मुहम्मद गोरी के आक्रमण |मुहम्मद गौरी के आक्रमण | Muhammad Ghori's Invasion

 

मुहम्मद गोरी के आक्रमण |Muhammad Ghori's Invasion

मुहम्मद गोरी के आक्रमण |मुहम्मद गौरी के आक्रमण | Muhammad Ghori's Invasion


 मोहम्मद गौरी से सम्बंधित प्रश्न ?


  • महमूद गजनवी के प्रायः 148 वर्ष पश्चात मुहम्मद गोरी का प्रथम आक्रमण 1175 ई. में मुल्तान में हुआ। 
  • इस समयान्तर के बावजूद भी उत्तरी भारत में विभिन्न राजवंशों में परिवर्तन होने के अतिरिक्त कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ या यह कहा जा सकता है कि भारतीयों ने महमूद के आक्रमणों से कोई सबक नहीं लिया। 


मुहम्मद गोरी के आक्रमण के समय भारत की स्थिति 

  • राजनीतिक दृष्टि से भारत उस समय भी विभक्त था, निस्संदेह कुछ राजपूत वंश बहुत सम्मानित और शक्तिशाली थे परन्तु उनमें राज्य विस्तार की प्रतिस्पर्धा और वंशानुगत झगड़ों के कारण निरन्तुर युद्ध होते रहते थे, जिससे वे न तो अपनी शक्ति का सदुपयोग अपने और अपने राज्य के हित के लिए कर सके और न वे एक होकर विदेशी शत्रु का मुकाबला कर सके।
  • इस समय उत्तर-पश्चिम सीमा पर सिन्ध, मुल्तान और पंजाब के मुसलमानी राज्य थे। 
  • सिन्ध मुल्तान राज्य छोटे थे और पंजाब का गजनवी राज्य दुर्बल था। 
  • गिज-तुर्कों से पराजित होकर के और गजनवी सुल्तान खुशरवशाह गजनी से भागकर लाहौर आ गया था। 
  • भारत के अन्य सभी भागों में राजपूत शासक थे। 
  • गुजरात और काठियावाड़ में चालुक्य वंश का शासन था जिसके शासक मूलराज द्वितीय ने 1178 ई0 में मुहम्मद गोरी को पराजित किया था। 


पृथ्वीराज तृतीय

  • दिल्ली और अजमेर में चौहान वंश का शासन था, यहाँ का शासक पृथ्वीराज तृतीय उत्तरी भारत के राजपूत शासकों में सर्वाधिक साहसी और महत्वाकांक्षी था। अपनी महत्वाकांक्षा के कारण प्रायः सभी राजपूत शासकों से उसकी शत्रुता हो गयी थी। 
  • गुजरात के चालुक्य वंश को उसने पराजित कर अपमानित किया, बुन्देलखण्ड के शासक परमर्दी देव को परास्त कर उसने उससे महोबा छीन लिया था और कन्नौज के गहड़वाल वंशी शासक जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता से बलपूर्वक विवाह कर उसने कन्नौज की शत्रुता मोल ले ली थी।
  • पृथ्वीराज तृतीय अपने युग का एक महान् साहसी योद्धा और सफल सेनानायक था, परन्तु उसमें दूरदर्शिता तथा राजनीतिज्ञता का अभाव था। इस कारण अपने मुसलमान शत्रु के विरूद्ध वह अपने किसी पड़ोसी से सहायता प्राप्त नहीं कर सका।



  • कन्नौज के गहड़वाल वंश का राज्य उत्तर भारत में सबसे अधिक विस्तृत था। गोरी के विरूद्ध यहाँ के शासक जयचन्द्र ने अत्यधिक पराक्रम दिखाया था लेकिन छंदवाड़ नामक स्थान पर 1194 ई0 में वह अकेला मारा गया।
  • बुन्देलखण्ड में चन्देल वंश तथा कलचुरि में चेदी वंश का शासन था।

 

मुहम्मद गौरी के आक्रमण

पृथ्वीराज चौहान मोहम्मद गौरी की लड़ाई - 1192 ई0 का तराइन का युद्ध

 

