वाक्य की अवधारणा परिभाषा एवं विशेषताएं | Vaykya Ki Avdharna Paribasha Evam Visheshtaayen

  वाक्य की अवधारणा परिभाषा एवं विशेषताएं

वाक्य की अवधारणा परिभाषा एवं विशेषताएं | Vaykya Ki Avdharna Paribasha Evam Visheshtaayen

वाक्य की अवधारणा

 

  • भाषा हमारे भावों और विचारों की संवाहक है अर्थात हम अपने भाव या विचार भाषा के माध्यम से व्यक्त करते हैं। भाषा में हमारे भाव या विचार वाक्यों के माध्यम से ही लिखित और मौखिक दोनों रूपों में होते हैं। इस तरह स्पष्ट है कि भाषा के बोलने या लिखने में वाक्य ही प्रधान है। वाक्य भाषा की पूर्ण इकाई है।

 

वाक्य की परिभाषा

 

  • वाक्य के स्वरूप और परिभाषा को लेकर भाषाविदों में काफी मतभेद रहा है। अधिकतर लोगों ने माना है कि 'वाक्य सार्थक शब्दों का समूह है जो भाव की अभिव्यक्ति में अपने आप में पूर्ण होता है।’ 
  • भारत में 150 ई.पू. पतंजलि ने और पहली सदी ई.पू. यूरोप के प्रथम भाषाविद थैंक्स ने पूर्ण अर्थ की प्रतीति कराने वाले शब्द-समूह को वाक्य' माना है |
  • 'वाक्य सार्थक शब्दों का समूह हैकहने से यह स्पष्ट है कि कृत्रिम रूप से वाक्य को तोड़कर शब्दों को अलग-अलग कर लिया गया है जिससे ये व्यक्त होता है कि वाक्य सार्थक शब्द खण्डों का एक समूह है। इसके विपरीत हम जो सोचते, बोलते या लिखते हैं वह सार्थक शब्द खण्डों में नहीं बल्कि वाक्य में होता है। इसलिए वाक्य अपने आप में भाषा की पूर्ण इकाई है। 
  • वाक्य और पद (सार्थक शब्द खण्ड) को लेकर शुरू से ही पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ लोग इसे पदों का समूह कहते हैं तो कुछ पदों को वाक्य के कृत्रिम खण्ड की संज्ञा देते हैं। इस मतभेद की तुलना व्यक्तिवादी और समाजवादी सोच से की जा सकती है। जैसे व्यक्तिवादी विचारधारा समाज की अपेक्षा व्यक्ति को अधिक महत्व देती है क्योंकि व्यक्ति से ही समाज बनता है। 
  • वाक्य को सार्थक शब्दों का समूह कहना इसी सोच के अन्तर्गत आता है। दूसरी ओर, समाज सापेक्ष विचारधारा व्यक्ति की अपेक्षा समाज को अधिक महत्वपूर्ण मानती है। पदों को वाक्य के कृत्रिम खण्ड कहना इसी सोच की देन है। 
  • भारतीय मीमांसकों के विचारों में उक्त दोनों विचारधाराओं की छाया शुरू से ही देखी जा सकती है। अभिहितान्यववाद' के प्रवर्तक कुमारिल की मान्यता है कि शब्द या पद ही वस्तुतः अर्थवाचक होते हैं और एक विशेष क्रम में वे वाक्य का रूप ग्रहण करते हैं।
  • कुमारिल ने शब्द या पद की सत्ता का प्रधान माना है। वाक्य पदों या शब्दों का ही जोड़ा हुआ रूप है। इसके विपरीत कुमारिल के शिष्य प्रभाकर ने भाषा में वाक्य की सत्ता को सर्वोपरि माना। 
  • प्रभाकर द्वारा प्रवर्तित अन्विताभिधानवाद' सिद्धान्त के अनुसार वाक्य की सत्ता ही मूल है, पद उसके तोड़े गए अंश या खण्ड हैं। भाषा में वाक्य ही अर्थबोध का कारण बनते हैं।
  • इसके बाद भर्तृहरि ने भी अपने ग्रन्थ 'वाक्यपदीय' में वाक्य की सत्ता को ही वास्तविक कहा है। उनके अनुसार वाक्य के पृथक पदों की कोई निजी पहचान नहीं होती। 
  • वाक्य की परिभाषा देते हुए आचार्य विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण' में वाक्य के संदर्भ में सर्वथा नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है जो वाक्य संरचना को जानने-समझने में भी सहायक सिद्ध होता है। विश्वनाथ की परिभाषा के अनुसार वाक्य की आकांक्षा, योगयता, आसक्ति तथा अन्विति चार अनिवार्य शर्तें हैं। 'आकांक्षा' से तात्पर्य शब्दों की परस्पर पूरकता से है। 


