मुसलमानों के आक्रमण के पहले दक्षिण के राज्य | The Deccan Kingdoms

मुसलमानों के आक्रमण के पहले   दक्षिण के राज्य (The Deccan Kingdoms)

मुसलमानों के आक्रमण के पहले  दक्षिण के राज्य | The Deccan Kingdoms
 

  • उत्तर भारत की तरहदक्षिण भारत में भी कल्याणी के चालुक्यकांची के चोल और मदुरा के पांड्य वंशों के लोग प्रभुत्व के लिए संघर्ष कर रहे थे . 
  • प्रभुत्व के संघर्ष में दक्खिन में सन् 753 ई. में पूर्व चालुक्य वंशज राष्ट्रकूटों से पराजित हो गए थे और राष्ट्रकूट परवर्ती चालुक्य वंशजों से सन् 973 ई. में हार गए थे। 
  • इसी प्रकार नौवीं शताब्दी के अन्त तक महान पल्लव वंश का पतन हो चुका था. 
  • परवर्ती चालुक्य वंश का प्रवर्तक तैला द्वितीय था जो अपने को वातापी के प्रारम्भिक चालुक्य वंश का वंशज मानता था। उसने कल्याणी को अपनी राजधानी बनाया उसके उत्तराधिकारियों को चोल लोगों के साथ निरन्तर संघर्ष करना पड़ा. जो महान शासक राजाराज के शासनकाल में उत्कर्ष को प्राप्त हुए थे। 
  • राजाराज ने सन् 985 से 1014 ई. तक राज्य किया। उसके उत्तराधिकारी राजेन्द्र चोल ने 1044 ई. तक राज्य किया। 
  • राजेन्द्र चोल एक महान योद्धा और विजेता था उसने दक्षिणी तथा उत्तरी भारत में विस्तृत विजय प्राप्त की और उसकी गणना देश के महत्तम शासकों में होती थी जिस समय दक्षिण में चोल और चालुक्य वंश के लोगों के बीच घोर संघर्ष चल रहा था मुसलमानों ने भारत पर आक्रमण कर दिया।

 

मुसलमानों के आक्रमण के पहले  भारत की स्थिति क्विक रिविज़न 

 

