संवैगिक बुद्धि, धारणा, प्रशासन, शासन में इसकी उपयोगिता एवं अनुप्रयोग| What is momentum intelligence?

संवैगिक बुद्धि, धारणा, प्रशासन / शासन में इसकी उपयोगिता एवं अनुप्रयोग

संवैगिक बुद्धि, धारणा, प्रशासन, शासन में इसकी उपयोगिता एवं अनुप्रयोग| What is momentum intelligence?


संवेगिक बुद्धि क्या होती है ?

संवेगात्मक बुद्धि वह बुद्धि है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने संवेगों को समझता है, दूसरे के संवेगों को पहचानकर संवेगों का नियंत्रण करता है और कार्यकुशलता एवं कार्य की सफलता के लिये इसका प्रभावशाली ढंग से उपयोग करता है। यह विचार नया है लेकिन इसके बारे में हजारों साल पहले प्रमुख दार्शनिकों ने अपनी-अपनी राय रखी है। जिनमें से प्रमुख दार्शनिक अरस्तू ने कहा कि क्रोध को कब, कहाँ, कैसे, किस पर और किस मात्रा में प्रदर्शित किया जाए, यह गुण व्यक्ति को सफल बनाता है। इसी प्रकार सुकरात ने कहा है कि अपने आप को पहचानो यानी स्वयं को समझो।

 

भावनात्मक बुद्धिमत्ता अवधारणा का ऐतिहासिक विकास

(Evolution of the The Emotional Intelligence Concept) 

 

  • डार्विन ने माना था कि व्यक्ति की उत्तरजीविता व अनुकूलन में इस बात का भी महत्व है कि वह अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कैसे तथा कितनी करता है। 19वीं शताब्दी में जब हीगेल, काण्ट जैसे बुद्धिवादी बुद्धि तथा अमूर्तिकरण को मनुष्य की सर्वोच्च क्षमता बता रहे हैं अस्तित्ववादी विचारक सोरेन कोर्केगार्ड ने कहा था कि मनुष्य की पहचान उसकी भावनाओं से होनी चाहिए न कि बुद्धि से। 1920 में थोर्नडाइक ने बुद्धिमत्ता के प्रकार पर विचार करते हुए सामाजिक बुद्धिमत्ता की धारणा दी, जो सामाजिक संबंधों को ठीक से निभाने के लिए उचित विकल्प चुनने की क्षमता से था। 1940 में डेविड वेसलर ने लिखा था कि व्यक्ति की सफलताओं में सिर्फ बौद्धिक पक्ष शामिल नहीं है बल्कि भावनात्मक पक्षों को महत्व दिये जाने की जरूरत है। 1950 के दशक में प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने मनुष्य के भावनात्मक पक्षों के महत्व को रेखांकित किया था।

 

  • 1983 में हावर्ड गार्डनर ने बहुल बुद्धिमत्ता सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसमें बुद्धिमत्ता के 8 में से 2 प्रकार ऐसे थे जिनका गहरा संबंध भावनात्मक बुद्धिमत्ता से माना जाता है। जिसमें अंतरवैयक्तिक बुद्धिमत्ता एवं अन्तः वैयक्तिक बुद्धिमत्ता है। अंतर वैयक्तिक बुद्धिमत्ता जिसमें इरादों, अनुभूतियों मनःस्थितियों, इच्छाओं, स्वभावों तथा प्रेरणाओं को समझना तथा व्यक्तियों को कार्य की सफलता के लिए परस्पर अनुकल्पित करना शामिल है तथा अंत: वैयक्तिक बुद्धिमत्ता में व्यक्ति का स्वयं अपनी क्षमताओंकमजोरियों, इच्छाओं विशिष्टता आदि को समझना तथा अपनी भावनाओं का प्रबंधन करना। 1985 में वेन पेन (Wayne Payne) ने पहली बार भावनात्मक बुद्धिमत्ता शब्द का प्रयोग पारिभाषिक अर्थ में किया। हालाँकि 1966 में बार्बरा ल्यूनर ने भी इस शब्द का प्रयोग किया था। 1987 में पहली बार कीप बीसले ने भावनात्मक लब्धि Emotional Quotient शब्द का प्रयोग किया था।

 

