मुगलों के राजत्व का सिद्धान्त |The theory of Mughal kingship

मुगलों के राजत्व का सिद्धान्त

पादशाह अथवा बादशाह की अवधारणा 

मुगलों के राजत्व का सिद्धान्त पादशाह अथवा बादशाह की अवधारणा


  • बाबर ने भारत में पादशाह के रूप स्वयं को स्थापित किया था। 
  • सुल्तान पद की तुलना में पादशाह अथवा बादशाह का पद अधिक गरिमा, प्रतिष्ठा और शक्ति का द्योतक था। 
  • पूर्ण सम्प्रभुता प्राप्त शासक के रूप में मुगल बादशाहों ने स्वयं को खलीफ़ा द्वारा वैधानिक मान्यता दिए जाने की शर्त से व्यावहारिक व सैद्धान्तिक दृष्टि से मुक्त किया। 
  • पादशाह बाबर ने वंशानुगत शासन की स्थापना की और अपनी बहुसंख्यक गैर-मुस्लिम प्रजा को किंचित प्रतिबन्धों के साथ शान्तिपूर्वक जीने का अधिकार दिया। 
  • अकबर ने राजत्व के दैविक सिद्धान्त का पोषण किया। उसने स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर के प्रतिनिधि, पूर्ण पुरुष तथा अपनी प्रजा के आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित किया।
  • अबुल फ़ज़्ल ने आइन-ए-अकबरी में अकबर के धर्म-निर्पेक्ष राजत्व के सिद्धान्त की विशद व्याख्या की है। अकबर के राजत्व के सिद्धान्त पर हिन्दुओं के पौराणिक एवं ऐतिहासिक राजत्व के सिद्धान्तों का स्पष्ट प्रभाव पड़ा था। 
  • औरंगज़ेब ने इस्लाम को राज-धर्म घोषित कर राजत्व के दैविक सिद्धान्त का परित्याग कर दिया और स्वयं को इस्लाम के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया। अपने साम्राज्य को दारुल हर्ब से दारुल इस्लाम में परिवर्तित करने के प्रयास में उसने राजनीति पर धर्म के प्रभुत्व को एक बार फिर से स्थापित किया।
  • रवर्ती मुगल शासकों ने अपनी अयोग्यता व अकमर्ण्यता से मुगल राजत्व के सिद्धान्त की महत्ता को गहरा आघात पहुंचाया। 
  • मुगलों का राजत्व का सिद्धान्त मध्यकालीन राजनीतिक आदर्शों के अनुरूप था और इस पर तुर्की, ईरानी, मंगोल तथा भारतीय राजत्व के सिद्धान्तों का प्रभाव पड़ा था।

 

मुगलों के राजत्व का सिद्धान्त 


प्राचीन भारत में राजत्व का सिद्धान्त 

  • अति प्राचीन भारत में राजत्व के सिद्धान्त में शासक के चयन की प्रक्रिया प्रचलित थी।
  • विभिन्न कबीलों द्वारा सबसे सक्षम व्यक्ति का शासक के रूप में चयन किया जाता था।
  • शासक का अस्तित्व उसके शासकत्व के गुणों तथा उसके कर्तव्य निर्वाहन की क्षमता पर निर्भर करता था। एक अयोग्य शासक को कर्तव्य निर्वाहन की कसौटी पर खरा न उतरने की स्थिति में अपदस्थ भी किया जा सका था। 
  • वैशाली आदि राज्यों में शासक विहीन गणराज्य की स्थापना थी। किन्तु साम्राज्यों के उदय के काल में राजत्व के दैविक सिद्धान्त का पोषण किया जाने लगा। 
  • राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि कहा जाने लगा।
  • शासकगण अपने वंश की उत्पत्ति सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि आदि दैविक शक्तियों से बताने लगे और वंशाननुगत शासन प्रणाली का पोषण करने लगे। 
  • राजा को अनियन्त्रित शक्तियां प्राप्त हुईं किन्तु उससे यह अपेक्षा की गई कि राज्य संचालन में वह धर्म, नीति और परम्पराओं का पालन करे। 
  • देवानां प्रिय सम्राट अशोक, चद्रगुप्त विक्रमादित्य और हर्षवर्धन ने आदर्श शासक की परिकल्पना को साकार करने में पर्याप्त सफलता प्राप्त की।

