खेरला राज्य और देवगढ़ का गोंड राज्य | Kherla and Devgarhd Gond State

खेरला राज्य और देवगढ़ का गोंड राज्य

खेरला राज्य और देवगढ़ का गोंड राज्य | Kherla and Devgarhd Gond State
 

खेरला राज्य

 

  • खेरला राज्य स्थिति और उद्भव
  • नरसिंगराय होशंगशाह का खेरला पर आक्रमण
  • नरसिंगराय की मृत्यु और खेरला पर मालवा का अधिकार
  • मालवा और बहमनी के बीच खेरला के लिये खींचतान मालवा के अधीन

 

खेरला राज्य, स्थिति और उद्भव 

सतपुड़ा और विन्ध्याचल पर्वत श्रेणियों और उसके बीच में बहती नर्मदा की घाटी में मध्यकाल में तीन राज्य विकसित हुए। चौदहवीं सदी से सोलहवीं सदी के दौरान विकसित इन राज्यों में पहला राज्य था खेरला का राज्य जो वर्तमान बैतूल जिले में था, दूसरा राज्य गढ़ा का गोंड राज्य था जो पन्द्रहवीं सदी के अन्तिम चरण में जबलपुर अंचल में उभरकर एक विशाल राज्य के रूप में विकसित हुआ और तीसरा राज्य था देवगढ़ का गोंड राज्य जो वर्तमान सिवनी छिंदवाड़ा जिले में फैला। 

 

सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के पार दक्खिन की सीमा जहाँ से शुरू होती है वह प्रदेश मध्यकाल में उत्तर और दक्खिन का राजनीतिक सीमान्त था। इस सीमान्त प्रदेश में खेरला का राज्य था जो 15 वीं सदी में बहमनी और मालवा की सल्तनतों के बीच विवाद का कारण बना, जो अपनी रक्षा के लिये कभी बहमनी सुल्तानों का दामन पकड़ता रहा और कभी मालवा की सल्तनत की छत्रछाया में जाता रहा। इस राज्य के प्रबलतम राजा का नाम था नरसिंगराय । खेरला का किला आज मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में बैतूल शहर के पास है।

 

दसवीं सदी के अन्त तक दक्खिन के राष्ट्रकूटों का प्रसार बैतूल जिले तक था लेकिन यह ज्ञात नहीं है कि राष्ट्रकूटों के पतन के बाद इस क्षेत्र के इतिहास का क्या हुआ। इसके बाद तीन सदियों तक इस क्षेत्र का इतिहास अंधकारमय रहा। अंधकार का यह परदा तब उठता है जब मुकुन्दराज स्वामी मराठी ग्रंथ 'विवेकसिंधु में यह उल्लेख मिलता है कि मुकुन्दराज ने अपने अन्तिम दिन खेरला के राजपूत राजा जैतपाल के संरक्षण में बिताये। मुकुन्दराज की मृत्यु के बारे में अलग-अलग मत हैं।

 

कोई इसे 13 वीं सदी के अंत में बताता है और कोई 1330-35 के मध्य में बताता है। खेरला राज्य का यह सबसे पुराना उल्लेख है। किसी प्रामाणिक विवरण के अभाव में यह अनुमान ही लगाया जा सकता है कि खेरला राज्य का सम्पर्क दक्खिन के बहमनी शासकों से रहा होगा।

 

नरसिंगराय

 

सी.यू. विल्स का कहना है कि 14वीं और 15वीं सदी में खेरला पर नरसिंगराय का शासन था और यदि उसका वंश गोंड नहीं था तो राजपूत और गोंड की मिश्रित नस्ल का याने राजगोंड का था जैसा कि गढ़ा और देवगढ़ के शासक थे। चैटरटन भी राजपूत पिता और गोंड माँ की संतान मानते हैं। लेकिन चौदहवीं सदी की कृति अचलदास खीचीरी वचनिका से पता चलता है कि नरसिंगराय राजपूत था ।

 

