MP Ka Itihas (मध्य प्रदेश का सम्पूर्ण इतिहास)

मध्य प्रदेश का सम्पूर्ण  इतिहास
प्रागैतिहासिक काल 
  • मनुष्य का निवास नदियों के किनारों और कंदराओं में औजार, पत्थर और हड्डियों के बने, जानवरों के शिकार में प्रयुक्त। भीमबेटका, होशंगाबाद, सागर, भोपाल, रायसेन, नेमावर, छनेरा, महेश्वर, पंचमढ़ी, आदमगढ़, मंदसौर से अवशेष प्राप्त एवं शैलचित्र। 

पाषाणकाल

  • पुरापाषाण काल में बिना बेंत/हत्थे वाले औजार जैसे हस्तकुठार, खुरचनी का प्रयोंग। 
  • पुरापाषाणकाल के अवशेष नर्मदा, चम्बल, सोनार, पार्वती, बेतवा, हिरण, वेनगंगा की घाटियों में मिले हैं।
  • मध्यपाषाणकाल के औजार उच्च कोटि के पत्थरों से निर्मित थे, जो आकार में छोटे थे। 
  • उत्तरपाषाण काल को लघु औजार पाषाणकाल भी कहते हैं। शल्क, बेधनी, खुरचनी प्रमुख औजार। 
  • मानव, पशु-पक्षी तथा मछली को भोजन में प्रयोग करता था। 
  • पूर्वी निमाड़, शहडोल, मंदसौर होशंगाबाद, रीवा, सीहोर, उच्चैन, मण्डला, छतरपुर, छिंदवाड़ा इस काल के क्षेत्र थे। 
  • नवपाषाणकाल में मानव ने कृषि करना सीख गया। 
  • मृदभाण्ड बनाना, झोपड़ी बनाकर रहना, वस्त्रों का प्रयोग होने लगा।
  • इस काल के औजार ऐरण, जबलपुर, दमोह, सागर से प्राप्त। 

ताम्र पाषाणकाल 

  •  मानव ने पत्थर के साथ ताँबे का प्रयोग सीखा। 
  • यह सभ्यता मोहनजोदड़ों और हड़प्पा के समकालीन थी। 
  • नर्मदा, चम्बल, बेतवा नदियों के किनारों और जबलपुर, बालाघाट, में इस सभ्यता का विकास हुआ। 
  • मालवा के कायथा, ऐरण, आवरा, नवदाटोली, डॉगवाला, बेसनगर से इस सभ्यता के प्रमाण मिले हैं। 
  • कायथा म.प्र. की पहली ताम्रपाषाणकालीन बस्ती थी। 
  • डॉ. वी.श्री. वाकणकर ने नागदा, कायथा की खोज की। 
  • डॉ. सांकलिया ने महेश्वर, नवदाटोली की खोज की। 
  • घुमक्कड़ जीवन समाप्त, खेती, पशुपालन प्रारंभ। पशुओं में गाय, कुत्ता, बकरी पाले जाते थे। 

 प्राचीनकाल 

(।) वैदिककाल-

  • आर्यों के भारत में आगमन के साथ प्रारंभ 
  • वैदिक सभ्यता आर्यों ने स्थापित की (1500-1000 ई.पू.)  
  • अ0ार्यों में पंजाब में बसने के बाद अन्य स्थानों पर प्रवेश किया
  • यादवों का एक कबीला भी इस क्षेत्र में आकार बसा
  • कालांतर में अत्री, पाराशर, भारद्वाज, भार्गव आये। 
  • उत्तरवैदिक सभ्यता (1000-600 ई.पू.) में ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ के अनुसार विन्ध्यांचल के घने जंगलों में निषाद जाति रहती थी। 
  • मनु (वैवस्वत) के 10 पुत्रों में से एक कारूष ने कारूष वंश (बघेलखण्ड) की स्थापना की। 
  • चंद्रवंश (ऐलवंश)-मनु की पुत्री इला का विवाह सोम से हुआ और ऐलवंश की स्थापना हुई। 
  • सोम (पुरूखा/पुरूवा) के पुत्र आयु और अमावस हुए। 
  • सोम शासन बंुदेलखंड में था। 
  • आयु के पुत्र यर्थात हुए। जिसने अपना साम्राज्य 5 पुत्रों में बाँट दिया। पुत्र यदु को चर्मणवती (चंबल), वेत्रवती (बेतवा), शुक्तमती (केन) नदी घाटी क्षेत्र मिला। यदु के नाम पर यादव वंश स्थापित हुआ। 
  •  इक्ष्वाकु वंश- मनु के पुत्र इक्ष्वाक के नाम पर इस वंश की स्थापना हुई जिसका शासन दण्डकारण्य में था। 
  • इस वंश के प्रतापी राजा मान्धता ने अपने पुत्र पुरूकुत्स को मध्य भारत के नाग राजाओं की सहायता हेतु भेजा। (गंधवों के विरूद्ध)
  • नाग कुमारी(नर्मदा) का विवाह पुरूकुत्स के साथ हुआ। 
  • इस वंश के मुकुचंद ने रिक्ष और परिपाता पर्वतमालाओं के बीच नर्मदा नदी के तट पर पूर्वज मान्धाता के नाम पर मान्धाता (ओंकारेश्वर) नगरी बसाई। 

हैहय वंश- 

  • यादव वंश के यदु के पौत्र हैहय ने इस वंश की स्थापना की। 
  • इस वंश के राजा महिष्मत ने नर्मदा किनारे महिष्मति (महेश्वर) नगरी बासई। 
  • इस वंश के कीर्तवीर्य अर्जुन/सहस्त्रबाहु ने कार्काेंटवंशीय नागों, अयोध्या के पौरवराज, त्रिशंकु और लंकेश्वर रावण को हराया। कालांतर में गुर्जर देश के भार्गवों से संघर्ष में हैहयों की हार हुई। 
  • हैहयों ने तुण्डीकेरे (दमोह), त्रिपुरी, दश्मर्ण (विदिशा), अनूप (निमाड़) अंवति जनपदों की स्थापना की। 
  • कीर्तवीर्य अर्जुन के पुत्र जयध्वज ने मालवा क्षेत्र पर राज किया। 
  • जयध्वज का पुत्र तालजंघ और उसका पुत्र अवंति हुआ। अंवति के नाम पर मालवा क्षेत्र का नाम अंवति पड़ा। 
  • अंवति राजा ने यादवों से विदिशा (भेलसा) छीन लिया। विदर्भ के राजा भीमरथ की कन्या दमयंती का विवाह नलपुर के राजा नल से हुआ जिसने नलपुर/नरवर/शिवपुरी नगर बसाया। 