 

इस्लाम के अन्तर्गत राजत्व का सिद्धान्त

 

  • इस्लाम में धर्म और राजसत्ता आपस में जुड़े हुए होते हैं। 
  • वास्तव में आस्तिकों के समुदाय धर्म और राजनीति दोनों में ईश्वरीय आदेश का ही अनुपालन होता है। 
  • इस्लाम के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ स्थान विशेष की परिस्थितियों तथा परम्पराओं के अनुसार राजत्व के सिद्धान्त में किंचित संशोधन अथवा परिवर्तन किए गए किन्तु मूलतः उसका स्वरूप कुरान शरीफ़ में वर्णित शासक के अधिकारों और कर्तव्यों पर ही आधारित रहा। 
  • प्रसिद्ध विचारक और इतिहासकार इब्न खल्दूम के अनुसार इस्लाम में शासक के बिना राज्य का अस्तित्व असम्भव है।
  • इसीलिए हज़रत मुहम्मद की मृत्यु के बाद खलीफ़ा के पद तथा उसके राज्य खिलाफ़त की अवधारणा का विकास किया गया। 
  • खलीफ़ा को धर्म-प्रमुख, शासक तथा सर्वोच्च सेनानायक तीनों की ही भूमिका एक साथ निभानी थी। किन्तु उसकी सत्ता रोमन कैथोलिक चर्च के पोप के समकक्ष नहीं थी क्योंकि उसे पोप के समान धर्म की व्याख्या करने की शक्ति प्राप्त नहीं थी। 
  • खलीफ़ा को शरा के नियमों का पालन करते हुए एक शासक के अधिकारों व कर्तव्यों का निर्वाहन करना होता था। 
  • खलीफ़ा को स्वतः अपनी प्रजा पर शासन करने का अधिकार नहीं मिल जाता था। विभिन्न मुस्लिम समुदायों द्वारा उसका चयन होता था। खलीफ़ा को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का अधिकार नहीं था। खलीफ़ा का पद वंशानुगत नहीं होता था।

मुगलों का राजत्व का सिद्धान्त

 

बाबर का राजत्व का सिद्धान्त
 

  • बाबर स्वयं चग़ताई तुर्क था और अपनी माँ की ओर से उसमें मंगोल रक्त था। बाबर ईरान के सम्पर्क में भी रहा था। 
  • बाबरं का राजत्व का सिद्धान्त मुख्यतः तुर्कईरानी तथा मंगोल राजत्व के सिद्धान्तों पर आधारित था। 
  • बाबर ने अप्रैल, 1526 में पानीपत के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना के साथ-साथ एक नवीन राजत्व के सिद्धान्त की स्थापना भी की । 
  • बाबर ने स्वयं को सुल्तान के स्थान पर पादशाह अथवा बादशाह की उपाधि धारण की । पादशाह अथवा बादशाह एक पूर्ण सम्प्रभुता प्राप्त शासक होता था जब कि सुल्तान को अपने पद की वैधानिकता सिद्धान्ततः खलीफ़ा द्वारा प्रदान की जाती थी। 
  • इस प्रकार पादशाह अथवा बादशाह का दर्जा सुल्तान से कहीं अधिक ऊँचा था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि पादशाह अथवा बादशाह को अपने पद की वैधानिकता के लिए खलीफ़ा की मान्यता की आवश्यकता नहीं होती थी। 
  • इस प्रकार सुल्तान का अस्तित्व मूलतः इस्लाम के अन्तर्गत सर्वोच्च धार्मिक सत्ता खलीफ़ा के आधीन होता था जब कि पादशाह अथवा बादशाह को किसी धार्मिक सत्ता से मान्यता अथवा वैधानिकता प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होती थी। 
  • पादशाह अथवा बादशाह की प्रजा को अपनी निष्ठा खलीफ़ा के प्रति नहीं बल्कि पादशाह अथवा बादशाह के प्रति प्रदर्शित करनी होती थी। इस प्रकार पादशाह अथवा बादशाह स्वयं में सर्वोच्च था और उसकी सत्ता धर्म-निर्पेक्ष थी। 
  • मुगल काल में पादशाह की तुलना में सुल्तान तथा शाह पद की महत्ता कम की गई और यह पद अब शहज़ादों को प्रदान किया जाने लगा था। 
  • शहज़ादा खुर्रम को 'शाहजहांऔर शहज़ादा मुअज्ज़म को 'शाहकी उपाधि अपने-अपने पिताओं द्वारा ही प्रदान कर दी गई थी।

