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Soil of MP, MP Ki Mittiyan {मध्यप्रदेश की मिट्टियाँ}

मध्यप्रदेश की मिट्टियाँ
MP Ki Mitti

मध्यप्रदेश की मिट्टियाँ Soil Of MP

  • धरातल के ऊपरी परत जो पेड़-पौधों को उगने व बढ़ने के लिए जीवांश तथा खनिजांश प्रदान करती है, मिट्टी कहलाती है। मिट्टी चट्टान तथा जीवांश के मिश्रण से बनती है। डॉ. हम हेमंड बेनेट के अनुसार ‘ भूमि के तल पर पाई जाने वाली असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत जो मूल चट्टानों तथा वनस्पति अंश के योग से निर्मित हुई है, मिट्टी है।‘
  • वनस्पति और कृषि के स्वरूप को निर्धारित करने वाले कारकों में मिट्टी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। किसी प्रदेश में घास अथवा वन किस प्रकार के पाये जाते हैं, यह बहुत कुछ मिट्टी की प्रकृति पर निर्भर होता है। कृषि-भूमि उपयोग, फसलों का प्रादेशिक वितरण, उत्पाद की मात्रा उत्तमता एवं वनस्पिति की भिन्नता वहाँ पाई जाने वाली मिट्टियों की प्रकृति से निर्धारित होती है। किसी स्थान विशेष की प्रकृति कैसी है इसके लिए निम्नलिखित पक्षों का अध्ययन जरूरी होता है-


  1. विभिन्न खनिजों की मात्रा
  2. गठन
  3. संरचना
  4. रंग
  5. जल की मात्रा
  6. संरध्रता


  • मिट्टी की प्रकृति के दो प्रमुख पक्ष हैं- रासायनित व भौतिक। जनक पदार्थ, वनस्पति, जलवायु, जलनिकास तथा काल इन पक्षों को निर्धारित करने वाले मुख्य कारक हैं। मध्यप्रदेश भारत के दक्षिणी प्रायःद्वीप पठार का वह भू-भाग है जहाँ विस्तृत प्रदेश में अवशिष्ट मिट्टी पाई जाती है, यहाँ की मिट्टी की प्रकृति के निर्धारण में यहाँ स्थित चट्टाने महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अतः जैव पदार्थ इस मिट्टी में बहुतायत से मिलते हैं। इस पठारी भाग पर जल निकास की कोई समस्या नहीं है किन्तु भूमि के त्रुतिपूर्ण उपयोग ने मिट्टी के कटाव की समस्याएँ उत्पन्न कर दी है। मध्यप्रदेश अत्यंत प्राचीन भूखण्ड का भाग है एवं चट्टानों का बना हुआ है। इसलिए मिट्टी भी इन्हीं चट्टानों की बनी हुई है, इसलिए नदी कछारों के अतिरिक्त लगभग संपूर्ण मध्यप्रदेश में प्रौढ़ मिट्टी पाई जाती है।
  • बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण न हो सकने के कारण मध्यप्रदेश की मिट्टी का प्रादेशिक वितरण बड़े वर्गों में ही उपलब्ध होता है। स्थानीय भाषा में हालॉकि उसके उपवर्ग मिलते हैं, किन्तु उन्हें अन्य प्रदेशों के उपवर्गों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता। जैसे काली मिट्टी के स्थानीय उपवर्ग नरसिंहपुर तथा जबलपुर में भिन्न -भिन्न हैं। मिट्टी का दूसरा वर्गीकरण उसके गठन के आधार पर मिलता है जिसके द्वारा मिट्टी में बालू तथा चिकनी मिट्टी की मात्रा का ज्ञान होता है। इसलिए स्थूल रूप से संपूर्ण मध्यप्रदेश में मिट्टी के पॉच प्रमुख प्रकार मिलते हैं जो निम्नलिखित हैं-


  1. काली मिट्टी
  2. लाल तथा पीली मिट्टी
  3. जलोढ़ मिट्टी
  4. कछारी मिट्टी
  5. मिश्रित मिट्टी
  6. काली मिट्टी

