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मध्य प्रदेश के प्रमुख जिले एवं उनकी विशेषताएँ ( District of MP and their Features)

  • श्योपुर जिला - यह जिला अपनी काष्ठ कला के लिए ख्यात है। 
  • भिण्ड जिला - पश्चिम-उत्तर  एवं पूर्व दिशा से पाँच नदियाँ चंबल, क्वारी, वैसली, सिंध एवं  पहुज नदियाँ प्रवाहित होती हैं। जिले में प्रवाहित प्रमुख व उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित बीहड़ 40,517 हेक्टेयर है। 
  • गुना जिला - जिले को मालवा और चंबल का प्रवेश द्वार कहा जाता है। प्राचीन में गुना अवंती साम्राज्य का हिस्सा था। 15 अगस्त, 2003 को गुना जिले को विभाजित कर अशोक नगर निर्माण कर दिया गया। 
  • अशोकनगर जिले तहत प्रमुख दर्शनीय स्थल चंदेरी का किला है। 
  • दतिया जिला - दतिया में पीताम्बरा देवा का प्रसिद्ध मंदिर है। इसके अतिरिक्त सोनागिरी और बदौनी के मंदिर भी दतिया के प्रमुख दर्शनीय स्थल है।
  • शिवपुरी जिला - कभी सिपरी के नाम से जाना जाता था। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे को 1851 में अंग्रेजों द्वारा फाँसी पर यहीं लटकाया गया था। शिवपुरी का माधव राष्ट्रीय उद्यान, नरवर का किला, टाइगर सफारी, माधव विलास महल और बोट क्लब महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल हैं।
  • देवास जिला- यह जिला चित्रकला में मालवा तथा राष्ट्रीय धारा का महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। संगीत सम्राट स्वर्गीय पंडित कुमार गंधर्व  इसके राष्ट्रीय गौरव हैं। ब्रिटिश काल में देवास में प्रसिद्ध अंग्रेजी उपन्यासकर ई.एम. फास्टर का निवास सागर महल में था। उन्होंने विश्व प्रसिद्ध रचनाएं ‘ए पेसेज टू इंडिया‘ ‘हिल ऑफ गॉडेस‘ लिखीं। 
  • नागदा में पुरातत्वीय अवशेष, सतवास में शेरशाह सूरी कालीन मस्जिद, फतेहगढ़ का किला, नेमावर में नर्मदा के तट पर स्थित सिद्धेश्वर महादेव का मंदिर विशेष महत्व रखते हैं। 
  • जिले की बागली में बरझारी ग्राम से निकलने वाली कालीसिंध नदी जिसे ग्रेटर काली सिंध भी कहा जाता है। शिप्रा नदी देवास जिले की पश्चिमी सीमा का निर्माण करती है। 
  • मंदसौर- दशपुर (मंदसौर) मालवा का सिंहद्वार तथा राजस्थान का सीमांत प्रहरी कहलाता है। मंदसौर क्षेत्र में अरावली तथा विन्ध्य की पर्वत श्रृखंलाएं क्रमशः उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण-पूर्व में फैली है। चंबल और शिवना दो प्रमुख नदियाँ बहती हैं। भानपुर क्षेत्र में हिंगलाजगढ़ एवं गाँधी सागर अभ्यारण्य क्षेत्र में वन्य अभ्यारण्य है। 
  • नीमच - यह भारत भर में सी.आर.पी.एफ. एवं अफीम फैक्ट्री के लिए प्रख्यात है। सीमेंट उत्पादन व इमारती पत्थर के उत्पादन की दिशा में भी इसकी अपनी पहचान है। 
  • इंदौर जिला- इस शहर की नींव सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में खान और सरस्वती नदी के किनारे पर रखी गई थी। अहित्याबाई होल्कर का यशस्वी नाम भी इंदौर के इतिहास के साथ जुड़ा है। इंदौर के अलावा महेश्वर के निर्माण कार्य भी उनके नाम जुड़े हैं। इंदौर का नाम सांस्कृतिक कला और खेल जगत की कई विख्यात हस्तियों के साथ जुड़ा है। सी.के. नायडू, मुश्ताक अली जैसे क्रिकेट के दिग्गज इंदौर से संबंधित थे। तो वहीं एम.एफ. हुसैन और एन.के.बेन्द्र जैसे विख्यात चित्रकारों ने अपना काफी समय इंदौर में कला गुरू विष्णु देवलालीकर के सानिध्य में गुजारा।
