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पारिस्थितिकी तंत्र में संचरित होने वाले पोषक तत्व { Nutrients Circulated in Ecosystem }

Nutrients Circulated in Ecosystem

पारिस्थितिकी तंत्र में संचरित होने वाले पोषक तत्व Nutrients Circulated in Ecosystem


पारिस्थितिकी तंत्र में संचरित होने वाले पोषक तत्वों को निम्न तीन वर्गों में विभाजित किया गया है-

  • 01- वृहद मात्रिक या अधिक मात्रिक पोषक तत्व- पौधेां को आक्सीजन, कार्बन, हाइड्रोजन तत्वों की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है, अतः इन्हें अधिक मात्रिक पोषक तत्व कहते हैं। ये तत्व जीवों की कोशिकाओं के निर्माण करते हैं। तथा जीवों में चर्बी तथा कार्बोहाइड्रेट के मुख्य घटक होेते हैं।
  • 02- गौण मात्रिक तत्व- इसके अंतर्गत नाइट्रोजन, पोटेशियम, फास्फोरस, कैल्शियम, मैग्नीशियम तथा गंधक को सम्मिलत किया जाता है। पौधों को इनकी अल्प मात्रा में आवश्यकता रहती है। नाइट्रोजन प्रोटीन के निर्माण तथा संशलेषण में सहायक होती है। फास्फोरस जीवों में न्यूक्लिक अम्ल तथा कोशिकाद्रव्य का निर्माण करता है तथा जीवों में विभिन्न कोशिकाओं से ऊर्जा से स्थानान्तरण एवं गमन में सहायक होता है। कैल्शियम जीवों की कोशिकाओं की दीवारों को दृढ़ बनाता है तथा मैग्नीशियम क्लोरोफिल का उत्पादन करता है।
  • 03- सूक्ष्म मात्रिक तत्व- पौधों को जिन तत्वों की बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती है उन्हें सूक्ष्म मात्रिक तत्व कहा जाता है। वैसे तो पौधों को लगभग 100 सूक्ष्म मात्रिक तत्वों की आवश्यकता होती हे, परन्तु सर्वाधिक महत्व वाले तत्वों में लोहा, तॉबा, मैगनीज, जस्ता, बोरॉन क्लोरीन तथा मॉलिबडिनम आदि प्रमुख हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा और ऊर्जा-प्रवाह Energy Flow in Ecosystem

इस सृष्टि में समस्त जीवधारियों के जीवन-प्रवाह के लिए ऊर्जा अत्यन्त आवश्यक है। ये जीवधारी अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए कार्य करते रहते हैं और कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। सभी जैवीय क्रियाओं को करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस धरती पर समस्त जीवधारियों के ऊर्जा का एक मात्र मूल स्त्रोत सूर्य है। इसकी ऊर्जा का लगभग एक प्रतिशत ही हरे पौधे प्रकाश संशलेषण द्वारा संचित करते हैं और यही ऊर्जा बाद में सम्पूर्ण जीव-जगत को ऊर्जा प्रदान करती है।

ऊर्जा के प्रकार- यह मुख्यतः चार प्रकार की होती है-

01- विकिरण ऊर्जा

02- ऊष्मा ऊर्जा

03- रासायनिक ऊर्जा

04- यांत्रिक ऊर्जा

  • सूर्य द्वारा ऊर्जा किरणों के रूप में प्राप्त होती है जिसे विकिरण ऊर्जा कहते हैं। कुछ ऊर्जा प्रकाश के रूप में दिखाई पड़ती है जो शीघ्र ही ऊष्मा ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है जिसके कारण वातावरण गर्म लगता है। हरे पौधे विकिरण ऊर्जाको पर्ण हरिम क्लोरोफिल की सहायता से कार्बन डाई ऑक्साईड व जल की उपस्थिति में रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित कर देते हैं। यांत्रिक ऊर्जा द्वारा कार्य होता है। यह दो प्रकार की होती है- स्थितिज ऊर्जा व गतिज ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा सदैव संचित रहती है। जब इसका परिवर्तन स्वतंत्र ऊर्जा में होता है तो वह गतिज ऊर्जा कहलाती है।
ऊर्जा का अन्तर्परिवर्तन Inter Conversion of Energy -

पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न प्रकार की ऊर्जा का एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन कुछ निश्चित नियमों के अनुसार होता है। इन्हें ऊष्मा गतिज नियम कहते हैं। ये निम्नलिखित हैं-

1- प्रथम ऊष्मा गतिज नियम- ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न नष्ट की जा सकती है। इसका विभिन्न रूपों में रूपांतरण किया जा सकता है।

