मध्य प्रदेश नई वन नीति : 2005 | MP Forest Policy 2005

 मध्य प्रदेश नई वन नीति : 2005

MP Forest Policy 2005

मध्य प्रदेश नई वन नीति : 2005 MP Forest Policy 2005
 

4 अप्रैल, 2005 को मध्यप्रदेश की नई वन नीति को राज्य मंत्रिमंडल ने मंजूरी प्रदान कर दी तथा इसे लागू करने को वन विभाग को अधिकृत कर दिया। 

नई वन नीति 2005 का उद्देश्य

  • प्रदेश के पारिस्थितिकीय, आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी संसाधनों का उपयोग करते हुए वनों के संरक्षण, संवर्द्धन और संवहनीय उपयोग के लिए युक्तियुक्त वैधानिक और संस्थागत ढाँचे से वनों का प्रबंधन इस प्रकार करना है कि पर्यावरण सुरक्षा, पारिस्थितकीय संतुलन और भू-जल संरक्षण के साथ-साथ वनाश्रित समुदायों की जरूरतों की पूर्ति हो सके और वनों की उत्पादकता में वृद्धि की जा सके। 
  • इससे वन संसाधनों के विकास के साथ-साथ इन समुदायों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकेगा और उनका आर्थिक एवं सामाजिक विकास सुनिश्चित हो सकेगा। 
  • वन नीति में प्रदेश के उजड़े वनों को आवश्यकतानुसार उपचारित कर पुन: स्थापित करने राज्य की नदियों के जलाशय क्षेत्र और भूक्षरण के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में मृदा संरक्षण कार्य तथा जल ग्रहण क्षेत्र उपचार कर वृक्षाच्छादित करने, सड़कों, नहरों एवं रेल मार्गों के किनारे तथा परती भूमि में रोपित वृक्षों के समुचित प्रबंधन तथा रिक्त स्थानों पर वृक्षारोपण करने और शहरी क्षेत्रों में लागू ट्री प्रोटेक्शन एक्ट का विस्तार इन क्षेत्रों में भी करने, वन क्षेत्रों तथा वनों के बाहर के क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के प्रावधानों के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी सुनिश्चित करने और शहरी क्षेत्रों में पर्यावरण संतुलन एवं ग्राउंड वाटर रिचार्जिंग के लिए ग्रीन बेल्ट के विकास और विद्यमान ग्रीन बेल्ट के भूमि उपयोग का परिवर्तन नहीं करने का प्रावधान किया गया है। 
  • इस नीति में वन भूमि पर गैर वानिकी कार्यों की अनुमति न देने और वनों में अवैध उत्खनन करने वालों के साथ ही इसके लिए प्रेरित करने वालों के विरुद्ध भी कड़ी कार्यवाही करने की व्यवस्था की गई है।


मध्य प्रदेश नई वन नीति : 2005 की  प्रमुख बातें

 

  • अनियंत्रित चराई के नियंत्रण, वन प्रबंधन, इमारती लकड़ी, जलाऊ लकड़ी, बाँस के उत्पादन अकाष्ठीय वनोपज के उत्पादन, संवहनीय विदोहन, मूल्य संवर्द्धन और संवहनीय विदोहन करना।
  • लोक वानिकी तथा विस्तार वानिकी के तहत वृक्षारोपण को बढ़ावा 
  • वन आधारित उद्योगों को प्रोत्साहित करना देना। 
  • संयुक्त वन प्रबंधन के लिए वनों की सीमा से पाँच किमी. की परिधि के अंदर सभी गाँवों में ग्रामवासियों की समितियाँ गठित करने हेतु प्रोत्साहन देना। 
  • स्थानीय लोगों की वन आधारित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रचलित निस्तार व्यवस्था को उपलब्धता एवं आवश्यकता के आधार पर पूरे वर्ष जारी रखने के अलावा वनों में गिरी पड़ी सूखी जलाऊ लकड़ी वन सीमा से पाँच किमी. की परिधि में स्थित ग्रामवासियों को घरेलू उपयोग के लिए देने की अनुमति प्रदान करना। 
  • वनाश्रित समुदायों और भूमिहीनों के विकास तथा महिलाओं के सशक्तिकरण, जैव विविधता संरक्षण वन्य प्राणी संरक्षण, इको टूरिज्म को प्रोत्साहित करना। 
  • सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग, अनुसंधान एवं विस्तार, मानव संसाधन विकास, वन एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण के प्रति जनजागरूकता उद्देश्य से विभिन्न संचार माध्यमों का अधिकाधिक उपयोग कर व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करना।
  • वन क्षेत्रों में शीघ्रातिशीघ्र व्यवस्थापन और सीमांकन तथा वनग्रामों को राजस्व ग्रामों में परिवर्तित करने की पहल के साथ वन सुरक्षा के लिए अवैध कटाई की रोकथाम और वनकर्मियों को पर्याप्त अधिकार देना । 
  • संवेदनशील क्षेत्रों में वन चौकी व्यवस्था विकसित कर समूह गश्ती का प्रयास और वनकर्मियों को शस्त्र उपलब्ध कराना।
  • वन सुरक्षा में स्थानीय समुदाय का अधिकाधिक सहयोग सुनिश्चित करने और वन अपराधों के शीघ्र निराकरण के लिए जिला स्तर पर विशिष्ट अदालतों की स्थापना करना।
  • उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में इससे पूर्व मध्यप्रदेश की 1952 की वन नीति लागू थी। 
  • अने परिवर्तनों तथा राज्य की विशिष्ट भौगोलिकसामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों की आवश्यकताओं के परिप्रेक्ष्य में इस नीति में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