 महाकाव्य काल-
  •  रामायण काल में प्राचीन म.प्र. में दण्डकारण्य व महाकांतर के घने वन थे। विन्ध्य, सतपुड़ा, यमुना का दक्षिण भाग, गुर्जर प्रदेश इसमें शामिल थे। 
  • यदुवंशी राजा मधु इस क्षेत्र के शासक थे, जो अयोध्या के राजा दशरथ के समकालीन थे। 
  • भगवान राम के बनवास का कुछ समय दण्डकारण्य में बीता। 
  • राम के पुत्र कुश दक्षिण कौशल के राजा हुए। 
  • राम के भाई शत्रुघ्न का पुत्र धुत्रघाती ने दशार्ण (विदिशा) पर शासन किया जिनकी राजधानी कुशावती थी। 
  • यमुना से गोदावरी तक का क्षेत्र राजनीतिक दृष्टि से अयोध्या का भू-भाग था। 
  • रावण का राज्य अमरकंटक अथवा जबलपुर क्षेत्र बताया गया है। 
  • वाल्मीकि आश्रम में माता सीता ने लव-कुश को जन्म दिया था। यह आश्रम तमसा (टोंस) नदी के तट पर था। 
  • रामायणकालीन त्रेतायुग के बाद महाभारतकालीन द्वापर युग प्रारंभ हुआ। 
  • महाभारत युद्ध में बुंदेलखंड और बघेलखंड ने पाण्डवों की मदद् की 
  • (वत्स, वेदि, काशी, दशार्ण (विदिशा), मत्स्य जनपद) 
  • कौरवों की मदद् महिष्मति (राजा नील), अंवति, भोज, विदर्भ निषाद राज्यों ने की।
  • महाभारत में महिष्मति, उज्जैयिनी, कंुतलपुर, विराटपुरी (सोहागपुर) को म.प्र. के प्रमुख नगर बताया गया है।  

 महाजनपद काल-

  • 600 ई.पू. बौद्ध ग्रंथ अंगुतर निकाय तथा जैन ग्रंथ भगवतीसूत्र में वार्णित महाजनपदों की संख्या 16 थी। जिनमें चेदि तथा अंवति जनपद म.प्र. में थे।  
  •  चेदि जनपद- वर्तमान बुंदेलखंड का पूर्वी भाग और निकटवर्ती क्षेत्र इसमें शामिल थे, जिसकी राजधानी शक्तिमानी थी। 
  •  अवंति जनपद- यह पश्चिम और मध्य मालवा क्षेत्र में बसा था। इसके दो भाग उत्तरी अवन्ती (राजधानी उज्जयिनी) और दक्षिणी अवंति (राजधानी महिष्मति) थी। वेत्रवती (वेतवा) नदी इनके बीच बहती थी। 
  • उज्जैयिनी का राजा चण्डप्रघोत था जो पुलिक का पुत्र था। बिंबिसार और युद्ध प्रद्योत के समकालीन थे। 
  • बिंबिसार के समय मगध राज्य के साथ प्रद्योत के संबंध मैत्रीपूर्ण थे। प्रद्योत के पाण्ड्डुरोग से ग्रसित होने पर बिंबिसार ने अपने राजवैद्य जीवक को इलाज के लिए भेजा था। 
  • अजातशुत्र (बिंबिसार का पुत्र) के समय मगध और अवंति राज्यों के बीच द्वेष पनपने लगा। 
  • प्रद्योत के समय अवंति बौद्ध धर्म का केंद्र था। 
  • प्रद्योत का पुत्र पालक अवंति का राजा बना जिसने वत्स पर (ग्वालियर) आक्रमण पर उसकी राजधानी कौशांबी पर अधिकार कर लिया और अपने पुत्र निशाखयूप को वहां का उपराजा बनाया। 
  • पालक के बाद अजक और नंदिवर्धन ने अवंति पर शासन किया। 
  • अवंति राज्य लौह इस्पात के अस्त्र शस्त्र बनाने वाले श्रेष्ठ कारीगरों में धनी था। 
  • अवंति के दो प्रसिद्ध नगरों कुररधर और सुदर्शनपुर का वर्णन बौद्ध ग्रंथों में मिलता हैं। 
  • कालांतर में मगध राज्य के हर्यकवंश के अंतिक शासक नागदशक के अमात्य शिशुनाग ने अवंति राज्य पर आक्रमण पर प्रद्योत वंश के अंतिम शासक नंदिवर्धन को पराजित किया और अवंति को मगध में मिला लिया और मगध में शिशुनाग वंश का शासन आंरभ हुआ। 
  • मगध की राजधानी वैशाली और गिरिव्रज दोनों थे। परन्तु बाद में वैशाली को मुख्य राजधानी बनाया गया। 
  • शिशुनाग के बाद पुत्र कालाशोक राजा बना और पाटलीपुत्र को राजधानी बनाया गया। 
  • शिशुनाग के बाद पुत्र कालाशोक राजा बना और पाटलीपुत्र को राजाधानी बनाया। 
  • कालाशोक के समय द्वितीय बौद्धसंगीति का आयोजन हुआ जिसमें बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों (स्थाविर और महासंधिक) में बंट गया।
  • कालाशोक की हत्या महापùनंद ने की और नंदवंश की स्थापना की। 
  • नंदवंश शूद्र जाति से संबंधित था। इस वंश के अंतिम शासक धनानंद की (जो सिकंदर का समकालीन था) हत्या चंद्रगुप्त मौर्य ने कर दी और मौर्य वंश की स्थापना की। 
  • यूनानी लेखकों ने धनांनद को अग्रमीज कहा है। 

 मौर्य काल-
  •  चाणक्य ने चंद्रगुप्त को तक्षशिला में सैनिक शिक्षा दिलवाकर पारंगत किया।
  •  चंद्रगुप्त ने भारत को यूनानी दासता से मुक्त कराकर सिंध, पंजाब और मगध को अपने अधीन कर लिया। 
  • चंद्रगुप्त का पुत्र बिंदुसार था जिसका पुत्र अशोक अवंति का उपराजा था, जो बाद में मगध का शासक बना और देवानामविय की उपाधि धारण की। 
  • अशोक के काल में तृतीय बौद्ध संगीति पाटलिपुत्र में हुईं जिसकी अध्यक्षता मोगलिपुत्र नामक बौद्ध भिक्षु ने की। 
  • अशोक ने साँची स्तूप (स्तंभ लेख) रायसेन के अलावा विदिशा, सतधारा, अंधेर, सुनामी, भोजपुर में भी स्तूपों का निर्माण करवाया। 
  • अशोक ने 84000 स्तूपों का निर्माण करवाया  था। 
  • अशोक का विवाह विदिशा की राजकुमारी महादेवी से हुआ। जिससें पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा का जन्म हुआ।
  • मौर्य काल में प्रशासनिक ईकाई प्रांत, मण्डल, जिला ग्राम। 
  • मौर्य युग में 4 व्यापारिक मार्ग थे।जिसमें से तीसरा मार्ग दक्षिण में प्रतिष्ठान से उत्तर में श्रीवस्ती तक था जिसमें म.प्र. के महिष्मति, उज्जैन और विदिशा नगर स्थित थे। चौथा मार्ग भृगुकच्छ से मथुरा तक था जिसके मार्ग में उज्जयिनी था। 
  • अवंति के महिष्मति(महेश्वर) में सूती वस्त्र तैयार करने का केंद्र था। 
  • मौर्य युग में सोने के सिक्कें (निष्क), चाँदी (कार्षापण), ताँबा (भाषक), छोटे सिक्कें काकणि का चलन था। आहत सिक्कें भी मिलते हैं। 

अशोक के 4 शिलालेख म.प्र. से मिले हैं-

  • (1) रूपनाथ (जबलपुर, सिहोर तहसील) 
  • (2) गुर्जरा(दतिया) 
  • (3) सारो-मारो(शहडोल)
  • (4) पनमुडरिया(सिहोर)
  • गुर्जरा और सिहोर अभिलेख में अशोक के नाम का उल्लेख मिलता है। 
  • मौर्यकालीन ब्राम्ही लिपि में उत्कीर्ण शिलालेख म.प्र. के करीतलाई, खरकई, कसरावद (खरगोन), आरंग, रामगढ़, स्थानों से मिले हैं। 
  • बेसनगर विदिशा से मौर्यकालीन यक्ष की प्रतिमा प्राप्त हुई है। 
  • अशोक ने भरहुत (सतना) में भी एक स्तूप बनवाया था। 