2- द्वितीय ऊष्मा गतिज नियम- जब ऊर्जा का एक रूप दूसरे रूप में परिवर्तन होता है तो ऊर्जा के कुछ भाग का विसरण हो जाता है अर्थात् उष्मा के रूप में वह वायुमण्डल में वापस चली जाती है।

उर्जा प्रवाह Energy Flow-

  • आत्मपोषी पौधे अर्थात हरि वनस्पति पर्णहरिम की उपस्थिति में सूर्य के प्रकाश की विकिरण ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाई आक्साइड तथा जल से प्रकाश संशलेषण द्वारा शर्करा का निर्माण करते हैं। सरल शर्करा में सूर्य के प्रकाश की विकिरण ऊर्जा, बंध ऊर्जा के रूप में सचित हो जाती है। पौधे शर्करा को भूमि से अवशोषित खनिज लवणों की सहायता से जटिल कार्बनिक भोज्य पदार्थों ( मण्ड, प्रोटीन, वसा) में परिवर्तित करते हैं।
  • प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता ( शाकाहारी जंतु ) पौधों द्वारा निर्मित जटिल कार्बनिक भोज्य पदार्थों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं। जो पचने के पश्चात उनके शरीर के निर्माण व वृद्धि में सहायक होता है। इस प्रकार हर श्रेणी के उपभोक्ता जंतु या वनस्पतियों को भोजन के रूप में ग्रहण करके ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इसके अतिरिक्त इन भोज्य पदार्थों का श्वसन क्रिया के अंतर्गत ऑक्सीकरण होता है जिसके फलस्वरूप इनमें संचित बंन्ध ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा के रूप में मुक्त होती है। शेष ऊर्जा एडिनोसिन ट्राई फास्फेट (एटीपी) के रूप में संचित होती है। ए.टी.पी. का जलीय अपघटन होने पर पुनः ऊर्जा मुक्त हो जाती है।
  • इस ऊर्जा के द्वारा जंतु शरीर में होने वाली समस्त जैविक क्रियाएं सम्पन्न होती हैं।
  • कुछ जीवाणु व कवक जंतु या पौधों के मृत शरीर को अपघटित करके उनके ऊर्जा प्राप्त करते हैं। कुछ जीवाणु ( नाइट्रोकारी, सल्फर, आयरन, हाइड्रोजन व मीथेन जीवाणु ) अकार्बनिक पदार्थों में आक्सीकरण द्वारा ऊर्जा प्राप्त करते हैं और इस ऊर्जा की सहायता से कार्बन डाय आक्साइड व जल द्वारा कार्बोहाइडेªट्स का निर्माण करते हैं। इस क्रिया को केमोसिन्थेसिस कहते हैं। 
  • पौधों के मृत अवशेष पृथ्वी के अन्दर हजारों वर्षो के बाद कोयले, पेट्रोलियम एवं गैस के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इनके दहन से भी ऊर्जा प्राप्त होती है जिनका प्रयोग आजकल की विभिन्न स्वचलित मशीनों को चलाने में किया जाता है।
  • इस प्रकार पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्रों में ऊर्जा का प्रवाह सूर्य से पौधों में, पौधों से क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय व उच्चतम श्रेणी के उपभोक्ता जंतुओं में तथा इनका अपघटन जीवाणु , कवको द्वारा होता है।
  • प्रत्येक पोषण स्तर में वियोजक जीवों से श्वसन द्वारा ऊर्जा का ऊष्मा के रूप में वायुमण्डल में निर्गमन तथा क्षय होता हैं जीवों द्वारा श्वसन के माध्यम से वायुमण्डल में क्षय की गयी ऊष्मा-ऊर्जा जीवों के उपभोग के लिए पुनः सुलभ नहीं हो पाती है। इस प्रकार पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एक दिशा में होता है, इसका चक्रण एवं पुनर्चक्रण नहीं होता है।
ऊर्जा की इकाई Unit of Energy- 
  • ऊर्जा की इकाई अर्ग है। एक करोड़ अर्ग ( 107 अर्ग ) एक जूल के बराबर होता है। हर पकार की ऊर्जा, ऊष्मा में पूर्ण रूप से परिवर्तित की जा सकती है। पारिस्थितिकी विज्ञान में ऊर्जा को ऊष्मा इकाई में मापते हैं। ऊष्मा कैलोरी में मापी जाती है। एक कैलोरी 4.2 इन टू 107 अर्ग के बराबर होती है। एक हजार कैलोरी को एक किलो कैलोरी कहते हैं।

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