खेरला राज्य का विस्तृत प्रामाणिक उल्लेख हमें इतिहासकार फरिश्ता की कृति तारीख-ए-फरिश्ता में विस्तार से मिलता है। नरसिंहराय बहुत महत्वाकांक्षी शासक था और उसका राज्य इतना शक्तिशाली था कि वह निमाड़ तक फैला था और उसने वहाँ के सजनी या पिपलौदा के चौहानों को भी खदेड़ दिया था। तब खेरला के दक्षिण में बरार से बहमनी सल्तनत की तथा उत्तर में नर्मदा से मालवा सल्तनत की सीमाएँ शुरू हो जाती थीं। खेरला के पश्चिम में मलिक रजा फारुकी ने खानदेश की सल्तनत कायम कर ली थी। 1398 ई. में जब बहमनी सल्तनत संकट से गुजर रही थी तब मालवा और खानदेश के शासकों ने उसे बरार पर आक्रमण करने के लिये उकसाया। बहमनी सुल्तान उस समय विजयनगर के अभियान में व्यस्त था। इसका लाभ उठाकर नरसिंगराय ने दक्खन में माहुर तक के प्रदेश को अधिकृत कर लिया। इस पर फीरोज बहमनी 1399 में नरसिंगराय को सजा देने के लिये सेना सहित बढ़ा। माहुर पहुँचने पर फीरोज ने पाया कि वहाँ के राजाओं ने डरकर नरसिंगराय की अध् ीनता स्वीकार कर ली थी। फीरोज के आने पर इन सबने फीरोज की अधीनता फिर से स्वीकार कर लीं । अब फीरोज खेरला की ओर बढ़ा। नरसिंगराय ने खानदेश के फारुकी शासक नासिर खां तथा मालवा के शासक दिलावर खां गोरी से सहायता माँगी, पर उसे निराश होना पड़ा। तब उसने अकेले लोहा लेने का संकल्प किया।

 

बहमनी सेनाओं ने फज्लुल्मुल्क इजू और खानखाना के नेतृत्व में नरसिंगराय की सेना से युद्ध किया। युद्ध में बहमनी पक्ष के अनेक प्रमुख लोग शुजात खाँ, बहादुर खां दिलावर खां और रुस्तम खाँ मारे गये और लगा कि सेना हार जायेगी जब बहमनी सुल्तान के सेना सहित आने का समाचार सेना में प्रसारित किया गया, तब कहीं सेना की हिम्मत बँधी खानखाना तथा मलिक इंजू ने नरसिंगराय के बेटे गोपालराय को बंदी बना लिया और नरसिंगराय को खेरला के किले में घेर लिया। दो माह के घेरे के बाद नरसिंगराय ने खुद एलिचपुर पहुँचकर बहमनी सुल्तान के समक्ष समर्पण कर दिया और बहमनी सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली। उसने वार्षिक कर देने का वादा करने के साथ ही अपनी बेटी भी सुल्तान को सौंप दी एवं चालीस हाथी, पाँच मन सोना और पचास मन चाँदी भी भेंट की। बदले में बहमनी सुल्तान ने नरसिंगराय को खेरला वापिस कर दिया और उसे बहमनी सल्तनत का अमीर बना दिया।

 

होशंगशाह का खेरला पर आक्रमण 

खेरला पर बहमनी शासक का अधिकार होने के बाद मालवा के होंशंगशाह को अपनी गलती का अहसास हुआ। खेरला तक बहमनी की सत्ता स्थापित हो जाने से बहमनी सल्तनत की सीमा मालवा की सीमा से लग गई। अब यदि मालवा के सुल्तान को बहमनी सल्तनत के खिलाफ अपनी सुरक्षा करना था तो उसे खेरला पर प्रभावी नियंत्रण करना जरूरी था। खेरला पर नियंत्रण इस दृष्टिकोण से भी उपयोगी था कि छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के प्रदेशों से हाथी प्राप्त करने के लिए खेरला से होकर ही जाना पड़ता था। गुजरात के शासक अहमदशाह से जब होशंगशाह पराजित हुआ तो उसे लगा कि उसकी पराजय हाथियों की कमी के कारण हुई है। अब होशंगशाह ने खेरला की विजय करने और फिर वहाँ से जाजनगर- उड़ीसा का अभियान करने की योजना बना डाली। नरसिंगराय के इलाके पर अधिकार करने, उसकी सम्पत्ति हथियानें और खेरला प्रदेश के हाथियों पर कब्जा करने के लिये 1420 में होशंगशाह अपनी सेना सहित खेरला के किले की ओर बढ़ा। नरसिंगराय किले के बाहर निकला और उसने 50 हजार सैनिकों के साथ आक्रान्ता का मुकाबला किया लेकिन उसकी पराजय हुई। फलस्वरूप उसने होशंगशाह की अधीनता स्वीकार कर ली और उसे 84 हाथियों के साथ क्षतिपूर्ति के रूप में बड़ी तादाद में सोना भी दिया। होशंगशाह ने खेरला के किले पर कब्जा नहीं किया और उसे नरसिंगराय के अधीन ही छोड़ दिया। होशंगशाह वहाँ से जाजनगर को बढ़ गया।