 

अकबर का राजत्व का सिद्धान्त

 

अकबर का राजत्व का सिद्धान्त-01

  • मुगलों ने राजत्व के दैविक सिद्धान्त का अनुपालन किया। मुगलों द्वारा शासक को ईश्वर का प्रतिनिधि बताया गया और उसके आदेश में ईश्वर के आदेश की प्रतिध्वनि बताई गई। राजभक्ति को ईश्वरीय भक्ति का ही एक रूप माना गया। 
  • इस दृष्टि से बादशाह के साम्राज्य के हर व्यक्ति के लिए उसके आदेश को मानना उसका धार्मिक कर्तव्य माना गया। 
  • अबुल फ़ज़्ल ने अपने ग्रंथ अकबरनामा में राजत्व को ईश्वरीय उपहार माना है। अबुल फ़ज़्ल ने बादशाह को प्रजा के संरक्षकउसके पालकशुभचिन्तक और अभिभावक के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार बादशाह के अपरिमित अधिकारों के साथ उसके कर्तव्यों को भी जोड़ दिया गया क्योंकि पिता के पद की गरिमा और उसके अधिकारों को बिना किसी दायित्व के ग्रहण नहीं किया जा सकता। अबुल फ़ज़्ल के अनुसार बादशाह का कार्य राज्य में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित कर उसे सुदृढ़ता तथा सुरक्षा प्रदान करना है। 
  • अगर बादशाह का अस्तित्व नहीं होता तो हर जगह अशान्तिअराजकता व्याप्त रहती और निहित स्वार्थों में लिप्त व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के अधिकारों का हनन कर रहे होते। समस्त मानवजाति के लिए विनाशकारी इन प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण स्थापित करने के लिए बादशाह को अपनी शक्ति का भय दिखलाना आवश्यक है। 
  • बादशाह के प्रति आज्ञाकारिता और उसके प्रति निष्ठा व स्वामिभक्ति प्रदर्शित करना उसकी प्रजा का कर्तव्य है। प्रजापालक बादशाह जनकल्याणसर्वतोन्मुखी प्रगति तथा निष्पक्ष न्याय का जीवन्त प्रतीक होता है।

 

अकबर का राजत्व का सिद्धान्त-02


  • अबुल फ़ज़्ल पादशाह शब्द में पाद को स्थायित्व व स्वामित्व का तथा शाह को ईश्वर के प्रतिनिधि का प्रतीक मानता है। 
  • अतः पादशाह दैविक शक्ति से युक्तईश्वरीय आदेश पर पृथ्वी पर भेजा गया एक सर्वशक्तिमान शासक है जिसको आम प्रजा अथवा प्रभावशाली उलेमा वर्ग अथवा अमीरों द्वारा अपदस्थ नहीं किया जा सकता। 
  • पादशाह के विरुद्ध विद्रोह करना अथवा उसके आदेश की अवज्ञा करनाईश्वरीय आदेश की अवमानना है ।
  • एक आदर्श बादशाह सुख-दुःख से परे होता है। उसमें ईश्वरीय ज्ञान का प्रकाश प्रतिबिम्बित होता है इसलिए उसे अपनी प्रजा का आध्यात्मिक गुरु अथवा मार्गदर्शक बनने का भी अधिकार है। 
  • सन् 1579 में निर्गत महज़र में अकबर ने मुसलमानों के धार्मिक विवादों के विषय में प्रामाणिक व्याख्या तथा अन्तिम निर्णय देने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा था। 
  • अकबर की नीतयों से असन्तुष्ट उलेमा वर्ग ने जब उसको अपदस्थ करने के षडयन्त्र में भाग लिया तब उसने उनके प्रभाव और प्रतिष्ठा को और भी क्षीण कर दिया।


