Raja Ram Mohan Roy Gk in Hindi | राजा राम मोहन राय पुनर्जागरण के पिता


Raja Ram Mohan Rai ke samajik vichar

राजा राम मोहन राय जीवनी

जन्म- 22 मई 1772 स्थान- बंगाल हुगली जिला राधानगर गाँव
मृत्यु- 27 सितम्बर 1833 स्थान इंग्लैंड
पिता- रमाकांत राय,  माता- तारिणी देवी
उपाधि- मुगल बादशाह अकबर द्वितीय (1806-1837) ने उन्हें राजा की उपाधि दी।

राजा राम मोहन राय (1772-1833)

राजा राम मोहन राय पुनर्जागरण के पिता

राजा राम मोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का पिता कहा जाता है। वह आने वाली संस्कृति और सभ्यता के विराट रूप में एक शिखर के समान थे, वे मानववाद के दूत और आधुनिक भारत के पुरखा और पिता थे। राजा राम मोहन राय द्वारा आरम्भ किए हुए भारत में पुनर्जागरण पर टिप्पणी करते हुए प्रोफेसर जे.एन. सरकार ने कहा था, ‘‘ यह एक गौरवमयी उषा का आरम्भ था, ऐसी उषा जैसे संसार में देखने को नहीं मिली...एक वास्तविक पुनर्जागरण जो यूरोपीय पुनजार्गरण, जो कस्तुनतुनिया के पतन के पश्चात आया, उससे कहीं अधिक विस्तृत था। अधिक गहरा था और क्रांतिकारी था।
इन्होंने 1772 में राधानगर में एक बंगाली ब्राहम्ण कुल में जन्म लिया। उनके पूर्वज जागीरदार थे और बंगाल के नवाबों के यहां सेवा करते थे और उन्हें उपाधियां मिली हुई थीं। राम मोहन ने आरम्भिक शिक्षा अपने ही नगर में प्राप्त की और बंगला, फारसी, संस्कृत में पर्याप्त कौशल प्राप्त कर लिया। 1790 में वे उत्तरी भारत के भ्रमण पर गए और उन्होंने बौद्ध सिद्धांतों का परिचय प्राप्त किया। अपनी उदारवादी शिक्षा से राम मोहन हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म और इस्लाम धर्म के सिद्धांतो से परिचित हो गये। 1803 में राम मोहन कंपनी की सेवा में नियुक्त किये गए ओर दिग्बी के साथ दीवान के रूप में काम करने लगे। दिग्बी महोदय ने उन्हें अंग्रेजी सिखाई और उनका परिचय उदारवादी और युक्तियुक्त विचारधारा से करवाया। 1814 में राम मोहन कलकत्ता में बस गए और लोक सेवा और सुधार के एक गौरवमय जीवन का आरम्भ किया।
भारतीय समाज ने पाश्चात्य सभ्यता के प्रति अपनी प्रतिक्रिया भिन्न रूप से व्यक्त की थी। एक ओर तो पुरानी परम्परा के लोग थे- जिनमें राजे, रजवाड़े और धार्मिक कट्टरपन्थी थे जो पाश्चात्य विचारधारा की सभी बातों में तथा अंग्रेजी नीतियों में केवल अनिष्ट ही अनिष्ट देखते थे। दूसरी ओर बंगाली अतिवादी थे जिन्हें लोग प्रायः तरूण बंगाल दल भी कहते थे। जो अंगे्रजी पढ़े लिखों की पहली सीढ़ी थी- जो पाश्चात्य विचार, सामाजिक मूल्यों, ईसईयत इत्यादि के प्रति बहुत श्रद्धा रखती थी और भारतीय संस्कृति ओर धर्म के प्रति बहुत घृणा रखने लगी थी। राम मोहन राय ने दोनों के बीच का मार्ग चुना। वह पाश्चात्य युक्तियुक्त विचार, वैज्ञानिक विचारधारा, मानव सेवा के प्रति बहुत श्रद्धा रखते थे परन्तु भारतीय संस्कृति और धर्म के प्रति भी अनदेखी करने को उद्यत नहीं थे। पादरी प्रचारकों के प्रचार और दुर्वचन पूर्ण भाषा के प्रति उनकी प्रतिक्रिया बहुत कड़ी थी। उन्होंने बंगाल हरकारूनामक मासिक पत्रिका में लिखा, ‘यदि प्रज्ञा की किरण जिसके लिए हम अंग्रेजों के आभारी है, से उनका तात्यपर्य यांत्रिक कलाओं से है तो मैं सत्य ही उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने को तैयार हूं परन्तु यदि वे विज्ञान, साहित्य और धर्म के क्षेत्र की बात करते हैं तो मैं किसी प्रकार का ऋणी नहीं हूं क्योंकि इतिहास को देखने से हम सिद्ध कर सकते हैं कि संसार मेरे पूर्वजों के प्रति अधिक ऋणी है,ज्ञान के लिए जो पूर्व में आरम्भ हुआ और बुद्धि की देवी की कृपा से हमारे पास एक दार्शनिक और विपुल भाषा है जो हमें उन देशों से भिन्न बना देती है जो वैज्ञानिक तथा भाववाची विचारों को प्रकट करने के लिए विदेशी भाषा की सहायता के बिना काम नहीं कर सकते‘‘

