मुगलकाल में न्याय प्रशासन |Judiicery in the Mughal period

मुगलकाल में न्याय प्रशासन

मुगलकाल में न्याय प्रशासन |Judiicery in the Mughal period
 

मुगलकाल में न्याय प्रशासन

मुगल शासकों ने अपने राज्य को सूबों या प्रान्तों में विभक्त किया था तथा प्रत्येक सूबे की राजधानी में प्रांत स्तर पर तीन न्यायालय स्थापित किये गये थे जो निम्नलिखित है -

 

नाजिम का न्यायालय :- 

नाजिमसूबे का प्रमुख व सम्राट का प्रतिनिधि होने के कारण उसे न्यायिक कार्य भी करना पड़ता था। उसके समक्ष दीवानीफौजदारी के प्रारंभिक तथा अपीलीय दोनों प्रकार के मुकदमे पेश किये जाते थे। अपील की सुनवाई के समय एक काजी-ए-सूबा भी उसके साथ बैठता था। नाजिमकाजी-ए-सूबा व सूबा के दीवान के निर्णय के विरुद्ध भी निर्णय कर सकता था । शाही आज्ञाओं और फरमानों का उल्लंघन करने पर इसी न्यायालय से दण्ड दिया जाता था। नाजिम की सहायतार्थ "मुफ्ती व "दरोगा-ए-अदालत" होते थे व नाजिम न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील सम्राट या प्रमुख काजी के सम्मुख हो सकती थी

 

काजी-ए-सूबा का न्यायालय :- 

यह प्रांत स्तर की मुख्य न्याय संस्था थीकाजी-ए-सूबा की नियुक्ति सम्राट काजी-उल-कुजात के परामर्श से करता था। यह दीवानी फौजदारी के आरंभिक एवं अपीलीय दोनों तरह के मुकदमों में निर्णय का अधिकार रखता था। इसकी सहायतार्थ मुहतसिबमुफ्तीदारोगा -ए-अदालतमीर अदलपंडितवाकिया निगार आदि नियुक्त रहते थे। मीर- अदल न्यायालय का उच्चतर लिपिक था ।

 

दीवान-ए-सूबा का न्यायालय :- 

इस न्यायालय में भूमि तथा भू-राजस्व संबंधी मुकदमों का निर्णय प्रांतीय दीवान के द्वारा होता था। जिले तथा परगनों के न्यायालयों तथा आमिलों के निर्णय के विरुद्ध अपीलें भी इसी न्यायालय में की जाती थी। प्रांतीय स्तर से निचले स्तर पर सरकारें होती थींजिनकी भी न्याय व्यवस्था थी।

 

सरकार न्यायालय एवं न्यायाधीश : 

  • सरकार में फौजदारकाजी-ए-सरकारकोतवालअमलगुजार न्यायिक कार्य करते थे । फौजदार को 18वीं सदी के अन्त तक फाँसी का दण्ड छोड़कर अन्य सभी प्रकार के मुकदमों पर न्यायिक अधिकार प्राप्त हो गये। सरकार का मुख्य न्यायाधिकारी काजी-ए-सरकार थापरन्तु सम्राट द्वारा उसे कभी भी पद से हटाया जा सकता था। सरकार में काजी की अदालत के अन्य कर्मचारियों में पेशकारकातिबअमीननाजिरदफ्तरी मुचलका नवीसमिर्दहा इत्यादि प्रमुख हैं।

 

  • सरकार के नगरों में कोतवाल नियुक्त रहता थाजिसकी बहुआयामी भूमिका होती थी। वह दंडनायकपुलिस प्रमुखनगर पालिका का अफसर तीनों होता था।

 

परगना न्यायालय एवं न्यायाधिकारी :- 

परगनों में न्यायिक कार्य शिकदारकाजीकोतवालआमिल द्वारा संपादित किया जाता था। शिकदार प्रमुख प्रशासकीय अधिकारी होता था । परगना में मुख्य न्यायालय थाजिसका मुख्य न्यायाधीश काजी-ए-परगना था। इसकी मदद हेतु एक मुफ्ती एक मुहतसिब व एक दारोगा-ए-अदालत भी नियुक्त रहता था ।

 

ग्राम न्यायालय :- 

ग्राम पंचायतें न्याय की निम्नतम इकाई थींग्राम व जाति पंचायतें गाँवों में धार्मिक दीवानी एवं फौजदारी मामलों को सुनती थी । यद्यपि इन ग्राम पंचायतों का कोई कानूनी अस्तित्व नहीं थापरन्तु प्राचीनकाल से पंचजातीय पंचायतोंमुखिया आदि के द्वारा न्याय प्रदान किया जाता रहाअतः ये इस समय भी बने रहे।

 

  • उपरोक्तानुसार मुगलकालीन न्यायव्यवस्था सुचारू रूप से कार्यरत थी। इस काल में साक्ष्य की प्रणाली थी यदि साक्षी मुस्लिम हो तो उसे कुरानहिन्दू हो तो गीता या गाय इसाई हो तो बाईबिल की शपथ पड़ती थी।

 