  • सर्वप्रथम मनोविज्ञान में थार्नडाइक ने इसे सामाजिक बुद्धि का नाम दिया लेकिन संवेगात्मक बुद्धि का संदर्भ पहली बार 1990 में सैलोवी एवं मेयर ने दिया ।

 

  • संवेगात्मक बुद्धि को विश्व में प्रचलित करने का श्रेय 1995 में डेनियल गोलमैन को जाता है जिनकी पुस्तक संवेगात्मक "बुद्धि EQ (Emotional Quotient) दो गुना महत्वपूर्ण है IQ से प्रकाशित हुई (1995 में) इस पुस्तक का लेख टाइम मैगजीन में छपा जिसको पढ़कर विश्वभर में सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए और इसकी उपयोगिता के बारे में जाना तभी से यह प्रशासन प्रबंधन और कुशल संचालन का प्रमुख घटक बन गया। डेनियल गोलमैन ने तो यहाँ तक कह दिया कि किसी भी व्यक्ति की सफलता का निर्धारण लगभग 80% EQ है और केवल 20% IQ (Intelligence Quotient) है।

 

  • स्वयं की भावनाओं को पहचानने तथा दूसरों की भावनाओं को समझने, फिर इस ज्ञान का उपयोग कौशल व समझदार तरीके से निर्णयन व कार्य की दिशा में करने को भावनात्मक समझ बुद्धि कहते हैं। दरअसल बुद्धि का आशय माहौल समझने, सविवेक चिंतन करने तथा किसी चुनौती के सामने होने पर उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की व्यापक क्षमता से है। जीवन में सफल होने के लिए उच्च बुद्धिलब्धि तथा विद्यालयीन परीक्षाओं में अच्छा निष्पादन ही पर्याप्त नहीं है। हम अनेक ऐसे व्यक्ति पाएँगे जो उच्च शैक्षिक प्रतिभा वाले तो हैं, परंतु अपने जीवन में सफल नहीं हो पाते। परिवार में तथा कार्य स्थान पर उनको अनेक समस्याएँ रहती हैं वे अच्छे अंतर्वैयक्तिक संबंध नहीं बना पाते। ऐसा भावनात्मक समझ की कमी के कारण होता है।

 

  • भावनात्मक समझ का स्तर व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है, परंतु सामान्य तौर पर उम्र बढ़ने के साथ ही ये बढ़ते ही हैं। संज्ञानात्मक समझ के विपरीत जो कि व्यक्ति के जीवनभर सापेक्ष रहता है। शिक्षा और नए कौशल संपर्क के परिणामस्वरूप भावनात्मक समझ को सुधारा जा सकता है।

 

भावनात्मक समझ के अवयव

 

1) सामाजिक जागरूकता (Social Awareness ) - 

  • इसमें समाज की भावनाओं, विचारों व स्थितियों को समझना तथा संवेदनशील होना जरूरी है। जिसमें दूसरों की परिस्थिति को समझना दूसरे व्यक्तियों की भावनाओं को अनुभव करना और न बताये जाने के बावजूद दूसरों की आवश्यकताओं जानना। साथ ही सामाजिक तौर पर जागरूक नेतृत्व कार्यालयी राजनीति की आभास की क्षमता से भी युक्त होता है। साथ उसके सामाजिक नेटवर्क को भी समझना।

 

2) स्व जागरूकता (Self Awareness ) - 

  • खुद की भावनाओं को समझना सर्वाधिक आवश्यक पहलू है। उच्च स्व-जागरूकता वाले लोगों में उनके सबल-निर्बल पक्ष मूल्य तथा उद्देश्यों को जानने की अनुमति प्रदान करता है। जिससे व्यक्ति अपनी मनोदशा का सटीक मापन कर सकता है, उसकी मनोदशा दूसरे को कैसे प्रभावित कर सकती है। सहज रूप से समझ सकता है।

 

3) आत्म- प्रेरणा - (Self Motivation) 

