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साइमन आयोग, असहयोग आंदोलन (1920 ई.),सविनय अवज्ञा आंदोलन

 साइमन आयोग
  • 1919 के अधिनियम मेँ इस बात की व्यवस्था की गई थी कि दास वर्षों के पश्चात मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों की समीक्षा तथा उसमे परिवर्तन की संभावनाओं की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया जाएगा। इस प्रावधान के तहत 1929 मेँ एक आयोग की नियुक्ति की जानी थी।
  • तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने निर्धारित समय से दो वर्ष पूर्व 8 नवंबर 1927 को इंडियन इंस्टीट्यूट आयोग की नियुक्ति कर दी। सात सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे, जिनके नाम पर यह साइमन आयोग के नाम से विख्यात हुआ।
  • कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन मेँ इस आयोग का बहिष्कार का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया।
  • फरवरी 1928  को समय साइमन आयोग भारत आया। साइमन आयोग के भारत आने पर देश के सभी नगरों में हड़तालों एवं जुलूसों का आयोजन किया गया।
  • जनता के विरोध को कुचलने के लिए सरकार ने निर्मम दमन तथा पुलिस कार्यवाहियों का सहारा लिया।
असहयोग आंदोलन (1920 ई.)

  • प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् आत्मनिर्णय की भावना को बल मिला इसके साथ ही रौलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड, पंजाब मेँ मार्शल ला तथा खिलाफत के विवाद आदि घटनाओं से अंग्रेजों के प्रति भारतीय दृष्टिकोण मेँ व्यापक परिवर्तन आया।
  • जनता इन घटनाओं के लिए सरकार से खेद प्रकट करने की अपेक्षा कर रही थी। इसके विपरीत परिस्थितियोँ मेँ आंदोलन के एक और चक्र के प्रारंभ के लिए वह तैयार थी।
  • 1920 मेँ नागपुर मेँ आयोजित कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन, जिसकी अध्यक्षता विजय राघवाचारी कर रहै थे, मेँ असहयोग आंदोलन का अनुमोदन कर दिया गया।
  • सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए दमनात्मक नीति का सहारा लिया आंदोलन के स्वरुप मेँ स्थान परिवर्तन के साथ-साथ भिन्नता आई।
  • फरवरी 1922 को चौरी-चौरा नामक गाँव मेँ तीन हजार किसानो के एक कांग्रेसी जुलूस पर पुलिस ने गोली चलाई। किसानो की खुद भीड़ ने थाने पर हमला करके थाने मेँ आग लगा दी। जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए।
  • गांधीजी चूँकि हिंसा मेँ विश्वास नहीँ करते थे, इसलिए उनहोने 12 फरवरी 1922 को बारदोली मेँ हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक मेँ असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय किया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन

  • फ़रवरी 1930 मेँ साबरमती आश्रम मेँ कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक मेँ सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने की संपूर्ण शक्ति महात्मा गांधी के हाथ मेँ सौंप दी गई।
  • गांधीजी ने 31 जनवरी, 1930 को लार्ड इरविन के समक्ष अंतिम चेतावनी के रुप मेँ अपनी 11 सूत्री मांग रखी, जिसे अस्वीकार किए जाने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने की चेतावनी दी।
  • लॉर्ड इरविन द्वारा 11 सूत्री मांगोँ को अस्वीकार कर दिया जाने के बाद गांधी जी के समक्ष आंदोलन शुरु करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीँ था।
  • गांधी जी ने 12 मार्च, 1930 को अपने चुने हुए 78 स्वयं सेवको के साथ दांडी के लिए यात्रा शुरु की। 24 दिनोँ मेँ दांडी पहुंचकर महात्मा गांधी ने 6 अप्रैल को नमक कानून का उल्लंघन किया।
  • बंगाल मेँ मानसून के आगमन की वजह से नमक बनाना कठिन था, अतः वहां यह आंदोलन चौकीदारी विरोधी तथा यूनियन बोर्ड विरोधी आंदोलन के रुप मेँ चलाया गया।
  • महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा मध्य प्रांत मेँ जंगल कानूनो कथा असम मेँ कनिंघम सर्कुलर, जिसके अंतर्गत छात्रों तथा उनके परिजनोँ को चारित्रिक प्रमाणपत्र प्राप्त प्रस्तुत करने होते थे, का विरोध प्रारंभ हुआ।
  • निर्ममता पूर्वक दमन के बाद भी यहाँ आंदोलन की तीव्र गति को देख कर लार्ड इरविन ने महात्मा गांधी से समझौते का प्रयास किया। सरकार द्वारा यह आश्वासन दिए जाने पर कि हानि उठाने वालोँ को हर्जाना मिलेगा। 5 मार्च, 1931 को गांधी इरविन समझौते के बाद आंदोलन वापस ले लिया गया।
नेहरु रिपोर्ट (1928)

  • साइमन आयोग की नियुक्ति और उसके विरोध के पश्चात भारत सचिव ने भारतीयोँ की क्षमता पर प्रश्नचिंह लगाते हुए उन्हें अपने लिए एक सर्वमांय संविधान बनाने की चुनौती दी।
  • डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी की अध्यक्षता मेँ एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन 19 मई, 1926 को किया गया। इस सम्मेलन के अंत मेँ मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता मेँ एक समिति गठित की गई।
  • इस समिति 10 अगस्त, 1928 को लखनऊ मेँ हुए एक सर्वदलीय सम्मेलन मेँ अपने, संविधान का प्रारुप पेश किया, जिसे नेहरु रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है।
  • रिपोर्ट मेँ भारत को डोमेनियन राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग पर बहुमत था लेकिन राष्ट्रवादियोँ के एक वर्ग को इस पर आपत्ति थी। वह डोमेनियन राज्य के स्थान पर पूर्ण स्वतंत्रता का समर्थन कर रहे थे।
  • लखनऊ मेँ डाक्टर अंसारी की अध्यक्षता मेँ पुनः सर्वदलीय सम्मेलन हुआ, जिसमेँ ‘नेहरु रिपोर्ट’ को स्वीकार कर लिया गया।

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