  • शीघ्र न्याय हेतु न्यायिक समितियाँ भी स्थापित की गई थी। 1585 ई. में अकबर ने एक स्थायी समिति गठित की थी। तथा विशिष्ट मामलों की सुनवाई हेतु एक विशिष्ट समिति भी गठित की गई थी। वादी प्रतिवादी की अनुपस्थिति में उन्हें सम्मन भेजकर बुलाया जाता था । 
  • मुगल सम्राटों ने सप्ताह का एक दिन न्याय हेतु सुरक्षित रखा थाअकबर ने बृहस्पतिवारजहाँगीर ने मंगलवार व शाहजहाँ तथा औरंगजेब ने बुधवार का दिन निश्चित किया था ।

 

  • विदेशी यात्रियों की यात्रा वृत्तांत एवं जहाँगीर की आत्मकथा में न्याय की जंजीर का उल्लेख मिलता हैजो सोने की बनी थी। इसे कोई भी फरियादी न्याय प्राप्ति हेतु खींच सकता था। हुमायूँ ने भी न्याय हेतु "तबले अदल" (न्याय का नगाड़ा) स्थापित करवाया था। अकबर कहता था कि - "यदि में किसी अन्याय का अपराधी होऊँगातो स्वयं अपने विरुद्ध निर्णय करूँगा। अतः सुस्पष्ट है कि मुगल काल में सुस्पष्टनिष्पक्ष न्याय व्यवस्था स्थापित थी ।

 

  • निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि मुगल साम्राज्य भारतीय इतिहास का सर्वाधिक विशाल एवं लम्बी अवधि का साम्राज्य रहा हैइसके स्थायित्व का मूलाधार इनकी एकीकृत प्रशासनिक प्रणाली ही थी। इस प्रशासन का सर्वप्रमुख कार्य साम्राज्य का प्रशासनिक वर्गीकरण कर उसे सूबोंसरकारोंपरगनों एवं महाल व गाँवों में व्यवस्थित करना था

 

  • जहाँ तक 1707 ई. के पश्चात् उत्तर मुगलकालीन प्रशासन का प्रश्न है इस युग के प्रान्तीय शासन के इतिहास में कोई विशेष उल्लेखनीय बात नहीं हुई। प्रत्येक व्यक्ति ने अपने व्यक्तिगत हितार्थ मालवा को अपने अधिकार में लाने का प्रयास किया। केन्द्रीय सत्ता की उपेक्षा के फल स्वरूप स्थानीय जागीरदार एवं जमींदार साम्राज्य की परवाह नहीं करते थे। सूबों में प्रशासनिक व्यवस्था का पूर्व हास हो 'चुका था। मालवा और बुन्देलखण्ड में मराठों के प्रवेश ने आग में घी का कार्य किया। मुगल सूबेदारों ने मराठों के प्रवेश को रोकने के कोई प्रयास नहीं कियेअतः मराठों ने मालवा और बुन्देलखण्ड में शाही सत्ता को चुनौती दी।

 

  • इधर राजपूत शासकों की शक्ति एवं महत्त्व भी बढ़ने लगा। सवाई जयसिंह को मालवा की सूबेदारी मिलते ही इस महत्त्व में और अधिक वृद्धि हुई। डॉ. रघुबीरसिंह मुगलों की कमजोर स्थिति और राजपूतों के बढ़ते प्रभाव पर लिखते हैं कि "इस समय दिल्ली में न तो कोई ऐसा शक्तिशाली व्यक्ति ही था और न दूरदर्शी ही जो इन शासकों की इन प्रवृत्तियों के समझ कर उनको रोक सकता। प्रान्त के अधिकारी या कर्मचारियों का तो लाभ इसी में था कि वे इन राजाओं को ही प्रसन्न रखें और उनकी राह का कांटा न बनेसाम्राज्य के अधिकारियों या उसके ठीक-ठीक न्याय सम्मत पद का समर्थन करने से उन्हें लाभ होना तो दूर रहाहानि ही पहुँच सकती थी। इस युग में यही महान प्रवृत्ति बढ़ती रही किसी ने इसकी और ध्यान नहीं दिया और समय के साथ ही यह प्रवृति दृढ़तर होती गई .

 

  • कुल  मिलाकर उत्तर मुगलकाल में साम्राज्य का प्रशासन छिन्न-भिन्न हो गया था। शाही दरबार में आये दिन षडयंत्र होते थेनिरन्तर राजनैतिक परिवर्तन होते थे ऊपर से प्रान्तीय शासन की ओर ध्यान देना एक असंभव सी बात हो गयी थी। बहादुरशाह के शासन काल या यों कहिये 1712-13 ई. तक साम्राज्य का शासन तथा सत्ता बनी रहीतब तक प्रजा के हृदय में बादशाह के प्रति कुछ आदर शेष थाकिन्तु इसके बाद आन्तरिक विद्रोहबाह्रय आक्रमण तथा साम्राज्य की उपेक्षा के फलस्वरूप अराजकता बढ़ती गयी और अन्त में साम्राज्य का प्रान्तीय संगठन छिन्न-भिन्न हो गया 15 और मराठा आक्रमणों के फलस्वरूप 18वीं सदी के मध्य तक मध्यप्रदेश के भूभाग का साम्राज्य से संबंध विच्छेद हो गया।

 

  • भारतीय सामाजिक संगठन मूलतः प्राचीनकाल से आधुनिक समय तक एक समान रहा है। परन्तु निरन्तर परिवर्तित कालचक्र के परिणाम स्वरूप भारतीय समाज के स्वरूप में परिवर्तन स्वाभाविक था । क्योंकि समय का प्रभाव मनुष्य पर तथा मनुष्य का प्रभाव समाज पर पड़ता है।

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