अकबर का राजत्व का सिद्धान्त-03

  • सन् 1582 में दीन-ए-इलाही की योजना को प्रस्तुत किया गया था। अकबर इस नवीन मत का प्रणेताआध्यात्मिक गुरु पुरोहित तथा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि था। 
  • इसके मतावलम्बी अकबर से दीक्षा लेते थे और अपने अहंकार तथा स्वार्थ को त्याग कर उसके प्रति अपनी पूर्ण निष्ठा एवं भक्ति व्यक्त करते थे। 
  • तौहीद-ए-इलाही (दैविक एकेश्वरवाद) अथवा दीन-ए-इलाही को बदायूंनी ने अकबर द्वारा धर्म प्रवर्तक के रूप में अपने साम्राज्य की समस्त प्रजा को स्वनिर्मित एक राष्ट्रीय धर्म के अन्तर्गत लाने की महत्वाकांक्षी योजना कहा है। 
  • कुछ अन्य विद्वानों ने उसके द्वारा स्वयं को एक पैगम्बर या खलीफ़ा के रूप में प्रस्तुत करने का षडयन्त्र कहा है। दीन-ए-इलाही में अल्लाह हो अकबर (अल्लाह महान है।) तथा जल्ले जलाल हू के नारों का महत्व था। इन दोनों में बादशाह के नाम - अकबरतथा 'जलालुद्दीनका सम्मिलित होना आकस्मिक नहीं माना जा सकता। 
  • दीन-ए इलाही में बादशाह अकबर को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते हुए उपासक उसके समक्ष अपना तन मन-धन तथा ईमान अर्पित करते थे। वास्तव में अकबर के राजत्व के सिद्धान्त के अनुसारबादशाहइस पृथ्वी परईश्वर की छाया और उसका प्रतिनिधि होता है। 
  • अबुल फ़ज़्ल ने बादशाह अकबर को इंसान-ए-कामिल अर्थात् सर्वगुण सम्पन्नदोषरहितपूर्ण पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया है। अकबर का राजत्व का सिद्धान्त इस्लाम की राजनीतिक परम्पराओं पर आधारित नहीं था। उसके राजत्व के सिद्धान्त पर हिन्दुओं के राजत्व सिद्धान्त का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। 
  • फ़तेहपुर सीकरी में अकबर ने दीवान-ए-खास का निर्माण कराया था। इसके मुख्य कक्ष के मध्य में बादशाह एक सुदृढ़ स्तम्भ के ऊपर कमल की आकृति के गोलाकार स्थान पर रखे सिंहासन पर बैठता था। इसकी प्रेरणा कमल पर विराजमान प्रजापति ब्रह्मा की अवधारणा से ली गई थी। अकबर ने अपने नवरत्नों की अवधारणा की प्रेरणा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य तथा अन्य भारतीय शासकों से प्राप्त की थी। 
  • अकबर के ब्राह्मण चाटुकारों ने उसे भगवान कृष्ण के अवतार के रूप में भी प्रस्तुत किया था। अकबर ने झरोखा दर्शन की हिन्दू शासकों की परम्परा को पुनर्जीवित किया था। उसके काल में उसके अनेक भक्त दर्शनिए बन गए थे जो कि अकबर का दर्शन किए बिना अन्न-जल ग्रहण नहीं करते थे। इस प्रकार अकबर ने व्यक्ति पूजा को प्रोत्साहन दिया जो कि इस्लाम के मूलभूत सिद्धान्तों के विरुद्ध था।

 

शाहजहां का स्वयं को स्वर्गलोक के शासक के रूप में प्रस्तुत करना

 

  • दिल्ली के लालकिले में उद्यान योजनानहरे बहिश्त दीवान-ए-खास में शाहजहां के दरबार का अनुपम वैभव और तख्त-ए-ताऊस पर उसका विराजमान होना तथा दीवान-ए-खास को पृथ्वी पर स्वर्ग के रूप में प्रस्तुत करने की गर्वोक्ति शाहजहां द्वारा स्वयं को स्वर्गलोक के शासक इन्द्र के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कहा जा सकता है।

