उत्सर्जन तन्त्र से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य | Excreation Important Fact in Hindi

उत्सर्जन तन्त्र से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य

उत्सर्जन तन्त्र से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य | Excreation Important  Fact in Hindi



 उत्सर्जन तन्त्र से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य

  • केंचुआ जल की आधिक्य में अमोनिया परन्तु जल की कमी होने पर यूरिया का उत्सर्जन करता है। मनुष्य एक यूरियोटेलिक (Ureotelic) प्राणी है अर्थात् नाइट्रोजीनस कचरे के रूप में यह यूरिया का उत्सर्जन करता हैपरन्तु इससके मूत्र में अल्प मात्रा में यूरिक अम्ल पाया जाता है। यदि किसी कारणवस शरीर में अपेक्षाकृत अधिक यूरिक अम्ल बनने लगता हैतो यह शरीर के जोड़ों (Joints), कोमल ऊतकोंवृक्क आदि में यह जमा होने लगता है तथा गठिया (Gout) रोग के लक्षण उत्पन्न करता है। इसमे वृक्क के अक्रियाशील होने का डर रहता है। 
  • अमोनिया से यूरिया का निर्माण यकृत में होता है। 
  • उभयचर सामान्यतः दिन में मूत्र त्याग नहीं करते।

  • वैसे जन्तु जो वातावरण में होने वाले अधिक परासरणी भिन्नता को झेलने में सक्षम होते हैंयूरोहेलाइन (Euryhaline) कहलाते हैं। इसके विपरीत परासण भिन्नता के कम रेज (Range) को झेलने वाले प्राणी के स्टेनोहेलाइन (Stenohaline) कहा जाता है। 
  • वृक्क अथवा मूत्र नलिका में संक्रमण के कारण मूत्र में मवाद कोशिकाएँ पायी जाती हैं। इस स्थिति को पायूरिया (Pyuria) कहा जाता है। 
  • कभी-कभी युक्त में कैल्सियम ऑक्जेलेटकैल्सियम फॉस्फेटयूरिक अम्ल आदि एकत्रित होकर रवा (Crystals) का रूप धारण कर लेते हैं। यह मूत्र निर्माण तथा मूत्र त्याग में रुकावट उत्पन्न करते हैं। 
  • मूत्रासयमें होने वाले सूजन (Inflammation) को सिस्टाइटिस (Cystitis) कहते हैं। यह जीवाणुओं के संक्रमणरासायनिक अथवा यांत्रिक चोट के कारण होता है।
  • टोड (Toad) तथा लंग फिरोज (Lung Fishes) जल में अमोनिया का स्रावण करते हैं परन्तु जल की कमी होने पर ये यूरिया का निर्माण करते हैं। 
  • मेढक का लाव अथवा टेंडपोल (Tndpole) अमोनिया का उत्सर्जन करता है परन्तु वयस्क मेढक यूरिया उत्सर्जित करता है।
  • झींगा मछली (Prawn) का उत्सर्जी अंगप्रोन ग्रंथि (Green glands) कहलाता है। दूसरी ओरतिलचट्टा (Cockroach) भी प्रॉन की भाँति आर्थ्रोपोडा का सदस्य हैपरन्तु इसमें उत्सर्जी अंग मैल्पोधियन नलिकाओं (Malpighian tubules) के रूप में होते हैं। 
  • मनुष्य के अलावा सभी प्राइमेट्स (Primates) यूरियोटेलिक (Ureotelic) होते हैं।
  • रक्त को छानने को क्रिया नेफ्रॉन्स को ग्लोमेरुलस के अंदर होती है। 
  • मूत्र निर्माण की पूरी प्रक्रिया का नियमन पीयूष ग्रन्थि द्वारा लावित हॉर्मोन वैसोप्रेसीन (Vasopressin) द्वारा होता है।
  • सामान्य से अधिक मात्रा में मूत्र का निकलना डाइयूरेसिस (Diuresis) कहलाता है।
  • डायबिटिज इन्सोपोडस (Diabetes Incipidus) नामक रोग में वैसोप्रेसीन हॉर्मोन नहीं बनता इसके कारण अत्यधिक मात्रा में मूत्र का निर्माण एवं त्याग होता है।
  • चाय तथा कॉफी में पाया जाने वाला कैफोन तथा एल्कालिडीन (Caffeine and Alkalidine) डाइयूरेटिक (Diuretic) होते हैं अर्थात् को मात्रा को बढ़ाते हैं। 
  • गर्भवती महिलाओं के मूत्र में कोरियोनिक गोनैडोट्रॉपिक हॉर्मोन (Chorionic gonadotropic hormone) पाया जाता है। इसकी उपस्थिति के आधार पर ही डॉक्टर उसके गर्भवती होने को प्रमाणित करते है।
  • प्लेट तथा रोटिफर (Flateworms and Rotifers) में उत्सर्जी अंग के रूप में फ्लैम कोशिकाएँ (Flame cells) पायी जाती है। 
  • डायलिसिस (Dialysis) एक ऐसी तकनीक है जिसकी सहायता से अशुद्ध रक्त से अपेक्षाकृत बड़े अणुओं को अर्धपारगम्य झिल्ली (Sem)) permeable membrane) की सहायता से पृथक् किया जाता है। 
  • प्रोटीनूरिया (Proteinuria) एक असामान्य स्थिति हैजिसमें मूत्र के साथ प्रतिदिन लगभग 10-15 ग्राम प्रोटीन बाहर निकलता है। इस रोग को ओडेमा (Oedema) भी कहते हैं। 
  • ऐल्कोहॉल अथवा नशाकारी ड्रग्स के सेवन से ADH स्रावण कम हो जाता हैजिससे अधिक का मूत्र निर्माण होता है।
  • ऐनिस्थिसिया एवं सर्जरी के कारण अधिक ADH स्त्रावित होता हैफलस्वरूप कमगाढ़ा तथा अधिक सान्द्र मूत्र बनता है। यह प्रति प्रवाह क्रियाविधि (Counter-current mechanism) के कारण होता है। 
  • वृक्क द्वारा मूत्र का निर्माण नहीं होना एनूरिया (Anuria) कहलाता है।
  • ओलिगोरिया (Oligourea) कम मूत्र बनने की स्थिति है।
  • मूत्र में रक्त कोशिकाओं की उपस्थिति हीमेटोरिया (Haematorea) कहलाती है। 
  • पॉलीयूरिया (Polyurea) में मूत्र का आयतन बढ़ जाता है।
  • डायसूरिया (Diasuria) में मूत्र त्याग के समय मूत्र नलिका में दर्द होता है। 