  • धार जिला- राजा भोज की नगरी धार जिले को भोजशाला, बगरी गुफाओं और मांडव के लिए जाना जाता है। 
  • अलीराजपुर - 17 मई, 2008 को झाबुआ जिले का पुनर्गठन कर राज्य का 49 वाँ जिला अलीराजपुर अस्तित्व में आया। जिले की जनसंख्या 5 लाख 65 हजार 875 प्रशासनिक तौर पर तीन तहसीलांे अलीराजपुर, जोबट, भावरा के जरिए प्रशासित है।  
  • खण्डवा जिला (पूर्वी निमाड़)- प्रदेश के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। 15 अगस्त, 2003 को खण्डवा को विभाजित कर बुरहानपुर नामक अलग जिला बनाया गया। यह जिला नर्मदा और ताप्ती नदियों के बीच स्थित है।  
  • बुरहापुर- इस जिले में अनेक ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों के साथ-साथ अनूठी मुगलकालीन प्राचीन भूमिगत जल वितरण प्रणाली (साइफन) खूनी भण्डरा आदि स्थित हैं। जामा मस्जिद, आहूखाना, बीवी का मकबरा, राजा की छतरी और असीरगढ़ किला आदि प्रमुख हैं। 
  • पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने पूर्वी निमाड़ जिले को अपने कर्मस्थली बनाकर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनजागृति में योगदान किया दिया है। इसके साथ ही उन्होंने कर्मवीर नामक साप्ताहिक समाचार-पत्र का भी प्रकाशन यहीं से किया। जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से एक और पद्मभूषण पंडित भगवंतराम मण्डलाई ने स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग दिया वे मशहूर सिने अभिनेता अशोक कुमार एवं पार्श्व गायक एवं अभिनेता किशोर कुमार भी जिले के थे। 
  • भोपाल जिला- राज्य का भोपाल जिला प्रशासनिक तौर पर 2 तहसीलों हुजूर और बैरसिया में विभक्त हैं। भोपाल जिले की 2001 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 18 लाख 43 हजार 510 है। 11वीं शताब्दी में राजा भोज ने इस शहर को बसाया था। 1 मई, 1949 को भोपाल रियासत का भारत में विलय हो गया। 
  • सीहोर जिला - ऐतिहासिक एवं कृषि प्रधान जिला है। 1972 से पूर्व राजधानी भोपाल, इसी जिले के अंतर्गत आती थी। सीहोर अंग्रेजों का छावनी रहा है। प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख सिद्धपुर के रूप में मिलताहै। 
  • राजगढ़ जिला - जिले में पार्वती, काली सिंध, नेवज  प्रमुख नदियाँ हैं।
  • सागर जिला- सघन और पर्वतीय गुफाओं तथा सोनार, धसान, बीना, बेतवा आदि नदियों से सिंचित यह भू-भाग प्रौद्योतिहासिक कालीन मानव की क्रीड़ा स्थली रहा है। इस जिले का भू-भाग रामायण व महाभारत काल में विदिशा और दशार्ण जनपदों में सन्निहित था। ईसा पूर्व छठी शती में यह चेदि जनपद का भाग बना। सम्राट समुद्रगुप्त के समय में ऐरण, जिसे अभिलेखों में स्वभोग नगर कहा जाता है, राजकीय तथा सैनिक गतिविधियों के साथ ही वास्तुकला का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा। 13वीं-14वीं शती में यह क्षेत्र मुगलों के अधीन रहा। बाद में धामोनी, गढ़ाकोटा और खिमलासा में मुगल सेना को परास्त कर महाराज छत्रसाल ने अपना राज्य स्थापित किया। सन्1818 के पश्चात् यह क्षेत्र ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था। 1861 में प्रशासनिक व्यवस्था के लिए इस क्षेत्र को नागपुर से मिला लिया गया तथा यह व्यवस्था सन् 1956 तक नए मध्य प्रदेश राज्य के पुनर्गठन तक बनी रही।
