शिक्षा पर्यवेक्षण का अर्थ आवश्यकता |पर्यवेक्षण के सिद्धान्त |Need of education supervision

पर्यवेक्षण: सेवा, प्रक्रिया तथा नेतृत्व

शिक्षा पर्यवेक्षण का अर्थ आवश्यकता |पर्यवेक्षण के सिद्धान्त |Need of education supervision


 


पर्यवेक्षण प्रस्तावना 

शिक्षा समाज के प्रतिनिधि के रूप में समाज की आवश्यकताओं की परिपूर्ति करती है। आज का समाज क्रमशः भौतिक होता जा रहा है। विज्ञान तथा तकनीकी विकास ने भौतिकता की दिशा को और भी अधिक तीव्रता प्रदान की है। इससे शिक्षा पर नये-नये दायित्व आ पड़े हैं। इन दायित्वों के कारण विद्यालयों पर अतिरिक्त भार पड़ा है। आज यह निश्चित करना कठिन हो रहा है कि क्या और कैसे पढ़ाया जाये? इन कारणों के उत्तर के लिए नई-नई पाठ्य-वस्तुएँ शिक्षण पद्धतियों, विधियों तथा उपकरणों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ है। इससे शिक्षण-प्रक्रिया बड़ी ही जटिल एवं क्लिष्ट हो गई हैं शिक्षा प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने हेतु इन सभी का समुचित समायोजन, संगठन एवं प्रयोग आवश्यक है। इसके लिए शिक्षा पर्यवेक्षण की आवश्यकता पड़ती है। शिक्षा - पर्यवेक्षण का प्रमुख उद्देश्य अनेक शिक्षा प्रक्रियाओं का समुचित समन्वय कर अधिकतमक प्रतिफल प्राप्त करना है। पर्यवेक्षण के द्वारा शैक्षिक क्रियाओं की आवश्यक आवृत्तियाँ रोकी जा सकती हैं, अनेक शैक्षिक क्रियाओं का अपव्यय कम किया जा सकता है तथा शिक्षा को अधिकाधिक मानव-कल्याण का साधन बनाया जा सकता है।

 

शिक्षा पर्यवेक्षण का अर्थ 

शिक्षा प्रशासन के क्षेत्र में कभी-कभी निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण को एक ही अर्थ में लिया जाता है, जबकि इन दोनों में मूलभूत अन्तर हैं शाब्दिक अर्थ में निरीक्षण का अर्थ किसी चीज की बारीकी के साथ जाँच एवं देखरेख करना है जबकि पर्यवेक्षण का अर्थ दूर ऊँचे स्थान से नीचे के स्थानों का अवलोकन करना है। तकनीकी अर्थ में शिक्षा पर्यवेक्षण से हमारा तात्पर्य एक ऐसे सुनियोजित कार्यक्रम से है जिसका प्रमुख उद्देश्य शिक्षण-प्रक्रियाओं में उन्नति तथा प्रभावशाली लाना है। फ्रान्सेथ जाम के अनुसार 'उत्तम शिक्षा पर्यवेक्षण व्यक्तिगत तथा सामान्य समस्याओं के समाधान हेतु व्यक्तियों की ऊर्जा को रचानात्मक विधियों में संलग्न करने की प्रक्रिया है।' मला एवं मलैया ने अपनी पुस्तक शिक्षा प्रशासन एवं पर्यवेक्षण में शिक्षा - पर्यवेक्षण' की परिभाषा निम्न शब्दों में दी है-

 

'शिक्षा पर्यवेक्षण यह प्राविधिक सेवा है जो शिक्षकों को अपनी व्यावसायिक कुशलता वृद्धि के लिए उचित व्यावसायिक नेतृत्व तथा सहयोग प्रदान करती है, शिक्षण स्तर को उच्च बनाने हेतु उन्हें पाठ्यक्रम सुधार से परिचित कराती है एवं अपने छात्रो को और अच्छी तरह समझने, शिक्षण सामग्री निर्माण करने, शिक्षण विधियों का विकास करने, उचित मूल्यांकन - विधियों का उपयोग करने आदि के कौशल विकास में सहायक होती हैं। इस दृष्टि से शिक्षा पर्यवेक्षण एक लोकतंत्रीय तथा सहयोगी प्रक्रिया है जिसमें शिक्षण स्तर को उच्च बनाने हेतु शिक्षक, पर्यवेक्षक तथा बालक सभी हिल-मिल कर कार्य करते है।"