मध्य प्रदेश राज्य वन नीति 2005 के महत्वपूर्ण बिन्दु

 

  • दिनांक 4 अप्रैल 2005 को मंत्रि परिषद की बैठक में राज्य की नवीन वन नीति को मंजूरी प्रदान की गई है। 
  • इससे पूर्व मध्य प्रदेश में अविभाजित प्रदेश की सन 1952 की राज्य वन नीति लागू थी। लगभग 52 वर्षों का समय बीत जाने के कारण अनेकों परिवर्तनों तथा राज्य की विशिष्ट भौगोलिक सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों की आवश्यकता के फलस्वरूप इस नीति में व्यापक परिवर्तनों की आवश्यकता थी
  • वर्ष 1988 में पुनरीक्षित राष्ट्रीय वन नीति घोषित की गई जिसके प्रावधानों के अनुरूप में भी राज्य की वन नीति में व्यवस्थायें किया जाना आवश्यक थी । 
  • पूर्व की वन नीति में जहां राजस्व आय को प्राथमिकता दी गई थी. वर्तमान नीति में इसे गौण मानते हुए मुख्य लक्ष्य वनों के संवहनीय प्रबंधन से पर्यावरण संरक्षण तथा स्थानीय समुदायों को रोजगार उपलब्ध कराना, उनकी आय के साधन बढ़ाना तथा उनकी मूलभूत वनाधारित आवश्यकताओं को पूर्ण करना है । 
  • पूर्व की नीति में वन प्रबंधन कार्य जहां विभाग के कड़े नियंत्रण में ठेकेदारों के माध्यम से कराया जाता था, वर्तमान नीति में जन भागीदारी से वनों के विकास को महत्व दिया गया है । 
  • नवीन वन नीति में इमारती काष्ठ के उत्पादन के साथ-साथ लघु वनोपज, बांस तथा औषधीय प्रजातियों के उत्पादन, प्रसंस्करण तथा मूल्य संवर्धन पर विशेष बल दिया गया है । 
  • वनाश्रित समुदायों के सर्वांगीण विकास एवं महिलाओं के सशक्तीकरण पर पर्याप्त जोर दिया गया
  • है ।
  •  वनाश्रित परिवारों हेतु वनाधारित वैकल्पिक रोजगार की सतत उपलब्धता के अवसर निर्मित करना। 
  • वन क्षेत्रों का व्यवस्थापन सीमाओं के समस्त लंबित विवादों का निराकरण करते हुए शीघ्र करना तथा वन खण्डों का सीमांकन पूर्ण करना । 
  • वर्तमान में व्यवस्थापित अतिक्रमित क्षेत्रों को शीघ्रातिशीघ्र सीमांकित करना तथा भविष्य में अतिक्रमण की प्रभावी रूप से रोकथाम करना । 
  • वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में परिवर्तन करने की कार्यवाही पूर्ण की जायेगी । 
  • चन सुरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ बनाने के लिए बेतार तंत्र आदि संचार सुविधाओं का विस्तार करना।
  • संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष सुरक्षा बल की व्यवस्था सुदृढ़ करना एवं वन कर्मियों को आवश्यकतानुसार शस्त्र उपलब्ध कराना ।

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