सूफी सम्प्रदाय का विकास |Development of Sufi sect

 सूफी सम्प्रदाय का विकास 

सूफी सम्प्रदाय का विकास |Development of Sufi sect
 

 सूफी सम्प्रदाय का विकास 

मुगल बादशाहों की सत्ता स्थापित होने के पहले भी मालवा और बुरहानपुर में सूफी सन्तों को बहुत आदर सम्मान दिया जाता था। 

अतः मालवा में विशेषतः धार एवं माण्डू में और बुरहानपुर में मुगलों के समय में जो सूफी सन्त और विचारक हुए थे उनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है -

 

हज़रत शेख इब्न काजी सआदुल्ला सिद्दीकी रह 

हज़रत शेख के पूर्वज हजरत शेख - शिहाबुद्दीन सोहरवर्दी की संतानों में से हैं। यह परिवार शेख निज़ाम नारनौली के खलीफा के रूप में जौनपुर चला गया था। बाद में माण्डू सुलतान महमूद खिलजी प्रथम के राज्यकाल में (1436-1469 ई.) हज़रत काजी महमूद के समय में माण्डू आ गए थे।

 

हज़रत शेख सद्रजहाँ इब्न अबू फतेह रह 

ये एक ऐसे परिव्राजक ( भ्रमणशील) संत थे जिन्हें मालवा की धरती से प्यार था। इनका जन्म मवाल नामक कस्बे में हुआ था। कहा जाता है कि वे हमेशा ही हंगामें में गोशागशीन और सैर व सियाहत में चिल्लानशीन रहे। इनकी मजार धार में बनी है।

 

हज़रत जिन्दा हाजी मज्जूब इब्न रामराजा

हज़रत जिन्दा हाजी बिजैनगर के शासक रामराजा - के पुत्र थे। अहमद नगर के शासक हुसैन निजामुलमुल्क के आक्रमण के समय रामराजा मारा गया और उनका एक पुत्र जो बहुत कम उम्र का था उसे बंदी बना लिया गया। वही बंदी राजकुमार कालान्तर में जिन्दा हाजी नाम से विख्यात हुआ ।

 

हज़रत शेख ताजुद्दीन अताउल्ला 'बुगड़े पीर रह

हज़रत शेख ताजुद्दीन को शान और तरीकत - तो वंशानुगत रूप में प्राप्त हुए थे। विवेक और संयम उन्होंने शेख सद्रजहाँ से सीखा। अपने पिता गरीबुल्ला के ये एक सुयोग्य उत्तराधिकारी थे। इनका जन्म धार में ही 1578 ई. में हुआ था । धार में इनकी मजार है।

 

हज़रत रहनुमाए उलूम सैयद मसूद 'दाताबंदी छोड़रह 

हज़रत दाताबंदी छोड़ रह के परिचय के संबंध में भी मतभेद है। गुलजारे अबरार के लेखक गौसी शत्तारी ने इनके संबंध में कुछ नहीं लिखा। एक कथानक है कि किसी राजा ने अनेक नव विवाहित दम्पत्तियों को धार किले में बंदी बना रखा था जिन्हें हजरत ने मुक्त करवाया। जो भी परिचय मिलता है वह सैयद अब्दुल हयी कृत 'यादे अय्यामसे मिलता है जो बहुत बाद के समय की रचना है।

 

हज़रत शेख जमालुद्दीन 'जमनजत्तीरह

ये मदारिया सिलसिले के संत थे और शेख बदीउद्दीन शाह मदार रह से बेऊत होकर खरकए खिलाफत प्राप्त की थी। हज़रत शेख जमालुद्दीन कुछ समय तक हज़रत शेख महमूद राजन रह के पास रहकर तरीकत का इल्म हासिल किया। इन्हें तर्क तजरीद के साथ जीवन यापन करना पसंद था। वे एक अच्छे हाफिज थे और पाक कुरान पढ़ने का बड़ा शोक था। हमेशा रोजा रखते थेजौद तकबा व शरियत के पाबंद बुजुर्गो में इन्हें सम्मान प्राप्त था ।

 

हज़रत शेख ज़करिया कादरी रह - 

हज़रत शेख ज़करिया कादरिया सिलसिले के संत थे। अपने मुर्शिद हज़रत शेख अब्दुल रज्जाक जनजहानवी से आज्ञा लेकर हिजरी 984 (1576 ई.) में दिल्ली से मालवा आए । धार में हज़रत शेख सादुल्ला और सद्रजहाँ चिश्ती जैसे विद्वानों से प्रभावित होकर यहीं रूक गए। ये आजन्म अविवाहित रहे और यहीं धार में रहते हुए 1580 ई. में इनकी मृत्यु हुई।

 