  • दमोह जिला - जिले के तहत जैन धर्मावलंबियों का प्रसिद्ध तीर्थ कुंडलपुर हिन्दू तीर्थ बान्दकपुर आता है। 
  • पन्ना जिला - यह महामति श्री प्राणनाथ जी के दर्शनीय मंदिर तथा प्रमामी सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थ के लिए विख्यात है। पन्ना जिला ऐतिहासिक धरोहर एवं सुरम्य प्राकृतिक स्थलों से समृद्ध है। यहाँ अजयगढ़ का किला, नांदचांद मंदिर, किशोरजी मंदिर, बलदाऊजी मंदिर, राम जानकी मंदिर जैसी ऐतिहासिक धरोहर हैं। केन, व्योरमा, मिढासन, पतने एवं गल्को नदियाँ जिले के मध्य क्षेत्र में बहती हैं। केन नदी जिले के दक्षिण भाग से संपूर्ण जिले को पार कर बहती हुई उत्तरप्रदेश में प्रवेश करती है। इस नदी में पन्ना, छतरपुर पर बरियापुर, गंगऊ सिंचाई बाँध उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा निर्मित कराए नए हैं।
  • पाण्डव जल-प्रपात एवं गुफाएँ - जिला मुख्यालय से लगभग 15 किमी. दूर पन्ना-छतरपुर मार्ग पर स्थित है। इस स्थान में महाभारत काल में वनवास के समय पाण्डवों ने कुछ समय बिताया था इसलिए इसका नाम पांडव जल-प्रपात हो गया। यहाँ पर गुफाएँ हैं जो वर्तमान में खंडहर में परिवर्तित हो गई हैं। सन् 1930 में विख्यात क्रांतिकारी श्री चन्द्रशेखर आजाद ने गुप्त रूप से इस स्थान पर कुछ समय बिताया था। 
  • अजयगढ़ किला - पन्ना मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर। 
  • विष्णु वराह मंदिर (पुराना)- पन्ना नगर से लगभग 110 किलोमीटर दूर।
  • राष्ट्रीय उद्यान- पन्ना मुख्यालय से लगभग 18 किलोमीटर दूर है। 
  • पन्ना जिला में मझगंवा की हीरा खदानें - यहाँ केन्द्र सरकार के उपक्रम द्वारा हीरा उत्खनन का कार्य किया जाता है। 
  • छतरपुर जिला - छतरपुर जिले की अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति है। जिले के पूर्व और पश्चिम में केन और धसान नदियाँ प्रवाहित हैं। यमुना नदी के जलग्रहण क्षेत्र में स्थित इस जिले में इन दो प्रमुख नदियों के अलावा उर्मिल, कुटनी, बारना, श्यामरी और केन भी अपनी जलधारा प्रवाहित करती हैं। खजुराहों के मंदिरो को 9वीं सदी से लेकर 11वीं सदी तक धंग, गंड व विद्याधर जैसे चंदेल राजाओं ने प्राचीन भारतीय शिल्पकला से सँवारा। लक्ष्मण मंदिर, चौंसठ योगिनी मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर तथा कंदरिया महादेव मंदिर सहित सभी मंदिर इस प्राचीन गाथा के वाचक हैं। 
  • टीकमगढ़ जिला - यह जिला प्रि-कैम्ब्रियन युगीन ज्वालामुखी शैलों से बना हैं, जिन्हें भूगर्भिक इतिहास मं बंुदेलखण्ड नीस नाम दिया गया है। इन शैलों का निर्माण 2300 मिलियन वर्ष पूर्व ज्वालामुखी उदगार से निश्रृत लावा से हुआ है। 
  • जबलपुर जिला - जाबालि ऋषि की तपोभूमि के नाम पर जिले का नाम जबलपुर पड़ा बरेला के पास रानी दुर्गावती की समाधि है। मदनगिरि पहाड़ी पर स्थित मदन महल का किला प्राचीन वास्तुकला का अनुपम नमूना है। रूपनाथ में सम्राट अशोक का एक लघु शिलालेख स्थित है। जबलपुर नगर में पिसनहारी की मढि़या और भेड़ाघाट में चौसठ योगिनी मंदिर अन्य दर्शनीय स्थल है। कलचुरी कला (ईशा की दसवीं- ग्याहरवीं सदी) में कला तथा संस्कृति का केन्द्र जबलपुर शहर अपने संपूर्ण वैभव पर था। सोलहवीं