 

इस प्रकार से निरीक्षक एक आलोचक, गलतियाँ निकालने वाला तथा दण्डाधिकारी होता है, किन्तु पर्यवेक्षक एक मित्र, परामर्शदाता, निर्देशनकर्ता तथा शुभचिनतक होता है। पर्यवेक्षक जहाँ कमियों तथा गलतियों की ओर इशारा करता है, वहीं पर वह उनके निराकरण हेतु उपयोगी परामर्श भी देता है। उसका व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण होता है।

 

पर्यवेक्षण की आवश्यकता

शिक्षा पर्यवेक्षण शिक्षा की उन्नति के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसकी आवश्यकता निम्न कारणों से और भी अधिक बढ़ गई है -

 

1. सामाजिक आवश्यकता के कारण

आज प्रत्येक समाज क्रमशः भौतिकवादी होता जा रहा है। उसकी आवश्यकताएँ, मान्यताएँ, मूल्य तथा प्रकृति में तीव्र गति से उल्लेखनीय परिवर्तन हो रहा है। इसका स्पष्ट प्रभाव शिक्षा के स्वभाव एवं प्रकृति पर पड़ रहा है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में नई-नई समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। विश्व में लोकतंत्रीय जीवन दर्शन व्यापक रूप से अपनाया जा रहा है। इसमें जाति, रंग आदि का भेदभाव न रखते हुए सभी को समान शैक्षिक अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है। इसके लिए बडे पैमाने पर विद्यालयों की व्यवस्था करने की आवश्यकता है, साथ ही साथ कक्षाओं में छात्रों की संख्या भी आशा से अधिक बढ़ानी है। यह वास्तव में हो भी रहा है। इसके अलावा शिक्षा का भौतिकीकरण भी हो रहा है। इस नये परिवेश में शिक्षा को नई-नई समस्याओं, जैसे- अनुशासनहीनता, व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास करना, कक्षाओं में अधिक व्यक्तिगत विभिन्नताओं का होना, लोकतंत्रात्मक दृष्टिकोण का विकास करना आदि का सामना करना पड़ रहा है। इन समस्याओं के समाधान के लिए शिक्षा का समुचित पर्यवेक्षण करने की व्यवस्था अत्यन्त आवश्यक है।

 

2. अध्यापक पर अधिभार

आज के अध्यापक को पहले की अपेक्षा अधिक कार्य करना पड़ता है। आजकाल अध्यापक केवल एक अध्यापक ही नहीं है, वरन् वह मित्र, निर्देशक तथा दार्शनिक के रूप में छात्र के समक्ष प्रस्तुत होता है। इस स्थिति में अध्यापक को अनेक कार्य करने पड़ते हैं। वह शिक्षण करता है, व्यक्तिगत विभिन्नताओं का पता लगाता है, संचयी आलेख पत्र तथा छात्र से सम्बन्धित उपयोगी सूचनाएँ एकत्रित करता है, उसका पथ-प्रदर्शक बनता है, परिणाम-पत्र बनाता है तथा अन्य अनेक कार्य करता है। इन सहगामी कार्यों के बढ़ने के साथ ही उसके मूल कार्य शिक्षण में भी तीव्रता के साथ वृद्धि हुई हैं उसे अब कालांशों में से कभी- कभी तो सभी और सामान्यतया छः व सात कालांश शिक्षण करना पड़ता है। अब उसे कक्षा में दस-पन्द्रह छात्रों के स्थान पर पचास- पंचास और इनसे भी अधिक छात्रों को पढ़ाना पड़ता है। अध्यापक अपने इस अधिभार को सफलता एवं सुविधापूर्वक वहन कर सके, इसके लिए समुचित शिक्षा पयवेक्षण की आवश्यकता है। शिक्षा पर्यवेक्षण के द्वारा उसकी अनेक समस्याएँ सुलझाई जा सकती हैं।

 