काली मिट्टी

  • यह मिट्टी गहरे रंग की दोमट मिट्टी है। चीका एवं बालू इसके दो प्रधान अवयव हैं। सफेद चीकायुक्त यह मिट्टी बहुत बारिक कण वाली, चूना, मैग्नीशियम एवं कार्बोनेट्स के अंश वाली होती है। इस मिट्टी में लोहे, चूने, एल्यूमिनियम की अधिकता एवं  फॉस्फेट, नाइट्रोजन एवं जैव पदार्थ की कमी होती है। काली मिट्टी का प्रदेश मुख्यतः वह है वहाँ दक्कन ट्रैप अथवा बेसाल्ट नामक आग्नेय चट्टाने बहुत मोटी तहों में मिलती हैं। इस काली चट्टान के झरसे से ही मिट्टी बनती है। इस मिट्टी के रासायनिक संगठन में अन्य रसायनों के अलावा लोहे और चूने की मात्रा अधिक होने से इनका रंग काला हो जाता है। पानी पड़ने पर यह मिट्टी चिपकती है और सूखने पर बड़ी-बड़ी दरारें पड़ जाती हैं । जिससे  मिट्टी वायु संचरण तथा जल निकास की समस्या नहीं होगी।
  • मध्यप्रदेश में यह मिट्टी सतपुड़़ा के कुछ भाग, नर्मदा घाटी एवं मालवा के पठारी भागों में मिलती है। मंदसौर,रतलाम, झाबुआ, धार, खंडवा, खरगौन, इंदौर, देवास, उज्जैन, शाजापुर, राजगढ़, भोपाल, रायसेन, विदिशा, सागर, दमोह, जबलपुर, नरसिंहपुर, जबलपुर, होशंगाबाद, बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी, गुना, शिवपुरी, सीधी जिलों के भू-भाग दक्कन के पठार का उत्तरी पश्चिमी भाग हैं, इस कारण यहाँ काली  मिट्टी पाई जाती है। मध्यप्रदेश में टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सतना व रीवा में मिश्रित काली और लाल मिट्टी मिलती है। काली मिट्टी को तीन भागो में बाँटा जा सकता है।
  • 01- गहरी काली मिट्टी
  • 02- साधारण काली मिट्टी
  • 03- छिछली काली मिट्टी
गहरी काली मिट्टी- 

यह नर्मदा घाटी, मालवा और सतपुड़ा पठार के विस्तृत भाग में पाई जाी है। यह राज्य की 3.5 प्रतिशत भूमि अर्थात 35 लाख एकड़ क्षेत्र घेरती है। 20-60 प्रतिशत चिकनी मिट्टी की मात्रा वाली इस मिट्टी की गहराई 1-2 मीटर तक है। यह मिट्टी गेहूूॅ, तिलहन, चने तथा ज्वार की खेती के लिए बहुत उपयोगी होती है।

साधारण काली मिट्टी-

काली मिट्टी के प्रदेश का अधिकतम भाग इस वर्ग के अंतर्गत रखा जा सकता हैं जिसमें मालवा के पठार का संपूर्ण उत्तरी भाग और निमाड़ प्रदेश सम्मिलत है। लगभग 400 लाख एकड़ या राज्य का 37 प्रतिशत भू-भाग में यह मिट्टी पाई जाती है।इस मिट्टी की गहराई 15 सेमी से 1 मीटर तक है और मिट्टी का रंग पूरा या हल्का काला है।


छिछली काली मिट्टी-

राज्य के क्षेत्रफल का लगभग 75 लाख एकड़ या 7.1 प्रतिशत क्षेत्र सतपुड़ा क्षेत्र में आता है, जहाँ की अधिकतर मिट्टी  की परत छिछली है। छिंदवाड़ा, बैतूल तथा सिवनी जिले इसी भाग में आते हैं। यह चिकनी दोमट मिट्टी है जिसमें 15 से 30 प्रतिशत चिकनी मिट्टी की मात्रा पाई जाती है।

मध्यप्रदेश में काली मिट्टी के प्रदेश साधारणतः विस्तृत कृषि प्रदेश के रूप में उभरे हैं । रबी और खरीफ की फसलें ऐसी हैं जिन्हें अधिक सिंचाई की आवश्कयता नहीं होती । जैसे गेहँ, कपास, ज्वार, तिलहन और दालें।

लाल और पीली मिट्टी-


  • मध्यप्रदेश का संपूर्ण पूर्वी भाग अर्थात बघेलखण्ड में लाल और पीली मिट्टी पाई जाती है। सामान्य रूप से लाल और पीली मिट्टी साथ-साथ पाई जाती है तथा लाल रंग लोहे के कणों के ऑक्सीकरण के कारण होता है। अधिकतर यह हल्की बुलई मिट्टी है किन्तु कहीं-कहीं पर भारी चिकनी और दोमट मिट्टी के प्रदेश भी मिलते हैं।  इस मिट्टी की उर्वरता काफी कम होती है, क्योंकि उर्वरता हेतु आवश्यक ह्यूमस एवं नाइट्रोजन तत्वों की कमी होती है। इस मिट्टी  में चूने की मात्रा अपेक्षाकृत कम है जिससे इसमें धान की फसल अधिक बोई जाती है। वहीं ढलवा भागों में पीली बुलई दोमट मिट्टी  मिलती है। फलस्वरूप यह प्रमुख कृषि प्रदेश है। और यहां की प्रमुख फसल धान है। 