मोर्योतरकाल 

शुंग  वंश

  • अंतिम मौर्य शासक बृहदथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र ने की और शुंग वंश की स्थापना की।
  • पुष्यमित्र का पुत्र अग्निमित्र विदिशा का शासक था। 
  • शुंग वंश के 5वें शासक भागभद्र के समय यवन राजदूत हेलियोडोरस ने भागवत धर्म से प्रभावित होकर विदिशा में गरूड़ ध्वज की स्थापना विष्णुमंदिर के सामने करवाई। 
  • शुंग वंश के शासकों ने विदिशा को राजधानी बनाई।
  • शुंगों  ने यवनों को कालीसिंध (चंबल की सहायक) नदी के तट पर हराया। 
  • निमाण्डर के सिक्कें बालाघाट से मिले हैं। 
  • पुष्यमित्र शुंग को बौद्ध धर्म का विनाशक कहा गया है। 
  • साँची स्तूप का कटघरा और भरहूत स्तूप की चारदीवारी और तोरण का निर्माण शुंग काल में हुआ। 
 सातवाहन-
  •  अंतिम कण्व शासक सुशर्मा की हत्या सातवाहन शासक सिमुक ने की और सातवाहन वंश की स्थापना की इस वंश के पराक्रमी शासक शातकर्णी की पूर्वी मालवा पर विजय का वर्णन साँची स्तूप पर उत्कीर्ण हैं जिसमें इसे सिरिसात कहा हैं। पुराणों में इसे कृष्णपुत्र भी कहा गया हैं। 
  • शातकर्णी की रानी नागनिका के नानाघाट अभिलेख से भी इसकी जानकारी मिलती है। 
  • गौतमीपुत्र शातकर्णी के सिक्कें उज्जैन से प्राप्त हुए हैं। इसने शक राजा नहपान (नासिक) को हराया और मालवा से महेश्वर तक शासक किया। 
  • गौतमीपुत्र शातकर्णी का पुत्र वसिष्ठिपुत्र पुलुमावी हुआ जिसने मध्यभारत के बड़े भाग पर अधिकार किया परन्तु रूद्रदामन से हार गया। 
  • अंतिम सातवाहन राजा यज्ञश्री शातकर्णी के सिक्कें विदिशा, देवास से मिले हैं। 
  • इसके काल में रोम से व्यापार में वृद्धि होने की पुष्ठि म.प्र. के आवरा (मंदसौर), चकरबेड़ा, बिलासपुर (छ.ग.) से प्राप्त रोम सिक्कों से होती हैं। 
  •  इण्डोयूनानी- बालाघाट से मिनाण्डर (मिलिंद) के सिक्के प्राप्त हुए हैं। नागसेन ने इसे बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी। 
शक-क्षत्रप- 
  • चीन के पश्चिम से आकर भारत बसने वाली शक जाति ने मथुरा, उज्जैन, पंजाब में क्षत्रप राज्य स्थापित किया।
  • इस वंश के मोअस और अजेस राजाओं के सिक्कें मालवा से मिलें हैं। 
  • शकों के दो वंश थे-क्षहरात और कार्दमक।
  •  क्षहरात वंश के शासक भूमक और नहपान से। 
  • भूमक के बारे में मालवा से प्राप्त सिक्कों से जानकारी मिलती हैं। 
  • नहपान के सिक्कें शिवपुरी से मिले हैं। जिन्हें गौतमीपुत्र शातकर्णी ने पुनः ढलवाया था। नहपान और शतकर्णी के बीच युद्ध में नहपान मारा गया। 
  • नहपान का नान जैन साहित्य में नरवाहन तथा ‘पैरिप्लस ऑफ इरिथियन सी ”पुस्तक में नैम्बेनस मिलता हैं।
 कार्दामक वंश-
  • इसकी स्थापना येशोमिती में की। उसके पुत्र चष्टन ने उज्जैन में शासन किया। 
  • इस वंश का प्रसिद्ध राजा रूद्रमान संस्कृत का महान ज्ञाता था। 
  • रूद्रमान के गिरनार अभिलेख से प्राप्त जानकारी अनुसार इसने सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण करवाया था। 
  • रूद्रमान ने म.प्र. में तिथियुक्त चाँदी के सिक्के चलाये। 
  • रूद्रसिंह तृतीय को मारकर विक्रमादित्य ने उज्जैन का विलय गुप्त साम्राज्य में कर दिया। 
 कुषाण वंश-
  •  ये पश्चिमी चीन की यूनी नामक पाँच कबीलाई शाखा में से एक थे। 
  • प्रथम राजा कुजुल कडफिसेस था जिसके सिक्के विदिशा में मिले हैं। 
  • विमकडफिसेस के सिक्कें शहडोल से मिलें हैं। इसी ने भारत में सबसे पहले सोने के सिक्के चलवाये। 
  • कनिष्ठ ने शक संवत की शुरूआत की (78 ई.) 
  • कनिष्ठ का उत्तराधिकारी वसिस्क का अभिलेख साँची से मिला हैं। जिससे पता चलता हैं कि इस समय मधुकरि ने बौद्ध मूर्ति का निर्माण करवाया। 
  • वसिष्क के उत्तराधिकारी हुविष्क के सिक्कें शहडोल और हरदा तथा वसुदेव के सिक्के तेवर (जबलपुर) से मिले हैं। 
  • भेड़ाघाट से दो मूर्तिलेख और बौद्ध प्रतिमाएँ मिली हैं। 
नागवंश
  • नागवंश- इस वंश का संस्थापक वृषनाथ था जिसने विदिशा को राजधानी  बनाया। 
  • भीमनाग ने राजधानी को पद्मावती स्थानांतरित किया। 
  • नागवंश ने कुषाणों के उन्मूलन के लिए दस अश्वमेघ यज्ञ करवाये।
  • अंतिम नाग राजा मणपतिनाग को समुद्रगुप्त ने हराकर गुप्त साम्राज्य की स्थापना की। 
  • रविनाग का एक सिक्का ऐरण (सागर) से मिला हैं। 
  •  जबलपुर का बौधि वंश-त्रिपुरी के इस वंश के 4 राजाओं के सिक्के मिले हैं श्री बौधि, वसुबौधि, चंद्रबौधि, शिवबौधि। 
  • (स) बघेलखंड का माघ वंश- भीमसेन, भद्रमघ, शिवमघ प्रमुख शासक थे। इनके सिक्कें और शिलालेख बाँधवगढ़ (उमरिया) से मिले हैं। कुषणों से इन्होंने संघर्ष किया। 
  • (श्र) वाकाटक वंश- विन्ध्यशक्ति/विघाशक्ति नामक ब्राम्हण ने विदिशा नयनाकुडार (सतना) और गजअभिलेख (पन्ना) से मिलते है। 
  • हरिषेण के प्रयाग अभिलेख से पता चलता हैं कि समुद्रगुप्त ने श्रीधर को हराकर विदिशा पर अधिकार कर लिया । 
  • प्रवरसेन-सस ने छिंदवाड़ा, सिवनी, बैतूल, बालाघाट, इन्दौर क्षेत्र पर शासन किया। 