3.नवीन शिक्षण विधियों का विकास - 

लोकतांत्रिक शिक्षा के अन्तर्गत आजकल अनेक आधुनिक शिक्षण विधियों का विकास हो चुका है। इस नवीन विधियों का कक्षा शिक्षण में व्यावहारिक प्रयोग बिना पूर्व प्रशिक्षण के सम्भव नहीं है। साथ ही साथ नवीन शिक्षण पद्धतियों के प्रयोग, सफलता, असफलता तथा सुधारों पर प्रकाश डाला जा सकता है।

 

4. अप्रशिक्षित अध्यापक - 

तीव्र गति से बड़ती हुई शैक्षिक सुविधाओं की पूर्ति के लिए बड़ी मात्रा में अप्रशिक्षित अध्यापकों की सेवाओं की आवश्यकता पड़ी है। अप्रशिक्षित अध्यापकों को शिक्षण के आधारभूत सिद्धान्तों तथा प्रयोगों का ज्ञान तथा कौशल प्रदान किया जा सकता है।

 

5. प्रशिक्षित अध्यापकों का अभिनवीकरण - 

शिक्षण प्रशिक्षण संस्थाओं में प्रशिक्षत का काल छोटा होता हैं वहाँ शिक्षण कौशल का पूर्ण विकास नहीं किया जा सकता है। सेवारत स्थिति में सामयिक शिक्षा पर्यवेक्षण के द्वारा इन प्रशिक्षित शिक्षकों में वांछनीय शिक्षण कौशल विकसित किया जा सकता है।

 

6. विद्यालय कार्यों में वृद्धि - 

आज विद्यालय का कार्य केवल विषयगत शिक्षा प्रदान करना मात्र ही नहीं रह गया है, वरन् आज के विद्यालय से यह आशा की जाती है कि वह छात्र के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करे। इस कार्य हेतु विद्यालय के शिक्षा के अलावा और अनेक कार्य सम्पादित करने पड़ते हैं। उसे अनेक पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं की व्यवस्था एवं संचालन करना पड़ता है छात्रों में लोकतांत्रिक भावनाओं का विकास करने हेतु आवश्यक कदम उठाने पड़ते हैं तथा व्यावहारिक शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ती है। इन कार्यों की सफलता भी उपयुक्त शिक्षा पर्यवेक्षण पर निर्भर है।

 

पर्यवेक्षण के सिद्धान्त

पर्यवेक्षण के सिद्धान्तों की विभिन्न विद्धानों ने अलग-अलग चर्चा की है। कुछ विद्वानों ने पर्यवेक्षण के सिद्धान्तों की एक लम्बी सूची गिना दी है तो कुछ विद्वानों ने इनकी संख्या बडी ही कम रखी है। आर. बर्टन, तथा बुकनर ने पर्यवेक्षण के चार सिद्धान्त बताये हैं-

 

1. पर्यवेक्षण सैद्धान्तिक रूप से ठोस हो 

2. पर्यवेक्षण लोकतांत्रिक हो, 

3. पर्यवेक्षण वैज्ञानिक हो

4. पर्यवेक्षण रचनात्मक हो ।

 

शिक्षा - पर्यवेक्षण के उद्देश्य

शिक्षा पर्यवेक्षण के द्वारा अग्रांकित उद्देश्यों की प्राप्ति के प्रयास किये जाते हैं-

 

1. शिक्षकों के सम्मुख शिक्षा के उद्देश्य, मूल्य तथा उपलब्धियों को सुनिश्चित तथा स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करना । 

2. शिक्षकों की व्यावसायिक कुशलता में वृद्धि कर उनके शिक्षण को प्रभावकारी बनाना। 

3. शिक्षकों को छात्रों तथा समाज की आवश्यकताओं से परिचित कराकर उनकी परिपूर्ति करने हेतु अध्यापकों को प्रोत्साहित करना | 

4. शिक्षकों को उनकी योग्यता, शिक्षा तथा क्षमताओं के अनुसार कार्य विभाजन करना। 

5. शिक्षकों को समुचित समायोजन करने में सहायता देना। 

6. अप्रशिक्षित शिक्षकों को शिक्षण के आधारभूत सिद्धान्तों तथा प्रयोगों से परिचित करना। 

7. शिक्षकों के व्यापक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु विद्यालय में आवश्यक वातावरण तथा शिक्षण सुविधाएँ प्रदान करना।

 