 

मुगल राजत्व के सिद्धान्त में बादशाह के अधिकार और कर्तव्य

 

  • महान मुगल बादशाहों में हुमायूं तथा जहांगीर के अतिरिक्त सभी बादशाह कर्मठ थे तथा अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक थे। सभी बादशाह अपनी प्रजा के हितों के संरक्षण के लिए प्रयत्नशील रहते थे। 
  • बादशाह अकबर ने अप्रत्यक्ष रूप से सम्राट अशोक तथा शेरशाह की लोक-कल्याणकारी शासन-व्यवस्था से प्रेरणा प्राप्त की थी। बादशाह बाबर और बादशाह अकबर ने सैनिक अभियानों में स्वयं अपनी वीरता और साहस से अपने सैनिकों के लिए एक आदर्श उपस्थित किया था। 
  • सभी बादशाहों ने निष्पक्ष न्याय वितरण को अपना कर्तव्य माना था। राजा विक्रमादित्य तथा शेर शाह की न्याय व्यवस्था उनके लिए आदर्श थी। अपनी चारित्रिक दुर्बलताओं के बावजूद जहांगीर ने इंसाफ़ पसन्द बादशाह के रूप में ख्याति प्राप्त की थी। अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपने ग्रंथ बादशाहनामा में शाहजहां की व्यस्त दिनचर्या का विस्तृत वर्णन किया है। 
  • बादशाह औरंगज़ेब आजीवन कर्तव्य निर्वाहन के प्रति अपने समर्पित भाव के लिए विख्यात रहा। महान मुगल बादशाहों ने स्वयं को उदार निरंकुश शासक के रूप में प्रतिष्ठित करने में पर्याप्त सफलता प्राप्त की थी। 
  • अबुल फ़ज़्ल आइन-ए-अकबरी में एक आदर्श पादशाह को निष्पक्ष न्यायकर्तासत्यान्वेषी तथा प्रजा को शान्ति एवं सुरक्षा प्रदान करने वाले कर्तव्यपरायण प्रजापालक के रूप में देखता है।
 

वंशानुगत शासन की परम्परा का विरोध

 

  • इस्लाम में वंशानुगत शासन की अवधारणा मान्य नहीं है। शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि स्वस्थ कोई भी मुसलमान शासक का पद प्राप्त करने का अधिकारी है। शासक को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का अधिकार नहीं है। 
  • मुगल शासकों ने अपने जीवन में ही प्रायः अपने उत्तराधिकारियों की घोषणा कर दी थी किन्तु उनके जीवन काल में ही शहज़ादों तथा प्रभावशाली अमीरों के विद्रोहों तथा उनकी मृत्यु के तुरन्त बाद शहज़ादों के मध्य उत्तराधिकार के युद्धों ने उनके इन प्रयासों को असफल सिद्ध कर दिया था। 
  • शाहजहां जैसे प्रतापी बादशाह को तो अपने शासनकाल में ही न केवल उत्तराधिकार का युद्ध देखना पड़ा बल्कि औरंगज़ेब द्वारा अपदस्थ किए जाने के बाद आठ वर्ष तक कैदखाने में अपमानजनक जीवन व्यतीत करने के लिए विवश भी होना पड़ा।

 

औरंगज़ेब द्वारा अकबर के राजत्व के सिद्धान्त में परिवर्तन

 