विस्सेन्ट स्मिथ के अनुसार सन् 1192 ई0 का तराइन का युद्ध एक निर्णायक युद्ध था, इसमें पृथ्वीराज तृतीय की निर्णायक हार हुई, जिसने भारत में मुसलमानों के आक्रमण की सफलता सुनिश्चित कर दी। वास्तव में इस कथन में बहुत सत्यता विद्यमान है । इसके उपरान्त धीरे-धीरे मुसलमानों ने समस्त उत्तरी भारत को अपने अधिकार में कर लिया। 

ईश्वरी प्रसाद के अनुसार 'यह राजपूत शक्ति पर घातक आघात था। इसके द्वारा भारतीय समाज के समस्त अंगों का नैतिक पतन होना आरम्भ हो गया था जो समस्त राजपूत राजाओं को अपने नेतृत्व में संगठित कर मुसलमानों का सामना करता। 

डॉ0 आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने भी इन्हीं विचारों को व्यक्त किया। इस युद्ध में विजयी होने से मुहम्मद गौरी को भारत के अन्य भागों पर अधिकार करने में बड़ी सहायता मिली। 

महमूद गजनवी के विपरीत मुहम्मद गोरी के आक्रमणों से भारत की राजनीतिक स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन हो गया,था। 

 

मुहम्मद गोरी का कन्नौज पर अधिकार

 

तराईन के द्वितीय युद्ध में विजयी होने के उपरांत इस विजय को आगे बढ़ाते हुए मुहम्मद गोरी ने झॉसी, कुहराम तथा सरसुती पर अधिकार किया और भारत की भूमि पर मुसलमानी राज्य की स्थापना की। 


मोहम्मद गौरी की मृत्यु के पश्चात दिल्ली का शासक कौन बना ?


  • उसने अजमेर को पृथ्वीराज के पुत्र के अधिकार में इस शर्त के साथ सौंप दिया कि वह प्रतिवर्ष उसको कर दिया करेगा और दिल्ली को भी तोमर वंश के एक राजकुमार को समान शर्त पर सौंप दिया।
  • मुहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक के नेतृत्व में दिल्ली के समीप इन्द्रप्रस्थ में एक सेना छोड़ गयी जिसने बाद मेरठ, कोल और दिल्ली पर अधिकार किया। 

  • मुहम्मद गौरी स्वदेश वापिस चला गया। उसके चले जाने पर भारत में कुछ स्थानों में बगावत हुई , जिनका कुतुबुददीन ने कठोरता से दमन किया। इसके उपरान्त दिल्ली भारत में मुसलमानी राज्य की राजधानी घोषित हुई।


मुहम्मद गोरी का भारत में दूसरा आक्रमण

  • इन राज्यों पर अधिकार से ही मुहम्मद गौरी की विजय का अन्त नहीं हुआ। जब कुतुबुद्दीन राजपूतों के विद्रोह का दमन करने में व्यस्त था उस समय मुहम्मद गौरी फिर एक बार अपनी विशाल सेना लेकर भारत आया। 
  • इस बार उसका उद्देश्य कन्नौज और काशी को अपने अधीन करना था, जिस पर राठौर वंश के जयचन्द्र का अधिकार था। जयचन्द्र को अकेले ही मुसलमानी सेना का में सामना करना पड़ा। इस युद्ध केवल भाग्य के कारण मुहम्मद को विजय प्राप्त हुई। 
  • इस युद्ध में विजयी होने के परिणामस्वरूप उसके अधिकार में भारत का बहुत बड़ा भाग आ गया। उसने शीघ्र बनारस पर आक्रमण किया और उस पर भी अधिकार जमाया। मुहम्मद को यहाँ से अतुल धन तथा बहुत से हाथी प्राप्त हुए। उसने वहाँ मस्जिदों का निर्माण करवाया।
  • बहुत से मन्दिरों को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला और उनके स्थानों पर मुहम्मद के गजनी जाने के उपरान्त उसके कार्य को उसके सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने पूरा किया। 
  • कोल में विद्रोह हुआ जिसका शीध्र दमन कर दिया गया। इसके उपरान्त अजमेर में विद्रोह हुआ। उसने अजमेर पर आक्रमण किया और अजमेर पर पुनः मुसलमानों का अधिकार स्थापित हो गया। 
  • कुतुबुद्दीन ने अजमेर को एक तुर्क मुसलमान सूबेदार के हाथ में सौंप दिया और पृथ्वीराज के पुत्र को रणथम्भौर का प्रदेश दे दिया।