हज़रत अब्दुल्ला बियाबानी रह 

इल्म मआरफत के श्रेष्ठ ज्ञाता हज़रत अब्दुल्ला बियाबानी हज़रत शेख समाउद्दीन देहलवी के पुत्र थे। हज़रत काजी शेख समाउद्दीन जुबदतुल सादात थे और फतवानवीसी का मंसब प्राप्त था। उन्हें 'कुतलुग खानीकी उपाधि भी मिली हुई थी। हज़रत बियाबानी आबादी से दूर बियाबान स्थानों पर रहकर 'वली अजलतजैसी तपस्या किया करते थे। प्रतिदिन एक बार पूरा कुरान शरीफ जो याद था पढ़ा करते थे। 

हज़रत बियाबानी को कोई संतान न थी। हजरत शेख हुसैन नामक इनके एक चचेरे भाई थे जो गौसी सत्तारी के मित्र थे। 1598 ई. में इनका स्वर्गवास हो गया। उनके एक लड़का थाजो घोडनशाह के नाम से जाना जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि हज़रत बियागानी माण्डू सुलतानों के बाद भी लम्बे समय तक जीवित रहे थे।

 

हज़रत शेख महमूद चिश्ती रणथम्बोरी रह 

हज़रत शेख महमूद चिश्ती सुलतान कादिरशाह के राज्यकाल में (1537 से 42 ई.) माण्डू आए। ये एक सुयोग्य हाफिज थे और लोगों के अन्तरमन की बातें अपनी आत्मशक्ति से जान लेते थे। इनके पिता शेखुल हदाद चिश्ती के खिलीफा थे। कुछ दिनों तक माण्डू में रुकने के बाद इन्होंने नर्मदा किनारे कुब्जा संगम के समीप खुजावा गाँव को अपना आवास बनाया। वहीं पर 1552 ई. में इनकी मृत्यु हुई।

 

हज़रत शेख कमालुद्दीन इब्न सुलेमान कुरेशी रह. - 

हज़रज शेख कलामुद्दीन का जन्म कालपी में हुआ था । त्यागअपरिग्रह और अनुशासन इनकी दिनचर्या में सम्मिलित था। इन्होंने शाह अरगोन मदारी को अपना मुर्शिद बनायालेकिन अस्माए-इलाही और अजकार की अनुमति उन्हें हजरत शेख के और शेख अबुल फतह हिदायतुल्ला के पुत्र से प्राप्त हुई थी। ये बाजबहादुर के शासनकाल में माण्डू आ गये थे।

 

हज़रत शेख फजलुल्ला बिन शेख हुसैन चिश्ती रह

 ये परोपकारी स्वभाव के संत थे। हज यात्रा के बाद 1543 ई. में वापस माण्डू आ गये। माण्डू में रहकर 20 वर्षों तक अपने पूर्वजों के बताये मार्गों पर चलते रहे। 1564 ई. में नालछा में इनकी मृत्यु हुई।

 

हज़रत शेख जाइरूल्ला बिन शेख उमर रह

इनके पूर्वज माण्डू में कालीन बनाने का कार्य - करते थे। किन्तु हजरत शेख ने दरवेशी का मार्ग अपनाया। प्रतिदिन मस्जिद में कुरान सुनते और तरावीह के लिए दूर से चलकर आया करते थे। माण्डू में ही इनकी मृत्यु हुई और इनकी ख्वाबगाह माण्डू में ही है।

 

हज़रत मियाँ मियाँजी बिन दाऊद रह

ये गुलजारे अबरार के लेखक गौसी के मामू हैं। इनका जन्म माण्डू में हुआ था। इनका अधिकांश समय दरवेशों के साथ ही उठने-बैठने में व्यतित होता था । इनकी मृत्यु 1577 ई. में हुई थी।

 

हज़रत शेख बुरहान रह.

इनका जन्म अहमदाबाद में हुआ था। ये शेख सदरूद्दीन मोहम्मद - जाकिर की सेवा में ग्वालियर चले गये। वहाँ से ये माण्डू आ गये। माण्डू में हजरत शेख मेहम्मूद जलाल के पास रहे। ये शेख बुरहान और फाकीर गौसी से भेंट करने देपालपुर गये थे। इनकी मृत्यु अजमेर के समीप हुई थी ।

 

हज़रत शेख चावन इब्न उमर चिश्ती रह. - 

इनका जन्म अजमेर में हुआ था। मगर मूल वतन मालवा था। ये 1543 ई. में माण्डू आये थे। कुछ दिन नालछा में रहे। फिर जामा मस्जिद के पास बैठ गये। ये न किसी के घर जाते थे और न किसी से कुछ चाहते थे। पीरमोहम्मद की मालवा विजय के बाद बुरहानपुर जाते समय पीरमोहम्मद ने इनसे विजय की इच्छा जाहीर की थी। विपरीत उत्तर के जवाब में पीरमोहम्मद ने इन्हीं शेख चावन को पीटा था।

 

हज़रत शेख अब्दुल्ला बहाव अफगान रह. 