जलोढ़ मिट्टी- 


  • मध्यप्रदेश के उत्तरी पश्चिमी भागों मुख्यतः मुरैना, भिण्ड, ग्वालियर, तथा शिवपुरी जिलों में यह मिट्टी पाई जाती है। बुन्देलखण्ड, नीस तथा चम्बल द्वारा निक्षेपित पदार्थों से निर्मित यह मिट्टी गंगा घाटी के इस सीमांत प्रदेश में लगभग 30 लाख एकड़ भू-भाग पर फैली हुई है। इस मिट्टी में नाइट्रोजन , जैव तत्व एवं फॉस्फोरस की कमी होने के कारण वनस्पति भी कम पाई जाती है। इस मिट्टी की सतह बलुई, दोमट चह चिकनी दोमट तथा निचली तहों में अपेक्षाकृत महीन कणों का पदार्थ पाया जाता है। भिण्ड तथा मुरैना जिलों में मिट्टी का रंग पीलापन लिएहुए भूरा है जिसमें बीच बीच में राख का रंग भी मिलता है। मुरैने के अन्य भागों में गहरे रंग की मिट्टी पाई जाती है। जलोढ़ मिट्टी में बालू, सिल्क तथा मृतिका का अनुपात 50ः19ः6ः29ः4 पाया जाता है। बालू की अधिकता के कारण इसमें अपरदन अपेक्षाकृत कम होता है।

कछारी मिट्टी- 


  • बाढ़ के दौरान नदियों द्वारा अपने अपवाह क्षेत्र में बिछाई गई मिट्टी कछारी मिट्टी कहलाती है। इस मिट्टी में गेहू, गन्ना, कपास आदि फसलें बड़ी मात्रा में होती हैं। मध्यप्रदेश के भिण्ड, मुरैना, ग्वालियर में चम्बल और उसकी सहायक नदियों द्वारा यह मिट्टी लाई जाती है। कछारी मिट्टी का विस्तार भिण्ड जिले के गोहद, भिण्ड जिले मेहगॉव, मुरैना जिले की अग्बाह, मुरैना, जौरा, सबलगढ़, व विजयपु तहसीलों के अकिधकांश भाग पर तथा ग्वालियर, श्योपु एवं पोहरी तहसीलों के कुछ भाग हैं।

मिश्रित मिट्टी- 


  • विंध्य प्रदेश एवं मध्यप्रदेश के अनेक क्षेत्रों में लाल, पीली, एवं काली मिट्टी मिश्रित रूप में पाई जाती हैं यह मिट्टी फॉस्फेट, नाइट्रोजन, एवं कार्बनिक पदार्थों की कमी वाली कम उपजाऊ होती है इसलिए इस प्रकार की मिट्टी में मुख्यतः मोटे अनाज ज्वार, मक्का आदि उत्पादित किए जाते हैं।

मध्यप्रदेश में मृदा अपरदन Soil Erosion in MP

  • मध्यप्रदेश में मृदा का अपरदन कृषि के लिए एक जटिल समस्या है। क्योंकि इसके कारण मिट्टी की सतह से मिट्टी के महीन कण कट-कटकर बह जाते हैं जिसके कारण उस क्षेत्र की उर्वरता और उत्पादन में कमी आती है। मानसूनी वर्षा मृदा अपरदन का एक मुख्य कारण हैं यह वर्षा उस समय होती है जब ग्रीष्म ऋतु के बाद मिट्टी सूखकर भूरभुरी हो जाती है एवं जल के साथ साथ वह बह जाती है। साथ ही यह वर्षा की तेज बौछारों के रूप में होती है और तेजी से बहता हुआ जल भूमि पर कटाव करता है। ग्रीष्म ऋतु में वनस्पति की कमी होने के कारण बहता हुआ वर्षा  जल अधिक शक्ति से भूमि का कटाव करता है। विभिन्न क्षेत्रों में ढाल की तीव्रता के साथ जलप्रवाह की गति बढ़ती जाती हैं जिससे उसकी कटाव क्षमता भी गई गुना बढ़ जाती है। मध्यप्रदेश में अधिकतर भूमि पठारी एवं पहाड़ी है तथा ढाल पर्याप्त है, अतः मानसूनी वर्षा तथा भूमि के गलत उपयोग के कारण मृदा अपरदन के जटिल समस्या बन गई है।
  • चम्बल घाटी का भूमिक्षरण मध्यप्रदेश की ही नहीं इस देश की गंभीर समस्या हैं इस घाटी की महीन चिकनी अथवा दोमट मिट्टी, अर्द्वशुष्क जलवायु के कारण वनपस्पति की अधिक कमी जो कृषि प्रदेशों में और कम तथा पशुपालन से विस्तृत क्षेत्र की वनस्पति क्षेत्र की वनस्पति की समाप्ति से चंबल और उसकी सहायक नदियों के दोनों किनारों पर एक चौड़ी पेटी अतयाधिक गहरे खड्डों में परिवर्तित हो गई तथा ये खड्ड भूमि का ग्रास करते हैं। 6 लाख एकड़ बहुमूल्य कृषि भूमि इन खड्डों में परिवर्तित हो गई और इसमें वृद्धि अभी भी जारी है। ठीक इसी प्रकार का मृदा अपरदन नर्मदा के किनारों पर भी हो रहा है। इसे रोकने के कारगर उपाय तुरंत नहीं अपनाए गए तो निकट भविषय में यह एक गंभीर समस्या हो जायेगी।

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