 गुप्तकाल-
  •  इस वंश की स्थापना श्रीगुप्त ने की। 
  • चंन्द्रगुप्त-स का शासन इलाहाबाद से म.प्र. तक था। 
  • समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त के 9 गणराज्यों को अपने अधीन कर लिया यथा मालवा, अर्जुनयन, यौधेय, मद्रक आमीर/अहिरवाड़ा, पार्जुन, सनकानिक (विदिशा), काक, खरपरिक (दमोह)।
  • समुद्रगुप्त ने वाकाटक वंश और नागवंश से वैवाहिक संबंध बनाये। 
  • एरण (सागर) समुद्रगुप्त का स्वभोग नगर बन गया। इसने शक राज्य (उज्जैन) को छोड़कर संपूर्ण म.प्र. पर अधिकार कर लिया। 
  • समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी रामगुप्त था जो शकों से परास्त हुआ। 
  • चंद्रगुप्त-सस/ विक्रमादित्य ने शकों को हराकर उज्जैन पर अधिकार किया और उसे राजधानी बनाया। यही उसके दरबार में नौरत्न रहते थे। कालिदास, बेतालभट्ट, वराहमिहिर, धन्वतरी, अमरसिंह, वररूचि, घटकपर, क्षणपक, शुक। 
  • उदयगिरि गुफा लेख से उसके विदिशा अभिलेख का पता चलता हैं। 
  • चन्द्रगुप्त- सस  के उत्तराधिकारी कुमारगुप्त की मंदसौर प्रशस्ति के अनुसार सेनापति बंधुवर्मा ने सूर्यमंदिर के लिए दान दिया था। 
  • गुना के तुमैनशिलालेख में तुंबवन के शासक घटोत्कक्षगुप्त का वर्णन मिलता हैं। 
  • स्कंदगुप्त के समय 459 ई. में हूण आक्रमण (चीनी जनजाति) हुए। 
  • पुनः 5वीं सदी के तोरमाण ने नेतृत्व में हूण आक्रमण हुए। 
  • एरण की बराहमूर्ति अभिलेख से तोरमाण का पता चलता हैं। 
  • तोरमाण का पुत्र मिहिरकुल ने प. मालवा तक अधिकार कर लिया था। इसकी पुष्टि ग्वालियर अभिलेख स्कंदगुप्त से संबधित हैं। जिसका अधिकार मालवा, विन्ध्य और महाकौशल पर था। 
  • भानुगुप्त के हूणों से युद्ध के दौरान सेनापति गोपीराज मारा गया जिसकी विधवा के सती होने का उल्लेख एरण अभिलेख में हैं। 
  • परिव्राजक वंश- पन्ना में स्थापित संपूर्ण बंुदेलखंड तक सत्ता। पहला राजा देवादय था (प्रभंजन) दामोदर सस्तिन) 
  • खोह और मझगंवा (सतना) ताम्रपत्र हस्तिन से संबंधित हैं। 
  • उच्चकल्प राज्य- सतना स्थित ऊँचाहार का प्रचीन नाम। ओघदेव, कुमारदेव, जय स्वामिन, व्याघ्र, जयनाथ, सर्वनाथ अन्य राजा हुए।
  • पाण्डय राज्य- अमरकंटक के आसपास मैकल श्रणियों में स्थित। प्रथम राजा जयबल, अंतिम राजा  भारतबल। 
  • शैलवंश - महाकौशल क्षेत्र में स्थित। 
  • प्रथम राजा श्रीवर्धन, अंतिम राजा जयवर्धन। 
  • राधौली ताम्रपात्र (बालाघाट) जयवर्धन ने उत्कीर्ण करवाया था।
  • राष्ट्रकूट- 7वीं सदी के अंत में इसकी दो शाखाओं ने बैतूल अमरावती और मान्यखेट (महाराष्ट्र) में शासन किया।
  • बैतूल-अमरावती शाखा से दुर्गराज, गोंविदराज, स्वामिकराज और युद्रासुर के शासन के प्रामण मिले हैं। 
  • युद्रासुर के ताम्रपत्र तितिरखेड़ी तथा मुल्ताई (बैतूल) से मिले है। मान्यखेट शाखा का प्रतापी राजा दंतिदुर्ग ने पहली शाखा को भी अपने राज्य मे मिला लिया। 
  • दंतिदुर्ग ने नर्मदा नदी के तट पर कई युद्ध किये। 
  • गोविंद-ससस ने नागभट्ट सस (गुर्जर) को परास्त कर उज्जैन में दरबार लगाया। 
  • ध्रुव ने मालवा पर अधिकार किया तथा वत्सराज (मालवा का प्रतिहार नरेश) तथा धर्मपाल (बंगाल का पाल नरेश) को हराया।
  • इन्द्र ससस ने त्रिपुरी की कल्चुरी वंश की राजकन्या वैजंबा से विवाह किया। इसका अभिलेख इन्द्रगढ़ (मंदसौर) से मिलता हैं। 
  • इन्द्र ससस के समय अरबी यात्री अलमसूदी भारत आया। 

 गुर्जर प्रतिहार
  • राजस्थान में  हरिशचंद्र द्वारा स्थापित इस वंश की एक शाखा नागभट्ट-स के समय उज्जैन में स्थापित हुई। इसने अरबों के आक्रमण को विफल किया। 
  • वत्सराज ने राज्य का विस्तार किया जिससे राष्ट्रकूट शासक कृष्ण ससस, पाल नरेश धर्मपाल और प्रतिहार नरेश वत्सराज के बीच त्रिपक्षीय संघर्ष हुआ। 
  • रामभद्र के पुत्र मिहिरभोज के समय अरब यात्री सुलेमान आया। मिहिरभोज की महत्वपूर्ण उपलब्धि बुंदेलखंड पर अधिकार था। 
  • मिहिरभोज को ध्रुव (राष्ट्रकूट) तथा कोकल्ल (कल्चुरी, त्रिपुरी) से पराजित होना पड़ा। 
  • इसके बाद महेन्द्रपाल-स शासक बना। राजेश्वर इसके दरबारी विद्वान व कवि थे। जिसने कर्पूरमंजरी, हरविलास, बालरामायण, भुवनकोश, काव्यमीमांसा की रचना की। 
  • भोज-सस के बाद महिपाल शासक बना जिसका जिक्र अलमसूदी ने किया। 
  • राज्यपाल को चंदेल नरेश विद्याधर गंड ने मारकर त्रिलोचनपाल को राजा बनाया। 
  • यशपाल अंतिम प्रतिहार राजा था। 