  • औरंगज़ेब ने स्वयं को इस्लाम के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत कर उत्तराधिकार के युद्ध में सफलता प्राप्त की थी। 
  • बादशाह बनने के बाद इस्लाम के मान्य राजत्व सिद्धान्त को पुनर्स्थापित करना उसके प्रारम्भिक कार्यक्रम सम्मिलित था। उसने व्यक्तिगत जीवन में सादगीपरिश्रम और धर्माचरण को अपनाया। उसके जीवन में ही उसकी छवि आलमगीर ज़िन्दापीर की बन गई।
  • चूंकि औरंगज़ेब ने इस्लाम को राज-धर्म घोषित कर दिया था अतः उसने उलेमा वर्ग को राज्य की नीतियों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर प्रदान किया। 
  • औरंगज़ेब के काल में अकबर और शाहजहां के काल के शाही वैभव का स्थान सादगी ने ले लिया और बादशाह के सामने सिजदा, कोर्निश करने तथा उसके चरण चूमने की गैर-मुस्लिम प्रथा पैबोस को समाप्त कर दिया गया झरोखा दर्शन तथा तुलादान जैसी हिन्दू परम्पराओं को भी समाप्त कर दिया गया। 
  • अभिवादन के लिए सलाम वालिकुम तथा उसके जवाब में वालेकुम अस्सलाम का प्रचलन किया गया। 
  • औरंगज़ेब एक स्वेच्छाचारी निरंकुश बादशाह के स्थान पर एक सच्चा धर्मनिष्ठ मुसलमान बादशाह बनना चाहता था जिसका कि कोई भी कार्य इस्लाम की मूल आस्थाओं तथा परम्पराओं के विरुद्ध न हो।

 

राजनीतिक पराभव के काल में मुगल राजत्व के सिद्धान्त की निरर्थकता

 

  • वास्तव में मुगल राजत्व का सिद्धान्त तभी तक बादशाह पद को गरिमा प्रदान कर सका जब तक कि मुगल बादशाह शक्तिशाली रहे। महान मुगल बादशाहों के अवसान के बाद परवर्ती मुगल शासकों के काल में राजत्व का सिद्धान्त व्यावहारिक दृष्टि से पूर्णतया निरर्थक हो गया। 
  • अब सैयद बन्धु, इमाद 7उल-मुल्क अथवा नजीब-उद्-दौला जैसे प्रभावशाली अमीर, बादशाहों को शतरंज मोहरों की भांति बदलने लगे थे। इन निर्बल और कठपुतली बादशाहों में से शायद ही किसी की स्वाभाविक मृत्यु हुई थी, इनमें से अधिकांश प्रभावशाली व महत्वाकांक्षी अमीरों के हाथों मारे गए थे। बादशाह के प्रति न तो किसी के हृदय में अब न तो भय का भाव रह गया था और न ही श्रद्धा का ।

 

मध्यकालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में मुगल राजत्व के सिद्धान्त का आकलन

 

  • मध्यकालीन राजत्व का सिद्धान्त सामान्यतः निरंकुश स्वेच्छाचारी राजतन्त्र का पोषक था। इस काल में लोकतान्त्रिक मूल्य, जनभावना का सम्मान, नागरिक अधिकार, बौद्धिक राजनीतिक दृष्टिकोण, धर्म-निर्पेक्षता आदि का राजत्व के सिद्धान्त से कोई भी सम्बन्ध नहीं था। 
  • मध्यकाल में पूरे विश्व में निरंकुश शासकों का आधिपत्य रहा। मैकियावेली के राजत्व के सिद्धान्त का प्रतिबिम्बन हम किसी भी देश के मध्यकालीन शासक के राजत्व के सिद्धान्त में देख सकते हैं। मुगल राजत्व का सिद्धान्त, शोषण, दमन, असमानता, निरंकुशता, स्वेच्छाचारिता, धार्मिक संकीर्णता और वंशवाद का पोषक किन्तु के प्रगतिशील राजनीतिक दृष्टिकोण से मुगल जत्व के सिद्धान्त का हम आकलन नहीं कर सकते।
  • मुगलों ने मध्यकालीन राजनीतिक वातावरण में शासक के अधिकार और कर्तव्य में एक व्यावहारिक सामन्जस्य स्थापित करने का प्रयास किया था। अकबर, जहांगीर और एक सीमा तक शाहजहां ने मुस्लिम मान्यताओं पर आधारित राजत्व के सिद्धान्त में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया था।
  • जिस काल में यूरोप में धर्मयुद्ध के नाम पर रक्तपात हो रहा था उस काल में मुगल बादशाहों ने अपनी बहुसंख्यक गैर-मुस्लिम प्रजा को अपने साम्राज्य में शान्तिपूर्वक, सुख से जीने का अधिकार प्रदान कर अपनी उदारता का परिचय दिया था।

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