देवनागरी लिपिः उद्भव एवं विकास। देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता। Devnagri lipi udbhav evam Vikas

 देवनागरी लिपि किसे कहते हैं

देवनागरी लिपिः उद्भव एवं विकास। देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता। Devnagri lipi udbhav evam Vikas


देवनागरी लिपिः उद्भव एवं विकास

 

  • देवसनागरी लिपि के कई नाम हैं- नागरीनागरदेवनागरलोकनागरी तथा हिनदी लिपि। इसके सभी नामों में नागरी या देवनागरी सर्वाधिक लोक प्रचलित है। 
  • देवनागरी संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार संघ की लिपि भी है। इसके नामरकण के विभिन्न तर्क हैं- नागर ब्राह्मणों के कारण नाग लिपि शब्द सेनगरीय प्रयोग के कारणदेवनगर स्थान में प्रयुक्त होने के कारण। 

इसके नामों के संबंध में कोई एक निश्चित मत नहीं मिलतेइसीलिए डॉधीरेन्द्र शर्माडॉबाबूराम सक्सेना ने इस नाम सके लेकर कोई निश्चित मत नहीं प्रकट किया हैलेकिन फिर भी लोक प्रचलन ही दृष्टि से इसे नगरी या साहित्यिक राजभाषीय प्रचलन की दृष्टि से देवनागरी कहा जा सकता है। देवनागरी लिपि के विकास क्रम को ब्राह्मी लिपि से सम्बद्ध किया गया है। 

आइए इसे इस आरेख के माध्यम से समझें-

देवनागरी लिपि के विकास क्रम

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता 

देवनागरी लिपि की विशेषताओं को बताने के क्रम में यह अक्सर कहा जाता है कि यह वैज्ञानिक लिपि है। प्रश्न यह है कि किसी लिपि को वैज्ञानिकता प्रदान करने वाले कौन से तत्त्व होते हैं? वैज्ञानिकता के आधार तत्व बताते हुए भाषाविदों ने मान है कि वह वैज्ञानिक लिपि हो सकती है जिसमें-

 

  • एक ध्वनि के लिए एक वर्ण हो । 
  • एक वर्ण एक ही ध्वनि को व्यक्त करें। 
  • मात्रा एवं वर्णचिह्नों में भिन्नता हो। 
  • लेखन और उच्चारण में एकरूपता हो । 
  • सरल एवं स्पष्ट हो 
  • उच्चारण एवं लेखन में व्यवस्थित हो 
  • ध्वन्यात्मक दृष्टि से सन्तुलन स्थापित करती हो

 

तो वैज्ञानिकता के संदर्भ मे उपरोक्त तत्वों को क्या देवनागरी लिपि पूर्णतः पालन करनी दिखती है? इस प्रश्न का उत्तर हमें देवनागरी लिपि की विशेषता / गुण देखने के संदर्भ में मिल सकता है, तो आइए हम देवनागरी लिपि को विशेषतओं का अध्ययन करें-


देवनागरी लिपि को विशेषता

  • देवनागरी लिपि अधिक-से-अधिक ध्वनि-चिह्नों से संपन्न है। 
  • देवनागरी लिपि में स्वर एवं व्यंजन का वर्गीकरण वैज्ञानिक पद्धति से उच्चारण स्थान एवं प्रयत्नों के आधार पर किया गया है। 
  • देवनागरी लिपि में प्रत्येक लिपि के लिए अलग-अलग स्वतंत्र वर्ण हैं। 
  • देवनागरी लिपि में वर्णमाला और वर्तनी में उस प्रकार का विभेद नहीं जैसा कि अन्य लिपियों में है। केवल शब्दों का शुद्ध उच्चारण जानने से ही उन्हें शुद्ध रूप से लिखा जा सकता है। 
  • देवनागरी लिपि की बड़ी विशेषता यह है कि जो लिखा जाता है, वही पढ़ा जाता है और जो पढ़ा जाता है, वही लिखा जाता है । 
  • देवनागरी लिपि, भारत की प्राचीन लिपि है। भारत की कई अन्य भाषाओं (गुजराती, पंजाबी, उर्दू... . आदि) का साहित्य देवनागरी में ही मिलता है। अतः राष्ट्र की सम्वेदना इस लिपि से सहज ही जुड़ जाती है। 
  • देवनागरी लिपि में प्रत्येक स्वर वर्ण के लिए अलग से स्वतंत्र मात्रा चिह्न निश्चित किये गये हैं। इस कारण स्वरयुक्त व्यंजनों को उच्चारण के अनुरूप ही स्वतंत्र अक्षरों में लिपिबद्ध किया जाता है। 
  • यह सरल एवं सहज लिपि है। 
  • इस लिपि में यह व्यवस्था है कि जब किसी व्यंजन को स्वर रहित करके दिखान हो तो उसके नीचे हलन्त का चिह्न लगा दिया जाता है। 
  • यह किसी एक भाषा का लिपि नहीं है। यह संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, महाराष्ट्री, नेपाली आदि भाषाओं की लिपि है। 
  • देवनागरी लिपि में प्रत्येक वर्ण का सर्का एक ही उच्चारण में होता है। 
  • देवनागरी लिपि में रोमन वर्णों के स्थान छोटे-बड़े वर्णों के अलग-अलग रूप की समस्या नहीं है। इस कारण देवनागरी लिपि के लेखन, मुद्रण एवं टंकण की समस्या नहीं होती है। 
  •  देवनागरी लिपि में स्थानीय अनुनासिक ध्वनियों के लिए अलग-अलग स्वतंत्र वर्ण (ङ्ण्, न्, म्) है, जो संसार की किसी भी लिपि में नहीं पाये जाते ।

 

देवनागरी लिपि और मानकीकरण का प्रश्न

 

  • देवननागरी लिपि की कतिपय विशेषतओं के बावजूद उसके मानकीकरण के प्रयास भी होते रहे हैं। देवनागरी के विरोध में कुछ तो जानबूझकर भ्रम फैलाया गया, कुछ समयानुरूप उसमें संशोधन भी किय गये। यहाँ देवनागरी लिपि के के संदर्भ में जो आक्षेप किये गये हैं, आइए हम उसका अध्ययन करें।

 

  • देवनागरी में वर्णों की संख्या अधिक है, इसलिए इसके टंकण में असुविधा होती है। 
  • देवनागरी में शिरोरेखा का प्रयोग लेखन के प्रवाह को रोकता है। 
  • वर्ण साम्य से असुविधा होती है जैस ध/घ, रव/ख या म/भ जैसे वर्णों में। 
  • संयुक्त वर्ण को समझना मुश्किल हो जाता है जैसे- क्ष (क+ष), त्र (त् +त्र) आदि देवनागरी लिपि में एक ही वर्ण के दो-दो रूप प्रचलित हैं जिससे नई विद्यार्थी को असुविधा होती है। 
  • चन्द्रबिन्दु और अनुसार के प्रयोग में भ्रम है। 
  •  कुछ वैदिक ध्वनियाँ भी चल रही है- ऋ 
  •  देवनागरी लिपि में प्रत्येक स्वर की अलग-अलग मात्रा होती है। जैसे अ (।) इ ई उ ऊ आदि। 
  • मात्रा प्रयोग से लेखन में असुविधा होती है। 


इस प्रकार देवनागरी लिपि पर कई आक्षेप लगाये गये हैं, जिनकी समीक्षा आवश्यक है। देवनागरी लिपि पर जो आरोप लगाये गये हैं, वे ज्यादातर भ्रामक हैं।

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