चंदेल वंश-

  •  चंदेल का वंश संस्थापक नन्नुक था। 
  • चंदेलों ने महोबा (खजुराहों, बंुदेलखंड) में राज्य स्थापित। 
  • चंदेल प्रारंभ में प्रतिहारों के सामंत थे। 
  • जयशक्ति के नाम पर ही बंुदेलखंड का नाम जेजाकभुक्ति पड़ा।
  •  यशोवर्मन ने कांलिजर का किला जीता तथा खजुराहों में विष्णु मंदिर बनवाया। विष्णु मूर्ति उसने प्रतिहार नरेश देवपाल को हराकर कन्नौज से प्राप्त की थी। 
  • यशोवर्मन का पुत्र धंग देव था। जिसने प्रतिहारों से पूर्ण स्वतंत्र चंदेल राज्य की स्थापना की। 
  • धंगदेव ने खजुराहों के पार्श्वनाथ, विश्वनाथ, जिन्ननाथ, वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण करवाया। 
  • धंगदेव का पुत्र गंगदेव ने 1008 ई. में महमूद गजनवी के विरूद्ध बनाये गये संघ से भाग लिया। 
  • खजुराहों के जगदंबे और चित्रगुप्त मंदिर गंगदेव के शासन में बनाये गये। 
  • गंगदेव का पुत्र विद्याधर हुआ। इसने हिन्दू संघ से भागे राजा राज्यपाल (प्रतिहार) की हत्या कर दी। 
  • विद्याधर ने महमूद गजनी (तुर्क) से राज्य की रक्षा की। 
  • कंदरिया महादेव मंदिर विद्याधर ने बनवाया था। 
  • कीर्तिवर्मन ने सोने के सिक्के चलायें। कीर्तिसागर जलाशय महोबा में बनवाया। 
  • सुलक्षण वर्मन ने परमार शासकों के मालवा को लूटा और त्रिपुरी के कल्चुरी शासक को हराया। 
  • मदनवर्मन के 6 अभिलेख म.प्र. के खजुराहों, जयगढ़ (पन्ना), छतरपुर से प्राप्त हुए हैं। रीवा से 48 चाँची के सिक्के भी मिले हैें।
  • मदनवर्मन ने मालवा के यशोवर्मन परमार से विदिशा जीता। 
  • मदनवर्मन का पौत्र परर्दिदेव के 6 अभिलेख म.प्र. के अजयगढ़, मदनपुर, सेमरा, अहाड़, चरखारी से प्राप्त हुए। 
  • आल्हा उदल परमदर्दिदेव के साले और योद्धा थे। जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान (अजमेर) से युद्ध के दौरान जान गवाई। 
  • परमदर्दिदेव ने कुतुबुद्दीन की अधीनता स्वीकार कर ली। जिससे उसने मंत्री अजयदेव ने परमर्दिदेव की हत्या कर दी। 

परमार वंश-
  • स्थापना उपेन्द्र कृष्णराज ने की जो प्रतिहारों तथा राष्ट्र-कुटों के अधीन सामंत थे। 
  • प्रथम स्वतंत्रता शासक सिमुक (श्रीहर्ष) था। 
  • इस वंश का प्रसिद्ध राजा भोज था, राजधानी धार बनाई। 
  • राजा भोज ने भोजताल (भोपाल), सरस्वती मंदिर (धार) का निर्माण करवाया। (संस्कृत विद्यालय और विजय स्तम्भ) 
  • राजा भोज विद्वान संस्कृत ज्ञाता, कवि थे। 
  • समरांगण सूत्रधार (शिल्पशास्त्र), सरस्वतीकण्डभारण, सिद्धांत संग्रह, आयुर्वेंद सर्वस्व, राजमार्तण्ड, योसुत्र वृति, विद्या विनोद, चारूचर्चा, शब्दानुशासन, युक्ति कल्पतम (विधि गं्रथ) आदि ग्रंथों की रचना राजा भोज ने की। 
  • इस वंश के राजा जयसिंह को हराकर भीम-स (चालुक्य, ळर), तथा कर्ण (कल्चुरी, त्रिपुरी) ने मालवा पर अधिकार कर लिया।

कल्चुरी वंश- 
  • इस वंश ने महिष्मति (महेश्वर) में शासन किया। कृष्णराज प्रथम शासक था। 
  • इसके बाद शंकरगण और बुद्धगण हुए। 
  • बुद्धगण को चालुक्य शासक मंगलेश ने हराकर महिष्मति पर अधिकार किया।
  • उसके बाद कल्चुरी वंश ने त्रिपुरी को राजधानी बनाया। जिसका संस्थापक कोककल-स था। 
  • कोककल के बारे में बिलहारी लेख (जबलपुर) से जानकारी मिलती हैं। 
  • ”उसने समस्त पृथ्वी को जीतकर दक्षिण में कृष्णराज और उत्तर में भोज को अपने दो कीर्ति स्तम्भ के रूप में स्थापित किया।“
  • इसके बाद शंकरमण और युवराज प्रथम शासक बने।
  • प्रसिद्ध कवि राजशेखर युवराज प्रथम के दरबार में रहते थे।
  •  विद्धसालभंजिका में युवराज-स को उज्जयिनी भुजंग कहा गया हैं। लक्ष्मणराज ने उड़ीसा (अभियान के दौरान प्राप्त सोने एवं मणियों से निर्मित कालियानाम को सोमनाथ मंदिर(सौराष्ट्र, ळर ) को अर्पित किया।
  • कोककल सस का पुत्र गांगेयदेव शासक बना। 
  • कर्णदेव ने चालुक्य नरेश भीम के साथ मिलकर परमार शासक भोज को पराजित किया। 
तोमरवंश
  • (ज्) तोमरवंश- 14वीं सदी में वीरसिंह देव ने ग्वालियर में इसकी स्थापना की। 
  • राजा सूरजसेन ने ग्वालियर का किला बनवाया जिसे किलों का जिब्राल्टर कहते हैं। 
  • मानसिंह ने ग्वालियर में सास-बहू का मंदिर, गुजरी महल बनवाया। 
  • मानसिंह ने बहलोल लोदी, सिंकदर लोदी, इब्राहिम लोदी से युद्ध किया। 
  • मानसिंह के पुत्र विक्रमादित्य को हराकर इब्राहिम लोदी ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। 
अन्य वंश 
  •  गुहिल वंश -जीरण अभिलेख (मंदसौर) से विग्रह पाल के शासन की जानकारी मिलती है। 
  • कच्छपघाट वंश- ग्वालियर और शिवपुरी में स्थापित।
  • लक्ष्मण, वज्रदामन, कीर्तिराज, मधुसूदन शासक रहे। 
  • कीर्तिराज को महमूद गजनवी ने हरा दिया था। 
  •  बुंदेल वंश- रूद्रप्रताप बुंदेल ने ओरछा (टीकमगढ़) 1531 ई. को राजधानी बनाया। 
  • वीरसिंह देव बुंदेला ने जहाँगीर के कहने पर अबुल फजल की हत्या की।
  • चंपतराय के पुत्र छत्रसाल ने औरंगजेब (मुगलों) से युद्ध किया। 
  •  बघेल वंश इस वंश का शासन रीवा में था। 
  • रामचन्द्र के दरबार के संगीतज्ञ तानसेन को अकबर ने अपने नौ रत्नों में शामिल किया। 
  • 1569 ई. में बघेलवंश ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। 
  • भथा राज्य (विन्ध्यप्रदेश) के अंतिम शासक मार्तण्डसिंह थे। जिन्होंने इसका विलय 1947 में भारतीय संघ में किया। जो रीवा से सांसद भी चुने गये। 
मध्यकाल
  •  गुलाम वंश-1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने स्थापना की। यह गौरी का गुलाम था जिसने भारत में इस्लामिक राज्य की स्थापना की।
  • ऐबक ने बुंदेलखड़ के राजा परमर्दिदेव को हराकर कलिंजर, महोबा, खजुराहों पर अधिकार कर लिया। 
  • इल्तुतमिश ने माण्डू, मालवा, ग्वालियर और उज्जैन को जीता। 
  • इसने भेलसा (विदिशा) और ग्वालियर में मुस्लिम गवर्नर नियुक्त किये। 
  •  खिलजी वंश (1290-1320 ई.) जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने इस वंश की स्थापना की। उसने ग्वालियर में गुंबदाकार विश्रामगृह बनवाया। 
  • उसने मांडू को लूटा और सूबेदार आइन-उल-मुल्क को मालवा आक्रमण हेतु भेजा जिसमें राजा महलदेव और उसका पुत्र मारे गये। 
  • इसने कालिंजर (महोबा), भेलसा (विदिशा), चंदेरी, धार को भी लूटा। 
  • तुगलक वंश (1320-1414 ई.)- संस्थापक  ग्यासुद्दीन तुगलक था। इसके सूबेदार ने दमोह में एक महल बनवाया था। 
  • ग्यासुद्दीन के बाद जूना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) शासन बना। इसका उल्लेख बटियागढ़ लेख में मिलता है। (दमोह) मो. बिन तुगलक ने प्राणियों के लिए एक बावड़ी, गो-मढ, बगीचा बनवाया। 
  • फिरोजशाह तुगलक के राज्य का उल्लेख दुलनीपुर अभिलेख (सागर) में है। 
  • फिरोज की माँ बीबी मैला राजपूत सरदार रणमत की बेटी थी। 
  • नसीरूद्दीन महमूदशाह के समय मालवा का सूबेदार दिलावर खाँ  गौरी ने स्वतंत्र होकर चंदेरी पर अधिकार कर लिया। 
  • लोदीवंश- संस्थापक बहलोल लोदी था जिसने ग्वालियर पर आक्रमण किया। लौटते समय बीमार पड़ने से मुत्यु हो  गई। 
  • सिकंदर लोदी स्वर्णकार हिन्दू माँ की संतान था। इसने ग्वालियर भूभाग से राजस्व वसूला था। 
  • इब्राहिम लोदी ने ग्वालियर के शासक विक्रमाजीत को हराकर पुनः ग्वालियर पर अधिकार लिया। 