राममोहन राय की भारत के आधुनिकीकरण में भूमिका

उनका हृदय पूर्व और पश्चिम के उत्तम तत्वों के समन्वय में लगा था जिसे वह समकालीन भारतीय स्थितियों में स्थापित करना चाहते थे। उन्हें सत्य ही भारत के आधुनिकीकारक के रूप में स्मरण किया जाता है क्योंकि उनके अत्याधिक और भिन्न-भिन्न कार्यों  से विशेष कर सामाजिक तथा धार्मिक सुधारों के कारण, पश्चिमी शिक्षा पद्धति के प्रसार के लिए किए गए कार्य के कारण, नागरिक आधिकारों के समर्थन के कारण, समाचारपत्र की स्वतंत्रता के समर्थन, संसार में संवैधानिक आंदोलन के समर्थन के कारण- इस सभी के फलस्वरूप भारत में एक उदारवादी और विश्वमित्रता की भावना तथा आधुनिक विचारधारा का सूत्रपात हआ।

स्त्रियों की स्थिति में सुधार

समाज सुधार के क्षेत्र में तो सत्य ही वह प्रभात का तारा थे। उनका मुख्य उद्देश्य स्त्रियों के प्रति अधिक उत्तम व्यवहार प्राप्त करना था। अमानुषी सती प्रथा को समाप्त करवाने के लिए जो प्रयत्न उन्होंने किए वे विश्वविख्यात हैं। वह समकालीन लोगों से बहुत आगे थे जब उन्होंने स्त्रियों के लिए पुनर्विवाह का अधिकार मांगा तो उनके पक्ष में उत्तराधिकार के अधिकारों में भी परिवर्तन की मांग की। वे बाल विवाह और बहुपत्नी विवाहों को बंद करवाना चाहते थे। इससे अधिक वह उनकी शिक्षा के पक्ष में थे क्योंकि उसे बिना उनके समाज में अच्छा स्थान प्राप्त करने की बात नहीं सोची जा सकती थी।

जातिवाद पर प्रहार

उन्होंने जातिवाद पर प्रत्यक्ष प्रहार किया। उनके अनुसार जातिपांति के कारण भारतीय समाज जड़ हो गयाथा और इससे लोगों की एकता तथा घनिष्ठता में बाधा पड़ती थी। इनके अनगिनत विभाजनों के कारण देश प्रेम की भावना उत्पन्न नहीं होती। राजा सहिब ने सुझाव दिया कि जातिपांति के बंधनों को हटाने के लिए शैव वैवाहिक पद्धति अपनानी चाहिए।

राजा राम मोहन राय के धार्मिक क्षेत्र में विचार

धर्म के मामलें में उनके विचार उपयोगितावादी थे। लोग उन्हें धार्मिक बेन्थम अनुयायी कहते थे। वह धर्मों को भिन्न भिन्न आधारभूत सत्यों पर परखना नहीं चाहते थे अपितु उनके सामाजिक लाभ को देखते थे। उनका बल नैतिक और सामाजिक तत्वों पर था जो सभी धर्मों में एक है। इसलिए वह सभी धर्मो की एकता पर बल देते थे। उनके विचारों ने ब्रह्म समाजके रूप में अपने आपको प्रकट किया। ब्रह्म समाज का उद्देश्य उस शाश्वत, अप्राप्त और अचल ईश्वर की पूजा था  जो सभी धर्म कर सकते थे जैसा कि ब्रह्म समाज के प्रन्यास पत्र में स्पष्ट था, उनका उद्देश्य संसार के सभी धर्माें को जाति, मत देश इत्यादि  से दूर ईश्वर के चरणों में लाना था।