  • ग्यारहवीं शताब्दी में जब मुसलमानों ने भारत पर आक्रमण करने शुरू किये तब भारत विभिन्न राज्यों में बंटा हुआ था। 
  • 612 ई. में अरबों ने सिन्ध और मुलतान दोनों राज्यों को विजय कर लिया। ये दोनों हिन्दू राज्य यदि संगठित होकर विदेशियों द्वारा विजय किये जाने का विरोध करते तो अवश्य सफल होते। परस्पर शत्रुता के कारण 
  • ये राज्य मुसलमानों की अधीनता में रहे। कश्मीर का राज्य मुख्य राज्यों में से एक था इसके शासक को हिन्दुस्तानी साम्राज्य और कन्नौज के साथ युद्ध लड़ना पड़ा। कश्मीर का एक प्रसिद्ध शासक शंकरवर्मन था। 
  • नौवीं शताब्दी के मध्य से कन्नौज में प्रतिहार वंश राज्य कर रहा था वे श्रीराम के भ्राता लक्ष्मण को अपने वंश का संस्थापक मानते थे। कई विद्वानों का मत है कि वे गुर्जर जाति की सन्तान हैं। उनके राजा वत्स को सम्राट की उपाधि से सुशोभित किया गया था । 
  • ऐसा अनुमान किया जाता है कि उसे मुसलमानों का सामना करने में अधिक सफलता नहीं मिली। विजय चन्द्र ने गोविन्द चन्द्र का स्थान लिया। 
  • खजुराहो में चन्देलों का राज्य कन्नौज के दक्षिण में था उसके शासक विद्याधर ने महमूद गजनवी का सामना किया। उसके उपरांत इस राज्य को कई कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं। मदन वर्मन (1129-1163 ई.) ने विदेशी शत्रुओं का सामना करने के साथ-साथ अपनी सीमा का विस्तार भी किया। 
  • चौहान तोमर वंश के शत्रु थे। 11वीं और 12वीं सदी में उन्होंने अपनी शक्ति बढ़ा ली। 1079 ई. में दुर्लभ राजा तृतीय मुसलमानों से युद्ध लड़ता हुआ अमर हो गया। 
  • चालुक्यों और चौहानों की शत्रुता का वर्णन किये बिना यह गाथा अधूरी रह जाती है। चालुक्य राजा मूलराज को विग्रहराज द्वितीय ने पराजित किया। गुजरात के राजा जयसिंह सिद्धार्थ ने अपनी पुत्री का विवाह अरुणोराजा से कर के शत्रुता को मित्रता में बदलने का प्रयास किया। कुमारपाल चालुक्य के राज्य में एक बार फिर युद्ध की दुन्दुभी बज उठी। 
  • दसवीं सदी के मध्य में मूलराज ने गुजरात में चालुक्य वंश का राज्य स्थापित किया जयसिंह सिद्धार्थ और कुमारपाल के प्रयत्नों से यह राज्य पश्चिमी भारत का एक महान शक्तिशाली राज्य बन गया । 
  • गोरखपुर में कलचुरि की दो शाखाएँ राज्य करती थीं एक शाखा त्रिपुरी में थी । त्रिपुरी के राजा कोकल ने त्रुषका (Turushkas) राज्य में लूट मचा दी। 1034 ई. में बनारस के राजा गांगेयदेव विक्रमादित्य ने नयालतगीन के आक्रमण के समय मुसलमानों के साथ भीषण युद्ध लड़ा। 
  • उत्तर भारत की तरहदक्षिण भारत में भी कल्याणी के चालुक्यकांची के चोल और मदुरा के पांड्य वंशों के लोग प्रभुत्व के लिए संघर्ष कर रहे थे प्रभुत्व के संघर्ष में दक्खिन में सन् 753 ई. में पूर्व चालुक्य वंशज राष्ट्रकूटों से पराजित हो गए थे और राष्ट्रकूट परवर्ती चालुक्य वंशजों से सन् 973 ई. में हार गए थे। 
  • आर्नल्ड हौजर के अनुसार, "राजा युद्ध तो करता थापरन्तु वह शासन नहीं करता था। उसके नाम पर बड़े-बड़े जमींदार शासन करते थे परन्तु वे अधिकारियों और सैनिकों के रूप में नहींबल्कि स्वतंत्र सामंतों के रूप में शासन करते थे। वे शासक वर्ग के लोग थे जिनके हाथ में सरकार के सभी विशेषाधिकारसमस्त प्रशासन-तंत्र तथा सेना के सभी महत्त्वपूर्ण पद होते थे।" 
  • इन सामन्तों के अपने गुणावगुण थे। वे अपने शत्रुओं के प्रति उदारचरित होते थे स्त्रियों का वे सम्मान करते थे। चारणों तथा याचकों के प्रति वे उदार होते थे। वीरता में वे निडर होते थे। 
  • सामन्त लोग हठीतानाशाह और भ्रष्ट थेक्योंकि सरकार की सारी शक्ति का युद्धों और कूटनीति पर ही अपव्यय हो रहा था। असैनिक अपनी मनमानी करने में पूरी तरह स्वतंत्र थे। कल्हन लिखता है कि असैनिक कर्मचारी भ्रष्ट हो गए थे और वे राक्षसों की तरह व्यवहार करते थे। 
  • ग्यारहवीं शताब्दी के कवि बब्बर ने लिखा है कि शीत ऋतु की ठण्डी वायु तथा वर्षा के कारण गरीब लोगों में थरथराहट पैदा हो जाती थी वे न केवल कड़ाके की सर्दी से बल्कि भूख से भी पीड़ित थे। खाली पेट और दुःखी दिल वाले ये लोग अपने हाथ पांव समेटकर जड़वत् हो जाते थे। 
  • सिद्ध सरहपाद अथवा सरोहवज़ बुद्धमत में सहजयान विचारधारा के संस्थापक थे। उनके मतानुसार संसार को त्यागने की आवश्यकता नहीं है और व्यक्ति विवाहित जीवन व्यतीत कर सकता है। 
  • नाथ-योगियों के बारे में पुष्पदन्त लिखता है कि उनके सिरों पर बहुरंगी टोपियाँ होती थी उनके कानों में बड़े-बड़े छेद होते थे जिनमें हाथी-दांत अथवा धातु के बने कुंडल लटके रहते थे उनके हाथों में लम्बी छड़ें होती थीं। उनके गलों में भिन्न-भिन्न रंगों की कपड़े की चादरें लटकती थीं। वे खड़ाऊ पहनते थे। वे तुरही तथा भेरी बजाते हुए घर-घर जाया करते थे। मदिरागांजा तथा धतूरा जैसी नशीली वस्तुओं का प्रयोग वे सामान्य रूप से करते थे। 
  • भारत पर कुछ शताब्दियों से कोई आक्रमण नहीं हुआ था इसलिए लोगों में सुरक्षा की झूठी भावना बनी हुई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि विदेशी खतरों से देश की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। देश में भौतिक समृद्धि को भी लोग कमजोर हो गए थे। 
  • भारत के लोग बाकी दुनिया से अलग-थलग बने हुए थे वे अपने आप में इतने अधिक संतुष्ट थे कि उन्हें अपनी सीमाओं के बाहर हो रही घटनाओं की कोई चिन्ता नहीं थी । 
  • मठ जो पहले ज्ञान-प्राप्ति के स्थान थेअब विलासिता और निष्क्रियता के केन्द्र बन गए थे। अधिकांश मठवासी व्यभिचार का जीवन बिताते थे। 
  • मन्दिरों में देवदासी की प्रथा व्याप्त थी। बहुत बड़ी संख्या में अविवाहित लड़कियां मन्दिरों में देवता की सेवा के लिए समर्पित कर दी गयी थीं।

 

Also Read...

मुसलमानों के आक्रमण के पहले भारत की स्थिति


No comments:

Post a Comment

Powered by Blogger.