मुगलकाल
  • पानीपात का प्रथम युद्ध में 1526 ई. में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर मुगल साम्राज्य की नींव डाली। 
  • बाबर ने मेदिनीराय को 1528 ई. में हराकर चंदेरी पर अधिकार कर लिया। कालिंजर (महोबा) का किला भी मुगल आधिपत्य में आ गया। 
  • खानवा के युद्ध में (1527 ई.) बाबर में राणा सांगा को हराकर मालवा पर नियंत्रण कर लिया। 
  • हुमायूँ ने पुनः बहादुरशाह से मालवा छिन लिया और कांलिजर पर भी अधिकार कर लिया 
  • चौसा युद्ध (1939 ई.) में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को परास्त किया तथा मालवा और रायसेन दुर्ग पर अधिकार कर लिया। 
  • कालिंजर अभियान के बाद लौटते समय शेरशाह की मृत्यु हो गई। 
  • अकबर ने मालवा के शासक बाजबहादुर पर आक्रमण किया और बाजबहादुर के परास्त होने पर रूपमती ने आत्मदाह कर लिया। 
  • 1564 ई. में अकबर ने गोंडवाना विजय हेतु आसफ खाँ को भेजा। 
  • रानी दुर्गावती ने अपने अल्पायु पुत्र वीर नारायण की संरक्षिका बनकर मुगल सेना से युद्ध किया और अंततः वीरगति को प्राप्त हुई। 
  • रीवा महाराज रामचंद्र को मुगल सेना ने हराया। 
  • खानदेश की राजधानी बुरहानपुर पर आक्रमण कर अकबर ने अपनी अंतिम विजय के रूप में असीरगढ़ का किला जीत लिया। (बुरहानपुर) 
  • शाहजहाँ के शासनकाल में वीरसिंह बंुदेला के पुत्र जुझारसिंह पर शाहजहाँ ने आक्रमण किया। जुझारसिंह ने आत्मसमर्पण कर दिया। 
  • गोंडवाना शासक प्रेमनारायण के आग्रह पर औरंगजेब ने जुझारसिंह को पुनः परास्त कर देवीसिंह को ओरछा का शासक बना दिया। यह औरंगजेब का प्रथम युद्ध था।
  •  औरंगजेब का जन्म दोहर (उज्जैन) में मुमताज महल के पुत्र के रूप में हुआ।

 मराठा काल 
  • मुगल सम्राट फर्रूखसियर (1713 ई.) के विरूद्ध सैय्यद बंधुओं ने मराठों से सहायता मांगी और खानदेश व गोंडवाना साहू को सौंप दिये। 
  • 1722 ई. में बाजीराव-स ने मालवा पर पहली बार आक्रमण किया। 
  • दूसरी बार 1724 ई. में इस क्षेत्र में चौथ के लिए युद्ध किया।
  • तीसरी बार 1728 ई. में आक्रमण किया। तब भोपाल के निजाम की हार हुई। 
  • बाजीराव-स  और निजाम के बीच 1738 ई. में एक संधि हुई जो दुरई की संधि के नाम से जानी जाती हैं। जिसमें संपूर्ण मालवा और चंबल तथा नर्मदा के बीच की भूमि बाजीराव-स को दी गई। 
  • पर इसे मुगल बादशाह मुहम्मद शाह ने स्वीकार नहीं किया। तब जयसिंह के सहयोग से 1741 ई. में हुई संधि के अनुसार मालवा पेशवा को दे दिया गया। पहली बार मालवा पर मराठों का अधिकार हुआ। 
  • 1728 ई. में छत्रसाल (बुंदेलखंड) ने अफगान शासक मुहम्मद शाह बंगल के विरूद्ध बाजीराव-स  से सहायता माँगी। फलस्वरूप 1729 ई. में बुंदेलखंड का आधा भाग (कालपी, झाँसी, सागर, हृदयनगर) बाजीराव को मिला। 
  • पानीपात की तीसरी लड़ाई में अहमदशाह अब्दाली ने मराठों को हराया। 
  • इसके बाद सिंधिया और होलकरों को उत्तर भारत में स्वतंत्र रूप से अधिकार मिल गया। 
  • इसी समय छत्रसाल की मुगलों से लड़ाई में बाजीराव ने पुनः छत्रसाल की मदद की फलस्वरूप सागर, दमोह, जबलपुर, धामोनी, शाहगढ़, गुना, ग्वालियर क्षेत्र मिल गये।
  • पेशवा बाजीराव ने सागर, दमोह में गोविंद खेर को प्रतिनिधि नियुक्त किया और जबलपुर में बीसाजी गोविंद को। 
  • सारंगपुर में पेशवा नारायण राव (1772-73) और मालवा सूबेदार गिरिधर बहादुर के बीच युद्ध हुआ और मराठों को जीत हुई। 
  • मालवा का क्षेत्र उदासी पवार और मल्हारराव होलकर में बंट गया। 
  • बुरहानपुर से ग्वालियर तक का भाग पेशवा ने सिंधिया को दे दिया। 
  • उज्जैन और मंदसौर को सिंधिया ने अपने अधीन कर लिया। 
  • पेशवा ने 1737 ई. में भोपाल निजाम को हराकर सीहोर और होशंगाबाद का क्षेत्र अपने अधीन कर लिया। 
  • रायसेन में मराठों ने मजबूत किला बनवाया। 
  • गढ़ा मण्डला के गोंड  राजा नरहरि शाह को बाबा साहेब मोरो और बापूजी नारायण ने हराया। 
  • 1. होलकर वंश-मुगल साम्राज्य के पतन के बाद मालवा में मराठा राज्य स्थापित हुआ। 
  • 1727 ई. मल्हाराव होल्कर को मालवा के 5 महलों की सनद प्राप्त हुई। 
  • 1729 ई. में होल्कर और पँवार की सनदों का निर्धारण हुआ। 
  • अक्टूबर 1730 में मल्हारराव होलकर मालवा के शासक बने और होलकर वंश की स्थापना की। 
  • 1731 में मालवा तीन सरदारों होलकर, पँवार और सिंधिया और में बांट दिया। 
  • 1732 ई. में मालवा में 5 मराठा राज्यों की नींव पड़ी-