जैसे- 'वह पुस्तक पढ़ता है।

  • वाक्य में तीन पद हैं- 'वह' ‘पुस्तक' ‘पढ़ता है। 
  • व्याकरणिक दृष्टि से तीनों परस्पर एक दूसरे की आकांक्षा रखते हैं। 'वह' कर्ता है जिसे पढ़ना' क्रिया की आकांक्षा है और पढ़ता है' क्रिया है जिसे कर्म की आकांक्षा है। पुस्तक' कर्म है जिसे एक कर्ता और एक क्रिया की आकांक्षा है। 
  • इस प्रकार ये तीन पद परस्पर आकांक्षा से पूर्ण होकर अर्थात मिलकर एक सार्थक वाक्य की संरचना करते हैं।

 

  • 'योग्यता' से तात्पर्य अभिव्यक्ति से है। वाक्य में आए शब्द या पद यदि असंगत अर्थ की अभिव्यक्ति करें तो व्याकरणिक दृष्टि से परस्पर सम्बद्ध होते हुए भी वाक्य नहीं कहलायेगें । 'वह खाना खाता है' वाक्य है किन्तु 'वह अग्नि खाता है' वाक्य नहीं है क्योंकि इसमें अर्थ की संगति नहीं है। इसमें पदों के मध्य परस्पर अर्थबोध की योग्यता नहीं है।

 

  • आसक्तिका अर्थ समीप होना या सातत्य होना है। वाक्य में पदों के बीच लम्बा अन्तराल नहीं होना चाहिए। वाक्य के अर्थबोध के लिए पदों की निकटता या सातत्व अनिवार्य है। 


  • अन्विति' का अर्थ है कि व्याकरणिक दृष्टि से एकरूपता। यह एकरूपता प्रायः वचन, कारक, लिंग और पुरुष आदि की दृष्टि से होती है। हिन्दी में क्रिया प्रायः लिंग, वचन, पुरुष में कर्ता के अनुकूल होती है। 'सुधा गये' या 'सोहन गयी' वाक्य में अन्विति का अभाव है क्योंकि इनमें व्याकरणगत एकरूपता नहीं है। अतः वाक्य में अन्विति का होना अनिवार्य है। 


  • आधुनिक भाषा विज्ञान में वाक्य को ही भाषा की पूर्ण इकाई माना गया है। मनुष्य का चिन्तन और लिखित या मौखिक अभिव्यक्ति वाक्य के माध्यम से ही होती है। इसलिए भाषा में वाक्य की सत्ता महत्वपूर्ण है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि 'वाक्य ही भाषा की पूर्ण एवं सार्थक इकाई है। 


वाक्य की विशेषताएं

वाक्य की परिभाषाओं के विश्लेषण से वाक्य के सन्दर्भ में निम्नलिखित विशेषताएं स्पष्ट होती हैं -

 

1. वाक्य सार्थक होता है। 

2. वाक्य एक या एक से अधिक शब्दों या पदों का होता है। 

3. वाक्य अपने आप में पूर्ण होता है। 


  • उपर्युक्त विश्लेषण में दो बातें और भी सामने आती हैं कि वाक्य को शब्दों का समूह कहा गया है अर्थात वाक्य में एक से अधिक शब्द होते हैं किन्तु एक शब्द का भी वाक्य हो सकता है। जैसे आग लगने पर कोई आग-आग' कहते हुए चिल्लाए या बच्चा माँ से केवल 'पानी' कहे तो भी वह वाक्य होगा और अर्थ की दृष्टि से अभिव्यक्त करेगा। इतना ही नहीं, कई शब्द वाक्य में बिना प्रयोग हुए भी अपना अर्थ व्यक्त करते हैं किन्तु ऐसा उसी स्थिति में होता है जब पूर्वापर प्रसंग ज्ञात हो । नाटक, कहानी उपन्यास के साथ ही प्रायः वार्तालाप में ऐसे वाक्य प्रयोगों को देखा जा सकता है। वाक्य में अप्रयुक्त शब्दों का अर्थ जब पूर्वापर प्रसंगों से व्यक्त होता है तब अध्याहार कहलाता है। उदाहरण के लिए इन वाक्यों को देखें -

 

  • सुनो, कहाँ जा रहे हो ? (तुम) 
  • तुम्हारी क्यों सुनूँ। (बात) 
  • मैंने उसे निकाल दिया। (नौकरी से )

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