ग्लाइकोसूरिया या ग्लूकोरिया (Glycosuria or Glucosuria)- 

इस रोग में मूत्र के साथ अथवा शर्करा निकलने लगता है। यह मुख्य रूप से डायबिटीज के रोगियों में होती है। 

कीटोनूरिया (Kttonuria) मूत्र में कोटोन बॉडीज (Katone bodies) की मात्रा पायी जाती हैं।पायूरिया (Pyuria) मूत्र में मवाद कोशिकाएँ (Pus cells) पायी जाती हैं। 

होमेटूरिया (Haematuria)मूत्र के साथ थोड़ी मात्रा में रक्त निकलने लगता है। 

यूरेमिया (Uremia)- इस रोग में मूत्र में यूरिया तथा यूरिक अम्ल की सामान्य से अधिक मात्रा पायी जाती हैं।

नेफ्राइटिस (Nephritis)— यह रोग गुर्दों में होने वाला एक शोध (Inflammation) हैं जिसमें ग्लोमेरुलाई (Glomerulai) एवं ट्यूब्यूल्स (Tubules) को संक्रमण या टॉक्सिन के कारण क्षति होती है। इससे गुर्दे खराब हो जाते हैं। 

ओस्मोरेगुलेशन (Osmoregulation)— कोशिका में जल तथा कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थों का समुचित सान्द्रण बनाये रखना।

No comments:

Post a Comment

Powered by Blogger.