गिद्ध संरक्षण परियोजना | Vulture Conservation in Hindi

 

गिद्ध संरक्षण परियोजना Vulture Conservation in Hindi

वर्ष 2006 में हरियाणा वन विभाग एवं बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के मध्य हुए सहमति पत्र में गिद्धों के संरक्षण का लक्ष्य रखा गया । गिद्धों के आकस्मिक विलुप्तीकरण का कारण पशुओं को दी जाने वाली डायक्लोफेनिक नाम NSAID (नान स्टेराइड एंटी इंनफ्लेमेट्री ड्रग्स) है जो सामान्यतः पशुओं के दर्द निवारक के रूप में प्रयुक्त होती हैं इस दवा से गिद्धों की किड़नी दुष्प्रभावित होती हैं। 

पशुओं को दी जाने वाली इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। तथा डाईक्लोफेनिक के विकल्प के रूप में मेलाॅक्सिकम का प्रयोग किया जा रहा है। यह प्रतिबंध एशिया  समाप्त हो रहे गिद्धों के संरक्षण के एि सेव कार्यक्रम के अंतर्गत प्रारंभ किया गया हैं

SAVE-Saving Asia's Vultures from Extinction

सेव कार्यक्रम के अंतर्गत 30000 वर्ग किमीके सुरक्षित क्षेत्र जो हानिकारक दवा से मुक्त हो उनमें गिद्धों को संरक्षित किया जाएगा। जूनागढ़, भोपाल, हैदराबाद, तथा भुवनेश्वर से इस गिद्ध संरक्षण परियोजना का प्रारंभ हुआ हैं

गिद्धों की नौ प्रजातियाँ भारत की स्थानिक हैं, परंतु अधिकांश पर विलुप्त होने का खतरा है।

वर्ष 1990 के उत्तरार्द्ध में, जब देश में गिद्धों की संख्या में तेजी से गिरावट होने लगी उस दौरान राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में सफेद पीठ वाले एक गिद्ध (White-backed vulture) को बचाया गया जहाँ गिद्धों की संख्या में चिंताजनक दर से गिरावट हो रही थी।

गिद्धों की मौत के कारणों पर अध्ययन करने के लिये वर्ष 2001 में हरियाणा के पिंजौर में एक गिद्ध देखभाल केंद्र (Vulture Care Centre-VCC) स्थापित किया गया। कुछ समय बाद वर्ष 2004 में गिद्ध देखभाल केंद्र को उन्नत (Upgrade) करते हुए देश के पहले गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्रकी स्थापना की गई।

असम के धर्मपुर में देश का प्रथम गिद्ध प्रजनन केन्द्र स्थापित किया गया है। भारत में पिंजौर (हरियाणा), राजभटखाबा (पश्चिम बंगाल) तथा रानी (असम) में तीन गिद्ध संरक्षण केन्द्र संचालित किये जा रहे हैं।

गिद्ध संरक्षण परियोजना |


गिद्ध संरक्षण परियोजना Fact

  • वर्तमान में गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र में गिद्धों की तीन प्रजातियों व्हाइट-बैक्ड (White– backed), लॉन्ग-बिल्ड (long-billed) और स्लेंडर-बिल्ड (Slender–billed) का सरंक्षण किया जा रहा है।
  • गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र की स्थापना उस निर्णायक समय पर की गई जब गिद्धों की संख्या में 99 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की जा चुकी थी।
  • इस समय देश में नौ गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र हैं, जिनमें से तीन बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (Bombay Natural History Society-BNHS) के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रशासित किये जा रहे हैं।
  • गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्रों का उद्देश्य न केवल गिद्धों की देखभाल करना व उनका संरक्षण करना है बल्कि उन्हें जंगली क्षेत्रों में छोड़ना भी है।
  • इन केंद्रों का पहला उद्देश्य गिद्धों की लुप्तप्राय तीन प्रजातियों में से प्रत्येक से सैकड़ों की संख्या में गिद्धों के जोड़े पैदा करना है।

भारत के संरक्षण प्रयासों में मुख्य फोकस आईयूसीएन की गंभीर संकटग्रस्त सूची में शामिल गिद्धों की तीन प्रजातियाँ हैं, जो निम्नलिखित हैं-

  • व्हाइट-बैक्ड वल्चर (Whilte-backed Vulture)
  • स्लेंडर-बिल्ड वल्चर (Slender-billed vulture)
  • लॉन्ग-बिल्ड वल्चर (long-billed vulture)

गिद्ध संकट के कारण

  • गिद्धों की संख्या में गिरावट का प्रमुख कारण डिक्लोफिनेक (Diclofenac) दवा है, जो पशुओं के शवों को खाते समय गिद्धों के शरीर में पहुँच जाती है।
  • पशुचिकित्सा में प्रयोग की जाने वाली दवा डिक्लोफिनेक को वर्ष 2008 में प्रतिबंधित कर दिया गया। इसका प्रयोग मुख्यत: पशुओं में बुखार/सूजन/उत्तेजन की समस्या से निपटने में किया जाता था।
  • डिक्लोफिनेक दवा के जैव संचयन (शरीर में कीटनाशकों, रसायनों तथा हानिकारक पदार्थों का क्रमिक संचयन) से गिद्धों के गुर्दे (Kidney) काम करना बंद कर देते हैं जिससे उनकी मौत हो जाती है।
  • डिक्लोफिनेक दवा गिद्धों के लिये प्राणघातक साबित हुई। मृत पशुओं में, दवा से 1% प्रभावित पशु भी कम समय में गिद्धों की बड़ी संख्या को मार सकती है।
  • दवा से प्रभावित पशुओं के शवों से स्थानीय आवारा जानवर भी मारे गए हैं परंतु गिद्धों की संख्या में गिरावट का यह प्रमुख कारण है।
  • वन विभाग शिकारियों को दूर रखने के लिये पशुओं के शवों को जला रहा है या फिर दफन कर रहा है। इस प्रक्रिया से गिद्धों के लिये भोजन की कमी हो रही है।

गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र

  • गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र हरियाणा वन विभाग तथा बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी का एक संयुक्त कार्यक्रम है।
  • गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र को वर्ष 2001 में स्थापित गिद्ध देखभाल केंद्र के नाम से जाना जाता था।
  • साउथ एशिया वल्चर रिकवरी प्लान’ के प्रकाशित होने के साथ ही वर्ष 2004 में गिद्ध देखभाल केंद्र के उन्नत संस्करण के रूप में गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र की स्थापना की गई।

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