राजा राम मोहन राय के अंग्रेजी शिक्षा के क्षेत्र में विचार

शिक्षा के क्षेत्र में वह अंग्रेजी शिक्षा के पक्ष में थे। उनके अनुसार एक उदारवादी पाश्चात्य शिक्षा ही अज्ञान के अंधकार से हमें निकाल सकती है और भारतीयों को देश के प्रशासन में भाग दिला सकती है। इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने लार्ड एमहस्र्ट को दिसम्बर 1823 को एक पत्र लिखा था, ‘यदि अंग्रेजी संसद की इच्छा यह है कि भारत अंधकार में रहे तो संस्कृत शिक्षा से उत्तम कुछ नहीं हो सकता। परन्तु सरकार का उद्देश्य भारतीय लोगों को अच्छा बनाना है अतएव सरकार को एक उदारवादी शिक्षा का प्रसार करना चाहिए जिसमें गणित, सामान्य दर्शन, रसायन शास़्त्र, शरीर विज्ञान तथा अन्य लाभदायक विज्ञान इत्यादि सम्मिलत हो।

राजा राम मोहन राय के राजनैतिक विचार

राजनैतिक क्षेत्र में उनका विचार था कि अंग्रेजी साम्राज्य एक वास्तविकता है और वह समझते थे कि यह भारत के विकास में एक पुनर्जन्म देने वाली शक्ति के रूप में कार्य करेगा। वास्तव में उन्नीसवीं शताब्दी के उदारवादी विचाराकों के अग्रदूत थे। उनके अनुसार भारत को अंग्रेजी राज्य की कई वर्षों तक आवश्यकता रहेगी ताकि जिन दिनों वह अपनी राजनैनिक स्वतंत्रता के लिए प्रयत्नशील होें देश की एक अत्याधिक हानि न हो अर्थात् उनके अनुसार अंग्रेजों के अधीन ही भारत नागरिक और राजनैतिक स्वतंत्रताएं प्राप्त कर सकता है और सभ्य संसार में अपना स्थान प्राप्त कर सकता है।
उन्होंने उत्तरदायी सरकार की मांग नहीं की परन्तु प्रशासन में बहुत सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया जैसे कि अधिक अच्छी न्यायपालिका, कार्यकारिणी का न्यायपालिका से पृथकीकरण, भारतीयों की सेवाओं में भर्ती और समचार पत्रों की स्वतंत्रता इत्यादि।
वह स्वतंत्रता के उग्र प्रेमी थे और यह प्रेम देशी की सीमाओं से दूर तक फैला था। उदाहरण के रूप में जब पवित्र संघ  की शक्तियों (रूस, आस्ट्रिया तथा प्रशा) ने नेपल्ज (इटली में) लोकप्रिय आंदोलन को दबा दिया तो उन्हें बहुत दुःख हुआ और उन्होंने अपनी नियुक्ति रद्द कर दी। इसी प्रकार जब 1821 में जब स्पेन में संवैधानिक सरकार स्थापित हुई तो उन्होंने कलकत्ता में इस अवसर पर समारोह किया। ब्रजेन्द्रनाथ सील ने ठीक ही कहा है कि ‘‘राजा  साहिब ने अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति के और मानव इतिहास की सभ्यता के महत्वपूर्ण प्रश्नों के समाधान करने की सोची...वह आनेवाली मानवता के भविष्य वकता बन गए।‘‘

राममोहन राय के कार्यों का मूल्यांकन

आलोचकों ने कहा है कि उनके समाज तथा धर्म के कार्यों की सफलता सीमित थी। प्रोफेसर हिरेन मुकर्जी ने 19वीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण और 16वीं शताब्दी के यूरोपीय पुनर्जागरण की तुलना को मूलभूत रूप से अशुद्ध बतलाया है क्योंकि उस पुनर्जागरण से संसार का रूप ही बदल गया। राम मोहन ने पूर्व और पाश्चातय का समन्वय लाने का प्रयत्न तो अवश्य किया परन्तु वह समन्वय निम्न स्तर का था। जैसा कि प्रोफेश्वर सुशोभन सरकार ने दिखलाया कि सच्चा समन्वय दोनों विरोधियों को मिलाकर एक तीसरे परन्तु अधिक अच्छे समन्वय में होना चाहिए जो कि दोनों संस्कृतियों से अधिक अच्छा हो। हमारे पुनर्जागरण में वह तीसरा और अधिक ऊंचा समन्वय कहां है।
यह स्वीकार करना पड़ेगा कि जैसा प्रत्येक युग के महापुरूषों के विषय में होता है कि वे अपनी सफलताओं से कहीं अधिक बड़े होते हैं। समकालीन परिस्थितियों की सीमाओं को देखते हुए हम कह सकते हैं कि राजा राम मोहन राय वास्तव में एक महान दृष्टि वाले व्यक्ति थे और अपने समकालीन लोगों से बहुत ऊंचे और आगे थे।

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