शिक्षा पर्यवेक्षण की विशेषताएँ 

आधुनिक पर्यवेक्षण द्वारा छात्रों एवं अध्यापकों के व्यक्तित्व का सर्वाधिक विकास किया जा सकता है। आधुनिक पर्यवेक्षण की विशेषतायें जनतान्त्रिक प्रणाली के अनुकूल हैं। इनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं। -

 

1. शैक्षिक पर्यवेक्षण का आधुनिक प्रत्यय शिक्षा विकास की प्रक्रिया है- 

आधुनिक प्रत्यय के द्वारा शिक्षा का पूर्ण विकास पर्यवेक्षण द्वारा ही सम्भव है। इसकी नवीन विधियों, प्रविधियों, उपकरणों एवं आयामों द्वारा शिक्षा की सभी क्रियाओं को विकसित किया जाता है।

 

2. शैक्षिक पर्यवेक्षण का आधुनिक प्रत्यय प्रजातान्त्रिक - 

पर्यवेक्षण के आधुनिक प्रत्यय के अन्तर्गत पर्यवेक्षण एक सहयोगी, निर्देशक, परामर्शदाता तथा मैत्रीपूर्ण रूप से अपने सुझाव शिक्षको को दिये जाते हैं। अतएव पर्यवेक्षण का आधार प्रजातांत्रिक है।

 

3. शैक्षिक पर्यवेक्षण का आधुनिक प्रत्यय एक तकनीकी सेवा है- 

शैक्षिक पर्यवेक्षण के द्वारा मौलिक, रचनात्मक एवं वस्तुनिष्ठ शैक्षिक क्रियाओं को पूरा किया जाता है। अतएव इसको एक तकनीकी सेवा द्वारा सम्बोधित किया गया है।

 

4. शैक्षिक पर्यवेक्षण का आधुनिक प्रत्यय एक परामर्शदाता के रूप में कार्य करता है -

शैक्षिक पर्यवेक्षण के आधुनिक प्रत्यय के अन्तर्गत पर्यवेक्षक का प्रत्येक कार्य एक सहयोगी एवं मैत्रीपूर्ण परामर्शदाता के रूप में होता है। उसके सुझाव उपयोगी होते हैं।

 

5. इसके द्वारा वस्तुनिष्ठ तथा विश्वसनीय पर्यवेक्षा पर बल दिया जाता है- 

शैक्षिक पर्यवेक्षण की प्रत्येक क्रिया वस्तुनिष्ठ तथा विश्वसनीय रूप में सम्पन्न की जाती है। पर्यवेक्षण के द्वारा दिये गये सुझाव एवं विधियाँ पूर्णतः विश्वसनीय होते हैं।

 

6. शैक्षिक पर्यवेक्षण का आधुनिक प्रत्यय विद्यालय अन्तः क्रिया का गत्यात्मक रूप है-

 इसके द्वारा विद्यालय की सभी अन्तः क्रियाओं को निरन्तर आगे बढ़ाया जाता है। तथा समाज के अनुरूप परिवर्तित किया जाता है।

 

7. शैक्षिक पर्यवेक्षण का आधुनिक प्रत्यय योजनाबद्ध पर्यवेक्षण पर बल देता है- 

पर्यवेक्षण का आधुनिक प्रत्यय शिक्षा के सभी कार्यों को नियोजित रूप प्रदान करता है तथा इसकी रूपरेखा को सुनिश्चित करता है।

 

8. शैक्षिक पर्यवेक्षण का आधुनिक प्रत्यय वैज्ञानिक विधि प्रदान करता है- 

आधुनिक पर्यवेक्षण प्राचीन तथा परम्परागत विधियों में विश्वास नहीं रखता। इसके द्वारा जो विधि अथवा नवीन पद्धति अपनाई जाती हैं वह पूर्णतया परीक्षित एवं विश्वसनीय होती है। आधुनिक पर्यवेक्षण में वैज्ञानिक विधि को अपनाया जाता है। इस पर्यवेक्षण में विभिन्न कार्यक्रमों में समस्या का चयन, तथ्यों का संकलन तथा वर्गीकरण, परिकल्पना का निर्माण, व्याख्या एवं सामान्यीकरण, सम्भावित विधियो का चयन आदि वैज्ञानिक विधियों के सोपानों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इसके द्वारा प्रत्येक कार्य का गहन परीक्षण तथा गम्भीर विचार करके किया जाता है।

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