मनुष्य में उत्सर्जन या मानव उत्सर्जन तन्त्र |Excretory System of Human Body

मनुष्य में उत्सर्जन या मानव उत्सर्जन तन्त्र 

मनुष्य में उत्सर्जन या मानव उत्सर्जन तन्त्र |Excretory System of Human Body


 

मनुष्य में उत्सर्जन या मानव उत्सर्जन तन्त्र

मनुष्य में एक विकसित उत्सर्जन तन्त्र पाया जाता है जिसके द्वारा यह नाइट्रोजन युक्त उत्सर्जी पदार्थों को शरीर से बाहर करता है। इसके त्वचायकृतप्लीहामलाशय और फेफड़े भी शरीर में बने. विविध उत्सर्जी पदार्थों को शरीर से बाहर करते हैं या बाहर करने में मदद करते हैं। मनुष्य का उत्सर्जन तन्त्र निम्न अंगों का बना होता है

 

(A) वृक्क 

(B) एक जोड़ी मूत्रवाहिनियाँ (A pair of ureters) 

(C) मूत्राशय (Urinary bladder) 

(D) मूत्रमार्ग (Urethra)

 

(A) वृक्क  (Kidneys) 

मनुष्य की उदर गुहा के पृष्ठ भाग में डायफ्राम के नीचे एक जोड़ी गहरे लाल रंग की चिकने सेम के बीज की आकृति के अंग कशेरुक दण्ड के इधर-उधर स्थित होते हैंजिन्हें वृक्क कहते हैं। दायीं ओर का वृक्क यकृत की उपस्थिति के कारण लगभग 25 मिमी नीचे स्थित होता है। मनुष्य का वृक्क लगभग चार इंच लम्बा 3.5 इंच चौड़ा और 150 ग्राम वजनी होता है। इसके चारों तरफ एक पतली पेरीटोनियम नामक झिल्ली पायी जाती है। इसी झिल्ली के द्वारा यह उदर गुहा की पृष्ठ दीवार से जुड़ा रहता हैयह झिल्ली उदर गुहा के शेष अंग तथा वृक्क को अपनी जगह पर साधे रहते हैं। वृक्क की बाहरी सतह उत्तल तथा भीतरी सतह अन्दर की तरफ धँसकर एक गड्ढा बनाती है जिसे वृक्क नाभि (Hilum) कहते हैं। यहीं से मूत्रवाहिनी निकलती है और यहीं से प्रत्येक वृक्क में एक रीनल धमनी अन्दर जाती है एवं एक रीनल शिरा बाहर आती है। 

 वृक्क की औतिकी ( Histology of Kidney)

  • यदि हम लम्बवत् तथा अनुप्रस्थ काटों के द्वारा वृक्क का अध्ययन करें तो यह असंख्य पतली नलियों का बना दिखायी देता है जो वृक्क के अन्दर एक संयोजी ऊतक के आधार में पड़ी रहती हैंइन नलिकाओं को वृक्क या मूत्र नलिकाएँ (Uriniferous tubules) या नेफ्रॉन्स (Nephrons) कहते हैं। वृक्क के चारों तरफ संयोजी ऊतकों का बना आवरण (पेरीटोनियम) दिखायी देता है। इस आवरण के अन्दर का भाग दो भागों में बँटा रहता है। बाहरी भाग को कॉर्टेक्स (Cortex) तथा भीतरी भाग को मेडुला (Medulla) कहते हैं। कॉर्टेक्स भाग थोड़ी-थोड़ी दूर पर मेडुला के अन्दर धंसकर कगारें बनाता हैजिन्हें बर्टिनी के वृक्कीय स्तम्भ (Renal columns of Bertini) कहते हैं। इन कगार रूपी स्तम्भों के बीच-बीच में मेडुला तिकोने उभारों के रूप में उठी रहती है, जिन्हें वृक्कीय शंकु (Renal pyramid) कहते हैं। इनके चौड़े आधार कॉर्टेक्स की तरफ और शिखर वृक्क के केन्द्र की ओर स्थित होते हैं। इन शिखरों को वृक्क अंकुर (Rerial papillae) कहते हैं। मनुष्य के प्रत्येक वृक्क में 8-12 वृक्क अंकुर पाये जाते हैं।

 

वृक्क की आन्तरिक संरचना (Internal Structure of Kidney) 

वृक्क की आन्तरिक संरचना (Internal Structure of Kidney)


