अलाउद्दीन का दक्षिण भारत की विजय अभियान Alauddin's conquest of South India

 

अलाउद्दीन का दक्षिण भारत की विजय अभियान Alauddin's conquest of South India

अलाउद्दीन का दक्षिण भारत की विजय अभियान Alauddin's conquest of South India


  • सुल्तान जलालुद्दीन के शासनकाल में अपने देवगिरि के अभियान से अलाउद्दीन को दक्षिण की अथाह धन-सम्पदा व संसाधनों का ज्ञान हो चुका था किन्तु सुल्तान बनने के कई वर्षों बाद तक वह आन्तरिक समस्याओं और मंगालों का प्रतिरोध करने में व्यस्त रहा था। 
  • उत्तर भारत पर अपनी पकड़ मज़बूत कर और मंगोल आक्रमणों से सफलतापूर्वक निपटने के बाद अलाउद्दीन दक्षिण-विजय अभियान की ओर उन्मुख हुआ। मालवा, गुजरात, मेवाड़ और मारवाड़ पर अपना अधिकार हो जाने के बाद अलाउद्दीन के लिए दक्षिण विजय अपेक्षाकृत सुगम हो गई थी। 

अपनी विशाल स्थायी सेना को व्यस्त रखने के लिए दक्षिण अभियान उसके लिए एक लाभकारी कार्य हो सकता था। 

  • अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन के दक्षिण अभियान का उद्देश्य इस्लाम का प्रचार करना बताया है, इसी कारण हर अभियान में मन्दिरों का विध्वंस और मस्जिदों का निर्माण किया जाता था। किन्तु ऐसा तो महमूद गज़नवी भी करता था। 
  • के0 एस0 लाल यह मानते हैं कि अलाउद्दीन का दक्षिण अभियान महमूद गज़नवी के अभियानों की भांति मुख्यतः धन प्राप्ति के उद्देश्य से किए गए थे। 
  • अलाउद्दीन का उद्देश्य दक्षिण भारतीय राज्यों को अपने प्रत्यक्ष अधिकार में करना नहीं था क्योंकि ऐसा करने के लिए उसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे। वह तो इन राज्यों को अपने आधीन कर, समस्त अधिकार उन्हीं को सौंपकर, उनसे वार्षिक भेंट और अपने अभियानों के लिए आवश्यक संसाधन की मदद चाहता था। 
  • चौथी शताब्दी में समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के राज्यों पर विजय प्राप्त कर वहां के शासकों से यही अपेक्षा की थी। बाद में अकबर ने भी विभिन्न राजपूत शासकों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया था। सुल्तान अलाउद्दीन के दक्षिण अभियानों की सफलता का मुख्य श्रेय नाइब मलिक जाता है। 

 

अलाउद्दीन का दक्षिण भारत की विजय अभियान-01

  • सुल्तान के अधीनस्थ देवगिरि के शासक रामचन्द्रदेव ने तीन वर्षों से खिराज नहीं दिया था। उसने गुजरात के पूर्व शासक कर्ण बघेला को उसकी पुत्री देवलदेवी के साथ न केवल शरण दी थी उसे बगलाना पर अधिकार करने में मदद भी दी थी। अलाउद्दीन की बेगम कमलादेवी अपनी पुत्री देवलदेवी को दिल्ली बुलवाना चाहती थी। अलाउद्दीन ने अपने नाइब मलिक काफूर को देवगिरि पर तथा अल्प खाँ को बगलाना पर अधिकार करने के लिए भेजा। मार्च, 1307 में मलिक ने रामचन्द्रदेव को पराजित किया और भारी लूट के साथ उसे सपरिवार वह दिल्ली ले आया। सुल्तान की आधीनता स्वीकार करने के बाद रामचन्द्रदेव को न केवल उसका राज्य उसे वापस किया गया अपितु उसे राय रायनकी उपाधि और नवसारी का क्षेत्र भी प्रदान किया गया। अल्प खाँ ने कर्ण बघेला को खदेड़कर बगलाना पर अधिकार कर लिया।

 

अलाउद्दीन का दक्षिण भारत की विजय अभियान-02

  • वारंगल (तेलंगाना) के शासक प्रतापरुद्रदेव ने सन् 1303 में अपने विरुद्ध मलिक कार के अभियान को विफल कर दिया था। नवम्बर, 1309 में एक बार फिर मलिक काफ़ूर वारंगल अभियान का नेतृत्व प्रदान किया गया। वारंगल दुर्ग को काफ़ूर ने घेर लिया। एक समय तक प्रतिरोध करने के बाद प्रतापरुद्रदेव ने कार के समक्ष सन्धि प्रस्ताव रखा जिसे काफ़ूर ने स्वीकार कर लिया। प्रचुर मात्रा में धन और प्रतापरुद्रदेव द्वारा वार्षिक खिराज दिए जाने के आश्वासन के साथ काफूर दिल्ली लौट आया।

 

अलाउद्दीन का दक्षिण भारत की विजय अभियान-03

  • सन् 1310 में अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को तीसरी बार दक्षिण विजय के लिए भेजा। इस बार के अभियान का उद्देश्य धन प्राप्ति के अतिरिक्त होयसल (द्वारसमुद्र) राज्य के शासक वीर बल्लाल को दिल्ली सल्तनत के आधीन करना था। वीर बल्लाल को पराजित कर मलिक काफ़ूर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहा।

 


अलाउद्दीन का दक्षिण भारत की विजय अभियान-04


  • सुदूर दक्षिण में स्थित मदुरा राज्य में सुन्दर पाण्ड्य तथा वीर पाण्ड्य हो रहे गृहयुद्ध सुन्दर पाण्ड्य ने होयसल अभियान के दौरान मलिक काफूर से सहायता मांगी। मलिक कार में ने मदुरा पर आक्रमण कर दिया। वीर पाण्ड्य भाग निकला। सुन्दर पाण्ड्य को सहायता देने का काफ़ूर का कोई इरादा नहीं था। उसने जमकर मदुरा को लूटा उसने अनेक मन्दिरों को ध्वस्त किया। काफ़ूर रामेश्वरम के मन्दिर को ध्वस्त करने पहुंचा या नहीं, यह विवादास्पद है। पाण्ड्यों में से कोई सुल्तान के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने के लिए उपस्थित नहीं हुआ। सुन्दर पाण्ड्य के चाचा पाण्ड्य ने मलिक काफ़ूर की सेना बहुत हानि पहुंचाई किन्तु वह अपरिमित धन-सम्पदा लूट कर दिल्ली लौटने में सफल रहा।

 

अलाउद्दीन का दक्षिण भारत की विजय अभियान-05

  • सन् 1309 में रामचन्द्रदेव की मृत्यु के बाद शंकरदेव देवगिरि का शासक बना। शंकरदेव ने स्वय को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। सन् 1313 में मलिक काफूर ने शंकरदेव को परास्त कर मार डाला और दक्षिण में राचूर, गुलबर्गा, मुद्गल सहित विशाल क्षेत्र को जीत लिया। सुल्तान के आदेश पर हरपालदेव को देवगिरि का अधीनस्थ शासक बनाकर काफ़ूर, लूट और भेंट की राशि के साथ दिल्ली लौट आया।

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