वस्तुनिष्ठता का सामान्य अर्थ |Objectivity in Civil Service Ethics

वस्तुनिष्ठता का सामान्य अर्थ

वस्तुनिष्ठता का सामान्य अर्थ |Objectivity in Civil Service Ethics


 

वस्तुनिष्ठता का सामान्य अर्थ (Objectivity in Civil Service Ethics) 

वस्तुनिष्ठता का सामान्य अर्थ है कि व्यक्ति को कोई निर्णय करते समय उन सभी आधारों से मुक्त होना,चाहिए जो उसकी व्यक्तिगत चेतना में शामिल है जैसे उसको विचारधाराकल्पनाएंपूर्वाग्रहरूढ़धारणाएँमान्यताएँ एवं दृष्टिकोण इत्यादि। यदि वह इन सभी आधारों से मुक्त होकर निर्णय के मूल में केवल उन आधारों को रखेगा जो तथ्यात्मक एवं तार्किक हैं और जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति मानने को बाध्य है तो उनका निर्णय वस्तुनिष्ठ होगा। दर्शन की भाषा में वही नैतिक कथन वस्तुनिष्ठ कहलाएगा जिसकी सत्यता की स्थितियाँ किसी भी व्यक्ति विशेष के मस्तिष्क से स्वतंत्र हो।

 

सरकारी पदाधिकारी को सरकारी कार्य करते समय यथा-

 

1. सार्वजनिक नियुक्तियाँ करना, 

2. संविदाओं की स्वीकृति देना 

3. किसी व्यक्ति विशेष को पुरस्कारलाभ या कार्यों की सिफारिशें करना जैसे भर्तीपुरस्कारठेकेदारी इत्यादि । 

4. सरकारी नीतियों का कार्यान्वयन करते समय आपदा के समय सहायता पहुँचाने के क्रम में राहत सामग्रियों का वितरण आदि ।

 

उपरोक्त कार्यों को सम्पादित करते समय उसके कार्य और निर्णय तथ्यों एवं गुणों के आधार पर होने चाहिए और जहाँ तक हो सके व्यक्तिनिष्ठता से बचना चाहिए।

 

वस्तुनिष्ठता के मुख्य पक्ष 


1. सरकारी सेवकों का निर्णय एवं कार्यपूर्वाग्रह एवं व्यक्तिगत हितों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। 

2. जहाँ तक संभव हो सके प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्यसेवा के लिए मानक निर्धारित करने चाहिए जिससे फेरबदल की गुंजाइश कम से कम होनी चाहिए। 

3. निर्णय एवं कार्यों में पारदर्शिता एवं निष्पक्षता रखनी चाहिए।

4. बिना वस्तुनिष्ठता के सिविल सेवक न तो प्रभावी ढंग से मूल्यों की रक्षा और स्थापना कर सकता है और न ही वह पारदर्शितानिष्पक्षता और गैर तरफदारी पूर्वक अपने कार्यों को सम्पन्न कर सकता है। 

5. निर्णयों में पारदर्शिता होनी चाहिए ताकि लोगों को पता चल सके कि निर्णय क्यों लिये गये और किस आधार पर लिये गये। 

6. निर्णय के कारणों का उल्लंघन होने से संदेह का वातावरण रहता है इसलिए एकरूपता की स्थिति होनी चाहिए है।

 

  • शत प्रतिशत वस्तुनिष्ठता प्राय: असंभव मानी जाती है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने आरंभिक समाजीकरण की प्रक्रिया में कई ऐसे मूल्य सीखता है जो किसी न किसी वर्ग समुदायप्रजातिराष्ट्रजातिलिंगसमूह के प्रति सकारात्मक या नकारात्मक मनोवृत्ति पैदा करते हैं। ये मूल्य व्यक्ति पर धीरे-धीरे संस्कारों के स्तर पर इस तरह स्थापित हो जाते हैं कि इनसे मुक्त होने की अत्यंत कठोर प्रक्रिया के बाद भी यह दावा नहीं किया जा सकता है कि व्यक्ति सचमुच इनमें पूर्णत: तटस्थ हो चुका है। एक ही मामले में विभिन्न न्यायाधीश अलग-अलग निर्णयों पर पहुँचते हैं तो इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं अपनी आत्मनिष्ठा से स्वतंत्र नहीं हो पाते हैं।

 

अगर ऊँचे पदों पर आसीन व्यक्ति पूर्णतः वस्तुनिष्ठ नहीं है तो इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। अगर सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश स्त्रियों के प्रति असंवेदनशील है तो अनजाने में महिलाओं से जुड़े मामले में अन्याय कर सकता है। इसके समाधान हैं -


1. सिविल व न्यायिक सेवा के चयन में उम्मीदवारों को वस्तुनिष्ठता पर विशेष ध्यान देना व चयन के बाद भी ऐसा प्रशिक्षण देना जो इन गुणों को प्रोत्साहित करे।

 

2. महिलाओं से जुड़े मामलों में बैंच में महिला न्यायाधीशों की उपस्थित होनी चाहिए।


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