  • आत्म-प्रेरणा से तात्पर्य है परिणामोन्मुख होना और जो जरूरी है उससे परे लक्ष्य का पीछा करना। उच्च आत्म प्रेरित व्यक्ति अपने व दूसरों के लिए चुनौतीपूर्ण लक्ष्य निर्धारित करता है, अपने प्रदर्शन में सुधार का मार्ग तलाशता है। संगठन के लिए, लक्ष्य के लिए व्यक्तिगत त्याग के लिए भी तत्पर रहता है। वह सफलता की आशा से संचालित होता है न कि असफलता रूपी भय से । उदाहरण के लिए IAS बनाने के लिए माता-पिता के सपनों को पूरा करने के लिए बेटा / बेटी संघर्ष कर रही है। एक उच्च आत्म प्रेरणा से बेटा / बेटी खुद को कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित करेंगे। वहीं निम्न आत्म प्रेरणा वाला बेटा/बेटी खुद की क्षमता पर संदेह करना शुरू कर देगा। खुद को आत्म पराजय वाली सोचों में उलझा लेगा और परियोजना से हाथ खींच लेता/ लेती है।

 

4) आत्म प्रबंधन (Self Management)- 

  • आत्म प्रबंधन में अपनी भावनाओं, आवेग व संशोधनों को कितने अच्छे तरीकों से नियंत्रण करते हैं। जिसमें विध्वंसक आवेगों पर नजर रखना, ईमानदारी व सत्यनिष्ठा प्रदर्शित करना परिवर्तन के समय उदार होना, अच्छे प्रदर्शन की गति को बनाये रखना तथा अवसरों को पकड़ना और असफलता के पश्चात भी आशावादी बने रहना।

 

उच्च भावनात्मक समझ के लक्षण 

 

  • महत्वाकांक्षी, मिलनसार उत्साही आकर्षक धैर्य, स्थिर, स्वच्छ सचेत, सतर्क, अच्छा श्रोता, पूर्वानुमानी, प्रेरक, संचालकीय मजबूत इच्छाशक्ति, निर्णायक इत्यादि।

 

निम्न भावनात्मक समझ

 

  • आक्रामक, मुँहफट बदलाव का प्रतिरोध, स्वार्थी अल्प श्रोता, मंद, जिद्दी, आलोचक, असंतोषी, पूर्वाग्रही, निष्क्रिय, तुनक मिजाजी झगड़ालू, अहंकारी, इत्यादि। 

 

संवेगात्मक बुद्धि की व्यावहारिक सफलता के बाद अनेक विद्वानों ने इसे अपने अपने ढंग से परिभाषित किया जिनकी उपयोगिता के लिए प्रतिमान का विकास किया। इनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं- 

 

1. योग्यता आधारित EI का प्रतिमान- 

इस प्रतिमान का प्रतिपादन सैलोवी और मेयर ने 1960 में किया था। इस प्रतिमान में सूचनाओं को किस प्रकार ग्रहण किया जाता ने है तथा किस प्रकार उसका संग्रह एवं संचयन किया जाता है और फिर आवश्यकता पड़ने पर उपयोग किया जाता है यानी सूचनाओं पर आधारित है। संवेगात्मक बुद्धि इस प्रतिमान के अंतर्गत चार महत्वपूर्ण योग्यताओं से संबंधित है- 

 

(i) संवेगों को पहचानना- 

  • यह संवेगात्मक बुद्धि की प्रथम योग्यता है, जिसके द्वारा हम अपने संवेगों को और दूसरे के संवेगों को पहचानने का प्रयत्न करते इसके अंतर्गत चित्र, मूर्ति, प्रतिबिंब, संकेत विविध प्रकार के अशाब्दिक माध्यम एवं शाब्दिक, मौखिक या लिखित का उपयोग किया जाता है। यह क्षमता एक प्रशासनिक अधिकारी लोक सेवक के लिए बहुमूल्य है क्योंकि वह इसी योग्यता के द्वारा लोगों की संवेदनाओं को समझकर उपयुक्त ढंग से अनुक्रिया करता है।

 

(ii) भावनाओं की उपयोगिता 

  • यह योग्यता संवेदनाओं को समझकर, पहचानकर कार्यस्थल में इसकी उपयोगिता पर बल देता है। उदाहरण के लिए, एक कर्मचारी बहुत ही अंर्तमुखी व्यक्तित्व का मालिक है व शांतिप्रिय है उसे गुस्सा कम आता है और दूसरा व्यक्ति गुस्सैल है, दोनों का व्यक्तित्व अलग-अलग है। एक कुशल लोकसेवक वह है जो इन दोनों व्यक्तियों की संवेदनाओं में परिवर्तन करने का प्रयत्न न करके उपयुक्त ढंग से उनका उपयोग करें। जैसे शांतिप्रिय व्यक्ति को प्रबंधन, संचालन, नियोजन में लगाया जाए और आक्रामक व्यक्ति को योजनाओं के क्रियान्वयन में लगाया जाए।