 

मुहम्मद गौरी तथा उसके सेनापतियों की अन्य विजयें

 

मुहम्मद गौरी ने सन् 1195 ई0 में पुनः भारत पर बियाना तथा ग्वालियर के प्रदेशों को अपने अधिकार में करने के लिए आक्रमण किया।

 

1. बियाना पर अधिकार

  • बियाना पर भट्टी राजपूतों का अधिकार था। यहाँ के राजा कुमारपाल ने मुहम्म्द गौरी के आक्रमण से भयभीत होकर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

 

2. ग्वालियर पर अधिकार

  • इसके बाद मुहम्मद गौरी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया । ग्वालियर का दुर्ग अभेद्य समझा जाता था। मुहम्मद गौरी ने वहाँ के शासक से वार्षिक कर लेना स्वीकार कर उसने सन्धि की, कुछ समय उपरान्त मुसलमानों ने उस पर अधिकार कर लिया।

 

3. अन्हिलवाडा की लूटमार

  • मुहम्म्द गौरी के भारतीय प्रतिनिधि कुतुबुद्दीन ने अन्हिलवाड़ा पर आक्रमण किया, राजपूतों ने बड़ी वीरता से उनका सामना किया, किन्तु वे पराजित हुये। कुतुबुद्दीन अन्हिलवाड़ा की लूटमार कर वापिस चला गया।

 

4. बुन्देलखण्ड पर अधिकार

  • सन् 1201 ई0 में कुतुबुद्दीन ने बुन्देलखण्ड प्रदेश पर आक्रमण किया। उसने कालिंजर के दुर्ग का घेरा डाला, यह दुर्ग भी बहुत दृढ था और उसकी गणना भारत के प्रसिद्ध दुर्गों में की जाती थी कुतुबुद्दीन ने दुर्ग में पानी पहुंचाने के मार्ग पर अधिकार कर दुर्ग में पानी की आपूर्ति बन्द कर दी। फलस्वरूप राजपूतों ने हथियार डाल दिये और दुर्ग पर मुसलमानों अधिकार हो गया।

 

5. बिहार की विजय

  • इसी काल में मुहम्मद गौरी का एक अन्य दास मुहम्मद बिन बख्तियार खजली पूर्वी विजयों में संलग्न था। उसे गंगा और सोन नदी के मध्य में एक जागीर भेंट स्वरूप प्रदान की गई थी। उसने बहुत से खिलजियों को अपनी सेना में भर्ती किया और बिहार के प्रदेश पर आक्रमण करने आरम्भ किये। अपनी शक्ति को दृढ़ करने के उपरान्त उसने बिहार की राजधानी उदन्तिपुर पर अधिकार कर वहाँ के विशाल भवनों नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। उसने नालन्दा विश्वविद्यालय तथा उसके पुस्तकालयों पर भी आग लगा दी | इसके उपरान्त उसने बिहार के अन्य प्रदेश पर अधिकार किया और समस्त बिहार उसके अधिकार में आ गया।

 

6. बंगाल विजय

  • सन् 1204 ई0 में मुहम्मद बिन बख्तियार खजली ने बंगाल पर आक्रमण किया। वह अपनी सेना लेकर नदिया के द्वार पर पहुंच गया। उसके साथ उस समय केवल 18 व्यक्ति थे और उसकी सेना पीछे आ रही थी। वह दुर्ग में प्रवेश करने में सफल हुआ । इस समय राजा लक्ष्मणसेन दोपहर का भोजन करने के लिये बैठा ही था । जब उसने यह समाचार सुना तो वह पिछले द्वार से भाग गया। 
  • इसके बाद मुहम्मद बिन बख्तियार खजली ने गौढ के समीप लखनौती पर अधिकार कर उसको अपनी राजधानी घोषित किया, उसने बंगाल के अन्य प्रदेशों को अपने अधिकार में करने की चेष्टा नहीं की। उसने तिब्बत आक्रमण करने का विचार किया। लेकिन उसका यह अभियान असफल हुआ और सन् 1206 ई0 में इसकी मृत्यु हो गई।

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