  • खड़ी काट में प्रत्येक वृक्क बाहर से एक आवरण द्वारा घिरा होता है जिसे पेरीटोनियम (Peritonium) कहते हैं। वृक्क आन्तरिक रूप से दो भागों में बँटा होता है। बाहरी भाग को कॉर्टेक्स (Cortex) तथा भीतरी भाग को मेडुला (Medulla) कहते हैं। कॉर्टेक्स भाग थोड़ी-थोड़ी दूर पर मेडुला के अन्दर धँसकर कगारें बनाता हैजिन्हें बर्टिनी के वृक्कीय स्तम्भ (Renal columns of Bertini) कहते हैं। इन कगार रूपी स्तम्भों के बीच-बीच में मेडुला तिकोने उभारों के रूप में उठी रहती हैजिन्हें वृक्कीय शंकु (Renal pyramids) कहते हैं। इनके चौड़े आधार कॉर्टेक्स की तरफ और शिखर वृक्क के केन्द्र की ओर स्थित होते हैं। इन शिख को वृक्क अंकुर (Renal papillae) कहते हैं। मनुष्य के प्रत्येक वृक्क में 8-12 वृक्क अंकुर पाये जाते हैं। 
  • वृक्क के पिरामिड में अनेक वृक्क नलिकाएँ या नेफ्रॉन्स (Nephrons) पाये जाते हैं अनेक नेफ्रॉन्स आपस में मिलकर कुछ मोटी वाहिनियाँ बनाते हैं जिन्हें संग्रह नलिका (Collecting duct) अथवा बिलिनी (Billini) की वाहिनी कहते हैं। एक वृक्क की सभी बिलिनी वाहिकाएँ आपस में मिलकर वृक्क पिरामिड के शिखर पर एक चौड़ी नली में खुलती हैं जिसे वृक्क श्रोणि (Renal pelvis) कहते हैं। वास्तव में यह रीनल पेल्विस ही वृक्क के हाइलम में स्थित मूत्र वाहिनी की शुरुआत है। यह पेल्विस ही पतला होकर तथा वृक्क से बाहर आकर मूत्र वाहिनी बनाता है। मनुष्य के वृक्क का पेल्विस कई शाखाओं में बँटा होता हैइसमें से बड़ी शाखाओं को मुख्य पुटक (Major calyx) तथा छोटी शाखाओं को लघु पुटक (Minor calyx) कहते हैं।

 

  • वृक्क के अन्दर नेफ्रॉन्स इस प्रकार व्यवस्थित होते हैं कि इनके मैल्पीधियन कोषसमीपस्थ कुण्डलित भाग तथा दूरस्थ कुण्डलित भाग कॉर्टेक्स में स्थित होते हैं जबकि हेनले लूप एवं संग्रह नलिकाएँ वृक्क के केन्द्रीय भाग अर्थात् मेडुला में स्थित होते हैं। मेडुला भाग में स्थित संग्रह नलिकाएँ हल्के रंग की धारियों के रूप में दिखायी देती हैं जिन्हें मेडुलरी किरणें (Medullary rays) कहते हैं। वृक्क के मेडुला भाग में हेनले लूपसंग्रह नलिकाएँ तथा संग्रह वाहिनियाँ स्थित होती हैं। इस व्यवस्था के कारण हो वृक्क को गुहा दो भागों की बनी दिखायी देती है। आपस में मिलकर शिरिका का निर्माण करती हैंये शिरिकाएँ ही आपस में मिलकर वृक्क शिरा (Renal vein) बनाती हैं।

 

नेफ्रॉन्स की संरचना (Structure of Nephrons) 

नेफ्रॉन्स वृक्क की संरचनात्मक इकाई हैजो वृक्क की गुहा में स्थित संयोजी ऊतकों में लगभग दो लाख की संख्या में रुधिर वाहिनियोंलसीका वाहिनियोंपेशी तन्तुओं तथा तन्त्रिकाओं के साथ स्थित होती है। ये नलिकाकार तथा स्रावी प्रकृति के होते हैं। 