होल्कर वंश (इन्दौर)

  • (क) जीवाजी राव वंश (देवास छोटी पांती)
  • (इ) आनंदराव पंवार (धार)
  • (म) सिंधिया (ग्वालियर)
  • (ब) तुकोजीराव पंवार (देवास बड़ी पांती)
  • मल्हारराव की पत्नी गौतमाबाई थी। 1766 ई. में मल्हारराव की मृत्यु आलमपुर में हुई। 
  • खाण्डेराव का विवाह मानकोजी शिंदे की पुत्री अहिल्याबाई से हुआ। 
  • परन्तु खाण्डेराव 1754 ई. में कंुभेरी किले की लड़ाई में मारे गये। 
  • अहिल्या बाई ने पुत्र मालेराव और पुत्री मुक्ताबाई को जन्म दिया। मुक्ताबाई का विवाह यशवंत फडसे से हुआ। पुत्र जन्म के समय मुक्ताबाई का भी निधन हो गया। 
  • मालेराव भी पिता की तरह दुर्व्यसनी था। 1767 ई. में मालेराव भी मृत्यु को प्राप्त हुआ। 
  • तब अहिल्या बाई ने 1767 ई. में शासन की बागडोर संभाली और तुकोजीराव को सेनापति नियुक्त किया जिनकी मृत्यु 1797 में पूना में हुई। 
  • अहिल्या माता ने देशभर में देवालयों, नदी घाट, धर्मशालाओं का निर्माण करवाया और लोककल्याणकारी कार्य किये। 
  • 13 अगस्त 1795 को 70 वर्ष की आयु में में महेश्वर में अहिल्याबाई ईश्वर चरणों में लीन हुई। जन्म 1735 में चौड़ी गाँव (अहमदनगर, महाराष्ट्र) 
  • अन्य शासक काशीराव, यशवंत राव हुए। 
  • अंतिम शासक तुकोजीराव-ससस ने राज्य का विलय भारत संघ में कर दिया। 
  • होल्करों ने 200 वर्षों तक शासन किया। 
  • 2. सिंधिया वंश- इस वंश के संस्थापक राजोजी सिंधिया थे जिन्हें पेशवा ने मालवा का एक भाग 1731 ई. में दिया। 
  • 1745 ई. में राणोजी सिंधिया की मृत्यु हो गई। 
  • 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों की हार हुई। 
  • महादजी सिंधिया युद्ध भूमि से भाग गये। जाट सरदार लोकेंद्रसिंह 
  • ने इस युद्ध के बाद ग्वालियर का किला जीत लिया।
  • 1765 ई. में महादजी सिंधिया ग्वालियर का किला वापस लेने में सफल हुए और मध्य तथा उत्तरी भारत में मराठों की सत्ता पुनः स्थापित की। उज्जैन को राजधानी बनाया। 
  • महादजी ने मुगल शासक शाहआलम को मुक्त करवाया (गुलाम कादिर से)।
  • 1794 में पूना में महादजी का निधन हुआ। 
  • इसके बाद दौलतराव सिंधिया (1794-1827 ई.) उत्तराधिकारी बने और राजधानी ग्वालियर को बनाया। 
  • 1827 में दौलतराव का निधन हुआ। इनका कोई पुत्र नहीं था। 
  • इसके बाद जकोजी सिंधिया में शासन किया। 
  • जकोजी की विधवा ताराबाई का दत्तंक पुत्र जयाजीराव अगला शासक बना। 
  • 1857 में विद्रोह के सयम ग्वालियर का शासक जयाजीराव सिंधिया था जिसने ब्रिटिश सरकार की मदद की। 
  • 1886 ई. में जयाजीराव की मृत्यु के बाद माधवराव प्रथम शासक बने जिनकी मृत्यु 1925 ई. में हुईं। 
  • तब 9 वर्षीय जीवाजीराव सिंधिया शासक बने। 
  • 1948 में दिल्ली में मध्यभारत के राजाओं के सम्मेलन में 25 रियासतों और मालवा, इन्दौर, ग्वालियर का संयुक्त संघ बना जिसे मध्यभारत नाम दिया गया। (उद्घाटन जवाहरलाल नेहरू द्वारा) 
  • मध्यभारत के पहले राजप्रमुख के रूप में जीवाजी राव सिंधिया ने शपथ ली। 
  • जीवाजीराव के पुत्र माधवराव सिंधिया जो ग्वालियर से सांसद भी रहे, हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई। 
  • माधव राव के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया केन्द्र सरकार में राज्यमंत्री रहे और म.प्र. क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। 

आधुनिक काल
  • मराठों का उत्कर्ष और ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत आगमन से म.प्र. में कई प्रभाव लक्षित हुए। 
  • अंग्रेजों ने मराठों के साथ हुए 4 युद्धों के पेशवा, होलकर, सिंधिया और भोंसले को पराजित किया। 
  • अंग्रेजों के सिंधिया से पूर्वी निमाड़ और टिमरनी छीन लिया और मध्यप्रांत में मिला लिया। 
  • अंग्रेजों ने होलकर को भी सीमित किया और मध्यभारत के छोटे-छोटे राजाओं को जो मराठों के अधीन सामंत थे, राजा मान लिया और फूट डाली। 
  • मध्य भारत में सेंट्रल इंडिया एजेंसी स्थापित की गई। 
  • मालवा को कई रियासतों में बाँटकर इन पर नियंत्रण हेतु नीमच, महू, बैरागढ़ (भोपाल) में छावनियाँ स्थापित की।
  • 1804 ई. में लार्ड वैलेजली व सिंधिया के बीच सहायक सिंध हुई। 
  • डलहौजी की हड़प नीति ने राजाओं में रोष पैदा कर दिया। 

