मालवा के इतिहास में मेदिनीराय का उत्कर्ष | Mednirai in Malwa History

मालवा के इतिहास में मेदिनीराय का उत्कर्ष 

मालवा के इतिहास में मेदिनीराय का उत्कर्ष | Mednirai in Malwa History



मालवा के इतिहास में मेदिनीराय का उत्कर्ष

 

महमूद खाँ के माण्डू से जाते ही मुहाफिज खाँ ने साहिब खाँ को राजगद्दी पर बैठाकर उसे सुल्तान मोहम्मद की उपाधि प्रदान की। अब मालवा में दो सुल्तान थेराजधानी माण्डू में सुल्तान मोहम्मददूसरा सुल्तान महमूद खाँ जो इस समय उज्जैन में था।मालवा के अमीर और सरदार उलझन और दुविधा की स्थिति में कि वे किसका समर्थन करें। महमूद खाँ लगभग निराश हो चुका था किंतु उसी समय रायचंद पूरबिया जो बाद में मेदिनीराय के नाम से विख्यात हुआके आगमन से उसमें नई आशा का संचार हुआ। मेदिनीराय असाधारण योग्यता का व्यक्ति थी उसने अपने राजपूत समर्थकों की सेना के साथ सहिब खाँ को बुरी तरह पराजित कर नष्ट कर दिया। साहिब खाँ गुजरात होता हुआ दक्षिण में भाग गया। मेदिनीराय ने सुल्तान महमूद को पुनः माण्डू में स्थापित कर दिया। अब मेदिनीराय बहुत शक्तिशाली हो गयाउसने अपने संबंधियों और समर्थकों को मालवा में ऊँचे पदों पर नियुक्त किया और इन्हें सारंगपुरभेलसारायसेन और होशंगाबाद के क्षेत्रों में जागीरें प्रदान की । 


मेदिनीराय ने स्वयं के लिये चन्देरी को प्राप्त किया। इसी बीच उसे समाचार मिला कि अफजल खाँ और इकबाल खाँसाहिब खाँ को पुनः सुल्तान बनाने के लिये उससे गुप्त रूप से बातचीत कर रहे हैं। मेदिनीराय ने सुल्तान महमूद को यह समाचार दिया और सुल्तान ने मेदिनीराय के दबाव में इकबाल खाँ और अफजल खाँ को मृत्यु दण्ड दिलवा दिया। इस घटना से मुसलमान अधिकारियों और सरदारों में असंतोष और विद्रोह की भावना भड़क उठी। इन विद्रोहियों ने साहिब खाँ को पुनः राजगद्दी पर बैठाने और सहायता देने का वचन देकर उसे आमंत्रित किया। इसके साथ ही इन विद्रोही अमीरों ने सुल्तान सिकन्दर लोदी से प्रार्थना की वह इनकी सहायता के लिये सेना भेजे क्योंकि मालवा के सुल्तान ने शासन की बागडोर एक हिन्दू को सौंप रखी है। सुल्तान सिकन्दर शाह लौदी ने एक सेना भेजी। प्रारंभ में ऐसा प्रतीत होने लगा की दिल्ली कि सेना की सहायता से विद्रोही अमीर सफल हो जायेंगे। क्योंकि सुल्तान महमूद खिलजी की स्थिति गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर द्वितीय के मालवा पर आक्रमण से और खतरे में पड़ गई। किंतु गुजरात में विद्रोह होने के कारण मुजफ्फर द्वितीय वापस लौट गया । 


सिकन्दर लोदी ने चन्देरी में बिजहाद खाँ को शर्तों के अनुसार दिल्ली के सुल्तान से खुतबा न पढ़वाने को वचन भंग करने की संज्ञा दी और अपनी सेना वापस दिल्ली बुलवा ली। निजामुद्दीन और फरिश्ता दोनों के अनुसार इन घटनाओं ने साहिब खाँ और उसके समर्थक विद्रोही अमीरों की स्थिति को बहुत कमजोर कर दिया। इस स्थिति का लाभ सुल्तान महमूद खिलजी ने उठायाउसने मेदिनीराय और उसकी राजपूत सेना के साथ दिल्ली की सेना को पराजित कर दियातथा चन्देरी पर पुनः अधिकार कर लिया। महमूद खिलजी को विजय प्राप्त हुई। वह मेदिनीराय के असाधारण शौर्य का परिणाम थी । चन्देरी की व्यवस्था कर सुल्तान दिसम्बर 1514 ई. को राजधानी माण्डू लौट आया .