शताब्दी में महान गोंड सामा्रज्ञी दुर्गावती ने जबलपुर को नई गरिमा दी। अंग्रेजों के विरूद्ध आजादी की लड़ाई में हिरदेन शाह और शंकरशाह के बलिदानों ने नई चेतना दी। जिले में उच्च न्यायालय गन कैरिज फैक्ट्री, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, वन अनुसांधन केन्द्र राष्ट्रीय खरपतवार नियंत्रण केन्द्र आदि महत्वपूर्ण संस्थाएँ स्थित हैं। देश की आजादी के आंदोलन के रास बिहारी, दादा साहब खापर्डे, शैलन्द्र नाथ घोष, प्र्रकुल्ल कुमार घोष, मदन मोहन मालवीय, सेठ गोविन्द दास, विष्णु दत्त शुक्ल, महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस, हकीम अजमल खाँ, पं. जवाहरलाल नेहरू, खान अब्दुल गफ्फार खाँ, मौलाना अबुल कलाम, जयप्रकाश नारायण, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसी महान विभूतियों को योदान सर्वज्ञात है। महात्मा गाँधी का पाँच बार आगमन हुआ। नेताजी सुभाष चंद्र बोस दो बार यहाँ केन्द्रीय जेल में रहे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रसिद्ध झंडा सत्याग्रह जबलपुर से प्रारंभ हुआ। जबलपुर से अनेक उत्कृष्ट दर्जे के अखबार चेतना जाग्रत करने में लगे हैं। यहाँ की पत्रकारिता को माधव राव सप्रे, माखनलाल चतुर्वेदी, नर्मदा प्रसाद द्विवेदी, नरसिंह दास अग्रवाल, द्वारका प्रसाद मिश्र मनोहर कृष्ण गोलवलकर, लक्ष्मण सिंह चौहान, मायाराम सुरजन, गजानन माधव मुक्तिबोध, रामेश्वर प्रसाद गुरू जैसे अनेक मनीषियों का सानिध्य मिला।
  • कटनी जिला -इसका पुराना नाम मुड़वारा है। बिलहारी को पुष्पावती नगरी कहा जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो वहाँ कलचुरी काल की पुरासंपदा महल, बावड़ी, विष्णुवाराह, तामसी मठ सहित कामकंदला जैसे अनेक स्थल आज भी मौजूद हैं। कटनी वर्ष 1998 में स्वतंत्र जिला बना। जिले में चूना-पत्थर, डोलोमाइट, बाक्साइट मार्बल, फायरक्ले एवं लेटराइट के भंडार पाये जाते हैं। कटनी का चूना उद्योग न केवल प्रदेश बल्कि सारे देश में पहचाना जाता है। कटनी औद्योगिक दृष्टि से प्रदेश का विकसित जिला है। एसोसिएशन सीमेन्ट कैम्प कैमोर, एररनिट एम्बेटेड लिमिटेड कैमोर, एसीसी मेहगाँव, एसीसी पॉवर प्लांट कैमोर, एसीसी रिफरेक्टरी कटनी, ऑर्डिनेंस फैक्टरी कटनी, डाबर इण्डिया लिमिटेड, वर्न स्टैण्डर्ड कंपनी, निवार में ओजस्वी मार्बल इत्यादि ने जिले को औद्योगिक पहचान दी है। जिले के बहोरीबंद विकास खण्ड में आशेक के समय (332 ईसा पूर्व) का प्राचीनतम शिलालेख है। 
  • नरसिंहपुर जिला-जिले में जल स्त्रोतों के तौर पर नर्मदा एवं उसकी सहायक नदियाँ शेर, सीतारेवा, शक्कर ऊमर एवं दुधी हैं। 
  • रीवा जिला -जिले की पहचान सफेद शेरों (बाघों) की जन्म स्थली के रूप में है। चचाई प्रपात, विलौही जल प्रपाल तथा क्योटी जल प्रपात रीवा जिले के नैसर्गिक मनोरम स्थल है। जिले में कई बड़े उद्योग स्थापित है। इनमें जे.पी. सीमेंट फैक्ट्री, विंध्य टेली आदि प्रमुख हैं। 
  • सीधी जिला -प्रदेश का पूर्वोत्तर हिस्सा है। जिले को तीन प्राकृतिक भागों में विभक्त किया गया है। 
  • 1. उत्तर की कैमोर श्रेणी 
  • 2. सोन नदी की घाटी 
  • 3. मझौली एवं मड़वास का पठार 