संरचनात्मक दृष्टि से प्रत्येक नेफ्रॉन निम्नलिखित दो भागों का बना होता है 

(i) मैल्पीघियन सम्पुट (Malpighian capsule)—

  • प्रत्येक नेफ्रॉन का एक सिरा स्वतन्त्र तथा दूसरा एक नली से जुड़ा होता है। इसका स्वतंत्र सिरा एक कप जैसी आकृति के रूप में होता है जिसे बोमन सम्पुट कहते हैं। बोमन सम्पुट की दीवार ग्रन्थिल एपीथीलियम कोशिकाओं की बनी होती है। इस सम्पुट की गुहा में रुधिर वाहिकाओं का एक जाल पाया जाता हैजिसे ग्लोमेरुलस या केशिकागुच्छ कहते हैं । वास्तव में रीनल धमनी वृक्क में जाकर कई शाखाओं अर्थात् धमनिकाओं (Arteri-ole) में बँट जाती है। इसी में से एक धमनिका बोमन सम्पुट में जाकर जाल बनाती है और पुनः बाहर निकल जाती है। जो धमनिका सम्पुट में रुधिर ले जाती हैउसे अभिवाही (Afferent) धमनिका और जो बाहर लाती है उसे अपवाही (Efferent) धमनिका कहते हैं। बोमन सम्पुट वृक्क के कॉर्टेक्स में स्थित होते हैं।


(ii) स्त्रावी भाग (Secretory portion) 

नेफ्रॉन का बोमन सम्पुट के पीछे का भाग स्त्रावी भाग कहलाता है। इसकी आन्तरिक सतह पर रोमाभी उपकला ऊतक पाये जाते हैं। यह भाग बहुत अधिक कुण्डलित होता है और निम्नलिखित भागों का बना है- 

(a) समीपस्थ कुण्डलित नलिका (Proximal convoluted tubule) 

बोमन सम्पुट के पास का भाग समीपस्थ कुण्डलित नलिका (Proximal convoluted tu- bule-P.C.T.) कहलाता है। यह भाग कॉर्टेक्स में स्थित होता है और पीछे की ओर पतला होता जाता है।

 

(b) हेनले का लूप (Loop of Henle )

  •  P.C.T. के बाद नेफ्रॉन का नलिकाकार 'U' के समान भाग हेनले लूप ( Henle's loop) कहलाता है। इसकी P.C.T. के पास को भुजा को अवरोही लूप (Descending loop) तथा P.C.i. की दूरस्थ भुजा को आरोही लूप (Ascending loop) कहते हैं। हेनले का लूप वृक्क के मेडुला में स्थित होता है।

 

(c) दूरस्थ कुण्डलित नलिका (Distal convoluted tubule, D.C.T.) 

  • नेफ्रॉन या वृक्क नलिका का अन्तिम भाग दूरस्थ कुण्डलित नलिका (Distal convoluted tubule) कहलाता है। यह भाग छोटा तथा मोटा होता है और बोमन सम्पुट के पास कॉर्टेक्स में स्थित होता है। यह भाग वृक्क में ही स्थित एक नलिका में खुलता है जिसे संग्रह नलिका (Collecting duct) कहते हैं।

 

  • स्त्रावी भाग के चारों तरफ केशिकाओं का बना एक जाल पांया जाता है। यह जाल ग्लोमेरूलस से निकलने वाली इफरेण्ट धमनिका के विभाजित होने से बनता है। इस जाल की केशिकाएँ आपस में मिलकर शिरिका का निर्माण करती हैंये शिरिकाएँ ही आपस में मिलकर वृक्क शिरा (Renal vein) बनाती हैं। 
नेफ्रॉन्स की संरचना (Structure of Nephrons)



नेफ्रॉन्स के कार्य (Functions of Nephrons) - 

1. यह शारीरिक समस्थिति बनाये रखता है। 

2. यह शरीर में विभिन्न द्रवों का सन्तुलन बनाये रखता है। 

3. यह नाइट्रोजन उत्सर्जी पदार्थों को मूत्र के रूप में शरीर से बाहर करता है। 

4. यह शरीर में उपस्थित अन्य उत्सर्जी लवणोंऔषधियों जैसे आयोडाइडसैन्टोनिनआर्सेनिक एवं जीवाणुओं को शरीर से बाहर निकालता है। 

5। यह शरीर में अम्ल-क्षार सन्तुलन बनाये रखता है।

 

वृक्क के कार्य (Functions of Kidney) 

मूत्र निर्माण या उत्सर्जी पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना वृक्क का मुख्य कार्य है। इसके अलावा यह निम्न कार्यों के द्वारा शरीर को स्थायी अवस्था state) को बनाये रखता है और शरीर की इसी स्थायी अवस्था को समस्थापन (Homeo- stasis) कहते हैं- 


1. जल सन्तुलन बनाये रखने में (Maintenance of water balance) 