1857 की क्रांति 
  • 1824 में चंद्रपुर (सागर) के जवाहरसिंह बंुदेला ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी। 
  • सागर, दमोह, नरसिंहपुर, जबलपुर, मण्डला, होशंगाबाद के क्षेत्रों में भी विद्रोह होने लगे। 
  • तात्या टोपे और नानासाहब पेशवा के संदेशवाहकों ने ग्वालियर, महू, नीमच, मंदसौर, जबलपुर, सागर, दमोह, भोपाल और विन्ध्य क्षेत्र में घूम-घूम कर राष्ट्रीय भावना का प्रसार किया। 
  • सैनिकों, किसानों और ग्रामीणों के मध्य संदेश ‘रोटी और कमल‘ के फूल के माध्यम से पहुँचाया जाने लगा। 
  • 3 जून 1857 को नीमच छावनी में विद्रोह भड़का । मंदसौर में भी विद्रोह हुआ।
  • 14 जून 1857 को ग्वालियर छावनी में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। 
  • शिवपुरी, गुना में भी विद्रोह भड़का। 
  • शेख रमजान के नेतृत्व में सागर छावनी में विद्रोह हुआ। 
  • महाराजा सयाजीराव सिंधिया ने भागकर आगरा में अंग्रेजों के यहाँ शरण ली। 
  • 1 जुलाई 01857 को सदाअत खाँ के नेतृत्व में होलकर नरेश की सेना ने महू छावनी में विद्रोह कर दिया। 
  • इस समय इन्दौर में मौजूद अंग्रेज अधिकारी कर्नल डयूरेंट, स्टुअर्ट आदि सीहोर भाग गये। 
  • भोपाल की बेगम ने अंग्रेजों को संरक्षण दिया। 
  • अमझेरा के राव बख्तावसिंह ने विद्रोह किया। धार, भोपाल आदि क्षेत्र विद्रोहियों के कब्चे में आ गये। 
  • मण्डलेश्वर, सेंधवा, बड़वानी में भीमा नायक ने नेतृत्व संभाला। 
  • मण्डला में रामगढ़ रियासत की रानी अवंतीबाई ने नेतृत्व किया। 
  • गढ़मण्डला के शंकरशाह, रघुनाथ शाह और राधवगढ़ के राजा सूरजप्रसाद ने महाकौशल क्षेत्र में विद्रोह किया। 
  • 1857 की क्रांति के फलस्वरूप ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आ गया। 
  • मध्यभारत की रियसतों, भोपाल नवाब और विन्ध्यन की रियासतों के साथ अंग्रेजों ने सहायक संधि कर संरक्षण दिया। 
  • 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना बम्बई में हुई। 
  • 1891 में 7वाँ अधिवेशन नागपुर में हुआ। तिलक द्वारा प्रांरभ गणेश उत्सव, शिवाजी उत्सव तथा अखाड़ों के माध्यम से मालवा में भी राष्ट्रीय भावना का प्रसार होने लगा। 
  • 1905 में म.प्र. में कांग्रेस का पहला अधिवेशन नागपुर में हुआ जिसके आयोजक दादा साहब खापड़े थे। 
  • 1906 में गंगाधन चिटनीस ने जबलपुर में प्रांतीय अधिवेशन बुलाया। जिसमें मध्यभारत से बाबूराव किनछेड़े, अब्दुल्ला अजीज, भोपाल हरीभिड़े ने भाग लिया। 
  • 1907 में रहिसिंह गौर ने इसका आयोजन रायपुर में किया। 
  • 1916 में सिवनी में सत्याग्रह हुआ। गाँधीजी ने असहयोग एवं खिलाफत आंदोलन की घोषाणा की। 
  • म.प्र. में डुण्डीराज जाटव और अब्दुल गफ्फार खान ने खिलाफत आंदोलन (1920) को संगठित किया।
  • असहयोग आंदोलन (अगस्त 1920) में म.प्र. से सेठ गोविंददास, पं. द्वरिका प्रसाद, ठाकुर लक्ष्मण सिंह और पं. रविशंकर शुक्ल ने नेतृत्व किया। 
  • 1923 में श्यामसंुदर भार्गव, सुभद्राकुमारी चौहान, अब्दुल कादिर सिद्धिकी ने धरना सत्याग्रह एवं प्रदर्शन किया। 
  • 1923 में जबलपुर में झण्डा सत्याग्रह हुआ। 
  • पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने कर्मवीर पत्र के प्रकाशन के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया। 
  • 12 मार्च 1930 को प्रांरभ दाण्डी यात्रा 6 अप्रैल 1930 को समाप्त हुई। 
  • 7 अप्रैल 1930 से म.प्र. में स्थान-स्थान पर आंदोलन शुरू हो गये। 
  • म.प्र. में जबलपुर में रानी दुर्गावती की समाधि से सेठ गोविंदददास एवं पं. द्वारिकाप्रसाद मिश्र के नेतृत्व में चल समारोह निकाला गया और खण्डवा, सीहोर, जबलपुर आदि स्थानों पर नमक कानून तोड़ा गया। 
  • सिवनी में दुर्गाशंकर मेहता ने गाँधी चौक पर नमक बनाकर सत्याग्रह शुरू किया। 
  • 8 अप्रैल 1931 को सीहोर, कटनी, मण्डला, दमोह में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ। 
  • सिवनी (दुरिया) के आदिवासियों ने वन सत्याग्रह (1930) किया। 
  • घोड़ा डोंगरी में वन सत्याग्रह का नेतृत्व राजन सिंह कोरकू ने किया। 
  • 1931 में छतरपुर में चरण पादुका ग्राम में कर्नल फिशर ने स्वतंत्रता सेनानियों की शांतिपूर्वक बैठक पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाई। जिसमें 6 लोग शहीद हुए। इस घटना की तुलना जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड (19 अप्रैल 1919, अमृतसर, जनरल डायर) से की गई। 
  • 1954 में न.पी. केलकर के नेतृत्व में कांग्रेस ने एक अखिल भारतीय प्रजा परिषद का गठन किया।
  • कालांतर में मध्य भारत, विन्ध्यप्रदेश, भोपाल प्रजामण्डल की स्थापना हुई। 
  • झाबुआ एवं धार जिले में ब्रिटिश ध्वज यूनियन जैक जला दिया गया। 
  • 1939 में जबलपुर से पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही विनोबा भावे बने। 
  • 1942 में मण्डलेश्वर में बंदी क्रांतिकारियों ने जेल का मुख्य द्वार तोड़ दिया। भारत छोड़ो आंदोलन के समय कई भूमिगत नेता रतलाम में रहे। 
  • मालवा क्षेत्र में इन्द्रनारायण पुराणिक, मालिनी सरवटे, इन्दु पाटकर, जौहरीलाल झांझरिया को 1942 में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। 
  • सतना के लालसिंह पद्यमधर पुलिस की गोली से शहीद हुए। 
  • 1942 के आंदोलन के पूर्व भोपाल राज्य प्रजामण्डल के पदाधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। 
  • रीवा जिले के पं. शंभूनाथ शुक्ल तथा चंद्रकांत शुक्ल ने कॉलेज में पढ़ रहे छात्रों में राष्ट्रीय भावना का प्रसार किया। शहडोल से श्री छोटेलाल पटेल ने लोगों में जागृति फैलाई। 
  • 1942 में साबूलाल जैन (सागर), उदयचंद्र जैन (मण्डला), गुलाबसिंह (जबलपुर) की पुलिस गोलीबारी में मृत्यु हो गई। 
  • नरसिंहपुर के चिचली ग्राम में मंशाराम ताम्रकार और गौरीबाई का निधन हो गया। 
  • बैतूल जिले के आदिवासियों ने भी (वर्षा गोड़, महादेव तेली) भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। 
  • भाबरा (अलीराजपुर) से चंद्रशेखर आजाद सशस्त्र संघर्ष के नेता बने।
  • 15 अगस्त 1947 को मध्यभारत की रियासतों को मिलाकर मध्यभारत राज्य बना। 
  • रीवा, पन्ना, छतरपुर का एकीकरण कर विन्ध्य प्रदेश बना। 
  • भोपाल को स्वतंत्र राज्य बनाया गया। 
  • 1 नवम्बर 1956 को म.प्र. का गठन हुआ। 
  • 1 नवम्बर 2000 को म.प्र. से छत्तीसगढ़ पृथक राज्य बना। 

1857 क्रांति के प्रमुख नेता 

  • शेख रमजान-सागर 
  •  टंट्या भील-निमाड़ 
  • शंकरशाह-गढ़ामण्डला 
  • राजा ठाकुर प्रसाद-राघवगढ़
  • नारायणसिंह-रायपुर 
  • शहादत खाँ-महू
  • रानी लक्ष्मीबाई-झाँसी-कालपी 
  • सुरेंद्रराय-संबलपुर (छ.ग.)
  • तात्या टोपे-कानपुर-झाँसी-ग्वालियर
  • भीमा नायक-मण्डलेश्वर 
  • रानी अवंतीबाई-रामगढ़ 
  • झलकारी बाई-
  •  झाँसी (लक्ष्मीबाई)
  • गिरधरी बाई-रामगढ (अवंतीबाई)
  • श्री बहादुर एवं देवीसिंह-मण्डला  

No comments

Powered by Blogger.