 

होशंगशाह जब जाजनगर से हाथी लेकर लौटा तो खेरला पहुँचने पर उसे ज्ञात हुआ कि माण्डू के किले गुजरात के सुल्तान अहमदशाह ने घेर लिया है। इस पर उसने खेरला में ही शरण लेने का तय किया और नरसिंगराय को अपनी सेना में शामिल होने का आग्रह किया। उसने नरसिंगराय को नजरबन्द कर लिया और खेरला में अपना अधिकारी को नियुक्त कर दिया। लेकिन अहमदशाह के चले जाने के बाद होशंगशाह ने खेरला नरसिंगराय को सौंप दिया और नरसिंगराय मालवा का मित्र हो गया। नरसिंगराय ने 1423 ई. में होशंगशाह के गागरौन अभियान में भाग भाग लेने के लिए अपने दो बेटों चांदजी और खेमजी को भेजा ।

 

बहमनी सुल्तान अहमदशाह की बढ़ती ताकत देखकर होशंगशाह ने नरसिंगराय से सहयोग माँगा लेकिन नरसिंगराय के सहमत होने के कारण 1425-26 ई. में होशंगशाह ने दो बार खेरला के विरुद्ध अभियान किया लेकिन सफल नहीं हुआ। फिर 1428-29 ई. में होशंगशाह ने खुद सेना लेकर खेरला पर तीसरी बार आक्रमण किया। इससे आतंकित होकर नरसिंगराय ने अहमदशाह बहमनी से सहायता माँगी। अहमदशाह ने बरार के सूबेदार खानजहान को आदेश दिया कि वह सेना लेकर खेरला की सहायता के लिये जाए। खुद अहमदशाह भी सात हजार सैनिकों के साथ बरार के मुख्यालय एलिचपुर पहुँचा जिससे जरूरत पड़ने पर वह खानजहान की सहायता के लिए जा सके। होशंगशाह खेरला की ओर बढ़ा और उसने आसपास के इलाके को लूटना शुरू कर दिया। अब अहमदशाह बहमनी उसके खिलाफ बढ़ा। अपने दो हजार चुनिन्दा घुड़सवारों और 12 हाथियों के साथ अहमदशाह ने होशंगशाह को घेर लिया और होशंगशाह को रणक्षेत्र छोड़कर भागना पड़ा। अहमदशाह बहमनी की सेना ने उसका पीछा किया और उसके दो हजार लोगों को मार डाला। नरसिंगराय ने जब होशंगशाह की सेना को भागते देखा तो वह खुद खेरला के किले से निकला और होशंगशाह की सेना के बहुत से लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद उसने अहमदशाह के प्रति सम्मान प्रकट किया और उसे अपने किले में ले जाकर उसे कीमती भेंट प्रस्तुत की। 10 होशंगशाह इतनी बुरी तरह हारा कि उसे माण्डू भागना पड़ा। लेकिन उसके कई हाथी तथा हरम की कुछ महिलाएँ अहमदशाह के हाथ में पड़ गयीं, जिन्हें बाद में अहमदशाह ने 500 घुड़सवारों के साथ ससम्मान माण्डू वापस भेज दिया ।

 