 

(iii) भावनाओं/संवेदनाओं को समझना- 

  • यह संवेगात्मक बुद्धि की योग्यता संज्ञानात्मक क्षमता से संबंधित है यानी यह व्यक्ति के संवेगात्मक सूझ-बूझ (समझदारी) से संबंधित है।

 

(iv) भावनाओं का प्रबंधन

  • यह योग्यता संवेगों का प्रभावशाली ढंग से प्रबंधन करने से संबंधित है। यह सामाजिक संबंधों में उपयोग में लाई जाने वाली संवेदनाओं कुशल प्रबंधन के विकास से संबंधित है। सामाजिक संबंधों को समझकर उसके व्यावहारिक रूप से उपयोगिता पर यह क्षमता बल देता है। मूल रूप से यह क्षमता नेतृत्व की भावना विकसित करता है सबको साथ लेकर चलने की क्षमता विकसित करता है। यह व्यक्तिगत या संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त माना जाता है।

 

(2) क्षमता आधारित EI प्रतिमान- 

इस प्रतिमान का विकास विख्यात मनोवैज्ञानिक डेनियल गैलमेन ने किया था, जिसने E के विचार को बहुचर्चित किया एवं व्यापक बनाया। डेनियल गेलमेन ने इसका आधार मस्तिष्क को माना। यह मस्तिष्क पर  आधारित है जिसकी 5 प्रमुख क्षमताएँ होती हैं। जिससे संवेगात्मक बुद्धि का विकास होता है जो निम्नवत है-

 

  • दूसरों की भावनाओ को समझना 
  • अपने आप को अभिप्रेरित करना 
  • अपनी संवेदनाओं की जागरूकता 
  • संवेदनाओं का प्रबंधन

 


 

(i) संवेदनाओं की जागरूकता

  • संवेदनाओं की जागरूक क्षमता आधारित प्रतिमान का प्रमुख भाग है, जिसके अंतर्गत अपनी संवेदनाओं को समझना पहली प्राथमिकता है। यह आपने आप का मूल्यांकन करने की क्षमता विकसित करता है। यह अपनी भावनाओं, संवेदनाओं को समझने, संचालन निरीक्षण करने की क्षमता विकसित करता है। जिसके द्वारा व्यक्ति अपने भावों का निरीक्षण कर संचालन करता है। यह आत्ममंथन आत्मदर्शन से संबंधित है। इसलिए यह क्षमता एक लोकसेवक के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसे विभिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न लोगों के साथ संबंध स्थापित करना पड़ता है।

 

(ii) अपने आप को अभिप्रेरित करना- 

  • यह क्षमता बुद्धि के उपलब्धि एवं लक्ष्य निर्धारण को दिशा निर्देशित करता है। अभिप्रेरणा एक मानसिक प्रक्रिया है जो लक्ष्य प्राप्ति के लिये शक्ति प्रदान करती है। यानी लक्ष्य की प्राप्ति को ही अभिप्रेरणा कहते हैं। किसी भी कार्य की सफलता या असफलता लक्ष्य पर निर्भर करता है। इसलिए वे व्यक्ति जिसमें संवेगात्मक बुद्धि अधिक होती है, वे आशावादी होते हैं, कठिन लक्ष्य का निर्धारण करते हैं और उसकी प्राप्ति के लिए सभी संसाधनों का उपयोग करते हैं।

 

(iii) संवेदनाओं का प्रबंधन- 

  • गौलमेन ने संवेदनाओं के प्रबंधन पर बहुत अधिक बल दिया और कहा कि भावनाओं को एकीकृत कर लक्ष्य प्राप्ति के लिए उपयोग में लाना है न कि प्रदर्शन के लिए।

 

(iv) दूसरों की भावनाओं को पहचानना- 

  • इनमें व्यक्ति के आंतरिक भावों को पहचान कर उचित निर्णय लेने के लिए उपयोग किया जाता है। व्यक्ति की बातों या विचारों से उसकी भावनाओं का पता लगता है।

 

(v) सामाजिक संबंधों का प्रबंधन

  • यह संवेगात्मक बुद्धि का पाँचवाँ अंग है, जिसका सीधा संबंध सामाजिक संबंधों को समझना और उनका उपयोग लाभ प्राप्ति के लिए करना इसके अंतर्गत दूसरों को सहयोग करना, दूसरों के कष्ट को समझना, दूसरों की परेशानी व कष्ट को उसकी जगह पर रख कर सोचना ।