  • सीधी जिला 6वीं शताब्दी में प्रतिहारों के प्रभुत्व है। 7वीं शताब्दी के अंत में कल्चुरियों का प्रभाव स्थापित हुआ। इसी वंश के युवराज देश प्रथम के शासन काल में ग्राम चन्दरेह में शिव मंदिर तथा शैव मठ का निर्माण कराया गया। सोलहवीं शताब्दी में यह क्षेत्र बघेलों के आधिपत्य में चला गया जो स्वतंत्रता तक अंतिम बघेल शासक महाराज मार्तण्ड सिंह जूदेव के अधीन रहा। 
  • सिंगरौली जिला- यह नया जिला बेशकीमती खनिजों से परिपूर्ण है। जिले में कोयले के अपार भण्डार हैं। नॉर्दन कोल्डफील्ड के अंतर्गत नौ खदानें संचालित हैं साथ ही एन.टी.पी.सी. का 4000 मेगावाट का पॉवर प्लांट स्थापित है। ऐतिहासिक गुफा मारा भी स्थित है। जिले को दो प्राकृतिक भागों में बाँटा जा सकता है। 
  • देवसर की पहाडि़याँ  सिंगरौली का मैदान-यह गोंडवाना लैण्ड का अपशिष्ट भाग है। 
  • सतना जिला - चित्रकूट, शारदा देवी मैहर, रामवन एवं बिरसिंह आदि धार्मिक एवं पुनीत स्थलों की पवित्र स्थली है। 
  • शहडोल जिला-  इसका नाम (सहस्त्र$डोल) से बना है। महाभारतग्रंथ में पाण्डवों के अज्ञातवास के दौरान जिस विराट नगर का वर्णन है, वह शहडोल जिला मुख्यालय ही है, जिसके सम्राट राजा विराट थे। बाणगंगा में पाताल तोड़ अर्जुन कुण्ड स्थित है। बुढ़ार नगर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख केन्द्र रहा है। हुकुमचंद्र जूट मिल रसायन उत्पादन में प्रमुख हैं। नरसरहा ग्राम में औद्योगिक क्षेत्र स्थित है। सोहागपुर में कोयला की बड़ी खदानें हैं। 
  • अनूपपुर जिला- खनिज संसाधनों की दृष्टि से भरपूर है। जिले में कोयले के अलावा, बाक्साइट और क्ले का उत्खनन होता है। 
  • डिण्डोरी जिला -रानी अवंतीबाई के कारण जिले की एक पहचान है। अमरकंटक और डिण्डोरी के बीच नर्मदा के ऊपरी संभाग में 12 स्थानों में पाँच में मध्य पाषाण कालीन तथा शेष उत्तर पाषाण कालीन औजार प्राप्त हुए हैं। ये औजार चर्ट पत्थर के बने होते हैं। शहपुरा स्थित घुघवा जीवाश्म उद्यान है। 25 मई, 1998 को डिण्डोरी जिले का गठन हुआ।
नर्मदापुरम संभाग 
  • नर्मदापुरम संभाग का नामकरण 27 अगस्त, 2008 को किया गया। इसके तहत होशंगाबाद, हरदा और बैतूल जिले आते हैं। होशंगाबाद शहर की स्थापना माण्डू (मालवा) के द्वितीय राजा सुल्तान हुशंगशाह गौरी द्वारा पन्द्रहवीं शताब्दी के आरंभ की गई थी। जिले का लगभग 44 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है। विकास खण्ड टिमरनी, खिरिकिया तथा हरदा में सागौन एवं बाँस के बहुमूल्य वन हैं। वन ग्रामों में मुख्य रूप से कोरकू एवं गौंड जनजाति के लोग निवास करते हैं। जिले में कृषि जोत का औसत आकार 5.4 है। जिले में नर्मदा नदी के नाभि कुण्ड, हंडिया में तेली की सराय, जोगा का किला, बीवर की गुफाएँ, गंगेसरी मठ, गुप्तेश्वर महादेव, चारूवा मंदिर एवं मकड़ाई का किला जैस पुरातात्विक महत्व के स्थान हैं। ताप्ती, माचना, पूर्णा और बेल नदी का उद्गम है। ताप्ती नदी देश की पवित्र नदियों में एक है। जैन तीर्थ मुक्तागिरि, ताप्तीकुण्ड, भैंसदेही का शिव मंदिर, सलाजपुर के गुरू साहब की सामधि। खेड़ला, भंवरगढ़, सांवलीगढ़ आदि किले अपने-अपने ऐतिहासिकता का बखान करते हैं। बैतूल जिले में सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी खामला है। इसे कुकरू खामला के नाम से भी जाना जाता है। कुकरू कॉफी उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है। 

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