नरसिंगराय की मृत्यु और खेरला पर मालवा का अधिकार 

होशंगशाह की पराजय के बाद नरसिंगराय ने अहमदशाह की अधीनता स्वीकार कर ली । सुल्तान ने खेरला को बहमनी का संरक्षित राज्य घोषित करके नरसिंगराय को खेरला का स्वामी रहने दिया। सुल्तान की वापिसी यात्रा में नरसिंगराय उसे माहुर तक पहुँचाने गया। अहमदशाह बहमनी बरार प्रदेश के गवर्नर के रूप में अपने बेटे अहमद को छोड़कर दक्खिन लौट गया। होशंगशाह इस पराजय को और नरसिंगराय के विश्वासघात को भुला न सका और वह अवसर की ताक में रहने लगा । यह मौका उसे तब मिला जब अहमदशाह बहमनी अहमदशाह गुजराती के विरुद्ध व्यस्त था । इस मौके का फायदा उठाकर होशंगशाह ने 1433 ई. में खेरला पर आक्रमण कर दि । इस युद्ध में नरसिंगराय मारा गया और होशंगशाह ने खेरला राज्य को अपनी सल्तनत में शामिल कर लिया। नरसिंगराय के बेटे कोसलराय ने होशंगशाह की अधीनता स्वीकार कर ली और उसे खेर का अधीनस्थ राजा बना दिया गया।"

 

होशंगाबाद के इस अभियान और नरसिंगराय की मृत्यु का समाचार सुनकर अहमदशाह बहमनी होशंगशाह के विरुद्ध रवाना हो गया। लेकिन उसके मित्र खानदेश के शासक नासिर खान ने बीच में पड़कर होशंगशाह तथा अहमदशाह के मध्य समझौता करा दिया। इसके अनुसार तय हुआ कि बरार पर बहमनी के सुल्तान का अधिकार रहेगा और खेरला पर मालवा का अधिपत्य रहेगा। इस प्रकार खेरला की स्वतंत्र सत्ता का अन्त हो गया ।

 

मालवा और बहमनी के बीच खेरला के लिये खींचतान 

दो साल बाद 1435 ई. में ही होशंगशाह की मृत्यु हो गयी और मालवा के गोरी वंश का अन्त हो गया। उसकी जगह महमूद प्रथम गद्दी पर बैठा और उसने मालवा में खिलजी वंश की नींव रखी। इस मौके का फायदा उठाकर नरसिंगराय के उत्तराधिकारी खेरला के शासक ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। मालवा के सुल्तान महमूद प्रथम हाथी प्राप्त करने और खेरला के शासक को सबक सिखाने के लिए सेना सहित खेरला की ओर बढ़ा। महमूद खिलजी के आने की खबर पाकर खेरला का शासक किले से निकला और उसने महमूद खिलजी को 11 हाथी भेंट किये और मालवा सुल्तान के साथ सरगुजा की ओर रवाना हो गया । 

 

1453 ई. की शुरूआत में महमूद खिलजी ने बरार और तेलंगाना के इलाके जीतने का प्रयास किया। वह 5000 की सेना के साथ खेरला होकर माहुर की ओर चला लेकिन वह सफल नहीं हुआ और लौट गया। अक्टूबर 1461 ई. में उसने फिर अभियान किया और बहमनी सेना को महेसकर की लड़ाई में हराया। अगले साल महमूद खिलजी ने फिर से बरार जीतने की कोशिश की और एलिचपुर पर अधिकार कर लिया। तभी उसे पता चला कि गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने मालवा पर आक्रमण कर दिया है और वह लौट पड़ा तथा 10 मई 1463 ई. को माण्डू पहुँच गया। महमूद खिलजी अन्य व्यस्तताओं और खेरला में स्थित नरसिंगराय के वंशजों की अविश्वसनीयता के कारण बरार के मुख्यालय एलिचपुर पर पूरी तरह ध्यान नहीं पा रहा था। तब उसने खेरला अधिपति हरनायक को हटाकर खेरला का नाम महमूदाबाद कर दिया और वहाँ सिराजुल्मुल्क को नियुक्त कर दिया । सिराज को यह भी आदेश दिया गया कि वह महमूदाबाद खेरला के किले में अनाज एकत्र करे, जिससे खेरला को आधार बनाकर एलिचपुर पर आक्रमण किया जा सके। 

 

मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी की इन तैयारियों से चिंतित होकर बहमनी सुल्तान महमूदशाह लश्करी ने मालवा सुलतान के अतिक्रमणों को रोकने की तैयारी की। अब खेरला मालवा और बहमनी के बीच संघर्ष का केन्द्र हो गया। 1468 ई. में बहमनी शासक मुहम्मद तृतीय के आदेश से बरार के गवर्नर निजामुल्मुल्क ने खेरला को घेर लिया। खेरला के शासक ने तब मालवा के सुल्तान से सहायता मांगी। इस पर मालवा के सुल्तान महमूद ने अपने सेना नायक सिराजुल्मुल्क को सेना सहित खेरला की सहायता के लिए भेज दिया। सिराजुल्मुल्क ने खेरला पर अधिकार तो कर लिया लेकिन उसने युद्ध की तैयारी में सावधानी नहीं बरती। फल यह हुआ कि युद्ध में बहमनी सेना की जीत हुई और सिराजुल्मुल्क का बेटा युद्ध में मारा गया और सिराजुल्मुल्क को तेईस हाथियों के साथ बन्दी बना लिया गया। खेरला के किले पर अब बहमनी सुल्तान का अधिकार हो गया। 14 निजामुल्मुल्क को कुछ रोज बाद ही उसके एक सैनिक ने मार डाला ।

 

खेरला हाथ से निकल जाने से महमूद खिलजी को इतना बुरा लगा कि अस्वस्थ होने के बावजूद वह पालकी पर खेरला के अभियान के लिये रवाना हो गया। उसने ताज खान को खेरला की रक्षा के लिये सेना भेजने का आदेश दिया। निजामुल्मुल्क की मृत्यु से खेरला पर बहमनी की सेना का अधि कार निर्बल हो गया था और ताज खाँ ने खेरला से बहमनी सेनाओं को खदेड़कर खेरला का किला जीत लिया। खेरला के किले को मकबूल खाँ के अधीन रख दिया गया और उसे चार लाख टंका, 50 हाथी, 15 हाथी प्रदान किये गये जिससे वह दक्खिन की सेनाओं के खिलाफ खेरला के किले की सुरक्षा मजबूत कर सके। 15 काफी दिनों तक बहमनी और मालवा सल्तनतों के बीच खेरला के लिए खींचतान चलती रही। अन्त में यह तय हुआ कि दोनों राज्यों के मध्य की सीमा एलिचपुर रहेगी और खेरला मालवा के पास बना रहा।

 

मालवा के अधीन खेरला

मालवा की सल्तनत के शासक महमूद खिलजी के शासनकाल के अन्त में खेरला के सूबेदार मकबूल खाँ ने सुल्तान की वृद्धावस्था का लाभ उठाकर 1467 ई. में विद्रोह कर दिया। उसने खेरला के रायजादा याने युवराज रायभानुजी को अपनी ओर मिला लिया और बहमनी सल्तनत से भी सहायता ली। महमूद खिलजी ने विद्रोह का दमन करने के लिये तुरन्त ताज खाँ और अहमद खाँ को खेरला की ओर रवाना किया और खुद भी आवश्यकता पड़ने पर अभियान को रवाना होने के लिये तैयार हो गया। ताज खाँ को सफलता मिली और भानुजी भीलों के प्रदेश की ओर भाग गया। इसके बाद मालवा का सुल्तान महमूद खिलजी खेरला की ओर बढ़ा, पर तभी बहमनी तथा मालवा के मध्य संधि हो गयी। संधि के अनुसार खेरला मालवा को दे दिया गया और बरार बहमनी सुल्तान के पास रहा। खेरला मालवा के अधीन तब तक रहा जब तक मुगल बादशाह अकबर ने 1562 ई. में मालवा पर अधिकार नहीं कर लिया। फिर 1601 ई. में दक्खन के अभियान में जो सफलता अकबर को मिली थी उससे बरार का प्रदेश भी उसके अधिकार में आ गया था। आइन-ए-अकबरी में खेरला का उल्लेख बरार के सूबे में एक सरकार के रूप में किया गया हैं। नरसिंगराय के वंशजों का क्या हुआ यह जानकारी नहीं है।

No comments:

Post a Comment

Powered by Blogger.