 

मेदिनीराय की सलाह पर उसने अनेक मुसलमान सरदारों को कठोर दण्ड दिये। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि सुल्तान सभी मुसलमान सरदारों के विरूद्ध हो गया। मुसलमान अमीर भी महमूद खिलजी के विरोधी हो गये और उन्होंने मालवा छोड़ना शुरू कर दिया। अब मेदिनीराय ने सभी पदों पर अपने व्यक्तियों को नियुक्त करना प्रारंभ कर दिया। यहाँ तक कि कुछ राजपूत सरदारों जिनमें शालीवाहनखेमकरण आदि प्रमुख थे ने अपने हरम में मुसलमान लड़कियों को रख लिया। राजपूतों के इस आचरण ने मुसलमानों में असंतोष को और भड़का दिया ।

 

मेदिनीराय और उसके समर्थकों के बढ़ते प्रभाव के कारण सुल्तान महमूद बेचैन और असहज रहने लगा। वह अब राजपूतों से छुटकारा पाने की योजना बनाने लगा। एक दिन उसने बहुत ही सौजन्यता से मेदिनीराय को उसके पद से अलग कर दिया। मेदिनीराय के समर्थकों ने पहले सुल्तान को यह संदेश भेजा कि उनसे और मेदिनीराय से कौन सी गलती हुई है कि जिसके कारण आपने यह कदम उठाया है। इसके बाद वे सब एकत्र हुए और उन्होंने प्रस्ताव रखा कि मेदिनीराय के पुत्र को मालवा के सिंहासन पर बैठाया जाए। उनके इस प्रस्ताव का मेदिनीराय ने विरोध किया और कहा "वर्तमान में मालवा का सुल्तान और सल्तनत हमारे अधिपत्य में है। यदि किसी कारणवश महमूद गद्दी पर नहीं रहा तो गुजरात का सुल्तान मुजफ्फर शाह तत्काल सेना के साथ आक्रमण कर देगा और मालवा के राज्य पर अधिकार कर लेगा। इसलिए हमें उन सभी उपायों से जो संभव हो अपने स्वामी को प्रसन्न रखना होगा। 

 

मेदिनीराय सुल्तान के पास गया और उसने बहुत ही नम्रता और सौजन्यता से सुल्तान से क्षमा माँगीसुल्तान ने इस शर्त पर उसे और उसके राजपूत अधिकारियों को क्षमा करने का वचन दिया कि यदि मेदिनीराय सभी मुसलमान अधिकारियों को पुनः नियुक्त करेंअपने समर्थकों को राज्य के मामलों में हस्तक्षेप से रोके और उन्हें आदेश दे कि वे सभी मुसलमान स्त्रियाँ जो उनके यहाँ हैउन्हें वापस करें। 

मेदिनीराय ने सभी शर्तों को मान लिया। परंतु शालिवाहन ने मुसलमान स्त्रियों को वापस करने से इन्कार कर दिया। सुल्तान महमूद ने अब अपने व्यक्तिगत मुसलमान अंगरक्षकों के साथ षडयंत्र रचा और दूसरे दिन जब मेदिनीराय और शालिवाहन सुल्तान से मिलकर महल से बाहर निकले तो इन अंगरक्षकों ने अचानक उन पर वार कर दिया। इस आक्रमण में शालीवाहन मारा गया और मेदिनीराय घायल हो गया। मेदिनीराय किसी प्रकार अपने घर पहुँच गया। मेदिनीराय के समर्थकों जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर सुल्तान पर आक्रमण कर दिया। सुल्तान ने साहस के साथ इस आक्रमण को विफल कर दिया। मेदिनीराय को जैसे ही इस आक्रमण का पता चला उसने अपने साथियों को रोक दिया और सुल्तान को अपने कर्त्तव्यों और स्वामि भक्ति का विश्वास दिलवाया। सुल्तान ने भी आत्मीयता से इसे स्वीकार कर लिया। जब मेदिनीराय के घाव ठीक हो गयेतो वह नियमित रूप से दरबार में उपस्थित होना प्रारंभ कर सुल्तान को सम्मान देने लगा। 


सुल्तान की अनुमति से मेदिनीराय अब अपनी सुरक्षा के लिये पाँच सौ राजपूत अंगरक्षकों के साथ दरबार में आने लगा और प्रशासन के कार्य करने लगा। ऐसा प्रतीत होता है कि सुल्तान मेदिनीराय और उसके राजपूत समर्थकों की ओर से पूरी तरह से आश्वस्त न हो सका और अब वह इनके प्रभाव से मुक्त होने की योजना बनाने लगा। इसलिये उसने मेदिनीराय से छुटकारा पाने के लिये गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह द्वितीय से सहायता माँगी। सुल्तान महमूद एक दिन चुपचाप अपनी प्रिय रानी और एक सेवक के साथ गुजरात मुजफ्फरशाह द्वितीय से सहायता प्राप्त करने के लिये चला गया। महमूद खिलजी का गुजरात में सुल्तान मुजफ्फरशाह ने स्वागत किया।

No comments:

Post a Comment

Powered by Blogger.