 

  • बाद में गोलमेन ने 2002 में इस प्रतिमान में संशोधन किया और अपनी पुस्तक 'Primal leadership' में उन्होंने पाँच संवेगात्मक क्षमता को चार में परिवर्तित किया और इसी किताब में उन्होंने कहा कि इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति एक सफल नेतृत्व नहीं कर सकता यदि उसमें संवेगात्मक बुद्धि की कमी हो। उन्होंने यहाँ तक कहा कि एक व्यक्ति में अपार शक्ति हो सकती है। अनोखे ख्वाब हो सकते हैं, कल्पनाशील हो सकता है। नये-नये संसाधनों से निपुण हो सकता है, लेकिन एक अच्छा सफल नेतृत्व नहीं कर सकता जब तक उसमें संवेगात्मक बुद्धि न हो।

 

यह कथन गोलमेन द्वारा 500 CEO, कम्पनी मालिकों के अध्ययन पर आधारित है। यह चार तत्व है-

 

(a) आत्म जागरूकता 

(b) आत्म प्रबंधन एवं अभिप्रेरणा 

(c) सामाजिक जागरूकता 

(d) सामाजिक प्रबंधन

 

(3) संवेगात्मक सामाजिक बुद्धि प्रतिमान (ESF Models) 

  • 2006 में यह मॉडल बैरोन द्वारा दिया गया जो पिछले दोनों प्रतिमानों से बिल्कुल भिन्न है। इसमें बैरोन ने सामाजिक बुद्धि पर बल दिया। बैरोन के अनुसार "स्त्री, पुरुष, बच्चा या वयस्क अगर समाज में विभिन्न परिस्थितियों में अपने आप को प्रभावशाली ढंग से समायोजन करते हैं अनुकूलन करते हैं तो वे लोग बुद्धिमान कहलाएँगे।

 

(4) व्यक्तित्व विशेषता का सिद्धांत (Trait Model of E.I.) 

  • इसका विकास रूसी ब्रिटिश मनोविज्ञानी के. वी. पेट्राइड्स ने किया है। यह व्यक्ति के निम्नतम स्तर पर स्थित भावनात्मक आत्मधारणाओं का समूह है। सामान्य बोलचाल में किसी व्यक्ति का अपनी भावनात्मक समस्याओं के बारे में आत्मधारणा को 'ट्रेट ई. आई मॉडल' कहा जाता है। इस प्रतिमान में व्यक्तिगत विशेषताओं को संवेगात्मक वृद्धि से जोड़ने पर ल दिया जाता है। यह विचार इस बात पर बल देता है कि व्यक्तिगत गुणों के कारण संवेगात्मक वृद्धि हे या संवेगात्मक बुद्धि के कारण व्यक्तिगत गुण विकसित हुए हैं।

  • यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि संवेगात्मक बुद्धि कौन से गुणों का विकास करती हैं। तथा व्यक्तिगत गुण कौन से संवेगात्मक गुण का विकास करता है जैसे ईमानदारी संवेगात्मक बुद्धि से बढ़ रही है या ईमानदारी से संवेगात्मक बुद्धि बढ़ रही है। यह निश्चित नहीं है।

 

भावनात्मक समझ वाले व्यक्तियों की विशेषताएँ-

 

1) अपने संवेगों की प्रकृति और तीव्रता के शक्तिशाली प्रभाव को समझना। 

2) अपने संवेगों और उनकी अभिव्यक्तियों को दूसरों से व्यवहार करते समय नियंत्रित करना ताकि शांति और सामंजस्य की प्राप्ति हो सके। 

3) अपनी भावनाओं और संवेगों को जानना और उसके प्रति संवेदनशील होना। 

4) दूसरे व्यक्तियों के विभिन्न संवेगों को उनकी शरीर, भाषा, आवाज और स्वर तथा अन्य अभिव्यक्तियों पर ध्यान देते हुए जानना और उसके प्रति संवेदनशील होना।

5) अपने संवेगों को अपने विचारों से संबद्ध करना ताकि समस्या समाधान तथा निर्णय करते समय उन्हें ध्यान में रखा जा सके।

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