वृक्क रुधिर में उपस्थित जल को अतिरिक्त मात्रा को अलग करके इसे मूत्र में मिलाकर जल की मात्रा को नियंत्रित करता है। 

1. रुधिर में लवणों की मात्रा पर नियंत्रण (Regulation of salt contents) 

यह रुधिर में उपस्थित लवणों को अतिरिक्त मात्रा को छानकर रुधिर में इनकी मात्रा को नियंत्रित करता है। 

3. रुधिर के pH पर नियंत्रण (Regulation of pH blood) 

उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप रुधिर में कई प्रकार के अम्ल बनते रहते हैं। वृक्क नलिकाओं द्वारा आवश्यकता से अधिक हाइड्रोजन आयनों को हटाकर वृक्क रुधिर तथा शरीर में अम्ल-क्षार सन्तुलन को बनाये रखता है। इस प्रकार pH पर नियंत्रण रहता है।

4. विषाक्त पदार्थों को हटाना (Removal of toxic substances) वृक्क शरीर में पाये जाने वाले उन पदार्थों जैसे- विषदवाइयों इत्यादि को शरीर से बाहर करता है जो हमारे शरीर के लिये हानिकारक होते हैं। 

5. नाइट्रोजनी व पदार्थों का बहिःस्त्रावण (Excretion of nitrogenous wastes) 

  • वृक्क नाइट्रोजनी एवं अन्य उत्सर्जी पदार्थ को शरीर से बाहर हटाता है। 

6. इरिथ्रोप्रोटोन का उत्पादन (Production of erythroprotein)

  • वृक्क इरिथ्रोप्रोटीन का उत्पादन करता है जो कि अस्थि मरना में R.B.CS. के निर्माण में सहायता करता है।

 

7. रुधिर दाव पर नियंत्रण (Regulation of blood pressure) यह रुधिर दाब (Blood pressure) पर नियंत्रण रखता है।

8. विटामिन का सक्रियण (Activation of vitamin D ) - वृक्क विटामिन का सक्रियण (Activation)  करते हैं। 

9. रेनिन का स्वावण (Secretion of renin)- वृक्क रेनिन नामक एन्जाइम बनाता है जो हेनले के लूप में Na+ के अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। 


(B) एक जोड़ी मूत्रवाहिनियाँ (A Pair of Ureters) 

  • वृक्क में स्थित पेल्विस ही नली के रूप में नियमित होकर मूत्रवाहिनी का निर्माण करता है। प्रत्येक वृक्क के पेल्विस से एक मूत्रवाहिनी निकलती है जो मूत्राशय में समाप्त होती है। अतः मनुष्य में दो मूत्रवाहिनियाँ पायी जाती हैं। ये मूत्र को वृक्क से मूत्राशय में पहुँचा देती है। इन वाहिनियों की दीवारों में हमेशा क्रमाकुंचन गति होती रहती हैजिसके कारण मूत्र हमेशा वृक्क से गुदा की ओर "बहता रहता है। 

(C) मूत्राशय (Urinary Bladder) 

प्रत्येक मनुष्य को उदर गुहा के पिछले भाग में एक छोटी-सी थैलीनुमा रचना पायी जाती है जिसे मूत्राशय कहते हैं। इसका बाहरी आवरण पेरीटोनियम कहलाता है जबकि इसकी दीवार में अरेखित पेशियाँ पायी जाती हैं। वृक्क में बना उत्सर्जी पदार्थ या मूत्रमूत्रवाहिनियों के द्वारा मूत्राशय में लाया जाता है। प्रत्येक मूत्रवाहिनी अलग-अलग छिद्रों द्वारा मूत्राशय में खुलती है। 

(D) मूत्रमार्ग (Urethra) 

  • पुरुष तथा स्त्री दोनों में ही मूत्राशय एक पतली नली द्वारा बाहर खुलता हैजिसे मूत्रमार्ग (Urethra) कहते हैं। स्त्रियों में मूत्रमार्ग एक छोटी नलिका होती है जिसको लम्बाई लगभग चार सेमी होती है जिससे होकर केवल मूत्र बाहर निकलता हैजबकि पुरुषों में यह लगभग 20 सेमी लम्बी होती है और मूत्र के साथ वीर्य को भी बाहर निकालती है। मूत्राशय के अन्दर वृक्क में बने मूत्र को एकत्रित किया जाता है और जब इसे बाहर निकालना होता है तो मूत्राशय की दीवार संकुचित होती है और मूत्र शरीर से बाहर आ जाता है।

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