तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के प्रतिवेदनों पर विचार करने के लिये अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण समिति का गठन किया गया है। इसमें वर्तमान में 30 सदस्य हैं, 20 लोकसभा से तथा 10 राज्यसभा से। यह जाँच एवं नियंत्रण से संबंधित समिति है।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग के प्रतिवेदनों तथा केंद्र सरकार द्वारा महिलाओं की स्थिति, गरिमा तथा सभी क्षेत्रों में समानता के लिये क्या कदम उठाए गए हैं, की जाँच के लिये महिला सशक्तीकरण समिति का गठन वर्ष 1997 में किया गया। इसके 20 सदस्य लोकसभा से एवं 10 सदस्य राज्यसभा से चुने जाते हैं। यह एक जाँच एवं नियंत्रण से संबंधित समिति है।
  • विशेषाधिकार समिति एक जाँच समिति है। यह सदन एवं उसके सदस्यों के विशेषाधिकार हनन संबंधी मामलों की जाँच करती है और उपयुक्त कार्यवाही की अनुशंसा करती है।
  • एक अन्य जाँच समिति आचार समिति है। यह समिति संसद सदस्यों के लिये आचार संहिता लागू करवाती है।

परामर्शदात्री समिति

  • परामर्शदात्री समिति के सदस्यों को लोकसभा अध्यक्ष नामित नहीं करता, बल्कि संसदीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा विभिन्न मंत्रालयों में स्थापित समितियों, परिषदों, बोर्डों, आयोगों आदि में सदस्यों को मनोनीत किया जाता है।
  • इस समिति का अध्यक्ष उस मंत्रालय का मंत्री अथवा प्रभारी राज्य-मंत्री होता है न कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त होता है।
  • परामर्शदात्री समिति में संसद के सदस्य होते हुए भी संसदीय समिति नहीं है। क्योंकि यह समिति संसदीय समिति के नियमों का पालन नहीं करती है। इस समिति की अधिकतम सदस्य संख्या 30 एवं न्यूनतम संख्या 10 होती है। इस समिति की सदस्यता स्वैच्छिक होती है, इसे संसद सदस्यों एवं नेताओं की रुचि पर छोड़ दिया जाता है।
  • यह समिति संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा गठित की जाती है। संसदीय कार्य मंत्रालय संसदीय कार्य मंत्री के निर्देशन में कार्य करता है।

संसद की समिति के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य 

प्राक्कलन समितिः इसमें कुल 30 सदस्य होते हैंजो सभी लोकसभा के सदस्य होते हैं।

लोक लेखा समितिः इसमें कुल 22 सदस्य होते हैंजिसमें लोकसभा के 15 और राज्यसभा के 7 सदस्य होते हैं।

सरकारी उपक्रम समितिः इसमें कुल 22 सदस्य होते हैंजिसमें लोकसभा के 15 और राज्यसभा के 7 सदस्य होते हैं।

याचिका समितिः इसमें लोकसभा समिति में 15 तथा राज्यसभा समिति में 10 सदस्य होते हैं। यह एक जाँच समिति है। यह समिति विधेयकोंसार्वजनिक महत्त्व के मामलों पर दायर याचिकाओं एवं आवेदनों पर विचार करती है। इसे आवेदन समिति भी कहते हैं।

लोक लेखा समितिः यह एक वित्तीय समिति है। इसके अलावा दो अन्य वित्तीय समितियाँ हैं- प्राक्कलन (अनुमान समिति) एवं सरकारी उपक्रम समिति।

याचिका समितिः याचिका/आवेदन समिति एक जाँच/कार्यकारी समिति है। अन्य जाँच समितियाँ- विशेषाधिकार समिति एवं आचार समिति।

स्टॉक बाज़ार-स्कैम संयुक्त समितिः यह एक तदर्थ समिति है। तदर्थ समिति का गठन किसी विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिये किया जाता है और जब उन विशेष उद्देश्यों की पूर्ति हो जाती है तो समिति समाप्त हो जाती है।

विभागीय समितिः यह एक स्टैंडिंग समिति होती है।

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