इनका जन्म और मृत्यु दोनों ही माण्डू में हुई। ये - शेख फजलुल्ला इब्न हुसैन मुल्तानी के मुरीद थे ये जंगल से लकड़ीयाँ लाकर बेचते थे और उनसे निर्वाह करते थे।

 

शेख रुकनुद्दीन इब्न हजरत महमूद रह. - 

ये बयाना के रहने वाले थे। हेमू और अकबर के युद्ध के समय बयाना से चलकर माण्डू आ गये और यहीं अपना आवास बना लिया। इनका अध्ययन बहुत अच्छा था। अल्प भोजन करना साधना का अंग था। ये अरबी भाषा के अच्छे ज्ञाता थे। 1584 ई. में इनकी मृत्यु हो गई।

 

हज़रत शेख जहूरउद्दीन बिन महमूद जलाल रह. 

ये एक अच्छे हाफिजमित्र और मददगार के रूप में विख्यात रहे । ये मूलतः गुजरात के निवासी थे। बाद में हजरत जाकिर के साथ माण्डू आ गये। 10 वर्षो तक इन्होंने मानव सेवा की। 1587 ई. में इनकी मृत्यु हो गई।

 

हज़रत शेख दाऊद रह. 

ये हजरत शेख जहूरूद्दीन के खलीफा व जानशीन थे। वे एक त्पस्वी - विद्वान और सम्माननीय संत थे। ये ग्वालियर होते हुए शेख दाऊद माण्डू लौट आए माण्डू में ही इनकी मृत्यु हुई।

 

हज़रत शेख करमुल्ला रह. 

ये एक व्यापारी के - पुत्र है कि ये सौ वर्ष की आयु तक माण्डू में ही रहे । - थे। ये मदारिया सिलसिले के संत थे। कहते

हज़रत 'शिरीन मज्जूबबाबा भरग रह. 

ये रंगीन मिजाज वाले मस्त मोला संत थे। ये धार - परगने के किसी मुकादम के पुत्र थे। ये घर द्वार छोड़कर माण्डू चले आये। दिनभर गाते हुए बाजारों में घूमते और रात हलवाई की दुकानों में गुजार देते। एक बार जेतपुर के जमींदार ने माण्डू में लूटमार की उस समय इनके तलवार से घाव हो गया और उसमें कीड़े पड़ गये यदि कोई कीड़ा उसमें से गिर जाता थातो प्यार से उठाकर पुनः घाव में बिठा लेते थे। एक साल बाद घाव स्वतः ही ठीक हो गया। 1598 ई. में इनकी मृत्यु हो गई । सप्त कोठरी के समीप इनका मकबरा है।

 

हज़रत शेख उस्मान इब्न लादन कुरेशी रह. 

ये हजरत शेख फजल उल्ल इब्न हुसैन चिश्ती - के मुरीद थे। माण्डू में हजरत गौसी सत्तारी के पड़ोसी थे। 30 वर्ष की में दरवेश बन गये। समाज सेवा करते और नमाज पढ़ते। हिन्दी गानों के अत्यन्त शौकीन थे। अपने हुजरे में पड़े-पड़े आधी रात दर्द भरें गाते रहते थे। 1599 ई. में माण्डू में ही इनकी मृत्यु हो गई ।

 

हज़रत शेख मुबारक सिद्दीकी सत्तारी रह. 

ये शेख जलाल लोहांगी के मुरीद थे। ये 1573 ई. - माण्डू आये। लगभग 30 वर्षों तक माण्डू में रहकर साधना कीऔर 1601 ई. में जीवनमुक्त हो गये। 

 

हज़रत शेख महमूद इब्न सैयद मलिक रह.

इनका जन्म सूरत में हुआ था। इन्होंने दौलताबाद - के हजरत शेख अब्दुल लतीफमुजावर को अपना गुरु बनाया। इसके बाद भ्रमण हेतु निकल पड़े और 1577 ई. में नालछा आ गये। यहाँ एक मस्जिद की नींव रखी। आजाद जिन्दगी जीना पसंद था। 20 वर्षों तक नालछा में राहगीरों को पानी पिलाते रहे। इन्होंने मांसाहार को छोड़कर दरवेशों का तरीका अपनाया। ये गौसी सत्तारी से बड़ा स्नेह रखते थे, 1610 ई. में नालछा में इनकी मृत्यु हुई ।

 

हज़रत शेख खुदाबख्श रह. 

इनके पूर्वज 8वीं शती ई. में अरब से भारत आये थे। ये शेख - फजलुल्ला इब्न शेख हुसैन मुल्तानी के मुरीद थे। इन्हें एकांतवास पंसद था । रेशमी कपड़ों का व्यापार करते थे। उसका लाभांश फकीरों और दरवेशों में बांट देते थे। 40 वर्ष की आयु में इन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति बाट दी। तालाब के पास इनका हुजरा बना थाजहाँ एकांतवास करते थे

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